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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

चाँद शुक्ला हादियाबादी

जन्म: 21 मार्च 1946. उपनाम, चाँद. जन्म स्थान, हादियाबाद,फगवाड़ा (ज़िला कपूरथला).ई-मेल- chaandshukla@gmail.com

१.
जब तोड़ दिया रिश्ता तेरी ज़ुल्फ़े ख़फा से
बल खाए के लहराए कहीं मेरी बला से

अब तक है मेरे ज़ेह्न में वो तेरा सिमटना
सरका था कभी तेरा दुपट्टा जो हवा से

हर सुबह तेरा वादा हर एक साँझ तेरा ग़म
लिल्लाह कसम तुझको न दे झूठे दिलासे

आ जाओ तो आ जाएँगी इस घर में बहारें
आँगन मेरा गूँज उठ्ठेगा कोयल की सदा से

तन्हाई में होता है तेरे आने का धोखा
खटके जो कभी दर मेरा पूरब की हवा से

जब तूने क़दम रक्खा है उजड़े हुए दिल में
अब फूल खिलेगें तेरे आँचल की हवा से

पनघट पे तेरा आना वो पानी के बहाने
सर पे लिए गागर तेरा बल खाना अदा से

हम रिंद हैं पर माँग के तुमसे न पियेंगे
छोड़ेंगे यह मैखाना तेरा जायेंगे प्यासे

भरने के लिए माँग में लाया हूँ सितारे
आया हूँ तेरे पास उतरकर मैं ख़ला से

२.
हमने बना के रक्खी है तन्हाइयों के साथ
ख़ुश हैं हम अपनी ज़ात की परछाइयों के साथ

हमदम बिछड़ रहा है तू भटकेगा देखना
दिल में बसाया था तुझे गहराइयों के साथ

आया था दिल में सैंकड़ों अरमाँ लिए हुए
लौटा हूँ तेरे शहर से रुस्वाइयों के साथ

साया था वो तो झूठ अपना न बन सका
हमने तो की थी दोस्ती सच्चाइयों के साथ

गुज़री है सारी उम्र ग़मे-रोज़गार में
गुज़री है वो भी दोस्तो मँहगाइयों के साथ

३.
जब पुराने रास्तों पर से कभी गुज़रे हैं हम
करता- कतरा अश्क़ बन कर आँख से टपके हैं हम

वक़्त के हाथों रहे हम उम्र भर यूँ मुंतशर
दर -ब -दर रोज़ी की ख़ातिर चार- सू भटके हैं हम

हमको शिकवा है ज़माने से मगर अब क्या कहें
ज़िन्दगी के आख़िरी ही मोड़ पर ठहरे हैं हम

