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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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बुधवार, 6 मार्च 2013

शैलेश जैदी



१.

ये दिल की धड़कनें होती हैं क्या, क्यों दिल धड़कता है ?
मिला है जब भी वो, बाकायदा क्यों दिल धड़कता है ?
बहुत मासूमियत से उसने पूछा एक दिन मुझसे ,
बताओ मुझको, है क्या माजरा, क्यों दिल धड़कता है ?
मुसीबत में हो कोई, टीस सी क्यों दिल में उठती है,
किसी को देख कर टूटा हुआ, क्यों दिल धड़कता है ?
किया है मैं ने जो अनुबंध उस में कुछ तो ख़तरा है,
मैं तन्हाई में जब हूँ सोचता, क्यों दिल धड़कता है ?
अनावश्यक नहीं होतीं कभी बेचैनियां दिल की,
कहीं निश्चित हुआ कुछ हादसा, क्यों दिल धड़कता है ?
तेरे आने से कुछ राहत तो मैं महसूस करता हूँ,
मगर इतना बता ठंडी हवा, क्यों दिल धड़कता है ?
अभी दुःख-दर्द क्या इस जिंदगी में और आयेंगे,
जो होना था वो सबकुछ हो चुका, क्यों दिल धड़कता है?
कहा मैं ने के अब दिल में कोई हसरत नहीं बाक़ी,
कहा उसने के बतलाओ ज़रा क्यों दिल धड़कता है ?
वो मयखाने में आकर होश खो बैठा है, ये सच है,
मगर क्या राज़ है, साकी ! तेरा क्यों दिल धड़कता है ?

२.

यादों की दस्तक पर मन के वातायन खुल जाते है.
अपने आप ही मर्यादा के सब बन्धन खुल जाते हैं.
मैं उसको आवाज़ नहीं दे पाता लौट के आ जाओ,
दिल के गाँव में पीड़ा के पथ आजीवन खुल जाते हैं..
अर्थ-व्यवस्था के सुधार का आश्वासन क्यों देते हो ?
महंगाई की मार से झूठे आश्वासन खुल जाते हैं.
निर्धनता, भुखमरी मिटाने के प्रयास क्यों निष्फल हैं ?
तन ढकने की बात हुई जब और भी तन खुल जाते हैं.
शीशे के दरवाजों के वातानुकूल कक्षों में भी,
कुछ अधिकारी क्यों पाकर थोड़ा सा धन खुल जाते हैं.
मेरे घर के आँगन की दीवार बहुत ही नीची है.
ऊंचे भवनों की छत से नीचे आँगन खुल जाते हैं.
ओट में पलकों की सावनमय नयन छुपाए बैठे हो,
आंसू छलक-छलक पड़ते हैं जब ये नयन खुल जाते हैं.

३.

पुष्पों का स्थैर्य दीर्घकालीन नहीं होता ।
इसीलिए मन पुष्पों के आधीन नहीं होता ॥
होंठों की मुस्कानें अक्सर धोखा देती हैं ।
आस्वादन का मोह सदा रंगीन नहीं होता ॥
दर्शक दीर्घा में बैठा हर व्यक्ति, एक जैसा ,
नाट्य-कला का भीतर से शौकीन नहीं होता ॥
सुख,संतोष,आनंद सरीखे सुंदर शब्दों का,
अर्थ है क्या जबतक कोई स्वाधीन नहीं होता ॥
अलंकरण, आभूषण से कब रूप संवारता है ,
स्वाद रहित है भोजन जो नमकीन नहीं होता ॥
कुर्सी ही आसीन हुआ करती है लोगों पर ,
कुर्सी पर शायद कोई आसीन नहीं होता ॥
बस उपाधियाँ मिल जाएं होता है लक्ष्य यही ,
पढने-लिखने में यह मन तल्लीन नहीं होता ॥
राजनीति में आने वाले दिग्गज पुरुषों का,
कोई भी अपराध कभी संगीन नहीं होता ॥

४.

