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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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रविवार, 24 फ़रवरी 2013

अरुण मित्तल अद्भुत

जन्म- २१ फ़रवरी १९८५ को चरखी दादरी में।

ईमेल- adbhut_arun@yahoo.co.in

१.
जो उजालों में मिलेंगे शाम को
वो सुबह जैसा कहेंगे शाम को

इन चिरागों में किसी का है लहू
खुद ब खुद ये जल उठेंगें शाम को

वो लतीफा सुनके अब तो चल दिए
गर समझ आया हँसेंगे शाम को

याद रखना इन पलों की दास्तां
इक दफा हम फिर मिलेंगे शाम को

दिलजलों को इसमें इक पैगाम है
यह गजल फिर से पढेंगे शाम को

सूना है मयखाना अब तो गम न कर
लोग बहुतेरे जुडेंगे शाम को शाम को

साथ लेकर हम भी कोई गम गुसार
कब्र पर उनकी मिलेंगे शाम को 


२.
यूँ ही सारा हिसाब मत देना
सबको दिल की किताब मत देना

ऐ खुदा हुस्न देना दुनिया को
पर कभी बेहिसाब मत देना

फिर नया इक सवाल पैदा हो
कोई ऐसा जवाब मत देना

मेरा आँसू मेरी हकीकत है
मुझको आँसू का ख्वाब मत देना

छीन ले मुझसे जो मेरा अद्भुत
मुझको ऐसा खिताब मत देना


३.
 सिर्फ और सिर्फ खामोशी तो नहीं 
जिन्दगी मौत से बुरी तो नहीं

आँसुओं से जिसे न सींचा हो
कुछ भी हो पर वो शायरी तो नहीं

दर्द दिल का तुम्हें बताएगा
इश्क है हाँ ये दिल्लगी तो नही

नूर पाने की है तमन्ना भी
पर कभी की वो बंदगी तो नहीं

तुमने अद्भुत कहा है हालेदिल
तुमको खुद से ही दुश्मनी तो नहीं


४.
तुम्हें झूठ से बहलाने में डर लगता है
पर सच तक भी तो जाने में डर लगता है

तुझसे दूर रहूँ ये मुझको नहीं गवारा
लेकिन तेरे पास आने में डर लगता है

जिसको खुद ही ठुकराया था मैंने इक दिन
उसको फिर से अपनाने में डर लगता है

पता है मुझको बात वो मेरी मानेगा ही
लेकिन दिल को समझाने में डर लगता है

टूट गया है उनसे रिश्ता ये भी सच है
पर यह खुद को बतलाने में डर लगता है

जिनकी क़समें तोड़ नहीं मैं सकता अद्भुत
हाँ उनकी क़समें खाने में डर लगता है


५.
खुद से मिलकर हो रही है आज हैरानी बहुत
मन नहीं लगता कहीं भी है परेशानी बहुत

झेलने की दर्दो गम को और गुंजाइश नहीं
सह चुका है मन मेरा दुनिया की मनमानी बहुत

चाहता हूं मैं तड़प के साथ अश्कों की नमी
यूँ तो बारिश में भी गिरता है यहाँ पानी बहुत

वो हसीं देखे हुए तो एक मुद्दत हो गई
लग रही है मुस्कुराहट भी ये अनजानी बहुत

जाने क्यों आँखों से आँसू बहने को बेताब हैं
धड़कनें किस बात की खातिर हैं दीवानी बहुत

मेरे कहते ही ये मंजर सब समझ जाओगे तुम
पर है मुश्किल बात ये मुश्किल है कह पानी बहुत

ठीक है अद्भुत जिया है तूने ग़ज़लों का हुनर
पर तेरे अशआर में है अब भी नादानी बहुत


६.
वेदना के व्यक्त जल को कौन समझेगा
मेरे आँसू के महल को कौन समझेगा

इस शहर में झूठ ही मशहूर होता है
सत्य पर मेरी पहल को कौन समझेगा

जिन्दगी को ही कहाँ कब हम समझ पाए
तुम बताओ फिर अजल को कौन समझेगा

ना मिलन ना आस हो कोई भी मिलने की
उस विरह के दावानल को कौन समझेगा

तुमको भेजी है ग़ज़ल यह सोचकर अद्भुत
तुमसे बेहतर इस ग़ज़ल को कौन समझेगा


७.
अंधेरों में चमकता जो सितारा ढूँढ लेते हैं
गमों में भी वो खुशियों का सहारा ढूँढ लेते हैं