याद में जिसकी हमेशा जाम छ्लकाते रहे
आज जो देखा उसे ख़ुद जाम बन छलके हैं हम

एक ज़माना था हमारा नाम था पहचान थी
आज इस परदेस मैं गुमनाम से बैठें हैं हम

“चाँद” तारे थे गगन था पंख थे परवाज़ थी
आज सूखे पेड़ की एक डाल पे लटके हैं हम

४.
हम खिलौनों की ख़ातिर तरसते रहे
चुटकियों-से ही अक्सर बहलते रहे

चार- सू थी हमारे बस आलूदगी
अपने आँगन में गुन्चे लहकते रहे

कितना खौफ़-आज़मा था ज़माने का डर
उनसे अक्सर ही छुप-छुप के मिलते रहे

ख़्वाहिशें थीं अधूरी न पूरी हुईं
चंद अरमाँ थे दिल में मचलते रहे

उनकी जुल्फें- परीशाँ जो देखा किये
कुछ भी कर न सके हाथ मलते रहे

चाँद जाने कहाँ कैसे खो-सा गया
चाँदनी को ही बस हम तरसते रहे

५.
तू रस्ता हमवार करेगा चल झूठे
किया धरा बेकार करेगा चल झूठे

तेरी करनी और कथनी में फर्क बड़ा
सच का तू इज़हार करेगा चल झूठे

जीने मरने की कसमें न खाया कर
तू क्या किसी से प्यार करेगा चल झूठे

तुझसे मिलने- जुलने से अब क्या हासिल
बेवजह तकरार करेगा चल झूठे

जब भी तेरा एतबार किया बेकार गया
अब क्या तू इकरार करेगा चल झूठे

तेरी अपनी कश्ती बीच भँवर में है
तू मुझको क्या पार करेगा चल झूठे

चाँद चिनारों और केसर में आग लगा
अम्न का कारोबार करेगा चल झूठे

६.
साथ क्या लाया था मैं और साथ क्या ले जाऊँगा
जिनके काम आया हूँ मैं उनकी दुआ ले जाऊँगा

ज़िंदगी काटी है मैंने अपनी सहरा के करीब
एक समुन्दर है जो साथ अपने बहा ले जाऊँगा

तेरे माथे की शिकन को मैं मिटाते मिट गया
अपने चेहरे पर मैं तेरा ग़म सजा ले जाऊँगा

जब तलक ज़िन्दा रहा बुझ-बुझ के मैं जलता रहा
शम्अ दिल में तेरी चाहत की जला ले जाऊँगा

बिन पलक झपके चकोरी-सी मुझे तकती है तू
अपनी पलकों पर तुझे मैं भी सजा ले जाऊँगा

चाँद तो है आसमाँ पर, मैं ज़मीं का `चाँद’ हूँ
मैं ज़मीं को रूह में अपनी बसा ले जाऊँगा

७.
तेरी आँखों का यह दर्पन अच्छा लगता है
इसमें चेहरे का अपनापन अच्छा लगता है

तुंद हवाओं तूफ़ानों से जी घबराता है
हल्की बारिश का भीगापन अच्छा लगता है

वैसे तो हर सूरत की ही अपनी सीरत है
हमको तो बस तेरा भोलापन अच्छा लगता है

पहले तो तन्हाई से हमको डर लगता था
अब तो न जाने क्यों सूनापन अच्छा लगता है

हमने इक दूजे को बाँधा प्यार की डोरी से
सच्चे धागों का यह बंधन अच्छा लगता है

बोलें कड़वे बोल न हम कुछ फीका सुन पाएँ
ऐसा ही गूँगा-बहरापन अच्छा लगता है

दाग़ नहीं है माथे पे रहमत का साया है
‘चाँद’ के चेहरे पर ये चंदन अच्छा लगता है

८.
साँप की मानिंद वोह डसती रही
मेरे अरमानों में जो रहती रही

रोज़ जलते हैं ग़रीबों के मकान
फिर यह क्यों गुमनाम सी बस्ती रही

साँझ का सूरज था लथपथ खून में
मौत मेहंदी की तरह रचती रही

सूनी थीं गलियाँ ओ गुमसुम रास्ते
नाम की बस्ती थी और बस्ती रही

ना ख़ुदा थे हम ज़माने के लिये
अपनी तो मँझधार में कश्ती रही

गाँव की चौपाल जब बेवा हुई
शहर में शहनाई क्यों बजती रही

गाँव के हर घर का उजड़ा है सुहाग
मौत दुल्हन की तरह सजती रही

उनको अपने नाम की ही भूख है
मेरी रोटी ही मुझे तकती रही

साँप साँपों से गले मिलते रहे
आदमीअत आदमी डसती रही

हर इक घर का “चाँद” था झुलसा हुआ
मुँह जली सी चाँदनी तपती रही

९.
वो जब भी मिलते हैं मैं हँस के ठहर जाता हूँ
उनकी आँखों के समंदर में उतर जाता हूँ

