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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

अमर ज्योति नदीम

शिक्षा: एम.ए. (अँग्रेज़ी), एम. ए. (हिंदी), पीएच.डी. (अँग्रेज़ी) आगरा विश्वविद्यालय)

ईमेल- amarjyoti55@gmail.com
१.

पेट भरते हैं दाल-रोटी से।
दिन गुज़रते हैं दाल-रोटी से।

दाल- रोटी न हो तो जग सूना,
जीते-मरते हैं दाल-रोटी से।

इतने हथियार, इतने बम-गोले!
कितना डरते हैं दाल-रोटी से!

कैसे अचरज की बात है यारो!
लोग मरते हैं दाल-रोटी से।

जो न सदियों में हो सका, पल में
कर गुज़रते हैं दाल-रोटी से।

लोग दीवाने हो गए हैं नदीम,
खेल करते हैं दाल-रोटी से।


२.

सिमटने की हक़ीक़त साथ में विस्तार का सपना,
खुली आँखों से सब देखा किए बाज़ार का सपना।

समंदर के अंधेरों में हुईं गुम कश्तियाँ कितनी,
मगर डूबा नहीं है-उस तरफ़, उस पार का सपना।

थकूँ तो झाँकता हूँ उधमी बच्चों की आँखों में,
वहाँ ज़िंदा है अब तक ज़िन्दगी का, प्यार का सपना।

जो रोटी के झमेलों से मिली फ़ुरसत तो देखेंगे
किसी दिन हम भी ज़ुल्फ़ों का, लब-ओ-रुख़सार का सपना।

जुनूं है, जोश है, या हौसला है; क्या कहें इसको!
थके-माँदे कदम और आँख में रफ़्तार का सपना।


३.
 बाग़ों में प्लॉट कट गए, अमराइयाँ कहाँ!
पूरा बरस ही जेठ है, पुरवाइयाँ कहाँ!
उस डबडबाई आँख मे उतरे तो खो गए,
सारे समंदरों में वो गहराइयाँ कहाँ!

सरगम का, सुर का, राग का, चरचा न कीजिए,
'डी जे' की धूमधाम है, शहनाइयाँ कहाँ!

क़ुरबानियों में कौन-सी शोहरत बची है अब?
और बेवफ़ाइयों में भी रुसवाइयाँ कहाँ!

कमरे से एक बार तो बाहर निकल नदीम,
तनहा दिलों की भीड़ है, तनहाइयाँ कहाँ!


४.

धूल को चंदन, ज़मीं को आसमाँ कैसे लिखें?
मरघटों में ज़िंदगी की दास्तां कैसे लिखें?

खेत में बचपन से खुरपी फावड़े से खेलती,
उँगलियों से ख़ून छलके, मेंहदियाँ कैसे लिखें?

हर गली से आ रही हो जब धमाकों की सदा,
बाँसुरी कैसे लिखें, शहनाइयाँ कैसे लिखें?

कुछ मेहरबानों के हाथों कल ये बस्ती जल गई,
इस धुएँ को घर के चूल्हे का धुआँ कैसे लिखें?

दूर तक काँटे ही काँटे, फल नहीं, साया नहीं।
इन बबूलों को भला अमराइयाँ कैसे लिखें

रहजनों से तेरी हमदर्दी का चरचा आम है,
मीर जाफ़र! तुझको मीर-ऐ-कारवाँ कैसे लिखें?


५.

तेरी ज़िद, घर-बार निहारूँ,
मन बोले संसार निहारूँ।

पानी, धूप, अनाज जुटा लूँ,
फिर तेरा सिंगार निहारूँ।

दाल खदकती, सिकती रोटी,
इनमें ही करतार निहारूँ।

बचपन की निर्दोष हँसी को,
एक नहीं, सौ बार निहारूँ।

तेज़ धार औ भँवर न देखूँ,
मैं नदिया के पार निहारूँ।


६.

घर में बैठे रहे अकेले, गलियों को वीरान किया,
अपना दर्द छुपाए रक्खा, तो किस पर एहसान किया?

दुखियारों से मिल कर दुख से लड़ते तो कुछ बात भी थी,
कॉकरोच-सा जीवन जीकर, कहते हो क़ुर्बान किया!

दैर-ओ-हरम वालों का पेशा फ़िक्र-ए-आक़बत है तो हो,
हमने तो चूल्हे को ख़ुदा और रोटी को ईमान किया।

किशन-कन्हैया गुटका खा कर जूते पॉलिश करता है,
पर तुमने मन्दिर में जाकर माखन-मिसरी दान किया।

मज़हब, ज़ात, मुकद्दर, मंदिर-मस्जिद, जप-तप, हज,तीरथ,
दानाओं ने नादानों की उलझन का सामान किया।

कड़ी धूप थी, रस्ते में कुछ सायेदार दरख़्त मिले,
साथ नहीं चल पाए फिर भी कुछ तो सफ़र आसान किया।


७.

उम्र कुछ इस तरह तमाम हुई,
आँख जब तक खुली, के शाम हुई।

जीना आसान हो गया, हर शय,
या हुई फ़र्ज़, या हराम हुई।

जिसको तुमसे भी कह सके न कभी,
आज वो दास्तान आम हुई।

सूखी आँखों से राह तकती है,
ज़िंदगी कैसी तश्नाकाम हुई!

दफ़्न बुनियाद में हुआ था कौन?
और तामीर किसके नाम हुई??