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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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रविवार, 3 मार्च 2013

तनवीर अब्बास रिज़वी



1.
चढ़ा हुआ था जो दरिया वो पार कर न सका ।
मैं एक बार जो डूबा तो फिर उभर न सका ।
वही कसक है, वही दर्द है, वही है तड़प,
वो एक ज़ख्म जो दिल पर लगा था भर न सका ।
मुझे ग़मों का ही मौसम हमेशा रास आया,
किसी खुशी का कभी इंतज़ार कर न सका ।
मेरी निगाह तुझे छू के ही पलट आई,
मैं बूँद-बूँद तेरे जिस्म में उतर न सका ।
नदी तो दिल में समंदर के डूब जाती है,
नदी के दिल में समंदर कभी उतर न सका ।
हवा के सामने 'तनवीर' क्या दिए की बिसात,
भड़क के बुझ गया, कुछ देर भी ठहर न सका ।