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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

मौलाना हारून 'अना' क़ासमी

जन्म : 28 फरवरी 1966
जन्म स्थान : छतरपुर (म.प्र.)
ग़ज़ल संग्रह 'हवाओं के साज़ पर प्रकाशित देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित

सम्पर्क:आकाशवाणी तिराहा, छतरपुर (म.प्र.) पिन-471001,मोबाइल नम्बर - 9826506125





1 ग़ज़ल
कभी हाँ कुछ, मेरे भी शेर पैकर1 में रहते हैं
वही जो रंग, तितली के सुनहरे पर में रहते हैं|

निकल पड़ते हैं जब बाहर, तो कितना ख़ौफ़ लगता है,
वही कीड़े, जो अक्सर आदमी के सर में रहते हैं|

यही तो एक दुनिया है, ख़्यालों की या ख़्वाबों की,
हैं जितने भी ग़ज़ल वाले, इसी चक्कर में रहते हैं|

जिधर देखो वहीं नफ़रत के आसेबां2 का साया है,
मुहब्बत के फ़रिश्ते अब कहाँ किस घर में रहते हैं|

वो जिस दम भर के उसने आह, मुझको थामना चाहा,
यक़ीं उस दम हुआ, के दिल भी कुछ पत्थर में रहते हैं|

1 साचाँ 2 भूत

2 ग़ज़ल
माने जो कोई बात, तो इक बात बहुत है,
सदियों के लिए पल की मुलाक़ात बहुत है|

दिन भीड़ के पर्दे में छुपा लेगा हर इक बात,
ऐसे में न जाओ, कि अभी रात बहुत है|

महिने में किसी रोज, कहीं चाय के दो कप,
इतना है अगर साथ, तो फिर साथ बहुत है|

रसमन ही सही, तुमने चलो ख़ैरियत पूछी,
इस दौर में अब इतनी मदारात1 बहुत है|

दुनिया के मुक़द्दर की लक़ीरों को पढ़ें हम,
कहते है कि मज़दूर का बस हाथ बहुत है|

फिर तुमको पुकारूंगा कभी कोहे 'अना'2 से,
अय दोस्त अभी गर्मी-ए- हालात बहुत है|
1.हमदर्दी 2. स्वाभिमान

3 ग़ज़ल
बहुत वीरान लगता है, तिरी चिलमन का सन्नाटा,
नया हंगामा माँगे है, ये शहरे-फ़न का सन्नाटा|

कोई पूछे तो इस सूखे हुए तुलसी के पौधे से,
कि उस पर किस तरह बीता खुले आँगन का सन्नाटा|

तिरी महफ़िल की रूदादें बहुत सी सुन रखीं हैं पर,
तिरी आँखों में देखा है, अधूरेपन का सन्नाटा|

सयानी मुफ़लिसी फुटपाथ पर बेख़ौफ़ बिखरी है,
कि दस तालों में रहता है बिचारे धन का सन्नाटा|

ख़ुदाया इस ज़मीं पर तो तिरे बंदांे का क़ब्ज़ा है,
तू इन तारों से पुर कर दे मिरे दामन का सन्नाटा |

मिरी उससे कई दिन से लडा़ई भी नहीं फिर भी,
अ़जब ख़श्बू बिखेरे है, ये अपनेपन का सन्नाटा |

तुम्हें ये नींद कुछ यूँ ही नहीं आती 'अना ' साहिब,
दिलों को लोरियाँ देता है हर धड़कन का सन्नाटा |

4 ग़ज़ल
ये फ़ासले भी, सात समन्दर से कम नहीं,
उसका ख़ुदा नहीं है, हमारा सनम नहीं |