ख़ुद को चुनते हुए दिन सारा गुज़र जाता है
जब हवा शाम की चलती है बिखर जाता हूँ

अपने अश्कों से जला के तेरी यादों के चिराग
सुरमई शाम के दरपन में सँवर जाता हूँ

चाँदनी रात की वीरानियों में चलते हुए
जब अपने साये तो तकता हूँ तो डर जाता हूँ

चाँद तारे मेरे दामन में सिमट आते हैं
सियाह रात में जुगनू-सा चमक जाता हूँ

१०.
दरमियाँ यों न फ़ासिले होते
काश ऐसे भी सिलसिले होते

हमने तो मुस्करा के देखा था
काश वोह भी ज़रा खिले होते

ज़िन्दगी तो फ़रेब देती है
मौत से काश हम मिले होते

हम ज़ुबाँ पर न लाते बात उनकी
लब हमारे अगर सिले होते

अपनी हम कहते उनकी भी सुनते
शिकवे रहते न फिर गिले होते

काश अपने उदास आँगन में
फूल उम्मीद के खिले होते

रात का यह सफर हसीं होता
“चाँद”, तारों के काफ़िले होते

११.
वो ख़ुराफ़ात पर उतर आया
अपनी औक़ात पर उतर आया

रूप में भेड़िया था इन्साँ के
एकदम ज़ात पर उतर आया

जिसकी नज़रों में सब बराबर थे
ज़ात और पात पर उतर आया

वो फ़राइज़ की बात करता था
इख़्तियारात पर उतर आया

हुक़्मे-परवर-दिगार मूसा के
मोजिज़ा हाथ पर उतर आया

चाँद जब आया अब्र से बाहर
नूर भी रात पर उतर आया


१२.
वो एक चाँद-सा चेहरा जो मेरे ध्यान में है
उसी के साये की हलचल मेरे मकान में है

