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सन्देश

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और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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रविवार, 10 फ़रवरी 2013

वाजिदा तबस्सुम


१.
ये भी क्या एहसान कम हैं देखिये न आप का
हो रहा है हर तरफ़ चर्चा हमारा आप का

चाँद में तो दाग़ है पर आप में वो भी नहीं
चौधवी के चाँद से बड़कर है चेहर आप का

इश्क़ में ऐसे भी हम डूबे हुए हैं आप के
अपने चेहरे पे सदा होता हैं धोका आप का

चाँद सूरज धूप सुबह कह्कशाँ तारे शमा
हर उजाले ने चुराया है उजाला आप का


२.
 हमारे उन के मरासिम की बात मत पूछो 
ये सिल्सिला तो कहीं दूर जाँ से मिलता है

है अपने मुक़द्दर की बात क्या कहिये
हमारे ज़ख़्म को मरहम कहाँ से मिलता है

हमारे प्यार के क़िस्से गली गली बिखरे
ये मरतबा बड़े सूद-ओ-ज़ियाँ से मिलता है

सितरों जैसी ये आँखें ये चाँद स चेहरा
तुम्हारा सिल्सिला कुछ आसमाँ से मिलता है

हमारा ज़िक्र किताबों में ढूँढने वालो
हमारा ज़िक्र तो सरे जहाँ से मिलता है

३.
कैसे कैसे हादसे सहते रहे
हम यूँ ही जीते रहे हँसते रहे

उस के आ जाने की उम्मीदें लिये
रास्ता मुड़ मुड़ के हम तकते रहे

वक़्त तो गुज़रा मगर कुछ इस तरह
हम चराग़ों की तरह जलते रहे

कितने चेहरे थे हमारे आस-पास
तुम ही तुम दिल में मगर बसते रहे

४.
या तो मिट जाइये या मिटा दीजिये
कीजिये जब भी सौदा खरा कीजिये

अब जफ़ा कीजिये या वफ़ा कीजिये
आख़री वक़्त है बस दुआ कीजिये

अपने चेहरे से ज़ुल्फ़ें हटा दीजिये
और फिर चाँद का सामना कीजिये

हर तरफ़ फूल ही फूल खिल जायेंगे
आप ऐसे ही हँसते रहा कीजिये

आप की ये हँसी जैसे घुंगरू बजे
और क़यामत है क्या ये बता दीजिये

५.
कुछ न कुछ तो ज़रूर होना है
सामना आज उनसे होना है

तोड़ो फेन्को रक्खो करो कुछ भी
दिल हमारा है क्या खिलोना है

ज़िन्दगी और मौत का मत्लब
तुम को पाना है तुम को खोना है

इतना डरना भी क्या है दुनिया से
जो भी होना है वो तो होना है

उठ के महफ़िल से मत चले जाना
तुम से रोशन ये कोना कोना है