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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

शंभूनाथ तिवारी

जन्म- ११ जुलाई १९६२ ई.गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- बी.ए.(इलाहाबाद विश्वविद्यालय). एम.ए.(हिंदी), जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से प्रथम श्रेणी में प्रथम रहकर स्वर्णपदक प्राप्त । यूजीसी, नई दिल्ली से जे.आर.एफ. (नेट) उत्तीर्ण कर जे.एन.यू. नई दिल्ली से प्रोफेसर नामवर सिंह के निर्देशन में एम.फिल., एवं पीएच.डी.।
प्रकाशित कृतियाँ-मिश्रबंधु और हिंदी आलोचना, मेघदूत के काव्यानुवाद, समीक्षाग्रंथ,धरती पर चाँद

सम्पर्क: ईमेल- sn.tiwari09@gmail.com  
१.
सिमटे स्नेह टूटते रिश्ते कितने बदल गए हैं गाँव
परदेशी की बाट जोहती आँखें अब हो गई कहानी,
कोयल-मोर-पपीहे की वह टेर कहीं खो गई सुहानी
अब मुड़ेर से नहीं सुनाई देता है कौवे का काँव,
सिमटे स्नेह टूटते रिश्ते कितने बदल गए हैं गाँव!

वे रिश्तोंवाले संबोधन भी देते हैं नहीं सुनाई,
भाईचारा-प्यार-मोहब्बत वाली बातें हुई पराई।
मधुर स्नेह-सम्बन्धों में कब जाने कौन अड़ा दे पांव,
सिमटे स्नेह टूटते रिश्ते कितने बदल गए हैं गांव!

सूखे ताल-तलैया-पोखर पनघट पर छाई वीरानी,
सूनी पड़ी हुई चौपलें अब अलाव की बात पुरानी।
कहाँ गईं छितवन की छांहे उस बूढ़े बरगद की छांव,
सिमटे स्नेह टूटते रिश्ते कितने बदल गए है गाँव।

रिश्ते-नातों की बातों पर हो जाती फ़ीकी मुस्कानें,
बात-बात पर पड़ जाते है पीछे लोग मुट्ठियां ताने।
कहां बटोही करे बसेरा कोई नहीं ठिकाना-ठाँव,
सिमटे स्नेह टूटते रिश्ते कितने बदल गए है गाँव।

चले गए जो शहर गाँव की यादे उनको नहीं सतातीं ,
घरवाले रो-रोकर चाहें लिखवायें पाती पर पाती।
भूल गए ममता का आँचल दादा जी के दुखते पाँव,
सिमटे स्नेह टूटते रिश्ते कितने बदल गए हैं गाँव्।

नहीं भागता हैं मीलों मन जंगल-टीले-नदी किनारे,
सूने खेत-गली-चौराहे पेड़ खड़े किस्मत के मारे।
सूखी नदी रेत में जर्जर पड़ी सिसकती डोंगी नांव,
सिमटे स्नेह टूटते रिश्ते कितने बदल गए हैं गांव।


२.

बड़ी ग़मनाक दिल छूती परिंदों की कहानी है
कड़कती धूप हो या तेज़ बारिष का ज़माना हो
क़हर तूफ़ां का हो बेशक बिजलियों का ज़मानाहो
मगर वह बेबसी का ख़ौफ़ मंज़र देखने वाला
शिकायत क्या करे जिसका दख़्तों पर ठिकाना हो
बयाँ कुछ कर नहीं सकता यह कैसी बेज़ुबानी है
बड़ी ग़मनाक दिल छूती परिंदों की कहानी है
अगर दाली से बछ जाये तो पिंजड़े में पड़ा होगा
क़फ़स के दरमियाँ बेचारा घुट-घुट्कर बड़ा होगा
कहीं भी चैन से पलभर परिंदा जी नहीं सकता
किसी क़ातिल की आँखों में वह पहले से गड़ा होगा
मुसीबत उम्र भर उसको अकेले ही उठानी है
बड़ी ग़मनाक दिल छूती परिंदों की कहानी है
मुक़द्दर में भी उसके भला मंज़ूर होता है
बेचारा एक दाने के लिये मजबूर होता है
हथेली पर लिये फिरता है अपनी जान को हरदम
परिंदा जब कभी अपने वतन से दूर होता है
ज़मी से आसमाँ तक ज़िन्दगी उसकी वीरानी है
ज़रा सोचो तो कितना बेज़ुँबा-बेबस परिंदा है
नज़र से क़ातिलों की बच गया होगा तो ज़िंदा है
किसे क्या फ़ायदा होगा मिटा कर ज़िंदगी उसकी,
किसी लाचार को तो मारने वाला दरिंदा है
यह कैसी बेकसी की दासताने ज़िंदगानी है
वह होकर बेज़ुबाँ भी बदगुमानी छोड़ देता है
दिलों के दरमियाँ बेनाम रिश्ते जोड़ देता है
कभी इस मुल्क तो उस मुल्क उड़कर पहुँचनेवाला
परिंदा सरहदों की बंदिशें भी तोड़ देता है
यह नन्हा सा फ़रिश्ता अम्न की ज़िंदा निशानी है
बड़ी ग़मनाक दिल छूती परिंदों की कहानी है