कलियाँ थिरक रहीं हैं, हवाओं के साज़ पर,
अफ़सोस मेरे हाथ में काग़ज़ क़लम नहीं |

पी कर तो देख इसमें ही कुल कायनात है,
जामे-सिफ़ाल1 गरचे मिरा जामे-जम2 नहीं |

तुमको अगर नहीं है शऊरे-वफ़ा तो क्या,
हम भी कोई मुसाफ़िरे-दश्ते-अलम3 नहीं |

टूटे तो ये सुकूत4 का अ़ालम किसी तरह,
गर हाँ नहीं, तो कह दो ख़ुदा की क़सम,नहीं |

इक तू, कि लाज़वाल5 तिरी ज़ाते-बेमिसाल,
इक मैं के जिसका कोई वजूदो-अ़दम6 नहीं|

1. मिट्टी का प्याला 2. जमशेद बादशाह का,
वो प्याला जिसमें वो सारा संसार देखता था |
3. मुसीबतों के जंगल का राही 4. ख़ामोशी
5. अमिट 6. अस्तित्व एवं नश्वरता


5 ग़ज़ल
कभी वो शोख़ मेरे दिल की अंजुमन तक आये
मेरे ख़्याल से गुज़रे मेरे सुख़न1 तक आये

जो आफ़ताब थे ऐसा हुआ तेरे आगे
तमाम नूर समेटा तो इक किरन तक आये

कहे हैं लोग कि मेरी ग़ज़ल के पैकर2 से
कभी कभार तेरी ख़ुशबू-ए-बदन तक आये

जो तू नहीं तो बता क्या हुआ है रात गये
मेरी रगों में तेरे लम्स3 की चुभन तक आये

अब अश्क पोंछ ले जाकर कहो ये नरगिस4 को
अगर तलाशे-नज़र है मेरे चमन तक आये

तमाम रिश्ते भुलाकर मैं काट लंूगा इन्हें
अगर ये हाथ कभी मादरे-वतन तक आये

जो इश्क़ रूठ के बैठे तो इस तरह हो 'अना'
कि हुस्न आये मनाने तो सौ जतन तक आये

1 कवित्व 2 सांचा 3 स्पर्श 4 घने जगंल में खिलने वाला फूल

6 ग़ज़ल
ख़बर है दोनों को दोनों से दिल लगाऊँ मैं
किसे फ़रेब दूँ किस से फ़रेब खाऊँ मैं

नहीं है छत न सही आसमाँ तो अपना है
कहो तो चाँद के पहलू में लेट जाऊँ मैं

यही वो शय है कहीं भी किसी भी काम में लो
उजाला कम हो तो बोलो कि दिल जलाऊॅं मैं

नहीं नहीं ये तिरी ज़िद नहीं है चलने की
अभी अभी तो वो सोया है फिर जगाऊँ मैं


बिछड़ के उससे दुआ कर रहा हूँ अय मौला
कभी किसी की मुहब्बत न आज़माऊँ मैं

हर एक लम्हा नयापन हमारी फ़ितरत है
जो तुम कहो तो पुरानी ग़ज़ल सुनाऊँ मैं

7 ग़ज़ल
यूँ इस दिले नादाँ से रिश्तों का भरम टूटा
हो झूठी क़सम टूटी या झूठा सनम टूटा

सागर से उठीं आहें, आकाश पे जा पहुँचीं
बादल सा ये ग़म आख़िर बा दीदा-ए-नम टूटा

ये टूटे खंडहर देखे तो दिल ने कहा मुझसे
मसनूई1 ख़ुदाओं के अबरू का है ख़म टूटा

बाक़ी ही बचा क्या था लिखने के लिए उसको
ख़त फाड़ के भेजा है, अलफ़ाज़ का ग़म टूटा

उस शोख़ के आगे थे सब रंगे धनक फीके
वो शाख़े बदन लचकी तो मेरा क़लम टूटा

बेचोगे 'अना' अपनी बेकार की शय2लेकर
किस काम में आयेगा जमशेद3 का जम4टूटा

1 झूठे 2 चीज़ 3 एक बादशाह 4 उसका मशहूर प्याला


8 ग़ज़ल
ये अपना मिलन जैसे इक शाम का मंज़र है
मैं डूबता सूरज हूं तू बहता समन्दर है

