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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शनिवार, 9 मार्च 2013

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(09 सितंबर 1850 - 06 जनवरी 1885)


1.
फिर आई फ़स्ले गुल फिर जख़्मदह रह-रह के पकते हैं
मेरे दाग़-ए-जिगर पर सूरत-ए-लाला लहकते हैं
नसीहत है अबस नासेह बयाँ नाहक ही बकते हैं
जो बहके दुख्तेरज से हैं वो कब इनसे बहकते हैं
कोई जाकर कहो ये आख़िरी पैगाम उस बुत से
अरे आ जा अभी दम तन में बाक़ी है सिसकते हैं
न बोसा लेने देते हैं न लगते हैं गले मेरे
अभी कम-उम्र हैं हर बात पर मुझ से झिझकते हैं
व गैरों को अदा से क़त्ल जब बेबाक करते हैं
तो उसकी तेग़ को हम आह! किस हैरत से तकते हैं
उड़ा लाए हो यह तर्जे सखुन किस से बताओ तो
दमे तक़दीर गोया बाग़ में बुलबुल चहकते हैं
'रसा'की है तलाशे यार में यह दश्त-पैमाई
कि मिस्ले शीशा मेरे पाँव के छाले झलकते हैं
2.
ख़याल-ए-नावक-ए-मिजगाँ में बस हम सर पटकते हैं
हमारे दिल में मुद्दत से ये ख़ारे ग़म खटकते हैं
रुख़े रौशन पै उसके गेसुए शबगूँ लटकते हैं
कयामत है मुसाफ़िर रास्तः दिन को भटकते हैं
फ़ुगाँ करती है बुलबुल याद में गर गुल के ऐ गुलची
सदा इक आह की आती है जब गुंचे चटकते हैं
रिहा करता नहीं सैयाद हम को मौसिमे गुल में
कफ़स में दम जो घबराता है सर दे दे पटकते हैं
उड़ा दूँगा 'रसा' मैं धज्जियाँ दामाने सहरा की
अबस खारे बियाबाँ मेरे दामन से अटकते हैं
3.
ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वो बाहर निकलते हैं
अभी से कुछ दिल मुज़्तर पर अपने तीर चलते हैं
ज़रा देखो तो ऐ अहले सखुन ज़ोरे सनाअत को
नई बंदिश है मजमूँ नूर के साँचें में ढलते हैं
बुरा हो इश्क़ का ये हाल है अब तेरी फ़ुर्कत में
कि चश्मे खूँ चकाँ से लख़्ते दिल पैहम निकलते हैं
हिला देंगे अभी हे संगे दिल तेरे कलेजे को
हमारी आहे आतिश-बार से पत्थर पिघलते हैं
तेरा उभरा हुआ सीना जो हमको याद आता है
तो ऐ रश्के परी पहरों कफ़े अफ़सोस मलते हैं
किसी पहलू नहीं चैन आता है उश्शाक को तेरे
तड़फते हैं फ़ुगाँ करते हैं औ करवट बदलते हैं
'रसा'हाजत नहीं कुछ रौशनी की कुंजे मर्कद में
बजाये शमा याँ दागे जिगर हर वक़्त जलते हैं
4.
अजब जोबन है गुल पर आमदे फ़स्ले बहारी है
शिताब आ साकिया गुलरू कि तेरी यादगारी है
रिहा करता है सैयादे सितमगर मौसिमे गुल में
असीराने कफ़स लो तुमसे अब रुख़सत हमारी है
किसी पहलू नहीं आराम आता तेरे आशिक को
दिले मुज़तर तड़पता है निहायत बेक़रारी है
सफ़ाई देखते ही दिल फड़क जाता है बिस्मिल का
अरे जल्लाद तेरे तेग़ की क्या आबदारी है
दिला अब तो फ़िराक़े यार में यह हाल है अपना
कि सर जानू पर है और ख़ून दह आँखों से जारी है
इलाही ख़ैर कीजो कुछ अभी से दिल धड़कता है
सुना है मंज़िले औवल की पहली रात भारी है
'रसा'महवे फ़साहत दोस्त क्या दुश्मन भी हैं सारे
ज़माने में तेरे तर्ज़े सख़ुन की यादगारी है
5.
आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया
ऐ फ़लक क्या-क्या हमारे दिल में अरमाँ रह गया
बाग़बाँ है चार दिन की बाग़े आलम में बहार
फूल सब मुरझा गए ख़ाली बियाबाँ रह गया
इतना एहसाँ और कर लिल्लाह ऐ दस्ते जनूँ
बाक़ी गर्दन में फ़कत तारे गिरेबाँ रह गया
याद आई जब तुम्हारे रूप रौशन की चमक
मैं सरासर सूरते आईना हैराँ रह गया
ले चले दो फूल भी इस बाग़े आलम से न हम
वक़्त रेहलत हैफ़ है ख़ाली ही दामाँ रह गया
मर गए हम पर न आए तुम ख़बर को ऐ सनम
हौसला सब दिल का दिल ही में मेरी जाँ रह गया
नातवानी ने दिखाया ज़ोर अपना ऐ 'रसा'
सूरते नक्शे क़दम मैं बस नुमायाँ रह गया
6.
गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में
नहीं ये है गुलाले-सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे
ये आशिक की है उमड़ी आहें आतिशबार होली में
गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो
मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में
है रंगत जाफ़रानी रुख अबीरी कुमकुम कुछ है
बने हो ख़ुद ही होली तुम ऐ दिलदार होली में
रस गर जामे-मय गैरों को देते हो तो मुझको भी
नशीली आँख दिखाकर करो सरशार होली में
7.
उसको शाहनशही हर बार मुबारक होवे
कैसर-ए-हिन्द का दरबार मुबारक होवे
बाद मुद्दत के हैं देहली के फिरे दिन या रब
तख़्त ताऊस तिलाकार मुबारक होवे
बाग़वाँ फूलों से आबाद रहे सहने चमन
बुलबुलो गुलशने बे-ख़ार मुबारक होवे
एक इस्तूद में हैं शेखो बिरहमन दोनों
सिजदः इनको उन्हें जुन्नार मुबारक होवे
मुज़दऐ दिल कि फिर आई है गुलिस्ताँ में बहार
मैकशो खानये खुम्मार मुबारक होवे
ज़मज़मों ने तेरे बस कर दिए लब बंद 'रसा'
ये मुबारक़ तेरी गुफ़्तार मुबारक होवे