मैं जिसकी याद में खोया हुआ-सा रहता हूँ
वो मेरी रूह में है और मेरी जान में है

वो जिसकी रौशनी से क़ायनात है जगमग
उसी के नूर का चर्चा तो कुल जहान में है

तुझे तलाश है जिस शय की मेरे पास कहाँ
तू जा के देख वो बाज़ार में दुकान में है

चला के देख ले बेशक तू मेरे सीने पर
वो तीर आख़िरी जो भी तेरी कमान में है

ये ज़िन्दगी है इसे ‘चाँद’, सहल मत समझो
हरेक साँस यहाँ गहरे इम्तिहान में है।

१३.
वही लापता है जिसे था पता
बताता भी कोई नहीं रास्ता

नहीं अपने घर का मुझे कुछ पता
अगर तुझको मालूम है तो बता

बदन पे न था मेरे अच्छा लिबास
मुझे शह्र में कोई क्यों पूछता

सुनाते हो क्यों मुझको इंजील तुम
मुझे इब्ने-मरियम का दे दो पता

हैं मजबूर हालात से “चाँद” सब
न तेरी ख़ता है न मेरी ख़ता

१४
रोशनी की डगर नहीं आती
उनकी सूरत नज़र नहीं आती

अब अँधेरों से घिर गया हूँ मैं
नहीं आती सहर नहीं आती

हाय अब उम्र भर का रोना है
मुस्कुराहट नज़र नहीं आती

ऐसा बदला मिजाज़ मौसम का
अब नसीमे-सहर नहीं आती

अब तो साहिल पे ग़म का साया है
अब ख़ुशी की लहर नहीं आती

जिनकी सूरत बसी है आँखों में
उनकी सूरत नज़र नहीं आती

चाँद है बादलों के घर मेहमाँ
चाँदनी अब इधर नहीं आती

१५.
रोज़ मुझको न याद आया कर
सब्र मेरा न आज़माया कर

रूठ जाती है नींद आँखों से
मेरे ख़्वाबों में तू न आया कर

भोर के भटके ऐ मुसाफ़िर सुन
दिन ढले घर को लौट आया कर

दिल के रखने से दिल नहीं फटता
दिल ही रखने को मुस्कुराया कर

राज़े दिल खुल न जाए लोगों पर
शेर मेरे न गुनगुनाया कर

ख़ुद को ख़ुद की नज़र भी लगती है
आईना सामने न लाया कर

रेत पे लिख के मेरा नाम अक्सर
बार बार इसको मत मिटाया कर

दोस्त होते हैं `चाँद’ शीशे के
दोस्तों को न आज़माया कर

१६.
रंगों की बौछार तो लाल गुलाल के टीके
बिन अपनों के लेकिन सारे रंग ही फीके

आँख का कजरा बह जाता है रोते-रोते
खाली नैनों संग करे क्या गोरी जी के

फूलों से दिल को जितने भी घाव मिले हैं
रफ़ू किया है काँटों की सुई से सी के

सब कुछ होते हुए तक़ल्लुफ़ मत करना तुम
हम तो अपने घर ही से आए हैं पी के

तेरी माँग के चाँद सितारे रहें सलामत
जलते रहें चिराग़ तुम्हारे घर में घी के

१७.
ये कैसी दिल्लगी है दिल्लगी अच्छी नहीं लगती
हमें तो आपकी यह बेरुख़ी अच्छी नहीं लगती

अँधेरों से हमें क्या हम उजालों के हैं मतवाले
जलाओ शम्अ हमको तीरगी अच्छी नहीं लगती

खुला है घर का दरवाज़ा चलो चुपके-से आ जाओ
न जाने क्यों तेरी नाराज़गी अच्छी नहीं लगती

हुए हो तुम जुदा जब से तुम्हारा नाम है लब पर
हमें तो अब खुदा की बंदगी अच्छी नहीं लगती

मैं जब उनके ख़यालों में यूँ अक्सर खो-सा जाता हूँ
फिर उनकी भी मुझे मौजूदगी अच्छी नहीं लगती

मैं अपने चाँद तारों से सजा लेता हूँ महफ़िल को
चिराग़ों की ये मद्धम रौशनी अच्छी नहीं लग

१८.
यहाँ तो लोग बदलते हैं मौसमों की तरह
कि नफ़रतें ही बरसती हैँ बारिशों की तरह

महब्बतों के जनाज़े उठे यहाँ कब के
ख़ुलूस टूट के बिखरा है आईनों की तरह

है मिलता जब भी कोई बेवजह गले हमसे
दिखाई देता है वो हमको दोस्तों की तरह

मैँ सोचता हूँ तो फिर सोचता ही रहता हूँ
मेरा वजूद हो जैसे कि पत्थरों की तरह

जहाँ में जिसको भी अपना बनाके देखा है
बस उसने रंग ही बदले हैं गिरगिटों की तरह

नज़र से सादा-सा मासूम-सा जो दिखता था
हमें तो लगता है वो शख़्स क़ातिलों की तरह

चमन में फूल खिलेंगे हमें यक़ीं है अभी
हमारी हसरतें ज़िन्दा हैं हसरतों की तरह

गिला करें तो करें तुमसे किस तरह हम भी
निभाई दोस्ती तुमने भी दुश्मनों की तरह

जो अपनी ऐनकें ही साफ़ कर नहीं पाते
उन्हें तो ‘चाँद’ भी दिखता है बादलों की तर

१९.
मेरे हाथों की लकीरों में मोहब्बत लिख दे
मेरे क़ातिब मेरी तक़दीर में रहमत लिख दे

वो जो मेरा है वही रूठ गया है मुझसे
उसके दिल में तू मेरे वास्ते उल्फ़त लिख दे

वो अदावत की क़िताबों को लिए बैठे हैं
उन क़िताबों में बस इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत लिख दे

मेरी जेबों में खनक कर भी सकूँ देते हैं
खोटे सिक्कों के मुक़द्दर में तू बरक़त लिख दे