दिशा-विहीन हैं सब , फिर भी चल रहे हैं क्यों ?
हर-एक पल नई राहें बदल रहे हैं क्यों ?
समाज आज का विज्ञापनों की मंडी है।
हम इस समाज में चुपचाप पल रहे हैं क्यों ?
उड़े-उड़े से हैं चेहरे, झुकी-झुकी आँखें।
लुटा के आए हैं क्या , हाथ मल रहे हैं क्यों ?
लगी है आग ये कैसी, ये शोर कैसा है ?
ये किस के घर हैं, यहाँ लोग जल रहे हैं क्यों ?
कहाँ विलुप्त हुई स्वाभिमान की पूंजी ।
हम आज बर्फ की सूरत पिघल रहे हैं क्यों ?
कभी तो सोंचो , युगों तक, सभी दिशाओं में ।
हम इस जगत में हमेशा सफल रहे है क्यों ?
ये चक्रव्यूह है बाजारवाद का, इस में ।
हमारे मित्र निरंतर फिसल रहे हैं क्यों ?
ये कैसा शहर है, क्यों दौड़-भाग जारी है ?
घरों से लोग परीशां निकल रहे है क्यों ?

५.

विपत्तियों में भी मुस्कान का भरोसा है ।
खिलेंगे फूल, ये उद्यान का भरोसा है ॥
भटक रहे हैं वो अज्ञान- के अंधेरों में ।
जिन्हें विवेक - रहित ज्ञान का भरोसा है ॥
जगत में छोड़ के जाना है एक दिन जिसको ।
शरीर के उसी परिधान का भरोसा है ॥
ये पेड़, जिन पे नही आज एक भी पत्ता ।
इन्हें वसंत के आह्वान का भरोसा है ॥
अँधेरी रातें हों जैसी भी, सुब्ह आती है ।
दिवस हों जैसे भी, अवसान का भरोसा है ॥
ये लोग योग को व्यवसाय क्यों बनाते हैं।
वहीं है योग , जहाँ ध्यान का भरोसा है ॥
गिरे-पडों को भी मैं आदमी समझता हूँ ।
मुझे मनुष्य के सम्मान का भरोसा है ॥

६.

कलुशताएं किसी के मन में हों, अच्छी नहीं लगतीं.
दरारें कैसी भी जीवन में हों, अच्छी नहीं लगतीं.
बताओ तो सही, हर पल मुखौटे क्यों बदलते हो,
विवशताएं किसी बन्धन में हों, अच्छी नहीं लगतीं.
तुम्हारा रूप खिल उठता है जब तुम मुस्कुराते हो,
लकीरें कुछ अगर दरपन में हों, अच्छी नहीं लगतीं.
युवावस्था में दुःख का झेलना मुश्किल नहीं होता,
मगर पीडाएं जो बचपन में हों, अच्छी नहीं लगतीं.
जुदाई की ये घडियाँ यूं तो सह लेते हैं सब लेकिन,
यही घडियाँ अगर सावन में हों, अच्छी नहीं लगतीं.
सुलगती हों कहीं चिंगारियां अन्तर नहीं पड़ता,
ये जब ख़ुद अपने ही दामन में हों, अच्छी नहीं लगतीं.

७.

अदृश्य थे, मगर थे बहुत से सहारे साथ.
निश्चिन्त हो गया हूँ कि तुम हो हमारे साथ.
मीठा भी और खारा भी पानी का है स्वभाव,
सुनता हूँ मैं समुद्र में हैं दोनों धारे साथ.
याद आता है भंवर में कई लोग थे घिरे,
लेकिन पहुँच न पाया कोई भी किनारे साथ.
संसद में हो न पायी अविश्वास मत की जीत,
विद्रोहियों को दुःख है नहीं थे सितारे साथ.
मित्रों के शत्रु-भाव से महसूस ये हुआ,
कितने थे अर्थ-हीन वो दिन जो गुज़ारे साथ.
चिल्लाई घर की भूख तो हड़ताल रुक गई,
सच्चाइयों का देते भी कबतक बिचारे साथ.

८.

