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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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गुरुवार, 28 मार्च 2013

अली सरदार जाफ़री



१.

फिर एक दिन ऐसा आएगा
आंखों के दिये बुझ जायेंगे
हाथों के कँवल कुम्हलाएँगे
और बर्गे-ज़बां से नुत्क़ो-सदा
की हर तितली उड़ जायेगी

इक काले समंदर की तह में
कलियों की तरह से खिलती हुई
फूलों की तरह से हंसती हुई
सारी शक्लें खो जायेंगी
खूं की गर्दिश दिल की धड़कन
सब रागिनियाँ सो जायेंगी
और नीली फ़िज़ा की मख़मल पर
हंसती हुई हीरे की ये कनी
ये मरी जन्नत मेरी ज़मीं
इसकी सुब्हें इसकी शामें
बे जाने हुए बे समझे हुए
इक मुश्ते-गुबारे-इन्सां पर
शबनम की तरह रो जायेंगी

हर चीज़ भुला दी जायेगी
यादों के हसीं बुतखाने से
हर चीज़ उठा दी जायेगी
फिर कोई नहीं ये पूछेगा
सरदार कहाँ है महफ़िल में ?

लेकिन मैं यहाँ फिर आऊंगा
बच्चों के दहन से बोलूंगा
चिडियों की जुबां में गाऊँगा
जब बीज हँसेंगे, धरती से
और कोपलें अपनी ऊँगली से
मिट्टी की तहों को छेड़ेंगी
मैं पत्ती-पत्ती कली-कली
अपनी आँखें फिर खोलूंगा
सरसब्ज़ हथेली पर लेकर
शबनम के क़तरे तोलूँगा
मैं रंगे-हिना आहंगे-ग़ज़ल
अंदाजे-सुखन बन जाऊँगा.
रुख्सारे-उरूसे-नौ की तरह
हर आँचल से छन जाऊँगा

जाड़े की हवाएं दामन में
जब फ़स्ले-खिजां को लायेंगी
रह्वों के जवाँ क़दमों के तले
सूखे हुए पत्तों में मेरे
हंसने की सदाएं आएँगी
धरती की सुनहली सब नदियाँ
आकाश की नीली सब झीलें
हस्ती से मेरी भर जायेंगी
और सारा ज़माना देखेगा
हर किस्सा मेरा अफसाना है
हर आशिक है सरदार यहाँ
हर माशूका सुल्ताना है

मैं एक गुज़रता लम्हा हूँ
अय्याम के अफसूँ खाने में
मैं एक तड़पता क़तरा हूँ
मसरूफ़े-सफ़र हो जाऊँगा
माजी की सुराही के दिल से
मुस्तकबिल के पैमाने में
मैं सोता हूँ और जागता हूँ
सदियों का पुराना खेल हूँ मैं
मैं मर के अमर हो जाऊँगा

२.
फिर वही माँगे हुए लम्हे, फिर वही जाम--शराब
 फिर वही तारीक रातों में ख़याल--माहताब
फिर वही तारों की पेशानी पे रंग--लाज़वाल
 फिर वही भूली हुई बातों का धुंधला सा ख़याल
फिर वो आँखें भीगी भीगी दामन--शब में उदास
फिर वो उम्मीदों के मदफ़न ज़िन्दगी के आस-पास

फिर वही फ़र्दा की बातें फिर वही मीठे सराब
फिर वही बेदार आँखें फिर वही बेदार ख़्वाब

फिर वही वारफ़्तगी तनहाई अफ़सानों का खेल
फिर वही रुख़्सार वो आग़ोश वो ज़ुल्फ़--सियाह

फिर वही शहर--तमन्ना फिर वही तारीक राह
ज़िन्दगी की बेबसी उफ़्फ़ वक़्त के तारीक जाल

दर्द भी छिनने लगा उम्मीद भी छिनने लगी
मुझ से मेरी आरज़ू--दीद भी छिनने लगी

फिर वही तारीक माज़ी फिर वही बेकैफ़ हाल
फिर वही बेसोज़ लम्हें फिर वही जाम--शराब
फिर वही तारीक रातों में ख़याल--माहताब
३.
तुम से बेरंगी--हस्ती का गिला करना था

