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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शुक्रवार, 8 मार्च 2013

ज़ैदी जाफ़र रज़ा



१.
 
न जाने कब से हैं सहरा कई बसाए हुए
हुई हैं मुद्दतें, आंखों को मुस्कुराए हुए
ये माहताब न होता, तो आसमानों पर
सितारे आते नज़र और टिमटिमाए हुए
समंदरों की भी नश्वो-नुमा हुई होगी
ज़माना राज़ ये सीने में है छुपाए हुए
हर एक दिल में खलिश क्यों है एक मुब्हम सी
नक़ाब चेहरे से है वक्त क्यों हटाए हुए
इस इंतज़ार में आयेंगे फिर नए पत्ते
शजर को अरसा हुआ पत्तियां गिराए हुए
हवा के झोंकों में हलकी सी एक खुश्बू है
तुम आज लगता है इस शहर में हो आए हुए
गुलाब-रंग कोई चेहरा अब कहीं भी नहीं
ज़मीं पे अब्र के टुकड़े हैं सिर्फ़ छाए हुए
लगे हैं ज़ख्म कई दिल पे संगबारी में
के लोग सर पे हैं तूफ़ान सा उठाए हुए
किताबें पढ़के नहीं होती अब कोई तहरीक
जुमूद अपने क़दम इनमें है जमाए हुए
परिंदे जाके बलंदी पे, लौट आते हैं
के इन के दिल हैं नशेमन से लौ लगाए हुए
अजीब थे वो मुसाफ़िर, चले गए चुपचाप
दिलों में अब भी कहीं हैं मगर समाए हुए

२.

शिकस्त-खुर्दा न था मैं, गो फ़त्हयाब न था
के मेरी राह में, मायूसियों का बाब न था
कभी मैं वक्त का हमसाया, बन नहीं पाया
के वक्त, साथ कभी, मेरे हम-रकाब न था
समंदरों को, मेरे ज़र्फ़ का था अंदाजा
जभी तो, उनके लिए मैं, फ़क़त हुबाब न था
ज़बां पे कुफ्ल लगा कर, न बैठता था कोई
वो दौर ऐसा था, सच बोलना अज़ाब न था
गुज़र गया वो भिगो कर सभी का दामने-दिल
कोई भी ऐसा नहीं था जो आब - आब न था
मैं हर परिंदे को शाहीन किस तरह कहता
हकीक़तें थीं मेरे सामने, सराब न था
तवक्कोआत का फैलाव इतना ज़्यादा था
के घर लुटा के भी अपना, वो बारयाब न था

३.
(नज्म)
या खुदा !
तेरी हम्दो-सना से हमेशा मुझे
आब्नूसी फ़जाओं में रहकर भी
शफ्फाफ़ो-पुर्नूर अफ़कार की
राह मिलती रही.
मैंने मायूसियों के समंदर की मौजों को
तेरी अताअत के रौशन सफ़ीनों की
बे-खौफ रफ़्तार से चीर कर
अक्ल की वादियों का सफ़र तय किया
खुशनवा तायरों ने
जो विज्दान की वह्दतों के शजर पर
शऊरो-नज़र के मुरक़कों की सूरत
थे बैठे हुए
ज़िन्दगी की लताफ़त के नगमे सुनाये मुझे
मैं कभी लुक्मए-नफ्स बनकर
हिदायात से तेरी गाफ़िल नहीं हो सका
रफ़अते-ज़ाते-इन्साँ की तह्कीक़ के जोश में
नफ्स को अपने मैं
मुखतलिफ ज़ावियों से परखता रहा
मैंने पाया तेरे जल्वए-नूर को हर जगह
या खुदा !
मैं तेरी दस्तगीरी का मुहताज हूँ
पहले भी मैंने मांगी थी तेरी मदद
आज भी मांगता हूँ
के गंजे-गरांमाया से भी कहीं ज़्यादा है
तेरी इमदाद का वज़न मेरे लिए
ला-शरीक और यकता समझता हूँ मैं
दिल की गहराइयों से तुझे
मेरा ईमान ही एक ऐसा ज़खीरा है
जिसकी बदौलत मैं हँसते हुए
सामना करता आया हूँ खतरात का
तेरी खुशनूदियों की जिया से हैं रौशन
मेरे रास्ते.
इस से पहले के मैं और कुछ
अपने हालात का ज़िक्र तुझ से करूं
अपने कम-इल्म होने का इक़रार करते हुए
पूछना चाहता हूँ के मुझको
कहाँ और कब और क्यों तूने पैदा किया ?
क्यों मेरा ज़हन परवाज़ करता है उन वादियों में
के जिनसे मैं वाकिफ नहीं ?
क्यों मेरे क़ल्ब में ऐसी चिंगारियां जाग उठती हैं
जिनको तेरे नूर के रौज़नों का
तबस्सुम समझता हूँ मैं ?
या खुदा !
अपने एहसास को क्या करूं ?
मुझको महसूस होता है
ख़ुद अपनी आंखों से देखा है मैंने
के मैं -
ला-मकाँ सरहदों में कभी
पायए-अर्श की कील था
मुझको जड़कर बहोत खुश हुए थे मलक
क्योंकि मैं उनकी हर ज़र्ब को
तेरा अतिया समझकर
तेरा शुक्र हर लह्ज़ा करता रहा
मैंने देखा के जब तूने आदम के पुतले को
सर ता क़दम शाहकार अपनी तख्लीक का पाया
तू खुश हुआ
तूने रूहे-मुक़द्दस को अपनी कुछ इस तरह फूँका
के आदम ने जिसमे-बशर की हरारत को
साँसों में महसूस करके,
तेरी हम्द की
इस हरारत का इरफ़ान जिन्नो-मलक को ज़रा भी न था
फिरभी तामील में तेरे हुक्मे-मुक़द्दस की
सारे मलक सर-ब-सज्दा हुए
एक इबलीस था जिसको इनकार था मैं तेरी रूह का लम्स पाकर
शरारे कहीं क़ल्ब में अपने महसूस करने लगा
मेरी ये कैफ़ियत देखकर
तूने मुझको मुहब्बत से
आदम की प्यालीनुमा नाफ़ में रख दिया
मैं निगाहों में इबलीस की चुभ गया.
या खुदा !
ये ज़मीं तेरी, जिस से मैं अब खूब मानूस हूँ
इस से उस वक्त वाकिफ़ न था
जब मैं आदम के हमराह आया था इसपर तेरे अर्श से.
तूने फ़रमाया कुरआन में
तूने लोहे को पैदा किया
मेरा एहसास कहता है मुझसे, के मैं ही वो लोहा था
जिसको ज़मीं पर उतारा गया.
मुझको आदम ने
तेरी रज़ा की लताफत के अर्के-गुलअन्दाम से
पहले पिघलाया
फिर खुशबुओं के इकहरे बदन में
इनायत को याद करके तेरी
जज़्ब कुछ इस तरह कर दिया
मैं फ़क़त खुशबुओं का जहाँ रह गया
मैंने देखा के आदम की औलाद ने
एक की दूसरे पर फज़ीलत गवारा न की
खूने-नाहक बहा
और बातिल के जुल्मों का
एक सिलसिला सा शरू हो गया .
मेरे दामन पे औलादे आदम के खूं का
पडा दाग़ ऐसा
मेरी इत्र-बेज़ी सिमट सी गई
शायद औलादे-आदम को मेरी ज़रूरत न थी
मैं भटकता रहा मुद्दतों
और फिर मैंने देखा तेरे नूह को
उनकी कज-फ़ह्म उम्मत ने
तब्लीगे-हक़ का सिला यूं दिया
याद करके तुझे
वो बद-अक़ली पे उम्मत की रोते रहे
उनमें जुल्मो-तशद्दुद को
बर्दाश्त करने की कूव्वत न थी
नौहए-नूह तुझ को पसंद आ गया इस क़दर
शिक्वए-नूह पर तेरी क़ह्हारियत जाग उठी
तूने ये फैसला कर लिया
उम्मते-नूह गर्क़ाब हो
हुक्म पाकर तेरा एक कश्ती बनायी गई
जिसपे कुछ जान्दारों के जोडों के हमराह
जब, खुशबुओं के ज़खीरे को रक्खा गया
आफ़ियत मैंने महसूस की
आसमानों ज़मीनों से उठाती हुई
तेज़ मौजों में सैलाब की
मेरे दामन पे औलादे-आदम ने जो
खूने-नाहक़ का एक दाग़ था रख दिया
सब-का-सब धुल गया
सज्दए शुक्र मैंने किया
सामने मेरी आंखों के गर्क़ाब होता रहा एक जहाँ.
तेरी तौहीद की सुत्वतों ने मेरे ज़हन पर ज़र्ब की
शमएं रौशन हुईं मेरे इद्राक की
मैंने ख़ुद पर जो डाली नज़र
तू-ही-तू था फ़क़त जलवागर
या खुदा !
मेरे एहसास की खुशबुओं को भटकने न दे
तेरी हम्दो-सना के तक़द्दुस भरे पानियों से
वज़ू करके मैं
तेरी रह्मानियत के मुसल्ले पे
करता रहा हूँ नमाज़ें अदा
हिज्रे-यूसुफ़ में, याकूब की चश्मे-पुर्सोज़ से
जितने आंसू बहे
आतिशे-इश्क का एक पिघला हुआ
सुर्ख लावा थे वो
उनको यक्जा किया मैंने हौज़े-करम में तेरे
ताके मैं उन मुहब्बत भरे आंसुओं में नहाकर
तेरे सामने आ सकूँ
मेरे दिल ने कहा
नूह के आंसुओं में था
उम्मत के जुल्मो-तशद्दुद का शिकवा फ़क़त
उनमें कोई हरारत न थी
जबकि याकूब के आंसुओं में
तेरे जल्वए-हुस्न के हिज्र की
जानलेवा हरारत का तेज़ाब था.
या खुदा !
तेरे महबूब से इश्क करता हूँ मैं
ज़िक्र से उसके बेसाख्ता
भीग जाती हैं आँखें मेरी
भीग जाती हैं सर-ता-क़दम मेरी तन्हाइयां
पा-बरहना, सुलगते हुए रेगज़ारों से होकर
गुज़रता है जज़्बात का कारवाँ
हर तरफ़ गूँजती है सदा
इल्म का शहर कुरआन है
मुस्तफ़ा, मुस्तफ़ा
और उस शहर का बाब है सूरए-फ़ातिहा
मुर्तुज़ा, मुर्तुज़ा
पूरा कुरआन है क़ल्बे-मह्बूबे-हक़
जाने-कुरआन है सूरए फातिहा
जिस से ता-हश्र दुनिया को मिलती रहेगी जिला
मुस्तफ़ा-मुस्तफ़ा, मुर्तुज़ा-मुर्तुज़ा
या खुदा !
मैंने इल्म-किताब और हिकमत को
तेरे नबी से है हासिल किया
मेरे इद्राक में है उसी की ज़िया
काश तू बख्श दे मेरी आवाज़ को
लह्ने-दाऊद का सोज़
मैं अपने विज्दान को
अपनी हर साँस के जौहर-नूर से करके आरास्ता
राग छेडूँ इस अंदाज़ से
बज़्मे-क़ल्बे-बशर में चरागाँ हो
ज़ौके-अमल जाग उठे.

४.