सोने का सनम था वो, सबने उसे पूजा है
उसने जिसे चाहा है वो रेत का पैकर है

जो दूर से चमके हैं वो रेत के ज़र्रे हैं
जो अस्ल में मोती है वो सीप के अन्दर है

दिल और भी लेता चल पहलू में जो मुमकिन हो
उस शोख के रस्ते में एक और सितमगर है

दो दोस्त मयस्सर हैं इस प्यार के रस्ते में
इक मील का पत्थर है, इक राह का पत्थर है

सब भूल गया आख़िर पैराक हुनर अपने
अब झील सी अंाखों में मरना ही मुक़द्दर है

अब कौन उठाएगा इस बोझ को किश्ती पर
किश्ती के मुसाफ़िर की अंाखों में समन्दर है

9 ग़ज़ल

दिल की हर धड़कन है बत्तिस मील में
हम ज़िले में और वो तहसील में

उसकी आराइश1 की क़ीमत कैसे दूँ
दिल को तोला नाक की इक कील में

कुछ रहीने मय2 नहीं मस्ते ख़राम
सब नशा है सैण्डिल की हील में

यक-ब-यक लहरों में दम सी आ गई
लड़कियों ने पाँव डाले झील में

उम्र अदाकारी में सारी कट गई
इक ज़रा से झूठ की तावील3 में

आप कहकर देखियेगा तो हुज़ूर
सर है ह़ाज़िर हुक्म की तामील में

सैकड़ों ग़ज़लें मुकम्मल हो गईं
इक अधूरे शेर की तकमील4 में

1 श्रृगंार 2 शराब की अहसानमंद 3 बात घुमाना 4 पूरा करने की कोशिश

10. ग़ज़ल

खैंची लबों ने आह कि सीने पे आया हाथ
बस पर सवार दूर से उसने हिलाया हाथ

महफ़िल में यूँ भी बारहा उसने मिलाया हाथ
लहजा था ना-शनास1 मगर मुस्कुराया हाथ

फूलों में उसकी साँस की आहट सुनाई दी
बादे सबा2 ने चुपके से आकर दबाया हाथ

यँू ज़िन्दगी से मेरे मरासिम3 हैं आज कल
हाथों में जैसे थाम ले कोई पराया हाथ

मैं था ख़मोश जब तो ज़बाँ सबके पास थी
अब सब हैं लाजवाब तो मैंने उठाया हाथ

1 अपरिचित 2 सुबह की खुश्बूदार हवा 3 तअल्लुक़ा


११.
उसको नम्बर देके मेरी और उलझन बढ़ गई
फोन की घंटी बजी और दिल की धड़कन बढ़ गई

इस तरफ़ भी शायरी में कुछ वज़न-सा आ गया
उस तरफ़ भी चूड़ियों की और खन-खन बढ़ गई 


हम ग़रीबों के घरों की वुसअतें मत पूछिए
गिर गई दीवार जितनी उतनी आँगन बढ़ गई

मशवरा औरों से लेना इश्क़ में मंहगा पड़ा
चाहतें क्या ख़ाक बढ़तीं और अनबन बढ़ गई

आप तो नाज़ुक इशारे करके बस चलते बने
दिल के शोलों पर इधर तो और छन-छन बढ़ ग


१२.
उस क़ादरे-मुतलक़ से बग़ावत भी बहुत की
इस ख़ाक के पुतले ने जसारत भी बहुत की

इस दिल ने अदा कर दिया हक़ होने का अपने
नफ़रत भी बहुत की है मुहब्बत भी बहुत की

काग़ज़ पे तो अपना ही क़लम बोल रहा है
मंचों पे लतीफ़ों ने सियासत भी बहुत की

नादान सा दिखता था वो हुशियार बहुत था
सीधा-सा बना रह के शरारत भी बहुत की

मस्जिद में इबादत के लिए रोक रहा था
आलिम था मगर उसने जहालत भी बहुत की

इंसाँ की न की क़द्र तो लानत में पड़ा है
करने को तो शैतां ने इबादत भी बहुत की

मैं ही न सुधरने पे बज़िद था मेरे मौला
तूने तो मिरे साथ रियायत भी बहुत की


१२.
उससे कहना कि कमाई के न चक्कर में रहे
दौर अच्छा नहीं बेहतर है कि वो घर में रहे