३.

बिला वजह आँखों के भिगोना क्या
अपनी नाकामी का रोना-रोना क्या

बेहतर है कि समझें नब्ज़ ज़माने की
वक़्त गया फिर पछताने से होना क्या

भाईचारा-प्यार-मुहब्बत नहीं अगर
तब रिश्ते नातों को लेकर ढ़ोना क्या

जिसने जान लिया की दुनिया फानी है
उसे फूल या काटों भरा बिछोना क्या

क़ातिल को भी क़ातिल लोग नहीं कहते
ऐसे लोगों का भी होना-होना क्या

मज़हब ही जिसकी सरवेश फक़ीरी है
उसकी नज़रों में क्या मिट्टी-सोना क्या

जहाँ नहीं कोई अपना हमदर्द मिले
उस नगरी में रोकर आँखें खोना क्या

मुफलिस जिसे बनाकर छोड़ा गार्दिश ने
उस बेचारे का जागना भी सोना क्या

फिक्र जिसे लग जाती उसकी मत पूछो
उसको जंतर-मंतर-जादू-टोना क्या

४.

गुल हो मगर न खार हो ऐसा नहीं होता
दुनिया में महज़ प्यार हो ऐसा नहीं होता

इस ज़िन्दगी में ग़म बड़ी चीज़ है मियाँ
हरदम चमन गुलज़ार हो ऐसा नहीं होता

नाकामियाँ इन्सान को दिखाती है नई राह
हर वक़्त मगर हार हो ऐसा नहीं होता

माना कि मेरे पास ज़माने का हुनर है
हर शख्स तलबगार हो ऐसा नहीं होता

मिलने की चाह दिल में जगाकर कभी देखो
न खत्म इन्तज़ार हो ऐसा नहीं होता

मिल जाए अगर एक भी इनसान बहुत है
सारा ज़हान यार हो ऐसा नहीं होता

कुछ लोग हैं जो दर्द छिपाते है जिगर में
सबको ग़मों से प्यार हो ऐसा नहीं होता

बस सिरफिरे ही जान लुटाते है वतन पर
हर कोई जाँनिसार हो ऐसा नहीं होता

हिम्मत है अगर नन्हें पंरिन्दे में जान है
फिर तो फ़लक न पार हो ऐसा नहीं होता

५.

उसको ग़रज़ कहाँ है सताइश इनाम से
जिनको मिली हुई हो मुहब्बत अवाम से

इस दौर में दुशवार है इज़्ज़त की ज़िन्दगी
मुहँ फेरते है लोग शराफत के नाम से

बढ़ने लगी है इस क़दर आपस में दुरियाँ
बचने लगे हैं लोग दुआ ओ सलाम से

महफ़ूज़ गर नहीं हैं सुबह-शाम टहलना
फिर कौन सी उम्मीद करे हम निज़ाम से

बनती हैं अगर बात लतीफ़ों के ज़ोर पर
किसको ग़रज़ है उम्दा मयारी कलाम से

हर वक़्त माँगता है फ़कत ज़िन्दगी की ख़ैर
होता है दूर जब भी पंरिन्दा अपने मुक़ाम से

कोई नया पैगाम लिए आएगी सहर
हम मुंतज़िर बने बैठे हैं शाम से

६.

