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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

हैदर अली ‘आतिश’ दिहलवी

1.

सुन तो सही जहाँ में है तेरा फ़साना क्या
कहती है तुझको खल्क़े-खुदा गाइबाना क्या

ज़ेरे-ज़मीं से आता है गुल, सोज़ ज़रबकफ़
क़ारूं ने रास्ते में लुटाया ख़ज़ाना क्या

ज़ीना सबा का ढूँढती है अपनी मुश्ते-ख़ाक
बामे-बलंद, यार का है आस्ताना क्या

चारों तरफ़ से सूरते-जानां हो जलवागर
दिल साफ़ हो तेरा तो है आईना-खाना क्या

तब्लो-अलम है पास न अपने है मुल्को-माल
हम से ख़िलाफ़ होके करेगा ज़माना क्या

यूँ मुद्दई हसद से न दे दाद तो न दे
आतिश गज़ल ये तूने कही आशिक़ाना क्या

2.

इंसाफ़ की तराजू में तोला, अयाँ हुआ
यूसुफ़ से तेरे हुस्न का पल्ला गराँ हुआ

मादूम दागे-इश्क़ का दिल से निशाँ हुआ
अफ़सोस, बे-चराग़ हमारा मकाँ हुआ

देखा जो मैं ने उसको समंदर की आँख से
गुलज़ार आग हो गई, सुम्बुल धुंवां हुआ

तू देखने गया लबे-दरया जो चाँदनी
उस्द्तादा तुझको देख के आबे-रवां हुआ

इन्सां को चाहिए के न हो नागवारे-तब'अ
समझे सुबुक उसे जो किसी पर गराँ हुआ

अल्लाह के करम से बुतों को किया मुतीअ
ज़ेरे-नगीं क़लम-रवे-हिन्दोस्तां हुआ

क़ातिल की तेग़ से रहे-मुल्के-अदम मिली
आहन हमारे वास्ते संगे-निशाँ हुआ

फ़िकरे- बलंद ने मेरी ऐसा किया बलंद
आतिश ज़मीने-शेर से पस्त आसमां हुआ

3.

वहशते-दिल ने किया है वो बियाबाँ पैदा
सैकड़ों कोस नहीं सूरते-इन्सां पैदा

दिल के आईने में कर जौहरे-पिन्हाँ पैदा
दरो-दीवार से हो सूरते-जानां पैदा

बाग़ सुनसान न कर इनको पकड़ कर सैयाद
बादे-मुद्दत हुए हैं मुर्गे-खुश-इल्हाँ पैदा

रूह की तर्ह जो दाखिल हो वो दीवाना है
जिसमे-खाकी समझ उसको जो हो ज़िन्दाँ पैदा

बे-हिजाबों का मगर शहर है अक्लीमे-अदम
देखता हूँ जिसे, होता है वो उरयां पैदा

एक गुल ऐसा नहीं होवे खिज़ाँ जिसकी बहार
कौन से वक्त हुआ था ये गुलिस्ताँ पैदा

मूजिद इसकी है सियह-रोज़ी हमारी 'आतिश'
हम न होते तो न होती शबे-हिजरां पैदा

4.

तेरी मस्ताना आंखों पर न गर्दिश का असर देखा
मए-गुलरंग से सौ-सौ तरह पैमाना भर देखा

मुसाफ़िर ही नज़र आया, नज़र आया जो दुनिया में
जिसे देखा, उसे आलूदए- गर्दे-सफ़र देखा

नया ग़म्ज़ा किया सैयाद ने अपने असीरों से
किया आज़ाद उसे, जिस मुर्ग़ को बे बालो-पर देखा

ख़बर इक दिन न ली, पूछा न हाल अपने फ़क़ीरों का
वो शाहे-हुस्न, हमने बादशाहे-बेखबर देखा

तड़पते देख कर मुझको कहा हंस कर ये उस बुत ने
खुदा के दोस्त को रंजो-अलम में बेशतर देखा

बदख्शां-ओ-यमन छाना, लगाए गोते दरया के
न लब सा लाल, ऐ 'आतिश', न दंदां सा गुहर देखा

5.

आशियाना, न क़फ़स औ न चमन याद आया
आँख खुलने भी न पायी थी कि सैयाद आया

एक दिन हिचकी भी आई न मुझे गुरबत में
मैं कभी तुमको न ऐ अहले-वतन याद आया

सोज़िशे-दिल मेरी क्या बनके क़लम लिक्खेगा
मोम हो हो के है बह जाने को फ़ौलाद आया

सज्दए-शुक्र ज़मीं पर न करूँ मैं क्योंकर
आसमां से है मेरा रिज़के-खुदादाद आया

देखले फिर ये तमाशा नज़र आने का नहीं
सामने आंखों के है आलमे-ईजाद आया

दर्गहे-यार मुरादों की महल है 'आतिश'
शाद याँ से है गया, जब कोई नाशाद आया