तशरीफ़ लाये हज़रते यूसुफ हमीद आज
कहने लगे के इन दिनों अच्छा नहीं मिज़ाज
मैंने कहा के बात हुई क्या जनाबे-मन
बोले के क्या बताऊँ के फुंकता है तन-बदन
उल्लू की दुम हैं फ़ाख्ता जो लोग आज कल
हर रोज़ बुनके लाते हैं ख़्वाबों का एक महल
फिर उस महल को भरते हैं गीबत के रंग से
जादू चलाना चाहते हैं घटिया ढंग से
दिलचस्प बात ये है के सुनते हैं उनकी बात
वो लोग हैं बलंद बहोत जिनके मरताबात
अब आप ही बताइए जो भी हो बाशऊर
सर धुन के रह न जाए तो फिर क्या करे हुज़ूर
मैंने कहा के गुस्से को अब थूक दीजिए
हैं रोम में तो रोमियों जैसा ही कीजिए
बोले के वाह खूब कहा आपने जनाब
लाजिम है ऐसे रोम पे अल्लाह का इताब
अब देखिए न एक हैं अल्लाह बख्श खाँ
शोबे के सद्रो-डीन फैकल्टी भी हैं मियाँ
ज़ौजा जनाब की भी इसी जामिया में हैं
दोनों खुदा के फज्ल से अहले-वफ़ा में हैं.
दर अस्ल इन दिनों है वफ़ा बस मुसाहिबी
चालाक जो हैं करते हैं चौकस मुसाहिबी
ये जोडा जिसका ज़िक्र किया मैंने आप से
बढ़-चढ़ के आज कल हैं बहोत इसके हौसले
बैरूनी मुल्क में थी अभी एक कानफरेंस
अल्लाह बख्श लेके उसे थे बहोत ही टेन्स
कुछ दौड़-धूप करके हुए आप कामयाब
फिल्फौर जामिया ने किया उनका इन्तिखाब
तारीखें ऐसी पड़ गयीं इस कानफरेंस की
इनमें ही डीन होने की आफत थी आ फँसी
की जोड़-तोड़ कुर्सी पे मक्बूज़ हो गए
गो ख़त्म कानफरेंस थी शामिल मगर हुए
शिरकत की लेके आए सनद अपने साथ-साथ
खुश थे के हमने मार लिए दोनों सम्त हाथ
अल्लाह की है शान अजब, बात खुल गई
दब जाए सारा मामला कोशिश बहोत हुई
दिखलाया अपना जौजए मौसूफ़ ने कमाल
हैं शेखे-दर्स्गाह बहोत नेको-खुश-खिसाल
पहोंचीं वो बारगाह में उनकी बचश्मे-नम
बोलीं के बेगुनाहों पे होता है क्या सितम
शौहर मेरे, हुज़ूर के हैं बावाफाओं में
ख्वाहिश है दुश्मनों की घिरें वो बालाओं में
एक साहिबा सितारा जबीं हैं जो शक्ल से
मशहूर है, क़रीब हैं इज्ज़त-मआब के
अल्लाह जाने रखती हैं किस बात की जलन
शौहर को मेरे कहती हैं बातिल व हक-शिकन
इल्जाम उनका है के मेरे शौहरे हज़ीं
मुतलक भी कानफरेंस में शामिल हुए नहीं
मुह्तार्मा की नज़र में सनद भी है मज़हका
महफ़िल में ज़िक्र करके लगाती हैं क़हक़हा
कीजे उन्हें खामोश खुदारा किसी तरह
रखिए वकार आप हमारा किसी तरह
आंखों से अश्क छलके तो आरिज़ पे आ गए
इज्ज़त मआब देख के ये थरथरा गए
बोले के मैडम आप परीशां न हों ज़रा
मुझको ख़याल पूरा है अल्लाह बख्श का
सुनना था ये के चेहरए -बेजान खिल उठा
जादू चला के कल्बे-मुसलमान खिल उठा
सुनता रहा बगौर मैं ये दास्ताँ तमाम
दिल ने कहा के ऐसे हैं घपले यहाँ तमाम
अच्छी तरह से जानते हैं शेखे-दर्स्गाह
पर क्या करें, मुरव्वतें हैं दिल में बेपनाह
कुछ लोग अश्क भरके तो कुछ लेके भर्रियाँ
अच्छी तरह से काटते हैं ज़िंदगी यहाँ
दर अस्ल शेखे-जामिया हैं इतने नेक-खू
सबसे तअल्लुकात की रखते हैं आबरू
कुछ भी नहीं है फर्क सियाहो-सफ़ेद का
बहरूपियों का खूब यहाँ पर है मर्तबा

५.

 शोर था उस्ताद की बेगम का अगवा हो गया
क्या गज़ब है देखिए कैसा तमाशा हो गया
गुंडा-गर्दी की भी आख़िर कोई हद है या नहीं
दुश्मनी मीयाँ से थी बीवी पे हमला हो गया
सानहे की दर्ज थाने में हुई चट-पट रिपोर्ट
और अख्बारत में फिल्फौर चर्चा हो गया
बायाँ बाजू था मुखालिफ, शेखे-दानिश्गाह का
वाकए को ले उड़ा, कुछ ज़ोर तगड़ा हो गया
आ गई चश्मे-ज़दन में तेज़ हरकत में पुलिस
जीपें दौडीं मुखतलिफ सम्तों का दौरा हो गया
इब्तदा से आगई तफ्तीश में संजीदगी
रास्तों में हर तरफ़ पूलिस का नाका हो गया
लोग हमदर्दी जताने आए घर उस्ताद के
अहमियत बढ़ने लगी हर सू तहलका हो गया
जम के लीं दिल्चास्पियाँ हर तरह से अहबाब ने
दावतें लोगों ने खायीं, ज़िबह बकरा हो गया .

६.

मेरे मकान में थोडी सी रौशनी कम है ।
के आफताब की आमद यहाँ हुयी कम है ॥
मैं उसको चाहता हूँ और उससे दूर भी हूँ।
कभी भरोसा है उसपर बहोत , कभी कम है ॥
लबों पे उसके शहद की मिठास है अब भी,
मगर ज़बान में हलकी सी चाशनी कम है ॥
सवाल मैं ने किया, चेहरा मुज्महिल क्यों है ?
जवाब उसने दिया, आज ताजगी कम है ॥
पिला रहा है वो भर-भर के जाम क्यों सब को,
उसे ख़बर है कि रिन्दों में तशनगी कम है।
उसे बताओ वो महफ़िल में सबसे अच्छा है,
मगर मिजाज में उसके शगुफ्तगी कम है ॥
जदीदियत ने हमारे दमाग बदले हैं ,
जभी तो आज बुजुर्गों की पैरवी कम है।।
चलो यहाँ से, के घुटता है दम यहाँ मेरा,
यहाँ पे शोर बहोत, कारकर्दगी कम है॥
कहाँ मैं आ गया , ये बस्तियां अजीब सी हैं,
यहाँ हयात की चादर अभी खुली कम है॥
तुम्हारी बातों से मायूसियां झलकती हैं,
तुम्हारे जुम्लों में तासीरे-ज़िंदगी कम है ॥

७.

खामोश होगी कब ये ज़बाँ कुछ नहीं पता ।
बदलेगा कब निज़ामे- जहाँ कुछ नहीं पता ॥
कब टूट जाए रिश्तये-जां कुछ नहीं पता।
कुछ कारे-खैर कर लो मियाँ कुछ नहीं पता..
चेहरे पे है सभी के शराफत का बांकपन ।
मुजरिम है कौन - कौन यहाँ कुछ नहीं पता ॥
सबके मकान फूस के हैं फिर भी सब हैं खुश ।
उटठेगा कब कहाँ से धुआं कुछ नहीं पता ॥
मंजिल की सम्त दौड़ रहे हैं सभी, मगर ।
ले जाये वक़्त किसको कहाँ कुछ नहीं पता ॥
ओहदे मिले तो अपना चलन भी भुला दिया ।
छिन जाये कब ये नामो-निशाँ कुछ नहीं पता ॥
कल आसमान छूती थीं जिन की बलान्दियाँ ।
कब ख़ाक हो गये वो मकाँ कुछ नहीं पता ॥
सीकर भी होंट हो न सके लोग नेक-नाम।
फिर क्यों है फिक्रे-सूदो-ज़ियाँ कुछ नहीं पता ॥
शाखें शजर की, कल भी रहेंगी हरी -भरी।
कैसे करे कोई ये गुमाँ कुछ नहीं पता ॥

८.

उसकी आंखों की इबारत साफ थी।
मैं नहीं समझा, शिकायत साफ थी॥
क्या गिला करता मैं उसके ज़ुल्म का।
उसकी जानिब से तबीअत साफ थी ॥
छुप के तन्हाई में क्यों मिलते थे हम ?
जबके हम दोनों की नीयत साफ थी.
क़त्ल करके भी, वो बच निकला जनाब।
जानते हैं सब, शहादत साफ़ थी.
गुफ्तुगू में उसकी, थीं हमदर्दियां ।
उसके चेहरे पर मुरव्वत साफ थी॥
रुख नमाज़ों में उसी की सम्त था।
मेरी तफ़सीरे-इबादत साफ थी॥
मुफलिसी अपनी छुपाता किस तरह।
सब पे ज़ाहिर मेरी हालत साफ थी॥
वो मेरा आका था, मैं क्या टोंकता।
जो भी करता था, हिमाक़त साफ़ थी.
वो हमेशा खुश रहा मेरे बगैर।
हाँ मुझे उसकी ज़रूरत साफ थी॥

९.

सावन की घटा बन के बरसती हुई आँखें
भीगा हुआ मौसम हैं ये भीगी हुई आँखें
ख़्वाबों में उतर आती हैं चुप-चाप दबे पाँव
दोशीज़ए-माजी की चमकती हुई आँखें
ये सोचके जाता नहीं मयखाने की जानिब
आजायें न फिर याद वो भूली हुई आँखें
इस दौर में क्या जाने कोई क़द्र गुहर की
दो बेश-बहा सीप हैं सोई हुई आँखें
रुक कर मेरी नज़रें किसे पहचान रही हैं
शायद हैं ये पहले कभी देखी हुई आँखें
सायल की तरह आई हैं दरवाज़ए-दिल पर
कश्कोले-तमन्ना लिए सहमी हुई आँखें

१०.

दमकते चाँद से रुख पर बड़ी-बड़ी आँखें
बला का रखती हैं अंदाजे-दिलबरी आँखें
मैं जानता हूँ के होती हैं किस क़दर शीरीं
हसीन पलकों के शीशे में शरबती आँखें
किसी को नफ़रतें देती हैं प्यार के बदले
किसी से करती हैं इज़हारे-दोस्ती आँखें
गुलाबी शोख़ लिफ़ाफ़ों में है वफ़ा के खुतूत
छुपी हैं पर्दए-मिज़गाँ में प्यार की आँखें
सहर का नूर भी हैं, रात की सियाही भी
हयातो-मौत की तस्वीर खींचती आँखें
दिलों के बंद खज़ानों को खोल कर अक्सर
जवाहरात परखती हैं जौहरी ऑंखें

११.

गुफ्तुगू निगाहों की एतबार आंखों का
दिल पे हो गया आख़िर इख्तियार आंखों का
मय में आज साकी ने कोई शै मिला दी है
ढल गया है शीशे में सब खुमार आंखों का
आंसुओं के दरया में डूब-डूब जाता हूँ
ज़िक्र जब भी आता है अश्कबार आंखों का
मस्तिए-शराब इतनी देर-पा नहीं होती
नश'अ और ही कुछ है बावक़ार आंखों का
किस तरह मैं ठुकरा दूँ तुम ही कुछ कहो जाफर
दावतें हैं नज़रों की इन्केसार आंखों का

१२.

आरजूओं का जहाँ हैं आँखें
तशना ख्वाबों की ज़बां हैं आँखें
भीग जाएँ तो समंदर कहिये
वरना साहिल की फुगाँ हैं आँखें
ये नहीं हैं तो जहाँ है तारीक
दौलते- माहवशां आँखें
जिनमें गुम हो गया माजी मेरा
कौन जाने वो कहाँ हैं आँखें
कैसे गम अपना छुपाये कोई
तर्जुमाने-दिलो-जाँ हैं आँखें
क्या हुआ आपको जाफर साहब
किस लिए अश्क-फ़िशां हैं आँखें

१३.

अपने दामन में लिए शहरे तमन्ना ऑंखें
देखती रहती हैं दुनिया का तमाशा आँखें
यादें बादल की तरह ज़ेह्न पे छा जाती हैं
और अश्कों का बहा देती हैं दरया आँखें
दूर से इन पे समंदर का गुमाँ होता है
पास आने पे नज़र आती हैं तशना आँखें
इनमें सुर्खी भी, सियाही भी, सफेदी भी है
हू-ब-हू अक्स हैं तिरबेनी का गोया आँखें
आँखें मिलती हैं तो बढ़ जाता है कुछ और भी गम
लोग कहते हैं के होती हैं मसीहा आँखें
काम लेते हो हर इक लम्हा तुम इनसे जाफर
हो न जाएँ कहीं बाज़ार में रुसवा आँखें

१४.

