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सन्देश

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और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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रविवार, 13 जनवरी 2013

ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग'

जन्म तिथि- 4 मई 1933 को ग्राम-जगम्मनपुर, जनपद-जालौन (उ.प्र.)प्रकाशित कृतियाँ- धरती का कर्ज़, देहरी-दीप और अनकहा ही रह गया(कविता संग्रह), नदी में आग लगी है, फूल के अधरों पे पत्थर(ग़ज़ल संग्रह), दर्रों का देश लद्दाख (यात्रा वृत्तांत)। 
१.
फूल के अधरों पे पत्थर रख दिया
गंध को काँटों के अंदर रख दिया


यों नए उपचार अज़माए गए
ज़ख़्म को मरहम के ऊपर रख दिया

धार के तेवर परखने के लिए
अपने ही सीने पे खंजर रख दिया

अंध बाज़ारीकरण के दौर ने
घर को दरवाज़े से बाहर रख दिया

यह खुलापन तो दुशासन हो गया
ज़िंदगी का चीर हरकर रख दिया

जब बदल पाए न बेढ़ब सूरतें
आइनों को ही बदलकर रख दिया

क्या अजब भाषा है दुनिया की 'पराग'
राहजन का नाम रहबर रख दिया!

२.
धर्मशाला को वो घर कहने लगा है
मूर्ख मेले को नगर कहने लगा है


जो किसी भी मोड़ पर है छोड़ जाती
उस डगर को हमसफ़र कहने लगा है


रच रहा है दूरगामी योजनाएँ
चार दिन को उम्र भर कहने लगा है


आधुनिकता का चढ़ा है भूत ऐसा
देव-सरिता को गटर कहने लगा है


वो नया पंडित विदेशी व्याकरण का
श्लोक को खारिज-बहर कहने लगा है


दाग़ चेहरे के छुपाने के लिए वो
आइने को बेअसर कहने लगा है


सोचकर मिलना 'पराग' उस आदमी से
वो स्वयं को मान्यवर कहने लगा है!


३.
अपना-अपना मधुकलश है, अपना-अपना जाम है
अपना-अपना मयक़दा है, अपनी-अपनी शाम है


क्या कहा जाता, सुना जाता है क्या, किसको पता
हाँफती साँसों के घर बस शोर है कुहराम है


मील के पत्थर हटाकर, खोजते मंज़िल को लोग
वक़्त के पदचिन्ह धूमिल, राहबर नाकाम है


आज में जीती है दुनिया, कल न था, होगा न कल
धार ही आग़ाज़ इसका, धार ही अंजाम है


लोग कुछ कूड़ा बनाने पर तुले इतिहास को
और कूड़ा बीनने वालों का मालिक राम है


कोई ऐसा भी तो होना चाहिए इस दौर में
जो कहे सारी खुशी मेरी तुम्हारे नाम है


दूसरों के दर्द को जब ख़ास समझोगे 'पराग'
तब लगेगा दर्द अपना कुछ नहीं बस आम है!