जब तराशे गए तब उनकी हक़ीक़त उभरी
वरना कुछ रूप तो सदियों किसी पत्थर में रहे

दूरियाँ ऐसी कि दुनिया ने न देखीं न सुनीं
वो भी उससे जो मिरे घर के बराबर में रहे

वो ग़ज़ल है तो उसे छूने की ह़ाजत भी नहीं
इतना काफ़ी है मिरे शेर के पैकर में रहे

तेरे लिक्खे हुए ख़त भेज रहा हूँ तुझको
यूँ ही बेकार में क्यों दर्द तिरे सर में रहे

ज़िन्दगी इतना अगर दे तो ये काफ़ी है ’अना’
सर से चादर न हटे पाँव भी चादर में रहे


१३.
कुछ चलेगा जनाब कुछ भी नहीं
चाय कॉफी शराब कुछ भी नहीं

चुप रहें तो कली लगें वो होंट
हँस पड़ें तो गुलाब कुछ भी नहीं

जो ज़मीं पर है सब हमारा है
सब है अच्छा ख़राब कुछ भी नहीं

इन अमीरों की सोच तो ये है
हम ग़रीबों के ख़्वाब कुछ भी नहीं

मन की दुनिया में सब ही उरियाँ हैं
दिल के आगे हिजाब कुछ भी नहीं

मीरे-ख़स्ता के शेर के आगे
हम से ख़ानाख़राब कुछ भी नहीं

उम्र अब अपनी अस्ल शक्ल में आ
क्रीम पोडर खि़ज़ाब कुछ भी नहीं

ज़िन्दगी भर का लेन देन ‘अना’
और हिजाबो-किताब कुछ भी नहीं


१४.
कैसा रिश्ता है इस मकान के साथ
बात करता हूँ बेज़बान के साथ

आप तन्हा जनाब कुछ भी नहीं
तीर जचता है बस कमान के साथ

हर बुरे वक़्त पर नज़र उट्ठी
क्या तअल्लुक है आसमान के साथ

दुश्मनी थी तो कुछ तो हासिल था
छिन गया सारा कुछ अमान के साथ

थे ज़मीं पर तो ठीक-ठाक था सब
पर बिखरने लगे उड़ान के साथ

एक इंसाँ ही सो रहा है फ़क़त
कुल जहाँ उठ गया अजान के साथ

ना सही मानी हर्फ़ ही से सही
एक निस्बत तो है कुरान के साथ


१५.
छू जाए दिल को ऐसा कोई फ़न अभी कहाँ
कोशिश है शायरी की ये सब शायरी कहाँ

यूँ भी हुआ कि रेत को सागर बना दिया
ऐसा नहीं तो जाओ अभी तिशनगी कहाँ

ये और बात दर्द ने शक्लें तराश लीं
जो नक्श बोलते हैं वो सूरत बनी कहाँ

माना हमारे जैसे हज़ारों हैं शहर में
तुम जैसी कोई चीज़ मगर दूसरी कहाँ

ये जो बरहना संत है पहचानिए हुज़ूर
ये गुल खिला गई है तिरी दिल्लगी कहाँ

अब आपको तो उसके सिवा सूझता नहीं
किस शख़्स की ये बात है और आप भी कहाँ

ये क्या छुपा रहा है वो टोपी में देखिए
इस मयकदे के सामने ये मौलवी कहाँ

आँखें हैं या के तश्त में जलते हुए चराग़
करने चले हैं आप ये अब आरती कहाँ


१६.
जो ज़बाँ से लगती है वो कभी नहीं जाती
दर्द भी नहीं जाता चोट भी नहीं जाती

गर तलब हो सादिक़ तो ख़र्च-वर्च कर डालो
मुफ़्त की शराबों से तिश्नगी नहीं जाती

अब भी उसके रस्ते में दिल धड़कने लगता है
हौसला तो करता हूँ बुज़दिली नहीं जाती

कुछ नहीं है दुनिया में इक सिवा मुहब्बत के
और ये मुहब्बत ही तुमसे की नहीं जाती

तर्के-मय को ऐ वाइज़ तू न कुछ समझ लेना
इतनी पी चुका हूँ के और पी नहीं जाती

शाख़ पर लगा है गर उसका क्या बिगड़ना है