ज़ह्र पी लेते हैं क्यों लोग परीशां होकर
हम तो खुशहाल रहे बे-सरो-सामां होकर
लौट आओगे कभी इसका गुमां था किसको
एक टक देख रहा हूँ तुम्हे हैरां होकर
उसकी महफ़िल में सुखनवर तो कई थे लेकिन
उसका दिल जीत लिया मैं ने ग़ज़लख्वां होकर
शहर में रात गए आगज़नी होती रही
घर में हम क़ैद रहे मिशअले-ज़िनदां होकर
ज़ुल्म के सामने झुक जाऊं ये मंज़ूर नहीं
मैं न टूटूंगा किसी तरह हरासां होकर
दिल की गहराइयों में प्यार था जो सिमटा हुआ
तेरे चेहरे पे खिला चाहे-ज़नखदाँ होकर

१५.

वो कल था साथ तो फिर आज ख्वाब सा क्यों है
बगैर उसके ये जीना अज़ाब सा क्यों है
कहाँ गया वो कोई तो बताये उसका पता
दिलो-दमाग में इक इज्तराब सा क्यों है
हम एक साथ भी हैं और दूर दूर भी हैं
हमारे दरमियाँ आख़िर हिजाब सा क्यों है
उसे ख़बर है के आंखों में क्यों खुमार सा है
वो जनता है के चेहरा गुलाब सा क्यों है
बुरा न माने अगर वो तो उस से पूछ लूँ मैं
के मुझ पे लुत्फो-करम बे-हिसाब सा क्यों है
वो तुम से मिलने से पहले तो खुश-सलीका था
हुआ ये क्या उसे खाना-ख़राब सा क्यों है
ये राह्बर हैं तो क्यों फासले से मिलते हैं
रुखों पे इनके नुमायाँ नकाब सा क्यों है

१६.

दिल खिंच रहा है फिर उसी तस्वीर की तरफ़.
हो आयें चलिए मीर तकी मीर की तरफ़.
कहता है दिल कि एक झलक उसकी देख लूँ,
उठता है हर क़दम रहे-शमशीर की तरफ़.
मैं चख चुका हूँ खाना-तबाही का ज़ायका,
जाऊँगा अब न लज़्ज़ते-तामीर की तरफ़.
इक ख्वाब है कि आंखों में आता है बार-बार,
इक खौफ है कि जाता है ताबीर की तरफ़.
हालात शहरे-दिल से जिसे छीन ले गए
मायल है अब भी दिल उसी जागीर की तरफ़.
जिद थी मुझे कि उससे करूँगा न इल्तिजा,
क्यों देखता मैं कातिबे-तकदीर की तरफ़

१७.

जानता हूँ मैं, अभी तुम हो फ़क़त इक साल के
भर दूँ आंखों में तुम्हारी, रंग इस्तक्लाल के
तुम सरापा बन सको पैकर, हसीं अफआल के
और मैं यौमे-विलादत पर तुम्हारे क्या करूँ ?

कम मैं कर सकता नहीं जुग्राफियाई फ़ासले
चाह कर भी तय करूं कैसे फिज़ाई फ़ासले
ख़त्म कर देगी तुम्हारी खुश-अदाई, फ़ासले
और मैं यौमे-विलादत पर तुम्हारे क्या करूं ?

१८.

आते हैं ऐसे भी लम्हे, जबके फरते-जोश में
भींच लेता हूँ ख़यालों में तुम्हें आगोश में
ये जुनूँ की कैफ़ियत होती है, पूरे होश में
और मैं यौमे-विलादत पर तुम्हारे क्या करूं ?

ढाल कर अल्फाज़ में गूँ-गाँ को खुश होता हूँ मैं
देख कर खुश-खुश तुम्हारी माँ को खुश होता हूँ मैं
पुर-मसर्रत पा के लख्ते-जाँ को खुश होता हूँ मैं
और मैं यौमे-विलादत पर तुम्हारे क्या करूं ?

मुस्कुराते गुल-अदा रुखसार आओ चूम लूँ
चाहता है दिल के जब भी खिलखिलाओ चूम लूँ
लब तुम्हारे हैं बहोत खुशरंग, लाओ चूम लूँ
और मैं यौमे-विलादत पर तुम्हारे क्या करूं ?

गौर से देखो, तुम्हारे सामने मैं हूँ खड़ा
केक मुंह में रखदो अपने हाथ से, मैं हूँ खड़ा
लो मुबारकबाद मेरे लाडले, मैं हूँ खड़ा
और मैं यौमे-विलादत पर तुम्हारे क्या करूं ?

प्यार होता है इबादत, प्यार देता हूँ तुम्हें
अपने ख़्वाबों का हसीं गुलज़ार देता हूँ तुम्हें
दिल से जो निकले हैं वो अशआर देता हूँ तुम्हें
और मैं यौमे-विलादत पर तुम्हारे क्या करूँ ?

१९.

दर्द से रिश्ता कोई जोड़ना कब चाहता है
ये तो फ़ितरत का तक़ाज़ा है जो रब चाहता है
गीत बिखरे हैं फ़िज़ाओं में सुनो सबको, मगर
गुनगुनाओ वही नगमा जिसे लब चाहता है
आदमी सीख के आया है अनोखा जादू
एक नया चेहरा लगा लेता है जब चाहता है
मैं हूँ जैसा भी तुझे इस से तअल्लुक़ क्या है
जानना क्यों मेरी गुरबत का सबब चाहता है
पहले रस्मन हुआ करती थी मुलाक़ात उस से
वालेहाना मेरा दिल क्यों उसे अब चाहता है
मेरे घर में कोई दौलत कोई सरमाया नहीं
नाहक़ इस घर में लगाना वो नक़ब चाहता है

२०.

रिन्दों के लब पे मय की ग़ज़ल का खुमार था
मयखाना आज रात बहोत बे-क़रार था
फूलों के साथ रात में क्या हादसा हुआ
हर फूल सुब्ह होने पे क्यों अश्कबार था
जो आखिरी सुतून था कल वो भी गिर गया
घर का उसी सुतून पे दारोमदार था
उस शह्र के थे लोग निहायत थके हुए
चेहरों पे सब के वक़्त का गर्दो-गुबार था
उसको खिज़ाँ ने फेंक दिया जाने किस जगह
वो शख्स पुर-खुलूस था, बागो-बहार था
अफ़साने ज़िन्दगी के वो लिखता था बे-मिसाल
दर-अस्ल वो कमाल का फ़ितरत-निगार था
मेरी मुहब्बतें भी फ़क़त इक दिखावा थीं
उसकी वफ़ाओं का भी कहाँ एतबार था

२१.

मौत का रक़्स अगर देखना चाहो तो मेरे साथ चलो
कुछ मनाज़िर हैं मेरी आंखों में
देखो उस शहर में पेशानियों पर मौत का पैगाम लिए
जाने पहचाने कुछ अफराद चले आते हैं
अपने सफ़्फ़ाक क़वी हाथों में समसाम लिए
उनकी आंखों में है अदवानी शराबों का खुमार
उनके चेहरों पे हैं सावरकरी तेवर के सभी नक़्शो-निगार
लोग कहते हैं कि ये मौत के हैं ठेकेदार
ये जहाँ जाते हैं होता है वहाँ मौत का रक़्स
चीखें बन जाती हैं इनके लिए घुँघरू की सदा
सुनके होते हैं मगन लाशों की बदबू की सदा
मौत के रक़्स में है इनकी ज़फर्याबी का जश्न
ये मनाते हैं बड़े शौक़ से इंसानों की बेताबी का जश्न

२२.

हो के बेघर जा रहे थे रेगज़ारों में कहीं
मैं भी था उन कारावानों की क़तारों में कहीं
वो तो कहिये साथ उसका था कि साहिल मिल गया
कश्तियाँ बचती हैं ऐसे तेज़ धारों में कहीं
देर तक मैं आसमां को एक टक तकता रहा
सोच कर शायद वो शामिल हो सितारों में कहीं
उसपे जो भी गुज़रे वो हर हाल में रहता है खुश
उसके जैसे लोग भी हैं इन दयारों में कहीं
ये भी मुमकिन है वो आया हो अयादत के लिए
क्या अजब शामिल हो वो भी ग़म-गुसारों में कहीं
घर से जब निकला बजाहिर वो बहोत खुश-हालथा
लौटने पर ख़ुद को छोड़ आया गुबारों में कहीं

२३.

अफ़साना सुनाता किसे, मसरूफ़ थे सब लोग.
अफ़साना किसी शख्स का, सुनते भी हैं कब लोग
चर्चा है, कि निकलेगा सरे-बाम वो महताब
इक टक उसे देखेंगे सुना आज की शब लोग.
ये फ़िक्र किसी को नहीं क्या गुज़री है मुझ पर
हाँ जानना चाहेंगे जुदाई का सबब लोग.
राजाओं नवाबों का ज़माना है कहाँ अब
फिर लिखते हैं क्यों नाम में ये मुर्दा लक़ब लोग
लज्ज़त से गुनाहों की जो वाक़िफ़ न रहे हों
इस तर्ह के होते थे न पहले, न हैं अब लोग
यूँ मसअले रखते हैं, लरज़ जाइए सुनकर
सीख आए हैं किस तर्ह का ये हुस्ने-तलब लोग.
लोग आज भी नस्लों की फ़ज़ीलत पे हैं नाजां
बात आए तो बढ़-चढ़ के बताते हैं नसब लोग.

२४.

वरक-वरक मेरे ख़्वाबों के ले गई है हवा
पता नहीं उन्हें किन वादियों में डाल आए
शदीद दर्द सा महसूस कर रहा हूँ मैं
बिखर गया हूँ उन अवराक में कहीं मैं भी.
हुदूदे-जिस्म में शायद बचा नहीं मैं भी.

वो घर कि जिस में लताफत की जलतरंग बजे
मिलाये ताल तबस्सुम हया के नगमों से
सितार छेड़ रही हों शराफतें कुछ यूँ
कि हमनावाई के आहंग उभरें साजों से
वो घर भी ख़्वाबों के अवराक में रहा होगा
पढ़ा जो होगा किसी ने तो हंस दिया होगा

वो ख्वाब अब मैं दोबारा न देख पाऊंगा
कि मुझमें ख्वाबों के अब देखने की ताब नहीं
बनाना चाहता फिर ज़िन्दगी अजाब नहीं

२५.

कब कहा मैंने कि वो लालो-गुहर मांगता है.
इश्क़ की राह में मुझसे मेरा सर मांगता है.
इस ज़मीं पर नहीं उसकी कहीं कोई भी मिसाल
वो मगर हुस्न परखने की नज़र मांगता है.
शेर-गोई में सभी होते नहीं गालिबो-मीर
ये वो फ़न है जो ख़ुदा-दाद हुनर मांगता है.
एक रफ़्तार से चलते हुए थक जाता है वक़्त
और अफ़्लाक से कुछ ज़ेरो-ज़बर मांगता है.
घर में जब था तो कहा दिल ने कि सहरा में चलो
और सहरा में जब आया तो ये घर मांगता है.
इन्क़लाबात की बातें तो हैं आसान मगर
इन्क़लाबात का रुजहान शरर मांगता है.
ज़िन्दगी उसने मुझे दी है तो है फ़र्ज़ मेरा
उसको लौटा दूँ खुशी से वो अगर मांगता है.
मंजिलें होंगी सब आसान वो गर साथ रहे
उससे बस इतना ही दिल ज़ादे-सफ़र मांगता है
दिल की गहराइयों से निकलें तो कुछ बात बने
मुझसे जाफ़र वो दुआओं में असर मांगता है.

२६.

