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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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सोमवार, 14 जनवरी 2013

गौरीशंकर आचार्य ‘अरुण’

जन्म- ९ जुलाई १९३७ को बीकानेर में हुआ।कविता संग्रह ‘आद्या’ (१९७१)

१.
दरिया तो वही है, क्यों किनारे बदल गए।
मौसम को है गिला क्यों नजारे बदल गए।

बस्ती वही है छोडके जिसको गए थे हम,
लेकिन यहाँ क्यों लोग ये सारे बदल गए।

हमको शिकस्त देने की उनमें न ताब थी,
सबको पता है खेल में मोहरे बदल गए।

दिल की रगों से बात क्यों करती नहीं गजल,
लगता है लफ्ज और इशारे बदल गए।

जो भी मिले क्या खूब हमें रहनुमा मिले,
अच्छा हुआ जो पांव हमारे सम्भल गए।


२.
हम समन्दर के तले हैं, दोस्तों पोखर नहीं।
हाँ नदी होकर बहे हैं, नालियाँ होकर नहीं।

जिन्दगी हमने सँवारी मौत को रख सामने,
आदमी होकर जिए हैं, जानवर होकर नहीं।

मानते हैं हम उसूलों को इबादत की तरह,
फर्ज से अपने रहे हम, बेखबर होकर नहीं।

हर बसर के वास्ते दिल से दुआ करते हैं हम,
दोस्त बनकर खुश हुए हैं, दोस्ती खोकर नहीं।

रास्ते हमने बुहारे आज तक सबके लिए,
प्यार बोकर खुश हुए हैं, झाडियाँ बोकर नहीं।

दायरे अपने सभी के हैं अलग तो क्या हुआ,
हमवतन होकर रहे हैं, हम अलग होकर नहीं।


३.
हम तुम दोनों बैठ यहाँ पर अच्छी सी कुछ बात करें।
नये सिरे से फिर रिश्तों की अच्छी सी शुरुआत करें।

हाथ बढाता हूँ मैं अपना, अपना हाथ बढाओ तुम,
हम तुम दोनों मिल जीवन को खुशियों की सौगात करें।

इसी शजर पर हम दोनों को अपने नीड बनाने हैं,
इस जंगल की आग बुझा कर, सावन की बरसात करें।

अब जब भी तुमको मैं देखूं, या मुझको तुम देखो तो,
बहने लगे प्यार का दरिया ऐसे कुछ हालात करें।

मेरा दर्द तुम्हें पीडा दे, दर्द तुम्हारा मैं भोगूं,
अब तो हम तुम दोनों ही कुछ ऐसे जज्बात करें।

४.
धूल काफी जमा है कहीं न कहीं।
इसलिए आब-ए-दरिया निखरता नहीं।

क्या हुआ है सियासत क्यों खामोश है,
जुर्म से आज कोई क्यों डरता नहीं।

जो भी गुजरा यहां से वो शैतान था,
आदमी क्यों इधर से गुजरता नहीं।

ये मुसा फर नहीं इन पे रखना नजर,
इनका म.कसद असल में स फर का नहीं।

बन्द मिलती नहीं गर हमें खिडकियाँ,
हमको मिलना तुम्हारा अखरता नहीं।

फैंक कर पत्थरों को वो हैरान है,
आशियाँ क्यों ये हमसे बिखरता नहीं।


५.
और दिन आए न आए, एक दिन वो आएगा।
जब परिन्दा आशियाना छोडकर उड जाएगा।

मान लेगी मौत अपनी हार उसके सामने,
वक्त के माथे पे अपना नाम जो लिख जाएगा।

जख्म अपने जिस्म के ढक कर खडे हैं आप क्यों,
रहम दिल कोई तो होगा ढूंढिए मिल जाएगा।

.कत्लोगारद कर बहाया खून, उसको क्या मिला,
काश इतना सोचता वो साथ क्या ले जाएगा।

पुर सुकूं थी जिंदगी, इन्सानियत थी, प्यार था,
वक्त ऐसा इस जहां में फिर कभी क्या आएगा।

ये लुटेरों के मकां हैं, मांगने आया है तू,
भाग जा वरना जो तेरे पास है लुट जाएगा।

क्यों .कसीदे कह रहे हैं आप अपने नाम पर,
वक्त खुद अपनी जुबां से सब बयाँ कर जाएगा।


६.
उनको हम पर नहीं कभी भी ऐतबार हुआ।
शक हुआ इस कदर हुआ के बार-बार हुआ।

गरेबां चा.क ही होता तो उसे सी लेते,
हुआ तो इस .कदर हुआ के तार-तार हुआ।

ब.कौल उनके वो खंजर तो नहीं था गुल था,
पता नहीं कि वो कैसे जिगर के पार हुआ।

इस तमाशे का असर हो भी तो आखिर कैसे,
मेरी आँखों के ये आगे हजार बार-बार हुआ।