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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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रविवार, 20 जनवरी 2013

आसी ग़ाज़ीपुरी


१.

वे तेरे जीने की किस जी से तमन्ना करते?
मर न जाते जो शबे-हिज्र तो हम क्या करते?

तूने दावाए-ख़ुदाई न किया खूब किया।
ऐ सनम! हम तेरे दीदार को तरसा करते॥

दिले-बीमार से दावा है मसीहाई का।
चश्मे-बीमार को अपने नहीं अच्छा करते॥

भला किस दिल से हम इनकारे-दर्दे-इश्क़ करें।
नहीं कुछ है तो क्यों रह-रहके दिल पर हाथ धरते?

२.

नहीं होता कि बढ़कर हाथ रख दें।
तड़पता देखते हैं दिल हमारा॥

अगर क़ाबू न था दिल पर बुरा था।
वहाँ जाना सरे-महफ़िल हमारा॥

यह हालत है तो शायद रहम आ जाय।
कोई उसको दिखा दे दिल हमारा॥

३.

न कभी के बादापरस्त हम न हमें यह कैफ़े-शराब है।
लबेयार चूमें हैं ख़्वाब में वही जोशे-मस्तिये-ख़्वाब है॥

दिल मुब्तिला है तिरा ही घर उसे रहने दे कि ख़राब कर।
कोई मेरी तरह तुझे मगर न कहे कि ख़ानाख़राब है॥

उन्हें किब्रे-हुस्न की नख़वतें मुझे फ़ैज़े-इश्क़ की हैरतें।
न कलाम है न पयाम है न सवाल है न जवाब है।।

दिले-अन्दलीब यह शक नहीं गुलो-लाला के यह वरक़ नहीं।
मेरे इश्क़ का वो रिसाला है तेरे हुस्न की यह किताब है॥

४.

ताबे-दीदार जो लाये मुझे वो दिल देना।
मुँह क़यामत में दिखा सकने के क़ाबिल देना॥

रश्के-खुरशीद-जहाँ-ताब दिया दिल मुझ को।
कोई दिलबर भी इसी दिल के मुक़ाबिल देना॥

अस्ल फ़ित्ना है क़यामत में बहारे-फ़रदौस।
जुज़ तेरे कुछ भी न चाहे मुझे वो दिल देना॥

तेरे दीवाने का बेहाल ही रहना अच्छा।
हाल देना हो अगर रहम के क़ाबिल देना॥

हाय-रे-हाय तेरी उक़्दाकुशाई के मज़े।
तू ही खोले जिसे वो उक़्दये-मुश्किल देना॥

५.

जो रही और कोई दम यही हालत दिल की।
आज है पहलु-ए-ग़मनाक से रुख़स्त दिल की॥

घर छुटा शहर छुटा कूचये-दिलदार छुटा।
कोहो-सहरा में लिये फ़िरती है वहशत दिल की॥

रास्ता छोड़ दिया उसने इधर का ‘आसी’।
क्यों बनी रहगुज़रे-यार में तुरबत दिल की॥

६.

कोई तो पीके निकलेगा उडे़गी कुछ तो बू मुँह से।
दरे-पीरेमुग़ाँ पर मैपरस्ती चलके बिस्तर हो॥

किसी के दरपै ‘आसी’ रात रो-रोके यह कहता था--
कि "आखि़र मैं तुम्हारा बन्दा हूँ तुम बन्दापरवर हो"॥

तुम्हीं सच-सच बता दो कौन था शिरीं की सूरत में।
कि मुश्तेख़ाक की हसरत में कोई कोहकन क्यों हो॥

टुकडे़ होकर जो मिली कोहकनो-मजनूँ को।
कहीं मेरी ही वो फूटी हुई तक़दीर न हो॥

७.

इश्क़ ने फ़रहाद के परदे में पाया इन्तक़ाम।
एक मुद्दत से हमारा ख़ून दामनगीर था॥

वोह मुसव्वर था कोई या आपका हुस्नेशबाब।
जिसने सूरत देख ली इक पैकरे-तसवीर था॥

ऐ शबेगोर! वो बेताबि-ए-शब हाय फ़िराक़।
आज अराम से सोना मेरी तक़दीर में था॥

८.

आशिक़ी में है महवियत दरकार।
राहते-वस्ल-ओ-रंजे-फ़ुरक़त क्या?

न गिरे उस निगाह से कोई।
और उफ़्ताद क्या मुसीबत क्या?

जिनमें चर्चा न कुछ तुम्हारा हो।
ऐसे अहबाब ऐसी सुहबत क्या?

जाते हो जाओ हम भी रुख़सत हैं।
हिज्र में ज़िन्दगी की मुद्दत क्या?