मैं गज़ल की पलकों पे आंसुओं को, न देख पाया मैं क्या करूँ
उसे लफ़्ज़-लफ़्ज़ संवारा, फिर भी न मुस्कुराया मैं क्या करूँ
मैंने कितना चाहा कि होश में, किसी तर्ह उसको मैं ला सकूँ
मैं संभाल पाया न उसको, ऐसा वो डगमगाया मैं क्या करूँ
मैं उड़ा रहा था वरक़-वरक़, सभी ख्वाब आज फ़िजाओं में
मगर एक ख्वाब ने रुक के, मुझको बहोत रुलाया मैं क्या करूँ
मैंने जब से देखा है उसको, एक हसीन साए की शक्ल में
मुझे खौफ़नाक सा लगता है, मेरा अपना साया मैं क्या करूँ
वो मुहब्बतों के गुनाहगार थे, गाँव भर की निगाह में
उन्हें रात दी गयीं सूलियां, मेरा दिल भर आया मैं क्या करूँ
ये जो आहटें हैं उसी की हैं, सरे-शाम कैसे वो आ गया !
मैं अकेला होता तो ठीक था, ऐ मेरे खुदाया मैं क्या करूँ
मैं दरख्त से कोई बात पूछता, जब तक आ गयीं आंधियां
मेरे सामने, उसे जड़ से आँधियों ने गिराया, मैं क्या करूँ
वो जो हर क़दम पे था साथ-साथ, न जाने उसको ये क्या हुआ
वो बरत रहा है अब इस तरह, कि लगे पराया मैं क्या करूँ

२७.

जिन में लपक हो शोलों की वो फूल अब कहाँ
बेकार ज़ाया करते हो तुम रोज़ो-शब कहाँ
इस दौर का खुलूस भी है मस्लेहत-शनास
मिलते हैं लोग रोज़, मगर बे-सबब कहाँ
उन्वाने-फ़िक्र आज है दहशतगरों का ज़ह्र
कुछ भी पता नहीं कि ये फैलेगा कब, कहाँ
अब चाँदनी का हुस्न भी सबके लिए नहीं
गुरबत की ठोकरों में है हुस्ने-तलब कहाँ
हर साज़ तेज़-गाम, हर आवाज़ तेज़-रव
ठहराव आज मक़्सदे-बज़्मे-तरब कहाँ
कच्चे मकानों में भी न बाक़ी बचा खुलूस
वो सादगी, वो प्यार, वो जीने के ढब कहाँ
सैराब पहले से हैं जो दरिया उन्हीं का है
साहिल तक आ सकेंगे कभी तशना-लब कहाँ
क्यों तुमको साया-दार दरख्तों की है तलाश
इस दौरे-बे-अदब में मिलेगा अदब कहाँ

२८.

बरहना हो गये सब ख्वाब, आख़िर क्यों हुआ ऐसा ?
बता मुझ को दिले-बेताब, आख़िर क्यों हुआ ऐसा ?
निकलती आई थी अब तक जो तूफानों की ज़द से भी
वो कश्ती हो गई गर्क़ाब, आख़िर क्यों हुआ ऐसा ?
हवा कैसी चली जिसके असर से ख़ुद मेरे घर के
हुए लायानी सब आदाब, आख़िर क्यों हुआ ऐसा ?
सभी कहते थे वो राहें बहोत महफूज़ थीं फिर भी
सभी के लुट गये अस्बाब, आख़िर क्यों हुआ ऐसा ?
समंदर में महारत थी जिसे गोंते लगाने की
उसी पर सख्त थे गिर्दाब, आख़िर क्यों हुआ ऐसा ?
दिया था साथ मैं ने हक़ का, इसमें क्या बुराई थी
हुए दुश्मन सभी अहबाब, आख़िर क्यों हुआ ऐसा ?

२९.

उनको शिकवा है कि हम रंजो-अलम पालते हैं
ये इनायात उन्हीं की हैं जो हम पालते हैं
ज़ुल्म करने की कोई वज्ह नहीं होती है
सौ बहाने हैं जिन्हें अहले-सितम पालते हैं
तितलियाँ आती हैं रस लेके चली जाती हैं
फूल फितरत से ये अन्दाज़े-करम पालते हैं
लज़्ज़ते-दीद से दुनिया कभी खाली न रहे
सब इसी शौक़ से दो-चार सनम पालते हैं
लोग उस हुस्न से रखते हैं शिकायात बहोत
और उस हुस्न की खफगी के भी ग़म पालते हैं
मैंने पूछा कि हैं सब क्यों तेरी जुल्फों के असीर
हंस के कहने लगा हम ज़ुल्फ़ों में ख़म पालते हैं
जो कहानी कभी कागज़ पे रक़म हो न सकी
उसको हम प्यार से बा-दीदए-नम पालते हैं
इन्तेशाराते-ज़माना से न हम टूट सके
बात ये है कि ग़लत-फहमियाँ कम पालते हैं

३०.

ग़मों का बोझ है दिल पर, उठाता रहता हूँ
मैं राख ख़्वाबों की अक्सर उठाता रहता हूँ
ज़मीं पे बिखरी हैं कितनी हकीक़तें हर सू
उन्हें समझ के मैं गौहर उठाता रहता हूँ
उसे ख़याल न हो कैसे मेरी उल्फ़त का
मैं नाज़ उसके, बराबर उठाता रहता हूँ
शिकायतें मेरे हमराहियों को हैं मुझ से
गिरे-पड़ों को मैं क्योंकर उठाता रहता हूँ
ये जिस्म मिटटी का छोटा सा एक कूज़ा है
मैं इस में सारा समंदर उठाता रहता हूँ
मैं संगबारियों की ज़द में जब भी आता हूँ
मैं संगबारी के पत्थर उठाता रहता हूँ
ये जान कर भी कि हक़-गोई तल्ख़ होती है
नकाब चेहरों से 'जाफ़र' उठाता रहता हूँ

३१.

हवाएं गर्म बहोत हैं कोई गिला न करो
है मस्लेहत का तक़ाज़ा लबों को वा न करो
फ़िज़ा में फैली है बारूद की महक हर सू
कहीं भी आग नज़र आए तज़करा न करो
न जाने तंग नज़र तुमको क्या समझ बैठें
म'आशरे में नया कोई तज्रबा न करो
न कट सका है कभी खंजरों से हक़ का गला
डरो न ज़ुल्म से, तौहीने-कर्बला न करो
तुम्हें भी लोग समझ लेंगे एक दीवाना
तुम अपने इल्म का इज़हार जा-ब-जा न करो
वो जिनका ज़र्फ़ हो खाली, सदा हो जिनकी बलंद
ये इल्तिजा है कभी उनसे इल्तिजा न करो

३२.

शिकवए-गर्दिशे-हालात सभी करते हैं
ज़िन्दगी तुझसे सवालात सभी करते हैं.
सामने आते हैं जब करते हैं तारीफ़ मेरी
मसलेहत से ये इनायात सभी करते हैं
हक के इज़हार में होता है तकल्लुफ सब को
वैसे आपस में शिकायात सभी करते हैं
उस से मिलते हैं तो खामोश से हो जाते हैं
उस से मिलने की मगर बात सभी करते हैं
कह दिया उसने अगर कुछ तो है खफगी कैसी
ऐसी बातें यहाँ दिन रात सभी करते हैं
हर कोई फिरका-परस्ती में मुलव्विस तो नहीं
कैसे कह दूँ कि फ़सादात सभी करते हैं
तुमने 'जाफ़र' उसे चाहा तो बुराई क्या है
हुस्न की उसके मुनाजात सभी करते हैं

३३.

इतनी वीरान मेरे दिल की ये धरती क्यों है
ज़िन्दगी इसमें क़दम रखने से डरती क्यों है
एक तन्हा मैं बगावत की अलामत तो नहीं
ज़ह्न में फिर मेरी तस्वीर उभरती क्यों है
मेरी नज़रों से परे रहती है बरबाद हयात
सामने आती है मेरे तो संवरती क्यों है
रात औरों के घरों से तो चली जाती है
मेरे घर आती है जब भी तो ठहरती क्यों है
चाँद से मांग के शफ्फाफ सी किरनों का लिबास
चाँदनी छत पे दबे पाँव उतरती क्यों है
तुम जो हर सुब्ह सजा लेते हो ख़्वाबों की लड़ी
रोज़ 'जाफ़र' ये सरे-शाम बिखरती क्यों है

३४.

उसे हैरत है मैं जिंदा भी हूँ और खुश भी हूँ कैसे
ख़मोशी ही मेरे हक़ में है बेहतर, कुछ कहूँ कैसे
कहा था उसने हक़ गोई से अपनी बाज़ आ जाओ
कहा था मैं ने मैं पत्थर को हीरा मान लूँ कैसे
कहा उसने किसी मौक़े पे झुक जाना भी पड़ता है
कहा मैं ने कि सच्चाई को देखूं सर-नुगूं कैसे
कहा उसने कि चुप रह जाओ कोई कुछ भी कहता हो
कहा मैं ने कि मैं इंसान हूँ पत्थर बनूँ कैसे
कहा उसने कि तुम दुश्मन बना लेते हो दुनिया को
कहा मैं ने कि दुनिया की तरह मैं भी चलूँ कैसे
कहा उसने कि अपनों और बेगानों को पहचानो
कहा मैं ने कि इन लफ्ज़ों में ये मानी भरूं कैसे
मुझे 'जाफ़र रज़ा' फिर भी वो अपना दोस्त कहता है
इनायत उसकी मुझ पर इतनी ज़्यादा है गिनूं कैसे

३५.

खमोशी में हमेशा अम्न का साया नहीं होता
समंदर का लबो-लहजा बहोत अच्छा नहीं होता
मेरे ख़्वाबों में आने को वो अक्सर आ तो जाता है
मगर अंदाज़ उसकी खुश-मिज़ाजी का नहीं होता
सफ़र आसान हो जाता है ऐसे राहगीरों का
कि जिन की राह में कुहसार या दरिया नहीं होता
दरख्तों के हसीं झुरमुट में जब मिलते हैं दो साए
ज़बानों से, दिलों का उनके अन्दाज़ा नहीं होता
मुहब्बत जुर्म है, पढ़ना न इसकी दास्तानों को
कहा था माँ ने, लेकिन मुझ से अब ऐसा नहीं होता
हर एक आ आ के उसपर जब भी चाहे नाम लिख जाए
वरक दिल का कभी भी इस कदर सादा नहीं होता.

३६.

चलो हुकूमते-हाज़िर से इक सवाल करें
हम अपने ख़्वाबों को, क्यों रोज़ पायमाल करें
वो पत्थरों का अगर है तो मोम हम भी नहीं
बदल दें वक़्त को, हालात हस्बे-हाल करें
नकाबे-राह्बरी में खुदाओं के हैं बदन
खरीद कर, ये जिसे चाहें मालामाल करें
हमारा घर भी है सैलाबे-वक्त की ज़द में
बचेगा ये भी नहीं, कितनी देख-भाल करें
गिरह जो डाली है दिल में पड़ोसियों ने मरे
न खुल सकेगी, भले रिश्ते हम बहाल करें
सितमगरों से कभी दोस्ती नहीं अच्छी
क़रीब आयें तो ये ज़िन्दगी मुहाल करें
वो रंगों-नूर का पैकर है जो भी चाहे करे
सवाल उससे, हमारी है क्या मजाल, करें

३७.

मैं किसी जंगल के वीरानों में गुम हो जाऊँगा
इक हकीक़त बन के अफ़सानों में गुम हो जाऊँगा
जानता हूँ अश्क की सूरत कटेगी ज़िन्दगी
मोतियों के बे-बहा दानों में गुम हो जाऊँगा
मैं नशा करता नहीं, फिर भी नशे में चूर हूँ
देखना कल,मय के पैमानों में गुम हो जाऊँगा
मुझ से पोशीदा नहीं होगा किसी के दिल का हाल
कीमिया होकर, शफाखानों में गुम हो जाऊँगा
गो नहीं मैं खुश-गुलू पर लहने-शीरीं के लिए
ढल के मीठी तान में गानों में गुम हो जाऊँगा

३८.