शम्अ जलते ही मैं परवाने-सा जल जाता हूँ
तू मेरी राख़ को चाहे तो शहादत लिख दे

चाँद तारों की तरह चमके मुक़द्दर उनका
ये दुआ है मेरी उनके लिए शोहरत लिख दे

२०.
मेरे वजूद में बनके दिया वो जलता रहा
वो इक ख़याल था रोशन ज़हन में पलता रहा

बस गई काले गुलाबों की वो खुशबू रूह में
हसीन याद का संदल था और महकता रहा

वो धूप छाँव गरमी सरदी ना पुरवाई
बे एतबार-सा मौसम था और बदलता रहा

मैं जिनको डूबते छोड़ आया था मँझधारों में
उन्हीं की याद में मैं उम्रभर तड़पता रहा

वस्ल की रात थी सरग़ोशियों का आलम था
जो टूटा ख़्वाब तो मैं रात भर सुबकता रहा

२१.
किसी के प्यार के क़ाबिल नहीं है
मुहब्बत के लिए ये दिल नहीं है

बड़ा ही ग़मज़दा बे आसरा है
जे कुछ भी हो मगर बुज़दिल नहीं है

मुहब्बत में बला की चोट खाई
बहुत तड़पा है पर घायल नहीं है

ये परछाई किसी हरजाई की है
मेरा साया तो ये बिल्कुल नहीं है

मेरी आँखों से गुमसुम रोशनी है
मेरी नज़रों से वो ओझल नहीं है

मुझे जो जान से है बढ़ के प्यारा
क्यों मेरे दर्द में शामिल नहीं है

मुहब्बत चाँद से वो क्या करेगी
चकोरी जैसी जो पागल नहीं

२२.
पराए ग़म को भी हम अपना ग़म समझते हैं
मगर जो कमनज़र हैं हमको कम समझते हैं

किसी की बात को सुनने का हौसला तो हो
जो बोलते हैं बहुत बात कम समझते हैं

ख़ुदा गवाह है सारा ज़माना जानता है
जो तेरी बात में दम है वो हम समझते हैं

न मिलता हमसे तो जाने कहाँ बुझा होता
तेरे चेहरे का नया हम जनम समझते हैं

ख़ुदा करे कि हमारे ही जैसे और भी हों
तुम्हारे हुस्न की अज़मत को हम समझते हैं

ये अबके काली घटाओं के गहरे साये में
जो हमपे गुज़री है ऐ ‘चाँद’ हम समझते हैं

जो साहिबाने बसीरत हैं संग में ऐ `चाँद’
छुपे हुए हैं अज़ल से सनम समझते हैं

२३.
नाज़बरदारियाँ नहीं होतीं
हमसे मक़्क़ारियाँ नहीं होतीं

दिल में जो है वही ज़बान पे है
हमसे अय्यारियाँ नहीं होतीं

कम न होती ज़मीं ये जन्नत से
गर ये बदकारियाँ नहीं होतीं

इतनी पी है कि होश हैं गुम-सुम
अब ये मय-ख़्वारियाँ नहीं होतीं

अब यहाँ बुज़दिलों के डेरे हैं
अब वो सरदारियाँ नहीं होती

पहले होती थीं कुर्बतें दिल में
अब रवादारियाँ नहीं होती

जिन रुख़ों पर सजी हो शर्म-ओ-हया
उनपे फुलकारियाँ नहीं होती

‘चाँद’! जलते चिनार देखे हैं
मुझसे गुलकारियाँ नहीं होती

२४.
दो दिन का मेहमान है तेरी यादों का
उसपे यह एहसान है तेरी यादों का

आतीं हें तो फिर जाने का नाम नहीं
यह कैसा रुझान है तेरी यादों का

मन मंदिर में फूल महकते रहते थे
अब गुलशन वीरान है तेरी यादों का

चाक़-गिरेबाँ सबसे छुप-छुप रोते हैं
हमपे यह अहसान है तेरी यादों का

तेरी याद के पन्ने बिखरे रहते हैं
एक पूरा दीवान है तेरी यादों का

दिल के अरमाँ जलते-बुझते रहते हैं
यह तन-मन शमशान है तेरी यादों का

