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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

ख़लीलुरर्ह्मान आज़मी


१.
दिल की दिल में न रह जाये ये कहानी कह लो
चाहे दो हर्फ़ लिखो चाहे ज़बानी कह लो

मैं ने मरने की दुआ माँगी वो पूरी न हुई
बस इस को मेरे जीने की कहानी कह लो

सरसर-ए-वक़्त उड़ा ले गई रूदाद-ए-हयात
वही अवराक़ जिन्हें अहद-ए-जवानी कह लो

तुम से कहने की न थी बात मगर कह बैठा
अब इसे मेरी तबियत की रवानी कह लो

वही इक क़िस्सा ज़माने को मेरा याद रहा
वही इक बात जिसे आज पुरानी कह लो

हम पे जो गुज़री है बस उस को रक़म करते हैं
आपबीती कहो या मर्सियाख़्वानी कह लो


२.
तर्ज़ जीने का सिखती है मुझे
तश्नगी ज़हर पिलाती है मुझे

रात भर रहती है किस बात की धुन
न जगाती है न सुलाती है मुझे

रूठता हूँ जो कभी दुनिया से
ज़िन्दगी आके मनाती है मुझे

आईना देखूँ तो क्यूँकर देखूँ
याद इक शख़्स की आती है मुझे

बंद करता हूँ जो आँखें क्या क्या
रोशनी सी नज़र आती है मुझे

कोई मिल जाये तो रास्ता कट जाये
अपनी परचाई डराती है मुझे

अब तो ये भूल गया किस की तलब
देस परदेस फिराती है मुझे

कैसे हो ख़त्म कहानी ग़म की
अब तो कुछ नींद सी आती है मुझे


३.
जलता नहीं और जल रहा हूँ
किस आग में मैं पिघल रहा हूँ

मफ़लूज हैं हाथ-पाँव मेरे
फिर ज़हन में क्यूँ चल रहा हूँ

राई का बना के एक पर्वत
अब इस पे ख़ुद ही फिसल रहा हूँ

किस हाथ से हाथ मैं मिलाऊँ
अब अपने ही हाथ मल रहा हूँ

क्यों आईना बार बार देखूँ
मैं आज नहीं जो कल रहा हूँ

अब कौन सा दर रहा है बाक़ी
उस दर से क्यों मैं निकल रहा हूँ

क़दमों के तले तो कुछ नहीं है
किस चीज़ को मैं कुचल रहा हूँ

अब कोई नहीं रहा सहारा
मैं आज से फिर सम्भल रहा हूँ

ये बर्फ़ हटाओ मेरे सर से
मैं आज कुछ और जल रहा हूँ


४.
रुख़ में गर्द-ए-मलाल थी क्या थी
हासिल-ए-माह-ओ-साल थी क्या थी

एक सूरत सी याद है अब भी
आप अपनी मिसाल थी क्या थी

मेरे जानिब उठी थी कोई निगाह
एक मुबहम सवाल थी क्या थी

उस को पाकर भी उस को पा न सका
जुस्तजू-ए-जमाल थी क्या थी

दिल में थी पर लबों तक आ न सकी
आरज़ू-ए-विसाल थी क्या थी

उम्र भर में बस एक बार आई
स'अत-ए-लाज़वाल थी क्या थी