दिल पे अंबार है ख़ूँगश्ता तमन्नाओं का

आज टूटे हुए तारों का ख़याल आया है

एक मेला है परेशान सी उम्मीदों का

चन्द पज़मुर्दा बहारों का ख़याल आया है

पाँव थक थक के रह जाते हैं मायूसी में

पुरमहन राहगुज़ारों का ख़याल आया है

साक़ी--बादा नहीं जाम--लब--जू भी नहीं

तुम से कहना था कि अब आँख में आँसू भी नहीं
४.
दबी हुई है मेरे लबों में कहीं पे वो आह भी जो अब तक

शोला बन के भड़क सकी है अश्क--बेसूद बन के निकली

घुटी हुई है नफ़स की हद में जला दिया जो जला सकी है

शमा बन कर पिघल सकी है आज तक दूध बन के निकली

दिया है बेशक मेरी नज़र को वो परतौ जो दर्द बख़्शे

मुझ पर ग़ालिब ही सकी है मेरा मस्जूद बन के निकली
५.

दयार--ग़ैर में कोई जहाँ अपना हो

शदीद कर्ब की घड़ियाँ गुज़ार चुकने पर

कुछ इत्तेफ़ाक़ हो ऐसा कि एक शाम कहीं

किसी एक ऐसी जगह से हो यूँ ही मेरा गुज़र

जहाँ हुजूम--गुरेज़ाँ में तुम नज़र जाओ

और एक एक को हैरत से देखता रहे
६.
तुम्हारे लहजे में जो गर्मी--हलावत है

इसे भला सा कोई नाम दो वफ़ा की जगह

गनीम--नूर का हमला कहो अँधेरों पर

दयार--दर्द में आमद कहो मसीहा की

रवाँ-दवाँ हुए ख़ुश्बू के क़ाफ़िले हर सू

ख़ला--सुबह में गूँजी सहर की शहनाई

ये एक कोहरा सा ये धुँध सी जो छाई है

इस इल्तहाब में सुरमगीं उजाले में

सिवा तुम्हारे मुझे कुछ नज़र नहीं आता

हयात नाम है यादों का तल्ख़ और शीरीं

भला किसी ने कभी रग--बू को पकड़ा है

शफ़क़ को क़ैद में रखा सबा को बन्द किया

हर एक लमहा गुरेज़ाँ है जैसे दुश्मन है

तुम मिलोगी मैं, हम भी दोनों लम्हे हैं
७.
शाम होती है सहर होती है ये वक़्त--रवाँ

जो कभी मेरे सर पे संग-गराँ बन के गिरा

राह में आया कभी मेरी हिमाला बन कर

जो कभी उक्दा बना ऐसा कि हल ही हुआ

अश्क बन कर मेरी आँखों से कभी टपका है

जो कभी ख़ून--जिगर बन के मिज़्श्ग़ाँ पर आया

आज बेवास्ता यूँ गुज़रा चला जाता है

जैसे मैं कशमकश--ज़ीस्त में शामिल ही नहीं
८.
 आवो कि जश्न--मर्ग--मुहब्बत मनायेँ हम

आती नहीं कहीं से दिल--ज़िन्दा की सदा

सूने पड़े हैं कूचा--बाज़ार इश्क़ के

है शम--अन्जुमन का नया हुस्न--जाँ गुदाज़

शायद नहीं रहे वो पतंगों के वलवले

ताज़ा रख सकेगी रिवायात--दश्त--दर

वो फ़ित्नासर गये जिन्हें काँटें अज़ीज़ थे

अब कुछ नहीं तो नींद से आँखें जलायेँ हम

आओ कि जश्न--मर्ग--मुहब्बत मनायेँ हम

सोचा था कि आयेगा ये दिन भी फिर कभी

इक बार हम मिले हैं ज़रा मुस्कुरा तो लें

क्या जाने अब उल्फ़त--देरीना याद आये

इस हुस्न--इख़्तियार पे आँखें झुका तो लें

बरसा लबों से फूल तेरी उम्र हो दराज़

सँभले हुए तो हैं. पर ज़रा डगमगा तो लें
 ९.

