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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

अनूप कुमार


जन्म- 1 जनवरी 1956,सहायक लेखाधिकारी, मंडी परिषद, उ. प्र. लखनऊ  
प्रकाशित कृतियाँ-ऑडियो कैसेट तूने अबतक समय गँवाया (टी सीरीज़ से) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा आकाशवाणी से रचनाओं का प्रकाशन।
१.

बड़ी मुश्किल-सी कोई बात भई आसान होती है
अगर इंसानी फ़ितरत की हमें पहचान होती है

हुजूमे-ग़म जो आ जाए हुजूमे-शाद हो ऐ दिल
ग़मों से लड़ के ही तो ज़िंदगी आसान होती है

कहा करते हैं दौलत में बहुत अच्छइयाँ होतीं
ये जो हो हाथ में शैतान के, शैतान होती है

बड़ी सरमाया है नेकी हज़ारों नेकियाँ कर लो
यहाँ तक एक भी नेकी कभी ताबान होती है

अगर खुशियाँ ही खुशियाँ हों तुम्हें महसूस होगा रंज
मुसलसल रौशनी भी दर्द का सामान होती है।


२.

ये दुनिया इस तरह क़ाबिल हुई है
कि अब इंसानियत ग़ाफ़िल हुई है

सहम कर चाँद बैठा आसमाँ में
फ़ज़ा तारों तलक क़ातिल हुई है

खुदाया, माफ़ कर दे उस गुनह को
लहर जिस पाप की साहिल हुई है

बड़ी हसरत से दौलत देखते हैं
जिन्हें दौलत नहीं हासिल हुई है

जहाँ पर गर्द खाली उड़ रही हो
वहाँ गुर्बत की ही महफ़िल हुई है


३.

अगरचे मोहब्बत जो धोखा रही है
तो क्यों शमा इसकी हमेशा जली है

हमारे दिलों को वही अच्छे लगते
कि जिनके दिलों में मुहब्बत बसी है

मोहब्बत का दुश्मन ज़माना है लेकिन
सभी के दिलों में ये फूली फली है

बिठाते थे सबको ज़मीं पर जो ज़ालिम
वो हस्ती भी देखो ज़मीं में दबी है

सभी कीमतें आसमाँ चढ़ रहीं जब
तो इंसां की कीमत ज़मीं पे गिरी है

हो सच्ची लगन और इरादे जवाँ हों
तो मंज़िल हमेशा कदम पर झुकी है

ज़माने की चाहा था सूरत बदलना
मगर अपनी सूरत बदलनी पड़ी है


४.

आग अपनों ने ही लगाई है
बात ग़ैरों पे चली आई है

पीठ पीछे से रहनुमाई है
तौबा-तौबा ये पारसाई है

तीरगी में भी राह मिलती है
गर तेरी सोच में बीनाई है

किसी ज़ालिम से भला डरना क्या
जब कि चारों तरफ़ खुदाई है

नेकियाँ कैसे भुला दूँ उसकी
ज़िंदगी जिससे मुस्कुराई है

उसे खुदगर्ज़ समझ लूँ कैसे
जो तसव्वुर में चली आई है


५.

कहने पे चलोगे लोगों के हो सकते तुम्हारे काम नहीं
ये दुनियावाले इक पल भी देते हैं कभी आराम नहीं।

ये आज हमारे राहनुमा कठपुतली हैं दस्ते-मुन्इम की
ये बात तो यों जगजाहिर है मंज़ूर इन्हें इल्ज़ाम नहीं

यह दुनिया दौलतवालों की हर ऐश मयस्सर हैं इनको
पर मुफ़्लिस की हालत देखो सूखी रोटी तक दाम नहीं

इन ओहदेदारों के पीछे क्यों फिरते हों यों मारे-मारे
ये अपनी अना के दीवाने आते हैं किसी के काम नहीं

वो हमपे मेहरबाँ हैं शायद खुश हो के दिए कुछ दर्द हमें
सहने
के लिए जो ग़म हैं दिए वो ग़म भी तो कोई आम नहीं

नेकी के तो बंदे आज भी हैं गो कम हैं मगर कुछ हैं तो सही
माना
कि जहाँ में नाम नहीं ये कम तो नहीं, बदनाम नहीं

इंसान की हस्ती क्या हस्ती पर समझा है खुद को दानिश्वर
देता
है सभी कुछ अल्लाह ही लिखता है वो अपना नाम नहीं


६.

ग़म ने दिखाए ऐसे रस्ते
ग़म ने दिखाए ऐसे रस्ते
खो गए हैं जीवन के रस्ते

प्यार मोहब्बत या कि वफ़ाएँ
टूट गया दिल इनके रस्ते

छोड़ गया वो बीच भँवर में
एक सितमगर तिरछे रस्ते

मेरे दिल का हाल न पूछो
कितना टूटा प्यार के रस्ते

माँ का आँचल उसकी दुआएँ
साथ चलेगी सारे रस्ते

मंदिर मस्जिद और कलीसा
दिखते हैं एक से रस्ते


७.

जिनके दिल में गुबार रहते हैं
यार वो बादाख़्वार रहते हैं

कि जहाँ ओहदेदार रहते हैं
लोग उनके शिकार रहते हैं

पढ़ते लिखने में जो भी अव्वल थे
अब तो वो भी बेकार रहते हैं

मशवरा उनको कभी देना न
जो ज़हन से बीमार रहते हैं

किसी दौलत के ग़ार में देखो
वहाँ खुदगर्ज़ यार रहतै हैं

आजकल जिनके पास दौलत है
हुस्न के तल्बगार रहते हैं

किसी दफ़्तर के बड़े हाकिम ही
ऐश में गिरिफ़्तार रहते