२५.
दिल में अक्सर मेहमाँ बन के आता है
पूछ न मुझसे क्या रिश्ता क्या नाता है

मैंने उसको उसने मुझको पहन लिया
क्या पहरावा यह दुनिया को भाता है

उस के दिए गुलाब में काटें भी होंगे
ध्यान ज़ेहन में आते जी घबराता है

दिल के ज़ज्बे सच्चे हों तो रोने से
आँख का हर आंसू मोती बन जाता है

चाँद अकेला लड़ता है अंधियारों से
सुबहो तलक यह तन्हा ही रह जाता है

२६.
अपनी नज़र से आज गिरा दीजिए मुझे
मेरी वफ़ा की कुछ तो सज़ा दीजिए मुझे

यक-तरफ़ा फ़ैसले में था इंसाफ़ कहाँ का
मेरा क़ुसूर क्या था बता दीजिए मुझे

दो जिस्म एक जान है बीमार हैं दोनों
उसको शफ़ा मिलेगी दुआ दीजिए मुझे

मैं जा रहा हूँ आऊँगा शायद ही लौट कर
ऐसे न बार-बार सदा दीजिए मुझे

इस दौर में अब इब्ने-मरयम नहीं मिलते
बस कान में अंजील सुना दीजिए मुझे

रोते हुए बच्चे ने माँ-बाप से कहा
बस चाँद आसमान से ला दीजिए मुझे

सोया रहा हूँ चाँद मैं ग़फ़लत की नींद में
रुख़सत का आया वक्त जगा दीजिए मुझे

२७.
अपने तो हौसले निराले हैं
आस्तीनों में सांप पाले हैं

बन न पाये वोह हमखयाल कभी
हम निवाले हैं हम पियाले हैं

कुछ अजब सा है रखरखाव उनका
तन के उजले हैं मन के काले हैं

जिन घरों की छतों में जाले हैं
उनके दिन कब बदलने वाले हैं

हैं दुआयें मेरे बुजुर्गों की
मेरे चारों तरफ उजाले हैं

दर्दे दिल का बयाँ करूँ किस से
जबकि सब के लबों पे ताले हैं

२८.
छुप के आता है कोई ख़्वाब चुराने मेरे
फूल हर रात महकते हैं सिरहाने मेरे

बंद आँखों में मेरी झाँकते रहना उनका
शब बनाती है यूँ ही लम्हे सुहाने मेरे

जब भी तन्हाई में मैं उनको भुलाने बैठूँ
याद आते हैं मुझे गुज़रे ज़माने मेरे

जब बरसते हैं कभी ओस के कतरे लब पर
जाम पलकों से छलकते हैं पुराने मेरे

याद है काले गुलाबों की वोह ख़ुशबू अब तक
तेरी ज़ुल्फ़ों से महक उट्ठे थे शाने मेरे

दरब-दर ढूँढते- फिरते तेरे कदमों के निशान
तेरी गलियों में भटकते हैं फ़साने मेरे

‘चाँद’ सुनता है सितारों की ज़बाँ से हर शब
साज़े-मस्ती में मोहब्बत के तराने मेरे

२९.
गैरत मंद परिंदों यूँ ही हवा में उडते जाते हो
जब हो दाना दुनका चुगना तब धरती पे आते हो

मनमानी और तल्ख बयानी से क्यों सच झुठलाते हो
खुद की झूठी कसमें खा कर जीते जी मर जाते हो

तेरा मेरा तर्के-तअल्ल्लुक बेशक एक हकीकत है
तुम फिर भी जाने अनजाने ख़्वाबों में आ जाते हो

जानते हो तुम इश्क मोहबत तपता आग का सेहरा है
इसी लिए तुम पाँव बरेहना चलने से कतराते हो

चलो कदम दो आगे रखो मैं भी थोडा बढता हूँ
प्यार है तो इज़हार करो क्यों बे वजह शरमाते हो

हमने तो तन्हाई मैं तारों से बाते करनी है
चाँद हमारे राज़ की बाते सुन ने क्यों आ जाते हो

३०.
गुज़री है अपनी ज़िन्दगी तन्हाइयों के साथ
ज़िन्दा हैं सर पे मौत की परछाइयों के साथ