काम अब कोई न आयेगा बस इक दिल के सिवा
रास्ते बन्द हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा
बाइस-ए-रश्क़ है तन्हारवी-ए-रहरौ-ए-शौक़
हमसफ़र कोई नहीं दूरी-ए-मंजिल के सिवा
हम ने दुनिया की हर इक शै से उठाया दिल को
लेकिन इक शोख़ के हंगामा-ए-महफ़िल के सिवा
तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद
बेगुनाह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा
जाने किस रंग से आई है गुलशन में बहार
कोई नग़्मा ही नहीं शोर-ए-सिलासिल के सिवा
१०.
लू के मौसम में बहारों की हवा माँगते हैं
हम क़फ़े-दस्ते-ख़िज़ाँ पर भी हिना माँगते हैं
हमनशीं सादादिली-हाए-तमन्ना मत पूछ
बेवफ़ाओं से वफ़ाओं का सिला माँगते हैं
काश कर लेते कभी काबा-ए-दिल का भी तवाफ़
वो जो पत्थर के मकानों से ख़ुदा माँगते हैं
जिसमें हो सतवते-शाहीन की परवाज़ का रंग
लबे-शाइर से वो बुलबुल की नवा माँगते हैं
ताकि दुनिया पे खुले उनका फ़रेबे-इंसाफ़
बेख़ता होके ख़ताओं की सज़ा माँगते हैं
तीरगी जितनी बढ़े हुस्न हो अफ़ज़ूँ तेरा
कहकशाँ माँग में
, माथे पे ज़िया माँगते हैं
यह है वारफ़्तगिए-शौक़ का आलम सरदार
बारिशे-संग है और बादे-सबा माँगते हैं