बदन आबशार का दूध सा,था धुला-धुला मरे सामने
वहीं एक चाँद मगन-मगन, था नहा रहा मरे सामने
मैं तकल्लुफात में रह गया, कोई और उसकी तरफ़ बढ़ा
उसे देखते ही बसद खुशी, वो लिपट गया मरे सामने
कभी फूल बन के जो खिल सका, तो खिलूँगा उसके ही बाग़ में
मुझे अपने होंटों से चूम लेगा, वो दिलरुबा मरे सामने
मैं अज़ल से हुस्न परस्त हूँ, मुझे क्यों बुतों से न इश्क़ हो
मैं न बढ़ सकूँगा जो आ गया, कोई बुतकदा मेरे सामने
नहीं चाँद में वो गुदाज़, जैसा गुदाज़ उसके बदन में है
कोई फूल उसका बदल नहीं, है वो गुल-अदा मेरे सामने
कहा उसने मुझ से कि इश्क़ के, ये रुमूज़ तुम नहीं जानते
वो गिना रहा था खुशी-खुशी, मेरी हर खता मेरे सामने

३९.

अगर ख़्वाबों को मिल जाता कहीं से आइना कोई
यकीनन छोड़ जाता उनपे नक्शे-दिलरुबा कोई
नहाकर चाँदनी में फूल की रंगत नहीं बदली
मगर खुशबू के बहकावे से कुछ घबरा गया कोई
मैं सबका साथ सारी उम्र ही देता रहा लेकिन
न जाने बात क्या थी क्यों नहीं मेरा हुआ कोई
गुलों से रात कलियों ने बहोत आहिस्ता से पूछा
हमारा खिलना छुप कर क्या कहीं है देखता कोई
दरख्तों ने चमन में सुब्ह की आपस में सरगोशी
फलों का आना हम सब के लिए है हादसा कोई
शिकारी के निशाने पर न आता वो किसी सूरत
परिंदा जानता गर, उसका ही मुश्ताक़ था कोई
समंदर में फ़ना होना ही दरिया का मुक़द्दर था
इसी सूरत निकल सकती थी बस राहे-बका कोई
कोई खुशबू-बदन था या फ़क़त एहसास था मेरा
मेरे कमरे में दाखिल हो गया आहिस्ता-पा कोई
तकल्लुफ बर्तरफ जाफर उसी से पूछ लो चलकर
निकालेगा वही इस कशमकश में रास्ता कोई

४०.

अब ये बेहतर है कि हम तोड़ दें सारे रिश्ते
देर-पा होते नहीं प्यार में झूठे रिश्ते
अपने हक़ में कोई मद्धम सा उजाला पाकर
रास्ता अपना बदल लेते हैं कच्चे रिश्ते
कुछ भी हालात हों, हालात से होता क्या है
दिल भले टूटे, नहीं टूटते दिल के रिश्ते
थक के मैदानों से जाओ न पहाड़ों की तरफ़
जान लेवा हैं, चटानों के ये ऊंचे रिश्ते
जिन में गहराई मुहब्बत की मिलेगी तुम को
देखने में वो बहोत होते हैं सादे रिश्ते।

४१.

इल्मो-हुनर की दौड़ है दर्दे - सरी की दौड़
दिन रात जाँ खपाती है दानिशवरी की दौड़
तहकीक़ का तो काम है कुबके दरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में प्रोफेसरी की दौड़.

कैसा भी कैरियर हो न कुछ फ़िक्र कीजिये
गढ़ गढ़ के, कारनामों का बस ज़िक्र कीजिये
दिलबर समझिये सबको, ये है दिलबरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में, प्रोफेसरी की दौड़

गर डीन आपका है, चेयरमैन आपका
बस जान लीजिये कि है सुख चैन आपका
इक छोटी-मोटी है ये फ़क़त फ़्लैटरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में प्रोफेसरी की दौड़

कुछ शैखे-जामिया से तअल्लुक़ बनाइये
रूठे हों देवता जो उन्हें भी मनाइए
जादू ज़बान बनिए, है जादूगरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में, प्रोफेसरी की दौड़

प्रोमोशनों के दौर में है और भी मज़ा
अच्छा बुरा है कौन, ये है कौन देखता
होती है आज थोक में सौदागरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में, प्रोफेसरी की दौड़

आलिम अगर नहीं हैं, तो बन जाइये जनाब
मैटर उडा उड़ा के, बना लीजिये किताब
चोरी का रास्ता है उड़नतश्तरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में प्रोफेसरी की दौड़.

४२.

धडकनों के पेचो-ख़म का ढूँढने निकला था हल
दफ़अतन झपटे मेरी जानिब दरिन्दाने-अजल
रहमते-यज़दाँ ने लेकिन की हिफ़ाज़त बर-महल
इज़्तिराबे-क़ल्ब ने पाया सुकूने-लायज़ल

इस्तिलाहे-आम में कहते है जिसको अस्पताल
मुद्दतों जिसको समझता आया मैं जाए-क़िताल
सरहदें जिसकी मेरी नज़रों में थीं काँटों का जाल
अब करम-फ़रमा हैं मुझ पर, उसकी आंखों के कँवल

सुब्ह आते ही, छिड़क जाती है अफ़्शां चार सू
नूरो-नगहत, संदलीं साग़र से करते हैं वज़ू
भावनाओ-तल'अतो-फरजाना के जामो-सुबू
नर्मिए-साक़ी से मयनोशी का जारी है अमल

वैसे तो पाबंदियां रहती हैं मुझपर बेशुमार
लब हिलाना जुर्म है, और बोलना ना-साज़गार
दस्तो-पा हैं, फिर भी चलने का नहीं है अख़तियार
खून की रफ़्तार, नब्जों का चलन, बैते-ग़ज़ल

बेडियाँ पैरों में, हाथों में पिन्हा कर हथकडी
कार्डियोग्राफी की लैला, आफतों की फुलझडी
दिन में दो-दो बार मुझको छेड़ती है दो घड़ी
तायरे-आज़ाद को मुश्किल से मिल पाता है कल

नर्मो-नाज़ुक उँगलियों के लम्स से नब्ज़ों के तार
झनझना उठते हैं अज ख़ुद, बे झिझक बे-अख़तियार
साज़े-दिल पर राग बज उठते हैं बालाए-शुमार
ये वो मौसीकी है जिसका कुछ नहीं नेमुल्बदल

मुझको डर है उँगलियों से होके कोई सुर्ख रंग
मेरी नब्ज़ों में न दर आए कहीं मिस्ले-फ़िरंग
और फिर आहिस्ता-आहिस्ता बना ले इक सुरंग
यूँ कहीं तामीर हो जाए न उल्फ़त का महल

मुझको ये जन्नत न रास आएगी तेरी ऐ खुदा
गफ़लत-आगीं वो खुमार आलूद है इसकी हवा
मुझसे कहती है मुहब्बत से मेरे दिल की सदा
ऐ क़लन्दर ! अब यहाँ से चल, यहाँ से दूर चल

जगमगाती शमओं के हर नीम-वा लब को सलाम
सर्व-क़द रौशन दरीचों के हर इक ढब को सलाम
इस म'आलिज-गाह के दीवारोदर सबको सलाम
जा रहा हूँ मैं, कि दिल क़ाबू में है कुछ आज-कल

४३.

करतब कमाल का था, तमाशे में कुछ न था।
बच्चे के टुकड़े कब हुए, बच्चे में कुछ न था।
सब सुन रहे थे गौर से, दिलचस्पियों के साथ,
फ़न था सुनाने वाले का, क़िस्से में कुछ न था।
नदियाँ पहाड़ सब थे मेरे ज़हन में कहीं,
नक्शे में बस लकीरें थीं, नक्शे में कुछ न था।
दिल में ही काबा भी था, खुदा भी, तवाफ़ भी,
दिल में न होता काबा, तो काबे में कुछ न था।
किस सादगी से उसने मुझे दे दिया जवाब,
ख़त आया उसका, और लिफ़ाफ़े में कुछ न था।
क़ायम थी मेरी ज़ात, खुदा के वुजूद से,
वरना तो एक मिटटी के ढाँचे में कुछ न था।
परदा हटा तो हुस्ने-मुजस्सम था बेनकाब,
परदा मेरी नज़र का था, परदे में कुछ न था। 

४४.

बहोत उदास सा, मगमूम सा ये मंज़र है
दरख्त ऐसे खड़े हैं खमोश, गोया इन्हें
कहीं खलाओं में पोशीदा, तेज़ तूफाँ के
ज़मीं पे आके तबाही मचाने का डर है.
ये साहिलों का तड़पता, गरीब सन्नाटा
ज़बान से जो समंदर की खूब वाकिफ है
अभी-अभी इसे समझाया है समंदर ने
कि दूर-दूर से आए शगुफ्ता चेह्रों को
खला में होती हुई साजिशों का कोई पता
किसी भी तर्ह, किसी पल न तुम बताओगे
किया जो ऐसा तो ख़ुद को कहीं न पाओगे
तुम्हारे सीने में पेवस्त ऐसा खंजर है
जो टूट जाए अगर, आसमान टूट पड़े.
तबाहियों का मुकम्मल जहान टूट पड़े

४५.

बात निकली और गुल के मौसमों पर आ गयी।
ख़ुद-ब-ख़ुद मेरी ग़ज़ल उसके लबों पर आ गयी।
सरफ़रोशी के लिए मखसूस थे जो रास्ते,
ज़िन्दगी बेसाख्ता उन रास्तों पर आ गयी।
लोग कहते हैं कि अब फूलों में वो रंगत नहीं,
चूक माली से हुई , तुहमत गुलों पर आ गयी।
ये इमारत पहले तो इस शह्र के मरकज़ में थी,
हादसा कैसा हुआ ? क्यों सरहदों पर आ गई ?
कैसे कर सकती थी मौसीकी ज़माने से गुरेज़,
जैसी फरमाइश हुई, वैसी धुनों पर आ गयी।
बेहिसी की बदलियों में, धड़कनें तक खो गयीं,
क्या मुसीबत प्यार में टूटे दिलों पर आ गयी।
मरघटों ने जबसे मेरे घर पे कब्जा कर लिया,
साँस मेरे जिस्म की ख़ुद मरघटों पर आ गयी।

४६.

उस समंदर के कनारे था दरख्तों का हुजूम।
गाँव के तालाब पर जिस तर्ह बच्चों का हुजूम।
उनकी ताबीरें थीं कैसी इसका कब आया ख़याल
देखकर मैं डर गया ख़ुद अपने ख़्वाबों का हुजूम।
फिर्कावारीयत का जंगल किस क़दर सर-सब्ज़ था
शहर में फैला था हर जानिब दरिंदों का हुजूम।
जिनकी बद-आमालियाँ दुनिया से पोशीदा न थीं
हमको दिखलाया गया ऐसे फरिश्तों का हुजूम।
भूक, गुरबत, मुफलिसी के नाम पर यकजा थे सब
उस सियासी धूप में था सिर्फ़ सायों का हुजूम।
किससे कहिये दर्दे-दिल, किससे शिकायत कीजिये
ज़िन्दगी में हर क़दम पर जब हो गैरों का हुजूम।
एक शायर घिर गया है नंगी तलवारों के बीच,
वो है तनहा, सामने उसके है लाखों का हुजूम।

४७.

रौज़ने-ख्वाब से आती है बदन की खुशबू।
है यक़ीनन ये उसी गुंचा-दहन की खुशबू।
उसने परदेस में की मेरी जुबां में बातें
मुझ को बे-साख्ता याद आई वतन की खुशबू।
उस मुसव्विर को बहर-तौर दबाया सब ने
रोक पाया न मगर कोई भी फ़न की खुशबू।
धूप सर्दी में पहेनती है गुलाबी कपड़े
बंद कमरों से भी आती है किरन की खुशबू।
पास आये तो लगे दूध सी नदियों का बहाव,
हो जो रुखसत तो मिले गंगो-जमन की खुशबू।
मेरा घर नीम बरहना है किवाड़ों के बगैर,
मेरे घर आयेगी क्यों उसके फबन की खुशबू।
जाने ले जाये कहाँ ये मेरी आशुफ्ता-सरी,
मुझको महसूस हुई दारो-रसन की खुशबू।

४८.

