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सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

एहतराम इस्लाम

5 जनवरी 1949 को मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) में जन्म.'है तो है' इनका सुप्रसिद्ध गजल संग्रह है जिसे हिन्दुस्तानी एकेडेमी इलाहाबाद ने वर्ष 1993 में प्रकाशित किया है।

१.

नज़रें न क्यों जमाएँ बहलिए दरख्त पर
रुकने लगे हैं आके परिंदे दरख्त पर

छूटेगा तीर किसकी कमां से ये जानकर
है माँ के इंतज़ार में बच्चे दरख्त पर

क्या गहरी जड़ थी ,अपनी जगह से हिला नहीं
दुनियां के जुल्म तोड़े हवा ने दरख्त पर

किस शाख पर पनाह की उम्मीद कीजिए
दहशत पसर गयी है समूचे दरख्त पर

अंदर खोखला यूँ ही होता रहा अगर
गुल ही दिखाई देंगे , न पत्ते दरख्त पर

खोला गया फिर अंधे अकीदों का रास्ता
भूतों ने फिर जमा लिए डेरे दरख्त पर

कैसी डरावनी थी वो जंगल की रात थी
काटी गई जो रामभरोसे दरख्त पर

नंगा खड़ा है धूप में ,दुनिया से बेखबर
टूटे हैं जाने कौन से सदमें दरख्त पर

फल से लदा न होने का ये फायदा मिला
पत्थर किसी तरफ से न आये दरख्त पर

पत्तों में छिपके शेर नहीं कहते एहतराम
लिखते हैं हम दरख्त के किससे दरख्त पर

२.
 
अग्नि- वर्षा है तो है ,हाँ !बर्फबारी है तो है
मौसमों के दरमियाँ एक जंग जारी है तो है

जिन्दगी का लम्हा -लम्हा उसपे भारी है तो है
क्रन्तिकारी व्यक्ति ,कुछ हो ,क्रन्तिकारी है तो है

मूर्ति सोने की निरर्थक वस्तु है ,उसके लिए ,
मोम की गुड़िया अगर बच्चे को प्यारी है तो है

खू -पसीना एक करके हम सजाते हैं इसे
हम अगर कह दें कि यह दुनियाँ हमारी है तो है

रात कोठे पर बिताता है कि होटल में कोई
रोशनी में दिन की ,मंदिर का पुजारी है तो है

अपनी कोमल भावना के रक्त में डूबी हुई
मात्र श्रद्धा 'आज भी भारत की नारी है तो है

हैं तो हैं दुनियां से बे परवा परिंदे शाख पर
घात से उनकी कहीं कोई शिकारी है तो है

आप छल - बल के धनी हैं जीतियेगा आप ही
आप से बेहतर मेरी उम्मीदवारी है तो है

देश की सम्पन्नता कितनी बढ़ी है देखिए
सोचिए क्यों ?देश की जनता भिखारी है तो है

दिल्लियों ,अमृतसरों की भीड़ में खोयी हुई ,
देश में अपने कहीं कन्याकुमारी है तो है

एहतराम अपने गज़ल लेखन को कहता है कला
आप कहते हैं उसे जादूनिगारी है ,तो है

३.

डूबने के भय न ही बचने की चिंताओं में था
जितने क्षण मैं आपकी यादों की नौकाओं में था

थे जुबाँ वाले हमारे युग में कैसे मानिए ,
मौन के अतिरिक्त क्या कोई प्रवक्ताओं में था

आदमीयत के लिए कोई ठिकाना था कहाँ
पंडितों में धर्म था ,ईमान मुल्लाओं में था

रेत में तब्दील चट्टानों को होना ही पड़ा
जाने कितना हौसला पुर-जोश सरिताओं में था

मेरे लम्बे कहकहे ठहरे न कोई वाकिआ
मुस्कुराना आपका कुछ मुख्य घटनाओं में था

मेरी बातें लोग अपनी जानकर सुनते रहे
कोई आकर्षण तो मेरी शब्द- रचनाओं था

लोग बेहूदा हैं जो कहते हैं पिछड़ा देश को
फाइलों से जांचिए क्षण - क्षण सफलताओं में था

अपने सम्बन्धों पे आ रो लें इसी हीले से हम
तू भी प्रश्नों में घिरा मैं भी समस्याओं में था

उसका भाषण था कि मक्कारी का जादू एहतराम
मैं कमीना था कि बुज़दिल मुग्ध श्रोताओं में था

४.

ले उठ रहा हूँ बज़्म से मैं तश्नगी के साथ
साकी मगर ये जुल्म न हो अब किसी के साथ

हँस - हँस के जी रहा हूँ मगर मेरे दिल से पूछ
बाबस्ता कितने गम हैं मेरी जिन्दगी के साथ

पैहम सितम ने आपके मुझको सिखा दिया
हर इम्तहान -ए -गम से गुज़रना खुशी के साथ

फिर देखे किस कदर है सुकूं बख्श जिन्दगी
पहले कोई गुजार तो ले सादगी के साथ

खोया हूँ उसके हुस्न की रंगीनियों में मैं
उलझा हुआ है वह भी मेरी सादगी के साथ

मैं खुद पे हँस पड़ा हूँ तुम्हें देखने के बाद
इक अजनबी दयार में इक अजनबी के साथ

हाज़िर है एहतराम तमन्ना निकालिए
क्यों जा रहे हैं आप शिकस्ता-दिली के साथ