११.
आये हम ग़ालिब-ओ-इक़बाल के नग़्मात के बाद
मुसहफफ़े-इश्क़ो-जुनूँ हुस्न की आयात के बाद
ऐ वतन ख़ाके-वतन वो भी तुझे दे देंगे
बच गया है जो लहू अब के फ़सादात के बाद
नारे-नुम्रूद यही और यही ग़ुलज़ारे-ख़लील
कोई आतिश नहीं आतिशक़दा-ए-ज़ात के बाद
राम-ओ-गौतम की ज़मीं हुर्मते-इन्साँ की अमीं
बाँझ हो जाएगी क्या ख़ून की बरसात के बाद
हमको मालूम है वादों की हक़ीक़त क्या है
बारिशे-संगे-सितम
, ज़ामे-मुदारात के बाद
तश्नगी है कि बुझाये नहीं बुझती सरदार
बढ़ गयी कौसरो-तस्नीम की सौग़ात के बाद
4.
कोई हो मौसम थम नहीं सकता रक़्से-जुनूँ दीवानों का
ज़ंजीरों की झनकारों में शोरे-बहाराँ बाक़ी है
इश्क़ के मुजरिम ने ये मंज़र औ़ज़े-दार से देखा है
ज़िन्दाँ-ज़िन्दाँ
, महबस-महबस, हल्क़ःए-याराँ बाक़ी है
बर्गे-ज़र्द के साये में भी जूए-तरन्नुम जारी है
ये तो शिकस्ते-फ़स्ले-ख़िज़ाँ है
, सौते-हज़ाराँ बाक़ी है
मुह्तसिबों की ख़ुश्क़ी-ए-दिल पर एक ज़माना हँसता है
तर है दामन और वक़ारे-बादा-गुसाराँ बाक़ी है
फूल-से चेहरे,चाँद-से मुखड़े नज़रों से रूपोश हुए
आरिज़े-दिल पर रंगे-हिना है
, दस्ते-निगाराँ बाक़ी है
5.
एक जू-ए-दर्द दिल से जिगर तक रवाँ है आज
पिघला हुआ रगों में इक आतिश-फ़िशाँ है आज
लब सी दिये हैं ता न शिकायत करे कोई
लेकिन हर एक ज़ख़्म के मूँह में ज़बाँ है आज
तारीकियों ने घेर् लिया है हयात को
लेकिन किसी का रू-ए-हसीं दर्मियाँ है आज
जीने का वक़्त है यही मरने का वक़्त है
दिल अपनी ज़िन्दगी से बहुत शादमाँ है आज
हो जाता हूँ शहीद हर अहल-ए-वफ़ा के साथ
हर दास्तान-ए-शौक़ मेरी दास्ताँ है आज
आये हैं किस निशात से हम क़त्ल-गाह में
ज़ख़्मों से दिल है चूर नज़र गुल-फ़िशाँ है आज
ज़िन्दानियों ने तोड़ दिया ज़ुल्म का ग़ुरूर
वो दब-दबा वो रौब-ए-हुकूमत कहाँ है आज
6.
कभी ख़न्दाँ,कभी गिरियाँ, कभी रक़्साँ चलिए
दूर तक साथ तिरे
, उम्रे-गुरेज़ाँ, चलिए
ज़ौक़े-आराइश-ओ-गुलकारी-ए-अश्क़-ए-ख़ूँ से
कोई भी फ़स्ल हो
, फ़िरदौस-ब-दामाँ चलिए
रस्मे-देरीनःए-आलम को बदलने के लिए
रस्मे-देरीनःए-आलम से गुरेज़ाँ चलिए
आसमानों से बरसता है अँधेरा कैसा
अपनी पलकों पे लिए जश्ने-चराग़ाँ चलिए
शोलः-ए-जाँ को हवा देती है ख़ुद बादे-समूम
शोलः-ए-जाँ की तरह चाक-गिरीबाँ चलिए
अक़्ल के नूर से दिल कीजिए अपना रौशन
दिल की राहों से सूए-मंज़िले-इन्साँ चलिए
ग़म नयी सुब्‌ह के तारे का बहुत है लेकिन
लेके अब परचमे-ख़ुर्शीदे ज़र-अफ़शाँ चलिए
सर-ब-क़फ़ चलने की आदत में न फ़र्क़ आ जाए
कूचःए-दार में सरमस्तो-ग़ज़ल-ख़्वाँ चलिए
7.
शिकस्त-ए-शौक को तामील-ए-आरजू कहिये
के तिश्नगी को भी पैमान-ओ-सुबू कहिये
ख़याल-ए-यार को दीजिये विसाल-ए-यार का नाम
शब-ए-फिराक को गेसू-ए-मुश्कबू कहिये
चराग-ए-अंजुमन हैरत-ओ-नजारा हैं
लालारू जिनहें अब बाब-ए-आरजू कहिये
शिकायतें भी बहुत हैं हिकायतें भी बहुत
मजा तो जब है के यारों के रु-ब-रू कहिये
महक रही है गज़ल जिक्र-ए-जुल्फ-ए-खुबाँ से
नसीम-ए-सुब्ह की मानिंद कू-ब-कू कहिये
ऐ हुक्म कीजिये फिर खंजरों की दिलजारी
जहाँ-ए-जख्म से अफसाना-ए-गुलू कहिये
जुबाँ-ए-शोख से करते है पुरशिश-ए-अहवाल
और उसके बाद ये कहते हैं आरजू कहिये
है जख्म जख्म मगर क्यूँ ना जानिये उसे फूल
लहू लहू है मगर क्यूँ उसे लहू कहिये
जहाँ जहाँ भी खिजाँ है वहीं वहीं है बहार
चमन चमन यही अफसाना-ए-नुमू कहिये
जमीँ को दीजिये दिल-ए-मुद्दा तलब का पयाम
खिजाँ को वसत-ए-दामाँ-ए-आरजू कहिये
साँवरिये गज़ल अपनी बयाँ-ए-गालिब से
जबाँ-ए-मीर में भी हाँ कभू कभू कहिये
मगर वो हर्फ धड़कने लगे जो दिल की तरह
मगर वो बात जिसे अपनी गुफ्तगू कहिये
मगर वो आँख के जिसमें निगाह अपनी हो
मगर वो दिल जिसे अपनी जुस्तजू कहिये
किसी के नाम पे सरदार खो चुके हैं जिसे
उसी को अह्ल-ए-तमन्ना की आबरू कहिये