तितलियाँ दामन में, जुगनू मुट्ठियों में ले गया.
मेरा बचपन फिर मुझे हमजोलियों में ले गया.
हड्डियों पर थे टंगे, जिस गाँव में खस्ता लिबास,
ज़ह्न मेरा, फिर मुझे उन बस्तियों में ले गया.
इस से पहले मैं समंदर में कभी उतरा न था
चाँद अपने साथ मुझको पानियों में ले गया.
उसने आवारा ख़यालों को भटकने कब दिया,
क़ैद करके उनको, दिल की वादियों में ले गया.
हादसों का शह्र के, एहसास ही कब था उसे,
काँप उठा वो, जब उसे मैं ज़ख्मियों में ले गया.
कुछ तो कहना था उसे, वरना वो सबके सामने
क्यों मुझे उस बज़्म से, तनहाइयों में ले गया.
नक्श उसका फिर भी मुझसे नामुकम्मल ही रहा
गो मैं अपनी फ़िक्र सारे ज़ावियों में ले गया.


४९.

मक्के की सरज़मीन पे, काबा नहीं मिला।
देखा जो दिल में झाँक के, सब कुछ यहीं मिला।
गुम हो गया था मैं भी ज़माने की भीड़ में,
तनहा हुआ तो राज़े-दिले-हमनशीं मिला।
सजदे में सर झुकाया था मैंने खुलूस से,
लम्स उसके हाथ का मुझे जेरे-जबीं मिला।
इन मंजिलों से पहले था बिल्कुल मैं नाशानास,
निकला तो गरदे - राह में अर्शे - बरीं मिला।
देखा जो प्यार से, तो सभी थे मेरी तरह,
दुश्मन न पाया कोई, न कोई लईं मिला।
मुझको ही कर दिया था जहाँ ने सुपुर्दे-ख़ाक,
मैं ही था वो खज़ाना जो ज़ेरे-ज़मीं मिला।

५०.

घटाओं में उभरते हैं कभी नक्शो-निगार उसके।
कभी लगता है जैसे हों गली-कूचे, दयार उसके।
मेरे ख़्वाबों में आ जाती हैं क्यों ये चाँदनी रातें,
हथेली पर लिये रंगीन खाके बेशुमार उसके।
मैं था हैरत में, आईने में कैसा अक्स था मेरा,
गरीबां चाक था, मलबूस थे सब तार-तार उसके।
ज़माना किस कदर मजबूर कर देता है इन्सां को,
सभी खामोश रहकर झेलते हैं इंतेशार उसके।
फ़रिश्ता कह रही थी जिसको दुनिया, मैंने जब देखा,
बजाहिर था भला, आमाल थे सब दागदार उसके।
मुहब्बत का सफर 'जाफ़र' बहोत आसां नहीं होता,
रहे-पुरखार उसकी, आबला-पाई मेरी,गर्दो-गुबार उसके।

५१.

हैरत-ज़दा है सारा जहाँ देख के मुझे।
क्या गहरी नींद आयी है खंजर तले मुझे।
मैं सुब्हे-रफ़्ता की हूँ शुआए-फुसूं-तराज़,


लगते नहीं हैं शाम के तेवर भले मुझे।

खुशहाल ज़िन्दगी से न था क़ल्ब मुत्मइन,
फ़ाकों की रहगुज़र ने दिए तजरुबे मुझे।


मैं अपनी मंज़िलों का पता जानता हूँ खूब,
गुमराह कर न पायेंगे ये रास्ते मुझे।

वाक़िफ़ रुमूज़े-इश्क़ से मैं यूँ न था कभी,
रास आये तेरे साथ बहोत रतजगे मुझे।
कब देखता हूँ तेरे एलावा किसी को मैं,
कब सूझता है तेरे जहाँ से परे मुझे।
सुनता रहा मैं गौर से कल तेरी गुफ्तुगू,


मफहूम तेरी बातों के अच्छे लगे मुझे।
ग़म अपने घोलकर मैं कई बार पी चुका,
अब हादसे भी लगते नहीं हादसे मुझे। 



५२.

खामोश होगी कब ते ज़ुबाँ कुछ नहीं पता।

बदलेगा कब निज़ामे-जहाँ कुछ नहीं पता।

कब टूट जाए रिश्तए-जाँ कुछ नहीं पता।

कुछ कारे-खैर कर लो मियाँ कुछ नहीं पता।

चेहरों पे है सभीके शराफ़त का बांकपन,

मुजरिम है कौन-कौन यहाँ कुछ नहीं पता।

सबके माकन फूस के हैं, फिर भी सब हैं खुश,

उट्ठेगा कब कहाँ से धुवां कुछ नहीं पता।

मंज़िल की सम्त दौड़ रहे हैं सभी मगर,

ले जाये वक़्त किसको कहाँ कुछ नहीं पता।

ओहदे मिले तो अपना चलन भी भुला दिया,

छिन जाये कब ये नामो-निशाँ कुछ नहीं पता।

कल आसमान छूती थीं जिनकी बलंदियाँ,

कब ख़ाक हो गए वो मकाँ कुछ नहीं पता।

सीकर भी होंट हो न सके लोग नेक नाम,

फिर क्यों है फ़िक्रे-सूदो-ज़ियाँ कुछ नहीं पता।

शाखें शजर की कल भी रहेंगी हरी-भरी,

कैसे कोई करे ये गुमाँ कुछ नहीं पता।

५३.

ख्वाब बहोत देखे थे, हमने, तुमने, सबने।
फिर भी दुख झेले थे, हमने, तुमने, सबने।
खेतों में उग आई हैं साँपों की फसलें,
बीज ये कब बोये थे, हमने, तुमने, सबने।
क्यों नापैद हुए जाते हैं अम्न के गोशे,
प्यार जहाँ बांटे थे, हमने, तुमने, सबने।
आहिस्ता-आहिस्ता ख़ाक हुए सब कैसे,
जो रिश्ते जोड़े थे, हमने, तुमने, सबने।
तहरीरों से वो अफ़साने गायब क्यों हैं,
जो सौ बार पढ़े थे, हमने, तुमने, सबने।
मिटटी के खुशरंग घरौंदे दीवाली पर,
क्यों तामीर किये थे, हमने, तुमने, सबने।
पहले दहशतगर्द नहीं होते थे शायद,
कब ये लफ़्ज़ सुने थे, हमने, तुमने, सबने।


५४.

कशिश आमों की ऐसी है, कि तोते रोज़ आते हैं।
इसी सूरत से हम भी तुमसे मिलने रोज़ आते हैं।
तलातुम है अगर दरिया में घबराने से क्या हासिल,
हमारी ज़िन्दगी में तो ये खतरे रोज़ आते हैं।
परीशाँ क्यों हो उस कूचे में तुम अपने क़दम रखकर,
बढी है दिल की धड़कन ? ऐसे लम्हे रोज़ आते हैं।
सभी नामेहरबाँ हैं, गुल भी, मौसम भी, फ़िज़ाएं भी,
हमारे इम्तेहाँ को, कैसे-कैसे रोज़, आते हैं।
कभी ख्वाबों पे अपने गौर से सोचा नहीं मैंने,
मेरे ख्वाबों में नामानूस चेहरे रोज़ आते हैं।
कहा मैंने कि ये तोहफा मुहब्बत से मैं लाया हूँ,
कहा उसने कि ऐसे कितने तोहफ़े रोज़ आते हैं।
तुम अपने घर के दरवाज़े दरीचे सब खुले रक्खो,
कि उसके जिस्म की खुशबू के झोंके रोज़ आते हैं।
मुसीबत के दिनों में हौसलों को पस्त मत रखना,
कि इसके बाद हँसते-खिलखिलाते रोज़, आते हैं।


५५.

रात के ढलते-ढलते हम कुछ ऐसा टूट गये.
शीशा जैसे टूटे, रेज़ा-रेज़ा टूट गये.
हमसफ़रों ने साथ हमारा बीच में छोड़ दिया,
मंज़िल आते-आते होकर तनहा टूट गए.
तश्ना-लबी के बाइस जंगल-जंगल फिरे, मगर,
किस्मत देखिये, आकर कुरबे-दरिया टूट गये.
बिखर गए तखईल के सारे मोती चुने हुए,
कासे सब अफ़कार के लमहा-लमहा टूट गये.
जिनके पास हुआ करता था कुह्सरों का अज़्म
ऐसे लोगों को भी हमने देखा टूट गये.
खुम टूटा, पैमाने टूटे, ये सबने देखा,
मयखाने में और भी जाने क्या-क्या टूट गये.
जानते हैं सब दुश्मने-क़ल्बो-जाँ होता है इश्क़,
जिन लोगों ने उसको बेहद चाहा टूट गये.
तेरा करम बहोत है मुझपर, मिल गई मुझको राह,
तुझसे मेरे सारे रिश्ते दुनिया ! टूट गये.
दिल मज़बूत बहोत है आपका सुनता आया था,
आप भी जाफ़र साहब रफ्ता-रफ्ता टूट गये. 


५६.

मैं अपनी आंखों की रोशनाई से उसको लिखती हूँ रोज़ पतियाँ।
हरेक लम्हा उसी में गुम हूँ, उसी का दिन है उसी की रतियाँ।
यकीन है वो ज़रूर पिघलेगा, एक दिन हाल पर हमारे,
न रोक पायेगा अपने आंसू, वो देखेगा जब हमारी गतियाँ।
न जाने कितने ख़याल दिल में, हज़ार करवट बदल रहे हैं,
मैं उससे आख़िर कहूँगी क्या जब, वो मुझसे मिलकर करेगा बतियाँ।
मैं उसके हमराह खुलके सावन में पेंग झूले की ले रही थी,
मैं देखती थी कि डाह से भुन रही हैं मेरी सभी सवतियाँ।
मैं उसके घर से चली थी जिसदम, लिपट के मुझसे कहा था उसने,
अकेले मत जाओ रास्ते में, छुपे हैं दुश्मन लगाए घतियाँ।
मुझे है डर उसके सामने भी, कहीं लहू आँख से न टपके,
जो राज़ दिल में है खुल न जाए, हमारी मारी गई हैं मतियाँ।
सजाके फूलों की सेज कबसे, मैं रास्ता उसका तक रही हूँ,
मुझे यकीं है वो आके भर लेगा बाजुओं में लगाके छतियाँ।

५७.

लज्ज़ते-जिस्म की हर क़ैद से आजाद हैं ख्वाब।
जिंदा ज़हनों के शबो-रोज़ की रूदाद हैं ख्वाब।
आसमानों से उतर आते हैं खामोशी के साथ,
पैकरे-हुस्ने-मुजस्सम हैं, परीज़ाद हैं ख्वाब।
सामने आंखों के हों या हों नज़र से ओझल,
दिल में हर शख्स के, हर गोशे में आबाद हैं ख्वाब।
मेरी नज़रों में है दुनिया की तरक्की इनसे,
नौए-इंसान के इदराक की ईजाद हैं ख्वाब।
हम भी रह जायेंगे कल सिर्फ़ धुंधलकों की तरह,
जिस तरह आज हमारे लिए अजदाद हैं ख्वाब।
कभी लगता है कि हैं ख्वाब परिंदों की तरह,
कभी महसूस ये होता है कि सैयाद हैं ख्वाब।
वक़्त के साथ बदल जाता है दुनिया का मिज़ाज,
मुझको 'जाफ़र' मेरे बचपन के सभी याद हैं ख्वाब।

५८.

हमन की बात समझेंगे, ये मुल्ला क्या पुजारी क्या।
हमन के वास्ते इनकी, खुशी क्या नागवारी क्या।
हमन के दिल में झांके तो सही कोई किसी लम्हा,
हमन दुनिया से क्या लेना, हमन को दुनियादारी क्या।
डुबोकर ख़ुद को देखो, इश्क़ की मस्ती के साग़र में,
समझ जाओगे तुम भी शैख़, हल्का क्या है भारी क्या।
हथेली पर लिए जाँ को, हमन तो फिरते रहते हैं,
हमन की राह रोकेगी, जहाँ की संगबारी क्या।
शराबे इश्क़ की लज्ज़त, कोई जाने तो क्या जाने,
ये मय सर देके मिलती है, यहाँ शह क्या भिकारी क्या।
हमन ख्वाबीदगी में भी, हैं पाते लुत्फे-बेदारी,
हमन को रक्से-मस्ती क्या, हमन की आहो-ज़ारी क्या। 

५९.

