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सन्देश

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बुधवार, 9 जनवरी 2013

शशांक मिश्र ’भारती’ के मुक्तक




1ः-
तेरे आने का इन्तजार रहता है मुझे कब से,
तुम आती हो वर्ष में बसन्त ऋतु में जब से।
रंग-बिरंगे परिवेश को जैसा लाता मौसम
ले जाओ घृणाभाव भारत जन से ही वैसे।।



2ः-
देखो कहीं बहक न जाये मन तम की बातों में,
उस ज्ञान को छोड़ अज्ञान रूपी काली रातों में।
असत्य लोभ,ईष्र्या-द्वेष को छोड़कर के तुम
मिल जाओ सत्यं शिवं सुन्दरं की बातों में।।



3ः-
होली में जिस तरह के हैं रंग-बिरंगे परिवेश,
वैसे ही देश में भिन्न भाषाएं धर्म और भेष
किन्तु जो रखे हुए है सदैव से एकता सुत्र में
वही हमारी भारतीय संस्कृति का पावन संदेश।।



4ः-
सत्य को सदा समर्थन दो मत दो झूठे वादों को,
मैं तुमको वहीं मिलूंगा सत्य धर्म की रातों में।
आपसी मन मुटाव मिटाके तुम जन-जन का।
मिल जाओ अपनत्व भाव से होली की रातों में।।



5ः-
भेदभाव मिटे सर्वजनों के दिलों में तभी होली है,
लोगों का आपसी प्रेमभाव ही राष्ट की खुशहाली है।
मात्र ढोग आपसी घृणा मिटाने का करने से क्या-
दिलों में भी प्रेम अपने जगाओ आई आज होली है।।




6ः-
जन-जन मिलते हैं परस्पर हिल-मिल कर,
दूर करते हैं तम अपने अन्दर का घुल-मिल कर।
आज व्याप्त है देश में घृणा हिंसा का दौर
रोको सर्वजन आपस में प्रेमभाव जगाकर।।


7ः-

तम प्रकाश का आशय अबकी समझ लो इस होली में,
पुरुषार्थ चतुष्टय का अर्थ समझ लो इस होली में।
तूम निर्णय लो अपने मन में व्याप्त जंजालों का
घृणा-भेदभाव, ईष्र्या को प्रेम से जीत लो होली में।

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नेताओं का देखो राष्ट्रव्यापी पहनावा है कैसा,
नीतियां वही चोला का चोली सा बाना है वैसा।
देश की बदली परिस्थितियों से उन्हें क्या लेना
सत्ता-पद में फंस गये, देश से परे है पैसा।।




बहाने को अपनाने से कुछ होता नहीं,
ढोंग का भूषण पहन आता रोना भी कहीं।
स्वंय शूल बोकर फूल खिलें सोचते हो
पाओगे वही सब कुछ जो बोया था कभी।।




वह बहारों के शहर से लाये गये हैं,
डूबते सितारों सा बचाये गये है
स्वार्थ में डूबा देखका चैंकिए नहीं
सुख-साधन ही तो बनाये गये हैं।।




रात-दिन के आश्वासनों से होता क्या
चोर लूटने लगा, गधा रेंककर करेगा क्या
स्वंय लूटखोर होकर जब चिल्लाओगे तुम
घर भरोगे अपना देश का भला करोगे क्या?




नेता बदल रहा है वादा बदल रहा है,
अदला न बदली हुई इरादा बदल रहा है।
आज बना कौआ कल बन बैठे उल्लू
चोला गया कब का चोली बदल रहा है।।




आसन बदल जाने से कुछ होता नहीं,
कुर्सी से परे उनने है सबकुछ कही।
जनता के हित की परिभाषा भी क्या?
जब तक देते वो कोरे वायदों की मही।।

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वर्ष नया मनाने से पहले स्वंय नया बन जाना होगा,
जो अब तक अपना कहते, पहले उन्हें अजमाना होगा।
गली-गली आतंक फैलाते संसद तक कैसे पहुंच गए,
ऐसी नापाकी करतूतों का मायाजाल हटाना होगा।।




आतुर खिलने को कलियां खिल जाने दो,
मिलन भाव भर रखा तो मिल जाने दो।
आने वाले अभ्यागत के स्वागत हित बढ़ो-
छिन्द्रवशेष-शेष वसन में जल जाने दो।।




वर्ष नया इस बार शीघ्र ही आने वाला है,
होंठों पर नयी मुस्कान सभी के लाने वाला है।
घर-घर गलियों में गूंजेगा इसका शोर
नव उत्साह संकल्प धरें, यह बतलाने वाला है।।