ये गली सीधी चली जाती है उसके द्वार तक'

जाँ गँवा बैठे हैं इसमें सूरमा किरदार तक.
जिसके हाथों में संभल पाती न हो पतवार तक
उससे क्यों आशा करूँ ले जायेगा उस पार तक.
भाव कविता का समझकर तृप्त हो जाते हैं लोग
कोई अब जाता कहाँ है अर्थ के विस्तार तक.
कुछ तो निश्चय ही हुआ ऐसा कि जिसके बाद से,
मेरी दुनिया हो गई सीमित मेरे संसार तक.
धडकनों के शब्दकोशों को उलट कर देखिये
इसके सारे शब्द ले जाते हैं मन को प्यार तक.
मैंने साहस करके उसको पास जा कर छू लिया,
हो गए थे सुर्ख उसके रेशमी रुखसार तक.
क्रान्ति के दावों में क्यों होती है कमज़ोरी की गंध,
क्रान्ति की हर चेतना सीमित है क्यों ललकार तक.

९.

सारी नदियाँ पी जाता है ,फिर भी सागर प्यासा है
उसकी भाषा पढ़कर देखो, अक्षर-अक्षर प्यासा है
आसमान से चलकर दरिया तक आना आसान नहीं
रोज़ आता है पानी पीने चाँद, निरंतर प्यासा है.
ओस चाटकर कुछ तो प्यास बुझा लेते हैं फूल मगर
सुनो कभी संगीत जो उनका, एक-एक स्वर प्यासा है
दो जुन की रोटी तो जैसे-तैसे मिल भी जाती है
थोड़ा सा आदर पाने को, श्रमिक बराबर प्यासा है
मूल प्रश्न यह है आतंकी को विशवास दिया किसने ?
प्राण अगर जाएँ, स्वागत को, जन्नत का दर प्यासा है
केसरिया बाने को, केवल एक ही चिंता रहती है
मिले विधर्मी रक्त कहीं से, धर्म का गागर प्यासा है
कोई भी शैलेश तुम्हारी, आकर हत्या कर देगा
खरी-खरी बातों से, प्राणों का, हर विषधर प्यासा है.

१०.

चांदनी की ओट में श्वेताम्बरा आयी थी कल
था ये शायद स्वप्न कोई अप्सरा आयी थी कल
स्नेह पर संदेह उसके मैं करूँ, सम्भव नहीं,
मेरे दुःख पर आँख उसकी भरभरा आयी थी कल
मलमली कोमल फुहारें उड़ रही थीं हर तरफ़
मौसमी बारिश पहन कर घाघरा आयी थी कल
एक प्रेमी के निधन की सूचना देकर हवा
उसको आधी रात में जाकर डरा आयी थी कल
देखिये बनवास अब मिलाता है किस आदर्श को
राजनीतिक-मंच पर इक मंथरा आयी थी कल
थी सफलता की मुझे आशा, मगर इतनी न थी
मेरी ये उपलब्धि ही, मुझको हरा आयी थी कल

११.

धूप ने छाया से कानों में कहा, शीतल हो तुम.
किंतु स्थिरता नहीं है, इसलिए बेकल हो तुम.
देख कर बादल को उड़ते, चाँद को आई हँसी,
मुस्कुराकर बोला सच ये है बहुत निश्छल हो तुम.
मन के संगीतज्ञ ने काया की वीणा से कहा,
कैसे छेड़ूँ तार, शायद नींद से बोझल हो तुम.
फूल के पास आके भंवरे ने मुहब्बत से कहा,
कितने पावन हो! मेरी नज़रों में गंगाजल हो तुम.
मेरे मन! मैं इस समय तुमसे न कुछ कह पाऊंगा,
ताज़ा-ताज़ा ज़ख्म हैं, पूरी तरह घायल हो तुम.
कूदने की ज़िद है क्यों इस ज़िन्दगी की आग में,
हो गया है क्या तुम्हें! क्या एकदम पागल हो तुम.


12.