इस बात से मुझको बेइंतिहा तनाव है
ईमान के चेहरे पर बहुत तेज़ घाव है

इतने दिए हैं चोट ज़माने ने बार-बार
ज़ख्मों से मेरे अब भी मुसलसल रिसाव है

जो दिल में है चेहरे से पता भी नहीं चलता
इस दौर के लोगो का अजब हाव भाव है

नुकसानों नफा जोड़कर मिलता है आदमी
वर्ना किसी को अस्ल में किससे लगाव है

करने लगे हैं अहले सियासत वफा की बात
लगता है कोई आजकल फिर से चुनाव है

कुछ बात ही ऐसी है ज़ुबा खुल नहीं पाती
ग़रचे हमारे दिल में सुलगता अलाव है

ताउम्र चाहकर भी कोई गिन नहीं सकता
यह ज़िन्दागी भी कैसा मुकम्मल घुमाव है

हिम्मत से जो तुफान का मुंह मोड़कर रख दें
बेशक उसी की ओर जहां का झुकाव है

उड़ता है मगर ताकता है घोंसले की ओर
इस क़द्र परिंदे को वतन से लगाव है

७.

सुलझ जाते हैं मुश्किल से भी मुश्किल केश लाठी से
मैं देना चाहता हूँ मुल्क़ को संदेश लाठी से

शराफत और सच्चाई से प्यारे कुछ नहीं होता
ज़माना मानता हैं हुक्म और आदेश लाठी से

इसी ने गाँधी को बनाया नामवर इतना
हुए दुनिया के वे सबसे बड़े दरवेश लाठी से

भला कब काम आई जंग में बंदूक-तलवारें
नहीं नामों निशा था दुश्मनों का शेष लाठी से

मेरी लाठी को पी-पी कर के पानी कोसने वालो
मैं अपने दुश्मन को भी करुगां फेस लाठी से

मुझे दिखला रहे हैं जो सियासी पैतरे खुलकर
मैं उनके साथ आऊगा यक़ीनन पेश लाठी से

नहीं ये मामला है गाँव-क़स्बे-शहर-सूबे का
हमें तो हांकना है यह मुकम्मल देश लाठी से

नहीं गर पास में लाठी तो समझो कुछ नहीं प्यारे
बुढ़ापे में तो कम-से-कम करोगे ऐश लाठी से

मरे यह देश या सड़के लहू से लाल हो जाएं
हमें तो जीतनी है बस चुनावी रेस लाठी से

८.

नहीं है आदमी की अब कोई पहचान दिल्ली में
मिली है धूल में कितनों की ऊँची शान दिल्ली में

तलाशो मत मियाँ रिश्ते, बहुत बेदर्द है गालियाँ
बड़ी मुश्किल से मिलते है सही इंसान दिल्ली में

शराफ़त से किसी भी भीड़ में होकर खड़े देखो
कोई भी थूक देगा मुँह पे खाकर पान दिल्ली में

जिन्हें लूटा नहीं कोई बड़ी तक़दीर वाले हैं
यहाँ फूलन की भी लूटी गई दुकान दिल्ली में

सुनाएँ क्या कहानी भीड़वाली बस में चढ़ने की
हथेली पर लिए फिरते हैं अपनी जान दिल्ली में

घुटन होती है सुनकर दास्ताने-शहर दिल्ली की
जहाँ जीना भी, मरना भी, नहीं असान दिल्ली में

९.

हौसले मिटने न दें अरमाँ बिखर जाने के बाद
मंजिलें मिलती है कब तूफां से डर जाने के बाद

कौन समझेगा कभी उस तैरने वाले का ग़म
डूब जाये जो समंदर पार कर जाने के बाद

आग से जो खेलते है वो समझते है कहाँ
बस्तियाँ फिर से नहीं बसती उजड़ जाने के बाद

ज़लज़ले सब कुछ मिटा जाते है पल भर में मगर
ज़ख्म मिटते है कहाँ सदियों गुज़र जाने के बाद

आशियाने को न जाने लग गई किसकी नज़र
फिर नहीं आया परिंदा लौटकर जाने के बाद

आज तक कोई समझ पाया न यह राज़े-हयात
आदमी आखिर कहाँ जाता है मर जाने के बाद

प्यार से जितनी भी कट जाए वही है ज़िंदगी
याद कब करती है दुनिया कूच कर जाने के बाद