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बुधवार, 16 जनवरी 2013

ज़हीर क़ुरैशी

जन्म - 5 अगस्त,1950 को चंदेरी (ज़िला:गुना,म.प्र.) में.प्रकाशित ग़ज़ल-संग्रह:लेखनी के स्वप्न(१९७५),एक टुकड़ा धूप(1979),चाँदनी का दु:ख(1986),समन्दर ब्याहने आया नहीं है(1992),भीड़ में सबसे अलग(2003)
१.
लीक तोड़ी तो चल नहीं पाए,
लोग, रस्ते बदल नहीं पाए।


उसने रातों में जुगनुओं की तरह,
भय से उन्मुक्त पल नहीं पाए।


सोच में थी कहीं कमी कोई,
दुःख से बाहर निकल नहीं पाए।


तुम समझते रहे जिन्हें उर्वर,
फूल के बाद, फल नहीं पाए।


हमने सत्ता के साथ मिल कर भी,
हर समस्या के हल नहीं पाए।


एक बच्चे को शक्ल मिल जाती,
भ्रूण साँचे में ढल नहीं पाए।


सूर्य की कोशिशें हुईं नाकाम,
हिम के पर्वत पिघल नहीं पाए।


२.
क्या पता था कि किस्सा बदल जाएगा,
घर के लोगों से रिश्ता बदल जाएगा।


हाथ से मुँह के अंदर पहुँचने के बाद,
एक पल में बताशा बदल जाएगा।


दो दशक बाद अपने ही घर लौट कर,
कुछ न कुछ घर का नक्शा बदल जाएगा।


वो बदलता है अपना नज़रिया अगर,
सोचने का तरीका बदल जाएगा।


चश्मदीदों की निर्भय गवाही के बाद।
खुद-ब-खुद ये मुकदमा बदल जाएगा।


लौट आया जो पिंजरे में थक-हार कर,
अब वो बागी परिंदा बदल जाएगा।


घर के अंदर दिया बालते साथ ही,
घुप अंधेरे का चेहरा बदल जाएगा।

३.
सबकी आँखों में नीर छोड़ गए।
जाने वाले शरीर छोड़ गए।


राह भी याद रख नहीं पाई
क्या... कहाँ राहगीर छोड़ गए?


लग रहे हैं सही निशाने पर,
वो जो व्यंगों के तीर छोड़ गए।


एक रुपया दिया था दाता ने,
सौ दुआएँ फकीर छोड़ गए।


उस पे कब्ज़ा है काले नागों का,
दान जो दान-वीर छोड़ गए।


हम विरासत न रख सके कायम,
जो विरासत 'कबीर' छोड़ गए।


४.
अँधेरे की सुरंगों से निकल कर
गए सब रोशनी की ओर चलकर

खड़े थे व्यस्त अपनी बतकही में
तो खींचा ध्यान बच्चे ने मचलकर

जिन्हें जनता ने खारिज कर दिया था
सदन में आ गए कपड़े बदलकर

अधर से हो गई मुस्कान ग़ायब
दिखाना चाहते हैं फूल—फलकर

लगा पानी के छींटे से ही अंकुश
निरंकुश दूध हो बैठा, उबलकर

कली के प्यार में मर—मिटने वाले
कली को फेंक देते हैं मसलकर

घुसे जो लोग काजल—कोठरी में
उन्हें चलना पड़ा बेहद सँभलकर


५.
घर छिन गए तो सड़कों पे बेघर बदल गए
आँसू, नयन— कुटी से निकल कर बदल गए

अब तो स्वयं—वधू के चयन का रिवाज़ है
कलयुग शुरू हुआ तो स्वयंवर बदल गए

मिलता नहीं जो प्रेम से, वो छीनते हैं लोग
सिद्धान्त वादी प्रश्नों के उत्तर बदल गए

धरती पे लग रहे थे कि कितने कठोर हैं
झीलों को छेड़ते हुए कंकर बदल गए

होने लगे हैं दिन में ही रातों के धत करम
कुछ इसलिए भि आज निशाचर बदल गए

इक्कीसवीं सदी के सपेरे हैं आधुनिक
नागिन को वश में करने के मंतर बदल गए

बाज़ारवाद आया तो बिकने की होड़ में
अनमोल वस्तुओं के भी तेवर बदल गए.


६.

वो हिम्मत करके पहले अपने अन्दर से निकलते हैं
बहुत कम लोग , घर को फूँक कर घर से निकलते हैं

अधिकतर प्रश्न पहले, बाद में मिलते रहे उत्तर
कई प्रति-प्रश्न ऐसे हैं जो उत्तर से निकलते हैं

परों के बल पे पंछी नापते हैं आसमानों को
हमेशा पंछियों के हौसले ‘पर’ से निकलते हैं

पहाड़ों पर व्यस्था कौन-सी है खाद-पानी की
पहाड़ों से जो उग आते हैं,ऊसर से निकलते हैं

अलग होती है उन लोगों की बोली और बानी भी
हमेशा सबसे आगे वो जो ’अवसर’ से निकलते हैं

किया हमने भी पहले यत्न से उनके बराबर क़द
हम अब हँसते हुए उनके बराबर से निकलते हैं

जो मोती हैं, वो धरती में कहीं पाए नहीं जाते
हमेशा कीमती मोती समन्दर से निकलते हैं
७.
यहाँ हर व्यक्ति है डर की कहानी
बड़ी उलझी है अन्तर की कहानी

शिलालेखों को पढ़ना सीख पहले
तभी समझेगा पत्थर की कहनी

रसोई में झगड़ते ही हैं बर्तन
यही है यार, हर घर की कहानी

कहाँ कब हाथ लग जाए अचानक
अनिश्चित ही है अवसर की कहानी

नदी को अन्तत: बनना पड़ा है
किसी बूढे़ समन्दर की कहानी
८.

मुश्किल से मुझको आपके घर का पता लगा
घर का पता लगा तो हुनर का पता लगा


अंकों के अर्थ शून्य ने आकर बदल दिए
भारत से सारे जग को सिफ़र का पता लगा


जंगल को छोड़ना ही सुरक्षित लगा उसे
चीते को जब से शेरे-बबर का पता लगा


उसने निकाह करने से इन्कार कर दिया
जब उसको तीन लाख मेहर का प्ता लगा


कितने हज़ार डर हैं हरएक आदमी के साथ
क्या आपको भी आपके डर का पता लगा?


टिड्डी दलों -से टूट पड़े चींटियॊं के दल
जैसे ही चींटियॊ को शकर का पता लगा


मंत्रों की शक्ति पर मुझे विश्वास हो गया
जब से मुझे ग़ज़ल के असर का पता लगा
९.

किस्से नहीं हैं ये किसी बिरहन की पीर के
ये शे’र हैं अँधेरों से लड़ते जहीर के

मैं आम आदमी हूँ तुम्हारा ही आदमी
तुम,काश, देख पाते मेरे दिल को चीर के

सब जानते हैं जिसको सियासत के नाम से
हम भी कहीं निशाने हैं उस खास तीर के

चिन्तन ने कोई गीत लिखा या गज़ल कही
जन्मे हैं अपने आप ही दोहे कबीर के

हम आत्मा से मिलने को व्याकुल रहे मगर
बाधा बने हुए हैं ये रिश्ते शरीर के