शाम के सब धुंधलके पिघल से गए,
रात के कंगनों की खनक गूँज उठी.
लेके अंगडाई मयखाने जागे सभी,
प्यार के साधनों की खनक गूँज उठी।

लड़खडाते हुए चन्द साए मिले,
जिनकी आंखों में बेकल चकाचौंध थी,
चुप थे वीरान गलियों के शापित अधर,
फिर भी कुंठित मनों की खनक गूँज उठी।

मन-ही-मन में विचारों के आकाश से,
रूप की अप्सराएं उतरने लगीं,
गुनगुनाने लगे कल्पना के सुमन,
गीति के मंथनों की खनक गूँज उठी।

खिड़कियों से गुज़रती हुई चाँदनी,
मय के प्यालों में आकर थिरकने लगी,
चाँद के नूपुरों से स्वतः स्फुरित
गर्म स्पंदनों की खनक गूँज उठी।

मैं तिमिर की शरण में ही बैठा रहा,
होंठ करता रहा तर मदिर चाव से,
मेरे भीतर कहीं बारिशें हो गयीं,
बावले सावनों की खनक गूँज उठी।


१३.


 धूप का चाँदनी से मिलन, कब हुआ है जो हो पायेगा।
मांग में चाँद की मोतियाँ, कैसे सूरज पिरो पायेगा।
रात धरती से उगने लगी, फैल जायेगी कुछ देर में,
मन अभी से है उत्साह में, कितने सपने संजो पायेगा।
हर तरफ़ शोर ही शोर है, चैन शायद किसी को नहीं,
ख्वाब देखे कोई किस तरह, किस तरह कोई सो पायेगा।
उसके जैसा कोई भी नहीं, हाव में,भाव में, रूप में,
उसको पाना सरल है कहाँ, खुश बहुत होगा जो पायेगा।
कितनी संवेदनाएं कोई, मन की गागर में यकजा करे,
भरके गागर छलक जायेगी, इसमें क्या-क्या समो पायेगा।
लाख पथरीली बंजर ज़मीं, है तो क्या मैं भी ये मान लूँ,
प्यार का बीज इसमें कोई, बोना चाहे, न बो पायेगा।
कितनी चिंताओं में है घिरा,एक मिटटी का कच्चा घडा,
टूट जाए तो बिखराव हो, कोई अपना ही रो पायेगा।
मन में भूकंप आयें तो क्या, मन तो मन है समुन्दर नहीं,
ये सुनामी की लहरों में भी, बस स्वयं को डुबो पायेगा।


१४.

दो-चार पल ही गुज़रे थे सम्बन्धियों के साथ.
उठना पड़ा वहाँ से हमें तल्खियों के साथ.
ये कैसी आंधियां थीं कि सब कुछ उजड़ गया,
होता है क्यों ये खेल इन्हीं बस्तियों के साथ.
संकोच हर क़दम पे है कुछ बोलते नहीं
जीते हैं अपने देश में पाबंदियों के साथ.
करते रहोगे याचना, पाओगे कुछ नहीं,
अब न्यायाधीश होते हैं अपराधियों के साथ.
निश्चय ही बच न पायेंगे घर के तमाम लोग
तूफ़ान आ गया है नई बिजलियों के साथ.
जालिम नहीं, दर-असल ये बीमार लोग हैं,
इनको बरत के देखो कभी नर्मियों के साथ.
बांटा किये प्रकाश सभी को तमाम उम्र,
निर्वाह कर न पाये तिमिर-जीवियों के साथ.

१५.

वो अपरिचित भी नहीं है और परिचित भी नहीं।
जानता हूँ मैं उसे, पर हूँ सुनिश्चित भी नहीं।
उसने भिजवाई थी मुझको सूचना, घर आएगा,
कैसे मैं स्वागत करुँगा, घर व्यवस्थित भी नहीं।
मानता हूँ मैं कि उसपर है भरोसा कम मुझे,
किंतु उसकी ओर से मन कुछ सशंकित भी नहीं।
ये समस्याएँ तो होती हैं सभी के सामने,
इन समस्याओं से मैं किंचित प्रभावित भी नहीं।
सोचता हूँ मैं कि यह सम्मान क्यों मुझको मिला,
मैं तो अपने देश में कुछ ऐसा चर्चित भी नहीं।
जिनका है सम्पूर्ण जीवन लांछनाओं से भरा,
देखता हूँ मैं कि वे नेता कलंकित भी नहीं।
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