फूल सूँघ लेने से ताज़गी नहीं जाती

नाव को किनारा तो वो ख़ुदा ही बख़्शेगा
फिर भी नाख़ुदाओं की बंदगी नहीं जाती

शेरो शायरी क्या है सब उसी का चक्कर है
वो कसक जो सीने से आज भी नहीं जाती

उसको देखना है तो दिल की खिड़कियाँ खोलो
बंद हों दरीचे तो रौशनी नहीं जाती

तेरी जुस्तजू में अब उसके आगे जाना है
जिन हुदूद के आगे शायरी नहीं जाती


१७.
पैसा तो ख़ुशामद में मेरे यार बहुत है
पर क्या करूँ ये दिल मिरा खुद्दार बहुत है

इस खेल में हाँ की भी ज़रूरत नहीं होती
लहजे में लचक हो तो फिर इंकार बहुत है

रस्ते में कहीं जुल्फ़ का साया भी अता हो
ऐ वक़्त तिरे पाँव की रफ़्तार बहुत है

बेताज हुकूमत का मज़ा और है वरना
मसनद के लिए लोगों का इसरार बहुत है

मुश्किल है मगर फिर भी उलझना मिरे दिल का
है हुस्न तिरी जुल्फ़ तो ख़मदार बहुत है

अब दर्द उठा है तो ग़ज़ल भी है ज़रूरी
पहले भी हुआ करता था इस बार बहुत है

सोने के लिए क़द के बराबर ही ज़मीं बस
साए के लिए एक ही दीवार बहुत है


१८.
फ़न तलाशे है दहकते हुए जज़्बात का रंग
देख फीका न पड़े आज मुलाक़ात का रंग

हाथ मिलते ही उतर आया मेरे हाथों में
कितना कच्चा है मिरे दोस्त तिरे हाथ का रंग

है ये बस्ती तिरे भीगे हुए कपड़ों की तरह
तेरे इस्नान-सा लगता है ये बरसात का रंग

शायरी बोलूँ इसे या के मैं संगीत कहूँ
एक झरने-सा उतरता है तिरी बात का रंग

ये शहर शहरे-मुहब्बत की अलामत था कभी
इसपे चढ़ने लगा किस-किस के ख़्यालात का रंग

है कोई रंग जो हो इश्क़े-ख़ुदा से बेहतर
अपने आपे में चढ़ा लो उसी इक ज़ात का रंग


१९.
बचा ही क्या है हयात में अब सुनहरे दिन तो निपट गए हैं
यही ठिकाने के चार दिन थे सो तेरी हां हूं में कट गए हैं

हयात ही थी सो बच गया हूँ वगरना सब खेल हो चुका था
तुम्हारे तीरों ने कब ख़ता की हमीं निशाने से हट गए हैं

हरेक जानिब से सोच कर ही चढ़ाई जाती हैं आस्तीनें
वो हाथ लम्बे थे इस क़दर के हमारे क़द ही सिमट गए हैं

हमारे पुरखों की ये हवेली अजीब क़ब्रों-सी हो गई है
थे मेरे हिस्से में तीन कमरे जो आठ बेटों में बट गए हैं

मुहब्बतों की वो मंज़िलें हों के जाहो-हशमत की मसनदें हों
कभी वहाँ फिर न मुड़ के देखा क़दम जहाँ से पलट गए हैं

बड़े परीशा हैं ऐ मुहासिब तिरे हिसाबो-किताब से हम
किसे बताएँ ये अलमिया अब कि ज़र्ब देने पे घट गए हैं

मैं आज खुल कर जो रो लिया हूँ तो साफ़ दिखने लगे हैं मंज़र
ग़मों की बरसात हो चुकी है वो अब्र आँखों से छँट गए हैं

वही नहीं एक ताज़ा दुश्मन सभी को मिर्ची लगी हुई है
हमें क्या अपना बनाया तुमने कई नज़र में खटक गए हैं


२०.
बहुत वीरान लगता है तिरी चिलमन का सन्नाटा
नया हंगामा माँगे है ये शहरे-फ़न का सन्नाटा ।