घना बेहद था महसूसात का सहरा मैं क्या करता।
कोई हमदम न था, मैं था बहोत तनहा, मैं क्या करता।
मेरे चारो तरफ़ थीं ऊँची-ऊँची सिर्फ़ दीवारें,
मेरे सर पर न था छत का कोई साया मैं क्या करता।
मुहब्बत से मिला जो मैं उसे हमदम समझ बैठा,
वो निकला दूसरों से भी गया-गुज़रा, मैं क्या करता।
मेरे शोबे के सारे साथियों को, थी हसद मुझसे,
नहीं समझा कोई मुझको कभी अपना मैं क्या करता।
हवा में एक तेजाबी चुभन थी, चाँद जलता था,
तड़पते चाँदनी को मैंने ख़ुद देखा, मैं क्या करता।
उन्हीं कूचों से होकर हौसलों का कारवां गुज़रा,
उन्हीं कूचों ने मुझको कर दिया रुसवा, मैं क्या करता।
मेरे ही ख्वाब मुझ पर हंस रहे थे क्या क़यामत थी,
मैं बस खामोश था, होता रहा पस्पा, मैं क्या करता।
समंदर मेरे अन्दर मोजज़न था मेरी फिकरों का,
सफ़ीना ख्वाहिशों का आखिरश डूबा, मैं क्या करता।


६०.

मिला था साथ बहोत मुश्किलों से उसका मुझे।
न रास आया मगर जाने क्यों ये रिश्ता मुझे।

चढ़ा रहे थे उसे जब सलीब पर कुछ लोग,

मुझे लगा था कि उसने बहोत पुकारा मुझे।

महज़ वो दोस्त नहीं था, वो और भी कुछ था,

अकेला शख्स था जिसने कहा फ़रिश्ता मुझे।



मुंडेर पर जो कबूतर हैं उनको देखता हूँ,
कहीं न भेजा हो उसने कोई संदेसा मुझे।
जो रात गुज़री है वो सुब्ह से भी अच्छी थी,
जो सुब्ह आई है लगती है कितनी सादा मुझे।
न जाने चाँदनी क्यों आ गई थी बिस्तर पर,
न जाने चाँद ने क्यों रात भर जगाया मुझे।
दिखा रहा था जो तस्वीर मुझको माज़ी की,
मिला था रात गए ऐसा एक परिंदा मुझे।
लिबासे-बर्ग शजर ने उतार फेंका है,
वो अपनी तर्ह कहीं कर न दे बरहना मुझे।

कुबूल हो गई आख़िर मेरी दुआ जाफ़र,
तवक़्क़ोआत से उसने दिया ज़ियादा मुझे. 

६१.

किस क़दर उसके बदन में है दमक देखता हूँ।
आ गई है मेरी आंखों में चमक देखता हूँ।
नुक़रई किरनें थिरकती हैं अजब लोच के साथ,
चाँदनी रात में भी एक खनक देखता हूँ।
ऐसा लगता है कि जैसे हो किसी फूल की शाख,
उसके अंदाज़ में नरमी की लचक देखता हूँ।
छू के उसको ये हवाएं इधर आई हैं ज़रूर,
हू-ब-हू इनमें उसी की है महक देखता हूँ।
वो गुज़र जाता है जब पास से होकर मेरे,
अपने अन्दर किसी शोले की लपक देखता हूँ ।
शाम की सांवली रंगत में उसी की है कशिश,
वरना क्यों शाम के चेहरे पे नमक देखता हूँ।
उसका गुलरंग सरापा है नज़र में पिन्हाँ,
इन फिजाओं में उसी की मैं झलक देखता हूँ।
देखकर कूचए जानां में मुझे जाते हुए,
आज मौसम की निगाहों में है शक, देखता हूँ।

६२.

हमारे मुल्क की खुफ़िया निज़ामत कुछ नहीं करती।
ये तफ़्तीशें तो करती है, विज़ाहत कुछ नहीं करती।
ये दुनिया सिर्फ़ चालाकों, रियाकारों की दुनिया है,
यहाँ इंसानियत-पैकर क़यादत कुछ नहीं करती।
ज़मीनों से कभी अब प्यार की फ़सलें नहीं उगतीं,
ये दौरे-मस्लेहत है, इसमें चाहत कुछ नहीं करती।
चलो अच्छा हुआ तरके-तअल्लुक़ करके हम खुश हैं,
बजुज़ दिल तोड़ने के ये मुहब्बत कुछ नहीं करती।
तेरी महफ़िल में सर-अफाराज़ बस अहले-सियासत हैं,
वही फ़ाइज़ हैं उहदों पर, लियाक़त कुछ नहीं करती।
खता के जुर्म में हर बे-खता पर बर्क़ गिरती है,
हुकूमत है तमाशाई, हुकूमत कुछ नहीं करती।
महज़ दरख्वास्त देने से, मसाइल हल नहीं होते,
बगावत शर्ते-लाज़िम है, शिकायत कुछ नहीं करती।


६३.

कहाँ से आये हैं, कैसे हुए हैं दहशत-गर्द।
तबाहियों की ज़बां बोलते हैं दहशत-गर्द।
पता बताते नहीं क्यों ये अपनी मंज़िल का,
लहू ज़मीन का पीते रहे हैं दहशत-गर्द।
मुझे है लगता मज़ाहिब सभी हैं तंगख़याल,
कि इनकी सोच के सब सिसिले, हैं दहशत-गर्द।
ये मस्जिदें, ये कलीसा, ये बुतकदे अक्सर,
नशे में आते हैं जब, पालते हैं दहशत-गर्द।
हमारे जिस्म के अन्दर हैं कितने और भी जिस्म,
जहाँ छुपे हुए पाये गये हैं दहशत गर्द।
तेरे दयार में जाने में सर की खैर नहीं,
तेरे दयार के सब रास्ते है दहशतगर्द।
बिला वजह तो न लें जान बेगुनाहों की,
अगर खुदा को खुदा जानते हैं दहशत-गर्द।


६४.

जिस्म के टुकड़े धमाकों ने उडाये चार सू.
शहर में हैं मुन्तशिर दहशत के साये चार सू.
जाने किन-किन रास्तों से आयीं काली आंधियां,
फिर रहे हैं लोग अपनी जाँ बचाए चार सू.
ज़हन के आईनाखानों पर है दुनिया का गुबार,
हिर्स का जादू ज़माने को नचाये चार सू.
अपने कांधों पर उठाकर अपने सारे घर का बोझ,
दर-ब-दर की ठोकरें इंसान खाये चार सू.
जब भी वो नाज़ुक-बदन आए नहाकर बाम पर,
उसकी खुशबू एक पल में फैल जाए चार सू.
इन बियाबां खंडहरों को देखकर ऐसा लगा,
देखते हों जैसे ये नज़रें गड़ाए चार सू.
दूध से झरनों में होकर नीम-उर्यां आजकल,
ज़िन्दगी का खुशनुमा मौसम नहाए चार सू.
उजले-उजले पैकरों में चाँद की ये बेटियाँ
घूमती हैं आसमां सर पर उठाये चार सू.
कुछ नहीं 'जाफ़र' कहीं तुमसे अलग उसका वुजूद,
जिसको तुम सारे जहाँ में ढूंढ आए चार सू.


६५.

पहाडों पर भी होती है ज़राअत देखता हूँ मैं।
मेरे मालिक ! तेरे बन्दों की ताक़त देखता हूँ मैं।

जमाल उसका ही सुब्हो-शाम क्यों रहता है आंखों में,

उसी की सम्त क्यों मायल तबीअत देखता हूँ मैं।

हवा की ज़द पे रौशन करता रहता हूँ चरागों को,

ख़ुद अपने हौसलों में शाने-कुदरत देखता हूँ मैं।



जो बातिल ताक़तों के साथ समझौता नहीं करते,
वही पाते हैं बाद-अज़-मर्ग इज्ज़त देखता हूँ मैं।
वो ख़ुद हो साथ या हो साथ साया उसकी उल्फ़त का,
मुसीबत भी नहीं लगती मुसीबत देखता हूँ मैं।
ज़माने की नज़र में खुदकशी है बुज़दिली, लेकिन,
न जाने इसमें क्यों बूए-बगावत देखता हूँ मैं।
मेरी जानिब वो मायल आजकल रहता है कुछ ज़्यादा,
बहोत मखसूस है उसकी इनायत देखता हूँ मैं।

तेरी दुनिया में हैरत से तेरे ईमान-ज़ादों को,
सुनाते रोज़ अहकामे-शरीअत देखता हूँ मैं. 

६६.

ये सिलसिला कोई तनहा हमारे घर से न था।
बचा था कौन जो मजरूह इस ख़बर से न था।
हमारे ख़्वाबों में थी कोई और ही तस्वीर,
कभी हमारा सरोकार इस सेहर से न था।
कुछ और तर्ह का था आज मसअला दरपेश,
तबाहियों का ये सैलाब उसके दर से न था।
बचाया उसने न होता, तो डूब जाते सभी,
अगरचे रिश्ता कोई उसका इस सफ़र से न था।
सभी के जिस्मों पे चस्पां था मौत का साया,
रूखे-हयात फ़रोजां अजल के डर से न था।
दिए थे लहरों ने कितने ही ज़ख्म साहिल को,
मगर उसे कोई शिकवा किसी लहर से न था।
अजब दरख्त था, शाखें थीं आसमानों में,
ज़मीं का राब्ता मुत्लक़ किसी समर से न था।
हमारे मुल्क की परवाज़ थम गई कैसे,
हमारा मुल्क तो महरूम बालो-पर से न था।

६७.

वो सामने से नज़रें बचाकर निकल गया।
एक और ज़ुल्म करके सितमगर निकल गया।
अच्छा हुआ कि आंखों से आंसू छलक पड़े,
सीने में मुन्जमिद था समंदर निकल गया।
मैं गहरी नींद में था किसी ने जगा दिया,
आँखें खुलीं तो ख्वाब का मंज़र निकल गया।
इज़हार मैंने हक़ का, सरे-आम कर दिया,
तेज़ी से कोई मार के पत्थर निकल गया।
मैं उससे मिल के लौटा, तो उसके ख़याल में,
डूबा था यूँ, कि चलता रहा, घर निकल गया।
बिजली गिरी तो घर मेरा वीरान कर गई,
तूफ़ान सीना चीर के बाहर निकल गया।
अब क्या करेंगे मेरा ज़माने के ज़लज़ले,
मुद्दत से दिल में बैठा था जो डर, निकल गया।

६८.


जो सच था, अगर उसको रक़म कर दिया होता।
दुनिया ने मेरा हाथ क़लम कर दिया होता।
आता न ज़बां पर कभी हालात का शिकवा,
बस ख़ुद को सुपुर्दे-शबे-ग़म कर दिया होता।
औरों की तरह मैं भी अगर चाहता तुझको,
ये सर तेरी देहलीज़ पे ख़म कर दिया होता।
ख़्वाबों का बदन तेज़ हरारत से न भुनता,
पेशानी को एहसास की नम कर दिया होता।
शायद मेरी उल्फ़त में कहीं कोई कमी थी,
वरना तुझे मायल-ब-करम कर दिया होता।
करता वो अगर मुझ पे ज़रा सी भी इनायत,
कुर्बान ये सब जाहो-हशम कर दिया होता।
दुनिया में अगर मुझको जिलाना ही था मक़सूद,
सामान भी जीने का बहम कर दिया होता।
जब तुझको पता था कि मयस्सर नहीं खुशियाँ,
जो उम्र मुझे दी, उसे कम कर दिया होता।

६९.

उसे शिकवा है, ख्वाबों में समंदर देखते क्यों हो.
वो कहता है, ये आईना तुम अक्सर देखते क्यों हो.
कहा मैंने वफ़ाओं का तुम्हारी क्या भरोसा है,
कहा उसने कि सब कुछ रखके मुझपर देखते क्यों हो.
कहा मैंने किसानों की तबाही से है क्या हासिल
कहा उसने तबाही का ये मंज़र देखते क्यों हो.
कहा मैंने कि मेरे गाँव में सब फ़ाका करते हैं,
कहा उसने, कि तुम उजडे हुए घर देखते क्यों हो.
कहा मैंने, तअल्लुक़ तुमसे रख कर जां को खतरा है,
कहा उसने, कि नादानों के तेवर देखते क्यों हो.
कहा मैंने, कि लगता है कोई तूफ़ान आयेगा,
कहा उसने, कि तुम खिड़की से बाहर देखते क्यों हो.
कहा मैंने, तुम्हारा जिस्म तो है नर्म रूई सा,
कहा उसने, मुझे तुम रोज़ छूकर देखते क्यों हो.


