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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

ज़फ़र गोरखपुरी


१.
जब मेरी याद सताये तो मुझे ख़त लिखना
तुम को जब नीन्द न आये तो मुझे ख़त लिखना

नीले पेड़ों की घनी चाँव में हँसता सावन
प्यासी धर्ती में समाने को तरसता सावन
रात भर छत पे लगातार बरसता सावन
दिल में जब आग लगाये तो मुझे ख़त लिखना

जब फड़क उठे किसी शाख़ पे पत्ता कोई
गुदगुदाये तुम्हें बीता हुआ लम्हा कोई
जब मेरी याद का बेचैन सफ़ीना कोई
जी को रह रह के जलाये तो मुझे ख़त लिखना

जब निगाहों के लिये कोई नज़ारा न रहे
चाँद छिप जाये गगन पर कोई सहारा न रहे
लोग हो जायें पराये तो मुझे ख़त लिखना


२.
क्या उम्मीद करे हम उन से जिनको वफ़ा मालूम नहीं
ग़म देना मालूम है लेकिन ग़म की दवा मालूम नहीं

जिन की गली में उम्र गँवा दी जीवन भर हैरान रहे
पास भी आके पास न आये जान के भी अंजान रहे


कौन सी आख़िर की थी हमने ऐसी ख़ता मालूम नहीं
ऐ मेरे पागल अर्मानों झूठे बंधन तोड़ भी दो


ऐ मेरी ज़ख़्मी उम्मीदों दिल का दामन छोड़ भी दो
तुम को अभी इस नगरी में जीने की सज़ा मालूम नहीं


३.
मजबूरी के मौसम में भी जीना पड़ता है
थोड़ा सा समझौता जानम करना पड़ता है

कभी कभी कुछ इस हद तक बढ़ जाती है लाचारी
लगता है ये जीवन जैसे बोझ हो कोई भारी


दिल कहता है रोयें लेकिन हँसना पड़ता है
कभी कभी इतनी धुन्धली हो जाती हैं तस्वीरें


पता नहीं चलता क़दमों में कितनी हैं ज़ंजीरें
पाँव बँधे होते हैं लेकिन चलना पड़ता है

किस को ख़बर किन लम्हों में बन जाये कौन सहारा
दुनिया जैसी भी हो रिश्ता रखना पड़ता है


४.
हमेशा है वस्ल-ओ-जुदाई का धंधा
बुतों की है उल्फ़त ख़ुदाई का धंधा

अगर बैठे रिन्दों की सोहबत में ज़ाहिद
तो दें छोड़ सब पारसाई का धंधा

जो होना है आख़िर वो होकर रहेगा
करे कौन वख़्त आज़माई का धंधा

परेशाँ रही उम्र भर पर न छोड़ा
तेरी ज़ुल्फ़ ने कजअदाई का धंधा

मुबारक रईसों को कार-ए-रियासत
गदा को है काफ़ी गदाई का धंधा

नहीं ख़िज़्र के पीछे गर और झगड़े
तो है साथ इक रहनुमाई का धन्धा


५.
मौसम को इशारों से बुला क्यूँ नहीं लेते
रूठा है अगर वो तो मना क्यूँ नहीं लेते

दीवाना तुम्हारा कोई ग़ैर नहीं है
मचला भी तो सीने से लगा क्यूँ नहीं लेते

ख़त लिख कर कभी और कभी ख़त को जलाकर
तन्हाई को रंगीन बना क्यूँ नहीं लेते

तुम जाग रहे हो मुझ को अच्छा नहीं लगता
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यूँ नहीं लेते


६.
दिन को भी इतना अँधेरा है मेरे कमरे में
साया आते हुए डरता है मेरे कमरे में

ग़म थका हारा मुसाफ़िर है चला जायेगा
कुछ दिनों के लिये ठहरा है मेरे कमरे में

सुबह तक देखन अफ़साना बना डालेगा
तुझ को एक शख़्स ने देखा है मेरे कमरे में

दरबदर दिन को भटकता है तसव्वुर मेरा
हाँ मगर रात को रहता है मेरे कमरे में

चोर बैठा है कहाँ सोच रहा हूँ मैं 'ज़फ़र'
क्या कोई और भी कमरा है मेरे कमरे में


७.
मेरे बाद किधर जायेगी तनहाई
मैं जो मरा तो मर जायेगी तनहाई

मैं जब रो रो के दरिया बन जाऊँगा
उस दिन पार उतर जायेगी तनहाई

तनहाई को घर से रुख़्सत कर तो दो
सोचो किस के घर जायेगी तनहाई

वीराना हूँ आबादी से आया हूँ
देखेगी तो डर जायेगी तनहाई

यूँ आओ कि पाओं की भी आवाज़ न हो
शोर हुआ तो मर जायेगी तनहाई


८.
धूप है क्या और साया क्या है अब मालूम हुआ
ये सब खेल तमाशा क्या है अब मालूम हुआ

हँसते फूल का चेहरा देखूँ और भर आई आँख
अपने साथ ये क़िस्सा क्या है अब मालूम हुआ

हम बरसों के बाद भी उनको अब तक भूल न पाये
दिलसे उन का रिश्ता क्या है अब मालूम हुआ

सहरा सहरा प्यासे भटके सारी उम्र जले
बादल का इक टुकड़ा क्या है अब मालूम हुआ


९.