हमसे बिछ्ड़ के भटकेगा हमदम! तू देखना
दिल में बसाया है तुझे गहराइयों के साथ

आए थे दिल में सैंकड़ों अरमाँ लिए हुए
लौटे हैं उसके शहर से रुसवाइयों के साथ

झूठा था वो इसीलिए अपना न हो सका
अपनी तो दोस्ती रही सच्चाइयों के साथ

फ़ुर्सत मिली न हमको ग़मे-रोज़गार से
ता-उम्र जूझते रहे मँहगाइयों के साथ

काटी है हमने उम्र इसी इन्तज़ार में
गुज़रेंगे तेरे कूचे से शहनाइयों के साथ

आकर अब छत पे देखिए उसके शबाब को
निकला फ़लक पे चाँद है राअनाइयों के साथ

३१.
ग़म गुसारों की बात करते हो
किन सहारों की बात करते हो

हम सभी मौसमों से गुज़रे हैं
क्यों बहारों की बात करते हो

जिनकी बुनियाद का वजूद नहीं
उन दीवारों की बात करते हो

तुमसे होगी नहीं मसीहाई
क्यों बीमारों की बात करते हो

जिनकी ख़ातिर हुए हो तुम रुस्वा
कैसे यारों की बात करते हो

गुलसिताँ आग के हवाले है
किन चिनारों की बात करते हो

एक जुगनू नज़र नहीं आता
तुम सितारों की बात करते हो

मेरी कश्ती इन्हीं में डूबी है
तुम किनारों की बात करते हो

चाँद पर भी हमें तो ख़ाक़ मिली
तुम सितारों की बात करते हो।

३२.
ख़ुशबुओं की तरह महकते गए
तेरी ज़ुल्फ़ों के साए डसते गए

जो न होना था वो हुआ यारो
भीड़ थी रास्ते बदलते गए

न मिला तू न तेरे घर का पता
हम तेरी दीद को तरसते गए

ज़िंदगी को जिया है घुट-घुट कर
दिल में अरमान थे मचलते गए

कैसा बचपन था बिन खिलौनों के
चुटकियों से ही हम बहलते गए

मेरे सपने अजीब सपने थे
मौसमों के तरह बदलते गए

जब छुपा बादलों की ओट में “चाँद”
ग़मज़दा थे सितारे ढलते गए

३३.
कौन कहता है लबो रुख़सार की बातें न हों
सुर्खियों की बात हो अख़बार की बातें न हों

दुश्मनों का जो रवैया है ये उन पे छोड़ दो
दोस्तों में तो कभी इंकार की बातें न हों

एक हो तुम पाँव हैं दो कश्तियों में किसलिए
इक तरफ़ हो जाओ तो बेकार की बातें न हों

सब ज़माने से न कह दें कान की कच्ची हैं ये
घर की दीवारों में अब अग़यार की बातें न हों

क्यों ज़माने को ख़बर हो जानेमन! ये जान लो
प्यार की बातों में अब तकरार की बातें न हों

“चाँद” हरदम गर्दिशे अय्याम में चलता रहा
आज इसके सामने रफ़्तार की बातें न हों

३४.
किसी के प्यार के क़ाबिल नहीं है
मुहब्बत के लिए ये दिल नहीं है

बड़ा ही ग़मज़दा बे आसरा है
जे कुछ भी हो मगर बुज़दिल नहीं है

मुहब्बत में बला की चोट खाई
बहुत तड़पा है पर घायल नहीं है

ये परछाई किसी हरजाई की है
मेरा साया तो ये बिल्कुल नहीं है

मेरी आँखों से गुमसुम रोशनी है
मेरी नज़रों से वो ओझल नहीं है

मुझे जो जान से है बढ़ के प्यारा
क्यों मेरे दर्द में शामिल नहीं है

मुहब्बत चाँद से वो क्या करेगी
चकोरी जैसी जो पागल नहीं है

३५.
किस तरह ख़ाना ख़राब अब फिर रहे हैं हम जनाब
नींद में भी सो न पाएँ देखते रहते हैं ख्वाब

वो हसीं हैं हमने माना और हैं वो पुर शबाब
हम भी उनसे कम नहीं हैं दिल के हैं यारों नवाब