७०.


ये ज़िन्दगी भी हो गई, शबनम की एक बूँद.
होते ही सुब्ह खो गई, शबनम की एक बूँद.
होकर फ़िदा गुलों के जवाँ-साल जिस्म पर,
मोती सा कुछ पिरो गई, शबनम की एक बूँद.
क्या जानिए शुआओं ने क्या इस से कह दिया
जाकर कहीं पे सो गई, शबनम की एक बूँद.
देखा, तो नम से हो गए मेरे तअस्सुरात,
मुझमें ये क्या समो गई, शबनम की एक बूँद.
आंसू छलक के उसके जो आरिज़ पे आ गए,
इस शहर को डुबो गई, शबनम की एक बूँद।


७१.

लाख हों आंखों में आंसू, मुस्कुराते हैं वो लोग.
दूसरों के सामने यूँ गम छुपाते हैं वो लोग.

जान देकर जो बचाते थे वतन की आबरू,
आपको, हमको, सभी को याद आते हैं वो लोग.

अपनी ज़ाती सोच से बाहर निकल कर देखिये,
आप ही की तर्ह कुछ सपने सजाते हैं वो लोग.

आसमानों की छतों के साये में रहते हुए,
ज़िन्दगी की धूप में ख़ुद को सुखाते हैं वो लोग.

जिनकी ज़हरीली ज़बानों पर नहीं कोई लगाम,
वक़्त आने पर हमेशा मुंह छुपाते हैं वो लोग.

कितने बुज़दिल हैं हमारे दौर के दहशत-फ़रोश,
हक़ पे हैं तो क्यों नहीं आँखें मिलाते हैं वो लोग.
७२.
 
दूर इंसानों से दरया था रवां सब से अलग.
वक़्त ने रहने दिया उसको कहाँ सब से अलग.

अब किसी के सामने दिल खोलते डरते है लोग,
कर दिया हालात ने सबको यहाँ सब से अलग.

नफ़रतों की भीड़ में, उल्फ़त की बातें हैं फ़ुज़ूल,
आओ चलकर बैठते हैं हम वहाँ सब से अलग.

अब हमारे शह्र में भी है इलाक़ाई चुभन,
अब हमारे शह्र की भी है जुबां सब से अलग.

मस्लकों, सूबों, ज़बानों से है कुछ ऐसा लगाव,
एक लावारिस सा है हिन्दोस्ताँ सब से अलग.

ख़ुद मेरे अन्दर किसी लमहा हुआ ये हादसा,
रूह को देखा तड़पते, जिस्मो-जाँ सब से अलग.
 
७३.
 


तक़द्दुस का पहेनकर खोल हैवाँ रक़्स करता है।
निगाहें देखती हैं यूँ भी इन्सां रक़्स करता है।

मेरे घर में दरिन्दे घुस गये मैं कुछ न कर पाया,
मेरा घर अब कहाँ! अब तो बियाबाँ रक़्स करता है।

समंदर की खमोशी कह रही है कुछ तो होना है,
कहीं गहराइयों में एक तूफाँ रक़्स करता है।

इबादतगाहों के साए में भी शैतान पलते हैं,
तमाशा देखता है धर्म, ईमाँ रक़्स करता है।

चलो इस शहर से ये शहर तो पागल बना देगा,
यहाँ हर शख्स बिल्कुल होके उर्यां रक्स करता है.
 
७४.
 
रोशनी लेके अंधेरों से लड़ोगे कैसे.
ख़ुद अंधेरों में हो ये देख सकोगे कैसे।
ज़ाफ़रानी नज़र आते हैं जो गुलहाए-चमन.
उनमें है ज़ह्र, तो ये बात कहोगे कैसे.
चाँद गहनाया है, ठिठरी सी नज़र आती है रात,
मन्ज़िलें दूर हैं, राहों में चलोगे कैसे.
घर के फूलों से कहो सीखें न काँटों का चलन,
वरना फिर ऐसे बियाबाँ में रहोगे कैसे.
यूँ ही अल्फ़ाज़ में अंगारे अगर भरते रहे,
शोले भड़केंगे हरेक सम्त, बचोगे कैसे.
वक़्त लग जाता है किरदार बनाने में बहोत,
इतना गिर जाओगे नीचे तो उठोगे कैसे।
आइना सामने रख देगा ज़माना जिस रोज़,
अपनी तस्वीर पे सोचो कि हंसोगे कैसे.
 
७५.
 
ज़मीन की इन कुशादा पेशानियों पे कुछ सिल्वटें मिलेंगी.
सदी के सफ़्फ़ाक तेवरों की, लहू भरी आहटें मिलेंगी.


दिलों में शुबहात के दरीचे, खुलेंगे इस तर्ह रफ़्ता-रफ़्ता,
निगाहों में दोस्तों की अनजानी अजनबी करवटें मिलेंगी.

ये रास्ते हमको लेके जायेंगे ऐसे वीरान जंगलों में,
जहाँ हमारे ही जिस्मों की बरगदों से लटकी लटें मिलेंगी.

हमारे दिल में भी है ये ख्वाहिश, कि चाँद को हम भी छू के देखें,
हमें ये शायद ख़बर नहीं है, हमें वहाँ तलछटें मिलेंगी.

तबाहियों से तड़प रहे है जो उनके घर कोई जाए कैसे,
वहाँ फ़क़त चीखते हुए दर, कराहती चौखटें मिलेंगी.
 
७५.
 
 मैं साहिल पर खड़ा हूँ, सोचता हूँ उस तरफ़ क्या है.
सुना है लोग कहते हैं उधर भी एक दुनिया है.
वो बिल्कुल अजनबी है, फिर ये क्यों महसूस होता है.
कि जैसे उसको हमने बारहा पहलू में देखा है.
मेरी आंखों में कितने ही सितारे जगमगाते हैं,
समझता है ज़मीं का चाँद मुझपर उसका क़ब्ज़ा है.
कभी एहसास मुझको फ़ासलों का हो नहीं पाया,
वो है परदेस में, लेकिन हमेशा याद करता है.
हरेक इन्सां से अपनापन जताना गैर मुमकिन है,
मगर मैं क्या करुँ, मेरे लिए हर एक अपना है.
परीशाँ करते होंगे उसको भी माज़ी के वो लम्हे,
मैं तनहा हूँ अगर, मेरी तरह वो भी तो तनहा है.
 
७६.
 
दुश्मनी हिन्दी से थी, मारे गए मासूम लोग।
कैसे इस सूबा परस्ती से न हों मगमूम लोग।
एक जानिब हैं लक़ो-दक़ खुशनुमां उम्दा मकां,
दूसरी जानिब हैं खपरैलों से भी महरूम लोग।
एक अरसे से हिरासत में हैं कितने बेगुनाह,
क्या खता थी, कर न पाये आज तक मालूम लोग।
ज़िन्दगी की तेज़गामी का नहीं देते जो साथ,
ज़िन्दगी में ही समझते हैं उन्हें मरहूम लोग।
खुदसे जितना प्यार करते हैं, करेंगे मुझसे भी,
जान लेंगे जब मेरे अशआर का मफ़हूम लोग।

७७.
 
परदेसों से, चन्द परिंदे, आये थे कुछ रोज़ हुए।
खुश होकर घर-आँगन कैसा चहके थे कुछ रोज़ हुए।

मीठी-मीठी यादों के कुछ आवारा मजनूँ साए,
कड़वे-कड़वे सन्नाटों में चीखे थे कुछ रोज़ हुए।

नर्म-नर्म, उजले बादल के, रूई के गालों जैसे,
जाज़िब टुकड़े, आसमान से उतरे थे कुछ रोज़ हुए।

प्यारी-प्यारी खुशबू से था भरा-भरा माहौल बहोत,
कैसे-कैसे फूल फ़िज़ा में महके थे कुछ रोज़ हुए।

ख्वाब हकीकत बन जाते हैं आज मुझे महसूस हुआ,
ख़्वाबों में खुशरंग मनाजिर देखे थे, कुछ रोज़ हुए।
 
फिर से लोग वही तस्वीरें दिखलाने क्यों आये हैं,
अभी-अभी तो हमने धोके खाये थे कुछ रोज़ हुए।
 
सोने की ये थाली लेकर सुब्ह कहांतक जायेगी,
चाँद ने जाने कैसे संदेसे भेजे थे कुछ रोज़ हुए।

७८.

जड़ें दरख्तों की मज़बूत थीं, हिला न सकीं.
ये आंधियां कोई आफत भी इनपे ढा न सकीं.

हया के तायरों के आशियाँ थे आंखों में,
जभी तो मिलने पे ये खुलके मुस्कुरा न सकीं.

हमारे घर में ग़मों के निगाहबां थे खड़े,
बहारें आना बहोत चाहती थीं आ न सकीं.

तुम्हारी यादें मुझे ले गई थीं बचपन में,
मगर वो आजके हालात को छुपा न सकीं.

शिकंजे कस दिए थे हमने आरजूओं के,
गिरफ़्त सख्त थी इतनी कि फडफडा न सकीं.

गुलों को अपने लहू से जो बख्शते थे हयात,
वो नगमे बुलबुलें इस दौर में सुना न सकीं.

मुसीबतों ने मेरे घर में जब क़दम रक्खा,
पसंद आया घर ऐसा कि फिर वो जा न सकीं.


७९.

फ़स्ल खेतों में जलाकर, खुश हुए दुश्मन बहोत।
हादसा दिल पर वो गुज़रा, बढ़ गई उलझन बहोत।
रास आएगी तुझे हरगिज़ न ये आवारगी,
ज़िन्दगी ! तेरे लिए हैं तेरे घर-आँगन बहोत।
मेरे मज़हब के अलावा सारे मज़हब हैं ग़लत,
सोचते हैं आज इस सूरत से मर्दों-ज़न बहोत।
बर्क किस-किस पर गिराओगे, मैं तनहा तो नहीं,
हक़ पसंदों के हैं मेरे मुल्क में खिरमन बहोत।
खून की रंगत किसी तफ़रीक़ की क़ायल नहीं,
आदमी है एक, हाँ उसके हैं पैराहन बहोत।
आम के बागों में कजली की धुनें, झूलों की पेंग,
याद आता है मुझे क्यों गाँव का सावन बहोत।
मुफलिसी के बाद भी इज्ज़त पे आंच आई नहीं,
शुक्र है हर हाल में सिमटा रहा दामन बहोत।
वैसे तो परदेस में भी मैं बहोत खुश हाल था,
जब भी घर लौटा हुआ महसूस अपनापन बहोत।


८०.

गुले-ताज़ा समझकर तितलियाँ बेचैन करती हैं.
उसे ख़्वाबों में उसकी खूबियाँ बेचैन करती हैं.
कोई भी आँख हो आंसू छलक जाते हैं पलकों पर,
किसी की आहें जब बनकर धुवां बेचैन करती हैं.
सुकूँ घर से निकलकर भी मयस्सर कब हुआ मुझको,
कहीं शिकवे, कहीं मायूसियां बेचैन करती हैं.
दिलों में अब सितम का आसमानों के नहीं खदशा,
ज़मीनों की चमकती बिजलियाँ बेचैन करती हैं.
ख़बर ये है उसे भी रात को नींदें नहीं आतीं,
सुना हैं उसको भी तन्हाइयां बेचैन करती हैं.
नहीं करती कभी कम चाँदनी गुस्ताखियाँ अपनी,
मेरी रातों को उसकी शोखियाँ बेचैन करती हैं.
सभी दीवानगी में दौड़ते हैं हुस्न के पीछे,
सभी को हुस्न की रानाइयां बेचैन करती है.
मैं साहिल से समंदर का नज़ारा देख कब पाया,
मुझे मौजों से उलझी कश्तियाँ बेचैन करती हैं.