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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शनिवार, 23 मार्च 2013

खाक़ान ख़ावर



१.

बार-बार एक ही नज़्ज़ारा न दिखलाया कर।
बात दिलकश भी अगर हो तो न दुहराया कर।
लोग गिर जाते हैं मिटटी के घरौंदों की तरह,
इस तरह बारिशे-दीदार न बरसाया कर।
पेड़ का साया नहीं, टूटा हुआ पत्ता हूँ,
मुझको जज़बात के दरया में न ठहराया कर।
टूट जाए न किसी रोज़ तेरा शीश महल,
यूँ सरे-राह न दीवानों को समझाया कर।
मेरे एहसास को इक फूल बहोत है ख़ावर,
मेरे एहसास पे यूँ संग न बरसाया कर।