दिल नहीं है अपने बस में न ही बस में है दिमाग़
दर्द हमको दे दिए हैं इस जहाँ ने बेहिसाब

तुझको फुरसत से बनाया है ख़ुदा ने ख़ुशजमाल
फूल-सा चेहरा तेरा और मस्त आँखें लाजवाब

लोग कहते हैं शराबी ये ग़लत इल्ज़ाम है
जिस क़दर आँसू पिये हैं उस से कम पी है शराब

तू अँधेरे में छुपी है ऐ मेरी जाने ग़ज़ल
चाँद हूँ आखिर तुझे मैं ही करूँगा बे-नकाब

३६.
इश्क़ का कारोबार करते थे
ग़म की दौलत शुमार करते थे

क्या तुम्हें याद है या भूल गये
हम कभी तुमसे प्यार करते थे

काँटे भरते थे अपने दामन में
फूल उन पर निसार करते थे

बनके मजनू जुदाई में उनकी
पैरहन तार तार करते थे

अब तो बस इतना याद है के उन्हें
याद हम बेशुमार करते थे

याद में तेरी रात भर तन्हा
“चाँद” तारे शुमार करते थे

३७.
आ रहा है देखना जश्ने बहारां आएगा
चाँद तारे माँग में उसकी कोई भर जाएगा

नाच उठेगी खुशी से झूम कर वो महजबीं
उसके आँगन में कोई जुगनू सजा कर जाएगा

रात भर सरगोशियाँ होतीं रहेंगी देर तक
उसके कानों में कोई मिसरी का रस भर जाएगा

आज तनहाई का आलम है तो कल होगा मिलन
सुरमुई आँखों में वो खुशियों के जल भर जाएगा

भूल जाएगी वो अपना ग़म मिलन की रात में
उसके ज़ख़्मों पर वो मरहम का असर कर जाएगा

प्यार से अपने भरेगा उसकी नस-नस में ख़ुमार
देखना तन- मन को वो चंदन बना कर जाएगा

बंद पलकों में तलाशेगा ख़ुद अपने अक्स को
“चाँद” जाने कितने वो सपने सजा कर जाएगा

३८.
हम उन्हें फिर गले लगाएँ क्यों
आज़माए को आजमाएँ क्यों

जब यह मालूम है कि डस लेगा
साँप को दूध फिर पिलाएँ क्यों

जब कोई राबता नहीं रखना
उनके फिर आस -पास जाएँ क्यों

हो गया था मुग़ालता इक दिन
बार -बार अब फ़रेब खाएँ क्यों

जब के उनसे दुआ- सलाम नहीं
मेरी ग़ज़लें वो गुनगुनाएँ क्यों

“चाँद” तारों से वास्ता है जब
हम अँधेरों को मुँह लगाएँ क्यों

३९.
अम्बर धरती उपर नीचे आग बरसती तकता हूँ
सोच रहें हैं दुनिया वाले फिर भी कैसे जिंदा हूँ

मैंने ख़ुशियाँ बेच के सारी दर्द ख़रीदे हैं यारो
अपनी इस दौलत के सदके मैं पहचाना जाता हूँ

मेरे जैसा जिंदादिल भी होगा कौन ज़माने में
ख़ुद को दिल का रोग लगा के हरदम हँसता रहता हूँ

जिन से मिट्टी का रिश्ता है क्यों वोह धूल उड़ाते हैं
जो हैं मेरी जान के दुश्मन मैं तो उनका अपना हूँ

जब से मौत क़रीब से देखी है मैंने इन आँखों से
चाप किसी के क़दमों की मैं हरदम सुनता रहता हूँ

एक बुलबुला हूँ पानी का और मेरी औक़ात है क्या
जानता हूँ मैं वक़्त के हाथों एक बेजान खिलौना हूँ

जिसने गहरे अँधियारे के आगे सीना ताना है
मैं अँधियारी रात में रौशन तन्हा “चाँद” का टुकड़ा हूँ