कि जिनके दिल में है हरदम जुनूं हाँ जीतने का बस
वो हर तूफान में अपना किनारा ढूँढ लेते हैं

पता हमने कभी ना आँसुओं को भी दिया अपना
न जाने फिर वो कैसे घर हमारा ढूँढ लेते हैं

ये उनकी बादशाहत है या समझूँ मैं हकीकत ही
कि खुद में ही खुदा का वो नज़ारा ढूँढ लेते हैं

मेरी जो मुस्कुराहट गुम हुई तो मिल नहीं पाई
चलो आओ जरा उसको दुबारा ढूँढ लेते हैं

हमें अब पड़ गई आदत है अद्भुत फाकामस्ती की
हमारा क्या, कहीं भी हम, गुजारा ढूँढ लेते हैं


८.

ऊपर से सख्त जान वो लगता ज़रूर है
पर उसको प्यार करने का पूरा शऊर है

ये बिजलियों को किस तरफ़ मोड़ा है आपने
वो उस तरफ़ तो आशियाँ मेरा हुज़ूर है

इस रहगुज़र में चाहिए अब कोई रहनुमा
पाँवों में है थकान और मंज़िल भी दूर है

वो कौन किसकी बात मुझसे कर रहे हैं आप
कुछ भी कहो हाँ वो मेरी आँखों का नूर है

मिलते रहें हैं आज तलक दूसरों से हम
हर शख्स सच कहूँ तो बस ख़ुद से ही दूर है


९.
 तय सफ़र कुछ यों भी करना और भी अच्छा लगा 
तंग राहों से गुज़रना और भी अच्छा लगा
नज़रों नज़रों में ही बातें करना उनसे खूब था
चुपके से दिल में उतरना और भी अच्छा लगा

देखना यों तो बहुत अच्छा लगा पर सच कहूँ
ज़िंदगी तुझको समझना और भी अच्छा लगा

हुस्न पहले भी ग़ज़ब था पर यही सच है, तेरा
अब मेरी खातिर सँवरना और भी अच्छा लगा

यों तो अद्भुत ने सुनाई है ग़ज़ल पहले भी ये
आज इस महफ़िल में पढ़ना और भी अच्छा लगा


१०.
 रौशनी का जब कभी आभास मिलता है बहुत 
तब दिया भी आँधियों के पास मिलता है बहुत
शायरी कविता गजल मुक्तक हुए सब फ़ेल हैं
चुटकलों से मंच को उल्लास मिलता है बहुत

देश की खातिर जिए जो देश की खातिर मरे
उनको मेरे देश में उपहास मिलता है बहुत

मौत की आहट सुनाई देती है चारों तरफ़
ज़िंदगी का अब कहाँ आभास मिलता है बहुत

मत कहो अब उनसे गुलशन हो रहा वीरान है
उल्लुओं के घर में अब मधुमास मिलता है बहुत


११.
वो धोखा दे गया हमको जरा से इक बहाने से 
हमें शक उसपे था लेकिन डरे हम आज़माने से
तेरे चेहरे पे ये मासूमियत भी खूब जमती है
क़यामत आ ही जाएगी ज़रा-सा मुस्कुराने से

वहाँ इंसानियत का खून करने वाले ही तो थे
नहीं था आग का रिश्ता किसी का घर जलाने से

न ही जादूगिरी ना खेल है कोई तिलिस्मों का
यहाँ बनती है किस्मत अपने हाथों से बनाने से

तुम्हे अद्भुत से ही सारे मिले होंगे मगर हमको
शिकायत थी ज़माने से शिकायत है ज़माने से