कोई पूछे तो इस सूखे हुए तुलसी के पौधे से
कि उस पर किस तरह बीता खुले आँगन का सन्नाटा ।

तिरी महफ़िल की रूदादें बहुत सी सुन रखीं हैं पर
तिरी आँखों में देखा है अधूरेपन का सन्नाटा ।

सयानी मुफ़लिसी फुटपाथ पर बेख़ौफ़ बिखरी है
कि दस तालों में रहता है बिचारे धन का सन्नाटा ।

ख़ुदाया इस ज़मीं पर तो तिरे बंदों का क़ब्ज़ा है
तू इन तारों से पुर कर दे मिरे दामन का सन्नाटा ।

मिरी उससे कई दिन से लडा़ई भी नहीं फिर भी
अ़जब ख़ुशबू बिखेरे है ये अपनेपन का सन्नाटा ।

तुम्हें ये नींद कुछ यूँ ही नहीं आती 'अना ' साहिब
दिलों को लोरियाँ देता है हर धड़कन का सन्नाटा ।


२१.

यूँ इस दिले नादाँ से रिश्तों का भरम टूटा
हो झूठी क़सम टूटी या झूठा सनम टूटा ।

सागर से उठीं आहें आकाश पे जा पहुँचीं
बादल-सा ये ग़म आख़िर बा दीदा-ए-नम टूटा ।

ये टूटे खंडहर देखे तो दिल ने कहा मुझसे
मसनूई[1] ख़ुदाओं के अबरू का है ख़म टूटा ।

बाक़ी ही बचा क्या था लिखने के लिए उसको
ख़त फाड़ के भेजा है अलफ़ाज़ का ग़म टूटा ।

उस शोख़ के आगे थे सब रंगे धनक फीके
वो शाख़े बदन लचकी तो मेरा क़लम टूटा ।

बेचोगे 'अना' अपनी बेकार की शय[2] लेकर
किस काम में आयेगा जमशेद[3] का जम[4] टूटा ।

शब्दार्थ:
  1. झूठे
  2. चीज़
  3. एक बादशाह
  4. उसका मशहूर प्याला
२२.
ये मक़ामे इश्क़ है कौनसा कि मिज़ाज सारे बदल गए
मैं इसे कहूँ भी तो क्या कहूँ मिरे हाथ फूल से जल गए

तिरी बेरूख़ी की जनाब से कई शेर यूँ भी अ़ता हुए
के ज़बाँ पे आने से पेशतर मिरी आँख ही में मचल गए

तिरा मैकदा भी अ़जीब है कि अलग यहाँ के उसूल हैं
कभी बे पिए ही बहक गए कई बार पी के सम्हल गए

सुनो ज़िन्दगी की ये शाम है यहाँ सिर्फ़ अपनों का काम है
जो दिए थे वक़्त पे जल उठे थे जो आफ़ताब वो ढल गए

कई लोग ऐसे मिले मुझे जिन्हें मैं कभी न समझ सका
बड़ी पारसाई की बात की बड़ी सादगी से पिघल गए

ज़रा ऐसा करदे तू ऐ ख़ुदा कि ज़बाँ वो मेरी समझ सकें
वो जो शेर उनके लिए कहे वही उनके सर से निकल गए

२३.
ये शबे-अख़्तरो-क़मर चुप है
एक हंगामा है मगर चुप है

चल दिए क़ाफ़िले कयामत के
और दिल है कि बेख़बर चुप है

उनके गेसू और इस क़दर बरहम
इक तमाशा और इस क़दर चुप है

पहले कितनी पुकारें आती थीं
चल पड़ा हूँ तो रहगुज़र चुप है

बस ज़बाँ हाँ कहे ये ठीक नहीं
क्या हुआ क्यों तिरी नज़र चुप है

साथ तेरे ज़माना बोलता था
तू नहीं है तो हर बशर चुप है

बर्क़ ख़ामोश ज़मज़मे ख़ामोश
शायरी का हरिक हुनर चुप है

राज़ कुछ तो है इस ख़मोशी का
बात कुछ तो है तू अगर चुप है