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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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सोमवार, 4 मार्च 2013

शीन काफ़ निज़ाम

(जन्म : 26 नवंबर 1947)

१.

पहले जमीन बांटी फिर घर भी बट गया
इन्सान अपने आप में कितना सिमट गया
अब क्या हुआ कि खुद को मैं पहचानता नही
मुद्दत हुई कि रिश्ते का कुहरा भी छट गया
हम मुंतजिर थे शाम से सूरज के दोस्तों
लेकिन वो आया सर पे तो कद अपना घट गया
गांवों को छोड़ कर तो चले आये शहर में
जायें किधर कि शहर से भी जी उचट गया
किससे पनाह मांगे,कहां जायें, क्या करें
फिर आफताब रात का घूंघट उलट गया
सैलाबे-नूर में जो रहा मुझ से दूर-दूर
वो शख्स फिर अंधेरे में मुझसे लिपट गया
2.
तुम्हें भी शहर के चौराहे पर सजा देंगें
तुम्हारे नाम का पत्थर कहीं लगा देंगें
कुछ और पास नहीं तो किसी को क्या देंगें
किसी ने आग लगा दी तो हवा देंगें
ये और बात कि वो उसकी क्या सजा देंगें
जमाने वालों को हम आईना दिखा देंगें
बिछ़डते वक्त किसी से,ये जी में सोचा था
भुलाना चाहा तो सौ तरह से भुला देंगें
किताबे-जीस्त के औराक जल नही सकते
ये माना मेज से तस्वीर तो हटा देगें
कंहा से आये हो लेकर ये खाक खाक बदन
किसी ने पुछ लिया तो जवाब क्या देगें
उसी के साये में पलती है न ये दर्द की बेल
उजाड़ उम्र की दीवार ही गिरा देगें
जुदाईयों के है जंगल में जात के राही
ये वहम दिल में कि हम फासले मिटा देंगे
3.
बर्फ है रात,मगर यार पिघलती ही नहीं
जम गई जहन में ऐसी कि निकलती ही नहीं
उम्र की तर्ह से,जाये तो पलटती ही नहीं
एक ही रूख पहै वो, चाल बदलती ही नही
गुस्ल कर जाती है चुपचाप मिरी आंखो में
राह में खार उगे है पअटकती ही नही
अब उजालों पअंधेरों का गुमां होता है
रात तो राह किसी तौर भटकती ही नही
शाम,श्मशान-सी वीरान है, जाने कब से
और समझाऊं सहर को तो समझती ही नही
4.
किसी के साथ अब साया नही है
कोई भी आदमी पूरा नही है
मिरे अन्दर जो अंदेशा नही है
तो क्या मेरा कोई अपना नही है
कोई पत्ता कहीं से पर्दा नही है
तो क्या अब दश्त में दरिया नही है
तो क्या अब कुछ दरपर्दा नही है
ये जंगल है तो क्यूं खतरा नही है
कंहा जाती है बारिश की दुआएं
शजर पर एक भी पत्ता नही है
दरख्तों पर सभी फल हैं सलामत
परिन्दा क्यूं कोई ठहरा नही है
खिला है फूल हर गमले में लेकिन
कोई चेहरा तरो-ताजा नही है
धुआं ही है फकत गाड़ी के पीछे
यहां क्या एक भी बच्चा नही है
समझना है तो दीवारों से समझो
हमारे शहर में क्या क्या नही है
5.
आज वो भी घर से बेघर हो गया
एक सहरा था समुंदर हो गया
पानियों में अक्स अपने देखता
कल का पापी अब पयम्बर हो गया
मैं रहा चमगादड़ों के गोल में
और वो जंगली कबूतर हो गया
अपनी परछाई के पीछे दौड़ता
वो घने जंगल से बाहर हो गया
कनखजूरे के क़दम बढ़ने लगे
ज़र्रा ज़र्रा जब मुखद्दर हो गया
उससे मिलना मारके से कम न था
चलिए ये भी मारका सर हो गया
6.
अब बामो-दर का सर्द बदन चाटती है धूप
जीनों का पार कर के कंहा आ गई है धूप
मुम्किन है ये कि भीड़ मेंसंज्ञाका बाप हो
इक बार जोर से कहो कितनी कड़ी है धूप
सौ-सौ जतन से उस का तराशा गया बदन
कुव्वत मिली किसी को, किसी को मिली है धूप
ऐसे में खुश्क पत्तों से उम्मीद क्या करें