इरादा हो अटल तो मोजज़ा ऐसा भी होता है
दिए को ज़िंदा रखती है हव़ा
, ऐसा भी होता है
उदासी गीत गाती है मज़े लेती है वीरानी
हमारे घर में साहब रतजगा ऐसा भी होता है
अजब है रब्त की दुनिया ख़बर के दायरे में है
नहीं मिलता कभी अपना पता ऐसा भी होता है
किसी मासूम बच्चे के तबस्सुम में उतर जाओ
तो शायद ये समझ पाओ
, ख़ुदा ऐसा भी होता है
ज़बां पर आ गए छाले मगर ये तो खुला हम पर
बहुत मीठे फलों का ज़ायक़ा ऐसा भी होता है
तुम्हारे ही तसव्वुर की किसी सरशार मंज़िल में
तुम्हारा साथ लगता है बुरा
, ऐसा भी होता है
१०.
जिस्म छूती है जब आ आ के पवन बारिश में
और बढ़ जाती है कुछ दिल की जलन बारिश में
मेरे अतराफ़ छ्लक पड़ती हैं मीठी झीलें
जब नहाता है कोई सीमबदन बारिश में
दूध में जैसे कोई अब्र का टुकड़ा घुल जाए
ऐसा लगता है तेरा सांवलापन बारिश में
नद्दियाँ सारी लबालब थीं मगर पहरा था
रह गए प्यासे मुरादों के हिरन बारिश में
अब तो रोके न रुके आंख का सैलाब सखी
जी को आशा थी कि आएंगे सजन बारिश में
बाढ़ आई थी ज़फ़र ले गई घरबार मेरा
अब किसे देखने जाऊं मैं वतन
, बारिश में
११.
मिले किसी से नज़र तो समझो ग़ज़ल हुई
रहे न अपनी ख़बर तो समझो ग़ज़ल हुई
मिला के नज़रों को वालेहाना हया से फिर
झुका ले कोई नज़र तो समझो ग़ज़ल हुई
इधर मचल कर उन्हें पुकारे जुनूं मेरा
धड़क उठे दिल उधर तो समझो ग़ज़ल हुई
उदास बिस्तर की सिलवटें जब तुम्हें चुभे
न सो सको रात भर तो समझो ग़ज़ल हुई
वो बदगुमा हो तो शेर सूझे न शायरी
वो मेहरबां हो
जफ़र तो समझो ग़ज़ल हुई
१२.
कौन याद आया ये महकारें कहाँ से आ गईं
दश्त में ख़ुशबू की बौछारें कहाँ से आ गईं
कैसी शब है एक इक करवट पे कट जाता है जिस्म
मेरे बिस्तर में ये तलवारें कहाँ से आ गईं
साथ है,मिलना अगर चाहूँ तो मिलता भी नहीं
एक घर में इतनी दीवारें कहाँ से आ गईं
शायद अब तक मुझमें कोई घोंसला आबाद है
घर में ये चिड़ियों की चहकारें कहाँ से आ गईं
ख्वाब शायद फिर हुआ आंखों में कोई संगसार
ज़ेरे-मिज़गां ख़ून की धारें कहाँ से आ गईं
रख दिया किसने मेरे शाने पे अपना गर्म हाथ
मुझ शिकस्ता-पा में रफ्त़ारें कहाँ से आ गईं
१३.
देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे
अब भीक मांगने के तरीक़े बदल गए
लाज़िम नहीं कि हाथ में कासा दिखाई दे
नेज़े पे रखके और मेरा सर बुलंद कर
दुनिया को इक चिराग़ तो जलता दिखाई दे
दिल में तेरे ख़याल की बनती है एक धनक
सूरज-सा आइने से गुज़रता दिखाई दे
चल ज़िंदगी की जोत जगाएं,अजब नहीं
लाशों के दरमियां कोई रस्ता दिखाई दे
हर शै मेरे बदन की ज़फ़र क़त्ल हो चुकी
एक दर्द की किरन है कि ज़िंदा दिखाई दे