" हिन्दी काव्य संकलन में आपका स्वागत है "


"इसे समृद्ध करने में अपना सहयोग दें"

सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
हिन्दी काव्य संकलन में उपल्ब्ध सभी रचनायें उन सभी रचनाकारों/ कवियों के नाम से ही प्रकाशित की गयी है। मेरा यह प्रयास सभी रचनाकारों को अधिक प्रसिद्धि प्रदान करना है न की अपनी। इन महान साहित्यकारों की कृतियाँ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना ही इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य है। यदि किसी रचनाकार अथवा वैध स्वामित्व वाले व्यक्ति को "हिन्दी काव्य संकलन" के किसी रचना से कोई आपत्ति हो या कोई सलाह हो तो वह हमें मेल कर सकते हैं। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जायेगी। यदि आप अपने किसी भी रचना को इस पृष्ठ पर प्रकाशित कराना चाहते हों तो आपका स्वागत है। आप अपनी रचनाओं को मेरे दिए हुए पते पर अपने संक्षिप्त परिचय के साथ भेज सकते है या लिंक्स दे सकते हैं। इस ब्लॉग के निरंतर समृद्ध करने और त्रुटिरहित बनाने में सहयोग की अपेक्षा है। आशा है मेरा यह प्रयास पाठकों के लिए लाभकारी होगा.(rajendra651@gmail.com),00971506823693 (UAE)

समर्थक

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

अब्बास रज़ा अलवी


परिचय:
फतेहगढ़ उत्तर प्रदेश में जन्मे अब्बास रज़ा अलवी ने फतेहगढ़, अलीगढ़ विश्वविद्यालय व मास्को में शिक्षा प्राप्त की। आजकल आस्ट्रेलिया के नागरिक अब्बास रज़ा अलवी सिडनी में आयात निर्यात का व्यवसाय कर रहे हैं। अस्ट्रेलिया में इंडिया चेम्बर आफ़ कामर्सके अध्यक्ष है।
सम्पर्कalvis@bigpond.net.au
*******************************************

१.
फ़िसादो दर्द और दहशत में जीना
मिला यह आदमी को आदमी से

बुरा कहते हैं हम क्यों किस्मतों को
बढ़ी हैं रंजिशें अपनी कमी से

वतन ऐसा जलाया बिजलियों ने
सहम जाते हैं अब हम रोशनी से

जहाँ गुज़रा था एक बचपन सुहाना
वह दर छूटा है कितनी बेदिली से

न जब कोई तुम्हारे पास होगा
बहुत पछताओगे मेरी कमी से

कभी तो यह हक़ीकत मान लोगे
तुम्हें चाहा है मैंने सादगी से

हुई सब ग़र्क़ वो ख़्वाहिश ‘रज़ा’ की
सुनाएँ किया तुम्हें अपनी ख़ुशी से


२.
छोटी सी बिगड़ी बात को सुलझा रहे हैं लोग
ये और बात है कि यूँ, उलझा रहे हैं लोग

चर्चा तुम्हारा बज़्म में ग़ैरों के इर्द-गिर्द
कुछ इस तरह से दिल मेरा बहला रहे हैं लोग

अरमां नये, साहिल नये, सब सिलसिले नये
उजड़े हुए दयार से, दिखला रहे हैं लोग

कहते हैं कभी इश्क़ था, अब रख-रखाओ है
फिर आज क्यों यूँ देख कर, शर्मा रहे हैं लोग

हमने ख़ुद अपने ज़ुर्म का इकरार कर लिया
अब क्यों ”रज़ा” से इस क़दर कतरा रहे हैं लोग


३.
फिर किसी आवाज़ ने इस बार पुकारा मुझको
ख़ौफ़ और दर्द ने क्योंकर यूँ झिंझोड़ा मुझको


मैं सोया हुआ था ख़ाक़ के उस बिस्तर पर
जिस पर हर जिस्म नयी ज़िन्दगी ले लेता है


बस ख्यालों में नहीं असल में सो लेता है
आँख खुलते ही एक मौत का मातम देखा


अपने ही शहर में दहशत भरा आलम देखा
किस क़दर ख़ौफ़ ज़दा चीख़ा की आवाज़ थी वो


बूढ़ी बेवा की दम तोड़ती औलाद थी वो
एक बिलखते हुये मासूम की किलकार थी वो


कुछ यतीमों की सिसकती हुई फ़रियाद थी वो
मुझको याद आया फिर एक बार वो बचपन मेरा


कुहरे की धुंध में लिपटा हुआ सपना मेरा
तब हम एक थे इन्सानियत की छाँव तले


अब हम अनेक हैं हैवानियत के पाँव तले
तब हम सोचते थे सब्ज़ और ख़ुशहाल वतन


अब हम देखते हैं ग़र्क और लाचार वतन
तब फूल थे खुशियाँ थीं और हम सब थे


अब भूख है ग़मगीरी और हम या तुम
तब तो जीते थे हम और तुम हम सबके लिये


अब तो मरते हैं हम और तुम सिर्फ़अपने लिये
अब न वो इन्सान रहा और न वो भगवान रहा


बस दूर ही दूर तक फैला हुआ हैवान रहा
देख लो सोचलो शायद सम्भल पाओगे


क्यों जुदा करते हे रुह से जिस्म “रज़ा”
क्या कभी इस तरह तुम चैन से सो पाओगे