कदमों बड़े है साये तो मीलों बड़ी है धूप
अब तो किसी को आरजू-ए-बालो-पर नही
फिर किस के पर जलाने को पर तौलती है धूप
माही के खार से वा उलझता है रात भर
आफाक के करीब पड़ी केंचुली है धूप
बस्ती में आ के ताब दिखाये तो क्या हुआ
जंगल में जुगनुओं का बदन चाटती है धूप
दरवाजें सारे शहर के अन्दर से बन्द है
अब के अजीब लोगों के पाले पड़ी है धूप
7.
खुद हूं तमाशा खुद ही तमाशाईयों में हूं
जब से सुना है मैं तिरे शैदाईयों में हूं
गैराईयों में हूं कभी गहराईयों में हूं
रोजे-अजल से आंखो की अंगनाइयों में हूं
इक-इक नफस के साथ जला जिस के वास्ते
उस का ख्याल है कि मैं हरजाइयों में हूं
ऐवाने-ख्वाब छोड़ के निकला हूं जब से मैं
सांसो की गूंजती हुई शहनाईयों में हूं
अन्धे कुएं से अन्धे कुएं में गिरा दिया
सोचा नही कि मैं भी तिरे भाईयों में हूं
फूटे है अंग-अंग से तेरे मिरा ही रंग
मैं ही तो तेरी टूटती अंगडाइयों में हूं
कहता है वो कि तुझ से अलग मैं कहाँ निजाम
तन्हाइयों में था तिरी रूसवाइयों में हूं
8.
दरवाजा कोई घर से निकलने के लिए दे
बेखौफ कोई रास्ता चलने के लिये दे
आंखो को अता ख़्वाब किये शुक्रिया, लेकिन
पैकर भी कोई ख्वाबों में ढलने के लिए दे
पानी का ही पैकर किसी परबत को अता कर
इक बूंद ही नदी को उछलने के लिये दे
सहमी हुई शाखों को जरा-सी,कोई मुहलत
सूरज की सवारी को निगलने के लिए दे
सब वक्त की दीवार से सर फोड़ रहे है
रोजन की कोई भाग निकलने के लिये दे
सैलाब में साअत के मुझे फेंकने वाले
टूटा हुआ इक पल ही संभलने के लिये दे
महफूज जो तर्तीबे-अनासिर से हैं असरार
तो खोल को इक आंच पिघलने के लिए दे
तखईल को तखलीक की तौफीक अता कर
फिर पहलू से इक चीज निकलने के लिये दे
9.
वो गुनगुनाते रास्ते ख्वाबों के क्या हुए
वीरान क्यूं है बस्तियां बाशिंदे क्या हुए
वो जागती जबींने कहां जो के सो गईं
वो बोलते बदन जो सिमटते थे क्या हुए
जिन से अंधेरी रातों में जल जाते थे दिये
कितने हसीन लोग थे, क्या जाने, क्या हुए
खामोश क्यूं हो कोई तो बोलो जवाब दो
बस्ती में चार चांद-से चेहरे थे, क्या हुए
हम से वो रतजगों की अदा कौन ले गया
क्यूं वो अलाव बुझ गये वो किस्से क्या हुए
पूरे थे अपने आप में आधे-अधूरे लोग
जो सब्र की सलीब उठाते थे क्या हुए
मुम्किन है कट गयें हो वो मौसिस की धार से
उन पर फुदकते शोख परिन्दे थे क्या हुए
किसने मिटा दिये है फसीलों के फासले
वाबस्ता जो थे हम से वो अफसाने क्या हुए
खंभो पे ला के किस ने सितारे टिका दिये
दालान पूछते है कि दीवाने क्या हुए
ऊंची इमारतें तो बड़ी शानदार हैं
लेकिन यहां तो रैन बसेरे थे क्या हुए
10.
और कुछ देर यूं ही शोर मचाये रखिये
आस्मां है तो उसे सर पे उठाये रखिये
उंगलिया गर नही उट्ठें,तो न उट्ठें लेकिन
कम से कम उस की तरफ आंख उठाये रखिये
बारिषें आती है तूफान गुजर जाते है
कोहसारों की तरह पांव जमाये रखिये
खिड़कियां रात को छोड़ा न करें आप खुलीं
घर की है बात तो फिर घर में छिपाये रखिये
अब तो अक्सर नजर आ जाता है दिल आंखों में
मैं न कहता था कि पानी है दबाये रखिये
कौन जाने कि वो कब राह इधर भूल पड़े
अपनी उम्मीद की शम्ओं को जलाये रखिये
कब से दरवाजों की दहलीज तरसती है निजाम
कब तलक गाल को कोहनी पे टिकाये रखिये