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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

बेकल उत्साही

जन्म: 1924,उतर प्रदेश 
१.
उदास काग़ज़ी मौसम में रन्ग-ओ-बू रख दे
हर एक फूल के लब पे मेरा लहू रख दे

ज़बान-ए-गुल से चट्टानें तराशने वाले
सुकूत-ए-नक़्श में आराइश-ए-नमू रख दे

गिराँ लगे है जो एहसान दस्त-ए-क़ातिल का
उठ और तेग़ के लब पे रग-ए-गुलू रख दे

चला है जानिब-ए-मैख़ाना आज फिर वाइज़
कहीं न जाम पे लब अपने बेवज़ू रख दे

ख़ुदा करे मेरा मुन्सिफ़ सज़ा सुनाने में
मेरा ही सर मेरे क़ातिल के रू-ब-रू रख दे


२.
जब से हम तबाह हो गये
तुम जहाँपनाह हो गये

हुस्न पर निखार आ गया
आईने सियाह हो गये

आँधियों को कुछ पता नहीं
हम भी गर्द-ए-राह हो गये

दुश्मनों को चिट्ठियाँ लिक्खो
दोस्त ख़ैर-ख़्वाह हो गये


३.
इक दिन ऐसा भी आएगा होंठ-होंठ पैमाने होंगे
मंदिर-मस्जिद कुछ नहीं होंगे घर-घर में मयख़ाने होंगे

जीवन के इतिहास में ऐसी एक किताब लिखी जाएगी
जिसमें हक़ीक़त औरत होगी मर्द सभी अफ़्साने होंगे

राजनीति व्यवसाय बनेगी संविधान एक नाविल होगा
चोर उचक्के सब कुर्सी पर बैठ के मूँछें ताने होंगे

एक ही मुंसिफ़ इंटरनैट पर दुनिया भर का न्याय करेगा
बहस मोबाइल ख़ुद कर लेगा अधिवक्ता बेग़ाने होंगे

ऐसी दवाएँ चल जाएँगी भूख प्यास सब ग़ायब होगी
नये-नवेले बूढे़ होंगे,बच्चे सभी पुराने होंगे

लोकतंन्त्र का तंत्र न पूछो प्रतियाशी कम्प्यूटर होंगे
और हुकूमत की कुर्सी पर क़ाबिज़ चंद घराने होंगे

गाँव-खेत में शहर दुकाँ में सभी मशीनें नौकर होंगी
बिन मुर्ग़ी के अन्डे होंगे बिन फ़सलों के दाने होंगे

छोटॆ-छोटॆ से कमरों में मानव सभी सिमट जाएँगे
दीवारें ख़ुद फ़िल्में होंगी,दरवाज़े ख़ुद गाने होंगे

आँख झपकते ही हर इंसा नील-गगन से लौट आएगा
इक-इक पल में सदियाँ होंगी,दिन में कई ज़माने होंगे

अफ़्सर सब मनमौजी होंगे,दफ़्तर में सन्नाटा होगा
जाली डिग्री सब कुछ होगी कालेज महज़ बहाने होंगे

बिन पैसे के कुछ नहीं होगा नीचे से ऊपर तक यारो
डालर ही क़िस्मत लिक्खेंगे रिश्वत के नज़राने होंगे

मैच किर्किट का जब भी होगा काम-काज सब ठप्प रहेंगे
शेयर में घरबार बिकेंगे मलिकुल-मौत सरहाने होंगे

होटल-होटल जुआ चलेगा अविलाओं के चीर खिचेंगे
फ़ोम-वोम के सिक्के होंगे डिबियों बीच ख़ज़ाने होंगे

शायर अपनी नज़्में लेकर मंचों पर आकर धमकेंगे
सुनने वाले मदऊ होंगे संचालक बेमाने होंगे

बेकल इसको लिख लो तुम भी महिला-पुरुष में फ़र्क न होगा
रिश्ता-विश्ता कुछ नहीं होगा संबंधी अंजाने होंगे


४.
जब दिल ने तड़पना छोड़ दिया
जलवों ने मचलना छोड़ दिया

पोशाक बहारों ने बदली
फूलों ने महकना छोड़ दिया

पिंजरे की सम्त चले पंछी
शाख़ों ने लचकना छोड़ दिया

कुछ अबके हुई बरसात ऐसी
खेतों ने लहकना छोड़ दिया

जब से वो समन्दर पार गया
गोरी ने सँवरना छोड़ दिया

बाहर की कमाई ने बेकल
अब गाँव में बसना छोड़ दिया


५.
वो तो मुद्दत से जानता है मुझे
फिर भी हर इक से पूछता है मुझे

रात तनहाइयों के आंगन में
चांद तारों से झाँकता है मुझे

सुब्‌ह अख़बार की हथेली पर
सुर्ख़ियों मे बिखेरता है मुझे

होने देता नही उदास कभी
क्या कहूँ कितना चाहता है मुझे

मैं हूँ बेकल मगर सुकून से हूँ
उसका ग़म भी सँवारता है मुझे


६.
ये दुनिया तुझसे मिलने का वसीला काट जाती है
ये बिल्ली जाने कब से मेरा रस्ता काट जाती है

पहुँच जाती हैं दुश्मन तक हमारी ख़ुफ़िया बातें भी
बताओ कौन सी कैंची लिफ़ाफ़ा काट जाती है

अजब है आजकल की दोस्ती भी दोस्ती ऐसी
जहाँ कुछ फ़ायदा देखा तो पत्ता काट जाती है

तेरी वादी से हर इक साल बर्फ़ीली हवा आकर
हमारे साथ गर्मी का महीना काट जाती है

किसी कुटिया को जब "बेकल"महल का रूप देता हूँ
शंहशाही की ज़िद्द मेरा अंगूठा काट जाती है


७.
सुनहरी सरज़मीं मेरी रुपहला आसमाँ मेरा
मगर अब तक नहीं समझा ठिकाना है कहाँ मेरा

किसी बस्ती को जब जलते हुए देखा तो ये सोचा
मैं ख़ुद ही जल रहा हूँ और फैला है धुआँ मेरा

सुकूँ पाएँ चमन वाले हर इक घर रोशनी पहुँचे
मुझे अच्छा लगेगा तुम जला दो आशियाँ मेरा

बचाकर रख उसे मंज़िल से पहले रूठने वाले
तुझे रस्ता दिखाएगा गुबारे-कारवाँ मेरा

पड़ेगा वक़्त जब मेरी दुआएँ काम आएंगी
अभी कुछ तल्ख़ लगता है ये अन्दाज़-ए-बयाँ मेरा

कहीं बारूद फूलों में कहीं शोले शिगूफ़ों में
ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे है यही जन्नत निशाँ मेरा

मैं जब लौटा तो कोई और ही आबाद था "बेकल"
मैं इक रमता हुआ जोगी नहीं कोई मकाँ मेरा