वर्ष नया इस बार देखिये आने वाला है,
हर्ष-उमंगे चारों ओर ये फैलाने वाला है।
खुश होकर के सब लोग बधाईयां देंगे-
नूतन उल्लास सभी में यह जगाने वाला है।

वर्ष नया हम सभी सदैव ही रहे मनाते है,
क्या उद्देश्यों को भी इसके पूरा करवाते हैं।
तिथिबदलने कलैण्डर हटजाने से कुछ न होता-
बीते वर्षों सी गलतियां जब हम दुहराते हैं।।




चन्द्र मुखी सी असंख्य कथायें चन्द्रयान से बदल गयीं,
पर्व-त्यौहार प्रतिवर्ष मनाये क्या कुछ समझ भयी।
हैप्पी न्यू ईयर कहने भर से कुछ नहीं है हो सकता-
जब तक पूर्वाग्रह त्याग मनोदशा हो नहीं नयी।।




त्याग-त्याग की बात कह देने भर से क्या हो सकता है,
लोभ आवरण अहं प्राण जब नहीं सो सकता है।
बीते वर्ष का मुल्यांकन-आत्मनिरीक्षण नहीं हुआ तो-
यूंही नववर्ष मनेगा परिवर्तन क्या हो सकता है।



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1:-
रीति-नीति है पीछे छूटी सब कुछ यहां नया बन आया,
प्राच्यता को पुराना समझा, संदेशा नया संगणक लाया।
वेश और भेष दोनों हैं बदला गिट-पिट की शौकत छाई,
रिश्ते, अंकल-आण्टी में जकड़े;मम्मी मम,पापा डेड भाई।


2ः-
पागल बन दुनियां में जीते हैं लोग,
दहशत ने कायर बना दिये हैं लोग।
कुछ का काम है गरीबों का दमन,
अमीरों के कुचक्र में फंसते हैं लोग ।।


3ः-
वर्ष नया मनाने से पहले स्वंय नया बन जाना होगा,
जो अब तक अपना कहते, पहले उन्हें अजमाना होगा।
गली-गली आतंक फैलाते संसद तक कैसे पहुंच गए,
ऐसी नापाकी करतूतों का मायाजाल हटाना होगा।।



4ः-
विदेशी बोलते अपनी भाषायें हम विदेशी में जीते हैं।
स्वभाषा-गौरव की न रक्षा प्याला गरल का पीते हैं।
निज भाषा उन्नति ही अपनी एकता का सूत्र है होती,
उसके स्वाभिमान की रक्षा बिन स्वप्न सभी रीते हैं।।



5ः-
आज की नीतियां कुछ बदली नहीं लगती हैं,
बुझी हुई चिन्गारियां भी पुनः जल उठती हैं।
ऐसी स्थिति सोचो, अपने देश का क्या होगा-
तुष्टिकरण से कहीं रणभेरियां भी बजती है।।


6ः-
जहां चाहें जैसे खर्च करते यह दाम हैं।
योजनाओं में इनके कागजी ही काम है।
समाज में व्याप्त यह हैं रक्त लोभी जोंके,
भारतीय होकर भी अंग्रेजी की गुलाम हैं।।


7ः-
मेरी इच्छा सदा देश में खुशहाली बनी रहे,
सुख-शान्ति राष्ट्र के जन-जन में बसी रहे।
ईश्वर से चाहत हमभाव-भाव से सभी मिलेें,
समाज-देश में नूतन क्रांति के फूल खिलें।।


8ः-
नेताओं का देखो राष्ट्रच्यापी पहनावा है कैसा,
नीतियां वही चोला का चोली सा बाना है वैसा।
देश की बदली परिस्थितियों से उन्हें क्या लेना
सत्ता-पद में फंस गये, देश से परे है पैसा।।


9ः-
सत्य को अपनाओ यह मानवता की पुकार है,
भूलने से इसके ही तो अपराधों की भरमार है।
हिंसा की चिंगारी से रह-रह कर लपटें उठती-
अलगाव-द्वेष से फैले असन्तोष की भरमार है।।


10ः-
बालकों में आदर्शों का निर्णायक होता है शिक्षक,
नैतिक मूल्यों उच्चचरित्र का परिचायक है शिक्षक।
स्वंय बनकर आदर्श कहलाता जो है- सुनायक....
अनुकरण प्रक्रिया का मापक बालकों का शिक्षक।।