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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

फैज अहमद "फैज़"

उनका जन्म १३ फरवरी १९११ को लाहौर के पास सियालकोट शहर, पाकिस्तान में हुआ था। उनके पिता एक बैरिस्टर थे और उनका परिवार एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार था।१९५१‍ - १९५५ की क़ैद के दौरान लिखी गई उनकी कविताएँ बाद में बहुत लोकप्रिय हुईं और उन्हें "दस्त-ए-सबा (हवा का हाथ)" तथा "ज़िन्दान नामा (कारावास का ब्यौरा)" नाम से प्रकाशित किया गया।
१.

सच है हम ही को आप के शिकवे बजा ना थे,
बेशक सितम जनाब के सब दोस्ताना थे।

हाँ जो जफ़ा भी आप ने की,कायदे से की,
हाँ हम ही काराबंद-ए-उसूल-ए-वफ़ा ना थे।

आये तो यूँ की जैसे हमेशा थे मेहरबान,
भूले तो यूँ की गोया कभी आशना ना थे।


२.

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है,
दुशनाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है।

दिल मुद्दई के हर्फ़-ए-मलामत से शाद है,
ए जान-ए-जां, ये हर्फ़ तेरा नाम ही तो है।

दिल ना-उम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है,
लम्बी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।

३.

गुलों मे रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले।

कफ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-खुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले।

कभी तो सुबह तेरे कुन्ज-ए-लब से हो आगाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले।

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल गरीब सही
तुम्हारे नाम पे आएंगे गमगुसार चले।

जो हम पे गुजरी सो गुजरी मगर शब-ए-हिजरां
हमारे अश्क तेरी आकबत संवार चले।

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ्तर-ए-जुनून की तलब
गिरह मे लेके गरेबां के तार-तार चले।

मकाम कोई फैज़ राह मे जचा ही नही
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले।

४.

आये कुछ अब्र कुछ शराब आये
उसके बाद आये जो अज़ाब आये।

उम्र के हर वर्क पे दिल को नज़र
तेरी मेहर-ओ-वफ़ा के बाब आये।

कर रहा था गम-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आये।

इस तरह अपनी खामोशी गूंजी
गोया हर सिम्त से जवाब आये।

५.

तुम न आये थे तो हर चीज़ वही थी के जो है
आसमाँ हद-ए-नज़र, राह-गुज़र राह-गुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय
और अब शीशा-ए-मय, राह-गुज़र, रंग-ए-फ़लक
रंग है दिल का मेरे "खून-ए-जिगर होने तक"
चम्पई रंग कभी, राहत-ए-दीदार का रंग
सुरमई रंग के है सा'अत-ए-बेज़ार का रंग
ज़र्द पत्तों का, खस-ओ-ख़ार का रंग
सुर्ख फूलों का, दहकते हुए गुलज़ार का रंग
ज़हर का रंग, लहू-रंग, शब-ए-तार का रंग


आसमाँ, राह-गुज़र, शीशा-ए-मय
कोई भीगा हुआ दामन, कोई दुखती हुई रग
कोई हर लहज़ा बदलता हुआ आइना है
अब जो आये हो तो ठहरो के कोई रंग, कोई रुत, कोई शय
एक जगह पर ठहरे

फिर से एक बार हर एक चीज़ वही हो जो है
आसमाँ हद-ए-नज़र, राह-गुज़र राह-गुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय

 
६.

कभी कभी याद में उभरते हैं नक्श-ऐ-माज़ी मिटे मिटे से
वो आज़माइश दिल-ओ-नज़र की, वो कुर्बतें सी, वो फासले से।

कभी कभी आरज़ू के सेहरा में आ के रुकते हैं क़ाफिले से
वो सारी बातें लगाओ की सी, वो सारे उनवान विसाल के से।

निगाह-ओ-दिल को करार कैसा, निशात-ओ-ग़म में कमी कहाँ की?
वो जब मिले हैं तो उन से हर बार की है उल्फत नए सिरे से ।

तुम ही कहो रिंद-ओ-मुह्तसिब में है आज शब कौन फर्क ऐसा
ये आ के बैठे हैं मयकदे में, वो उठ के आए हैं मयकदे से ।

७.

आ के वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिस ने दिल को परी-खाना बना रखा था.
जिसकी उल्फत में भुला रखी थी दुनिया हम ने
दहर को दहर का अफ़साना बना रखा था.

आशनां हैं तेरे क़दमों से वो राहें जिन पर
उसकी मदहोश जवानी ने इनायत की है।
कारवाँ गुज़रे हैं जिन से उसी रानाई के
जिस की इन आंखों ने बे-सूद इबादत की है।

तुझ से खेली हैं वो महबूब हवाएं जिन में
उसके मलबूस की अफ्सुर्दा महक बाकी है.
तुझ पे भी बरसा है उस बाम से महताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाकी है.

तू ने देखी है वो पेशानी, वो रुखसार, वो होंट
ज़िंदगी जिनके तसव्वुर में लुटा दी हम ने.
तुझ पे उठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें
तुझ को मालूम है क्यों उम्र गंवा दी हम ने.

हम पे मुस्कराते हैं एहसान गम-ए-उल्फत के
इतने एहसान की गिनवाऊं तो गिनवा न सकूं.
हम ने इस इश्क में क्या खोया है, क्या सीखा है
जुज़ तेरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ.

आजिज़ी सीखी, गरीबों की हिमायत सीखी
यास-ओ-हिर्मान के, दुख-दर्द के मानी सीखे
ज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखा
सर्द आहों के, रुख-ए-ज़र्द के मानी सीखे

जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बे-कस जिनके
अश्क आंखों में बिलखते हुए सो जाते हैं
न-तावानों के निवालों पे झपटते हैं उकाब
बाज़ू तोले हुए, मंडराते हुए आते हैं

जब कभी बिकता है बाज़ार में मजदूर का गोश्त
शाहराहों पे गरीबों का लहू बहता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है, ना पूछ!
अपने दिल पर मुझे काबू ही नहीं रहता है !!

८.

लाज़िम है के हम भी देखेंगे
वो दिन की जिसका वादा है
जो लौहे-अज़ल पे लिखा है
जब जुल्मो-सितम के कोहे-गरां
रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहले-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज़े-खुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहले-सफा मर्दूदे-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेग अल्लाह का
जो गायब भी है, हाज़िर भी
जो मंज़र भी है, नाज़िर भी
उठ्ठेगा अनलहक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज़ करेगी खल्क़े-खुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो

९.

आपकी याद आती रही रात भर,
चश्मे-नाम मुस्कुराती रही रात भर |
रात भर दर्द की शम्मा जलती रही,
गम की लौ थरथराती रही रात भर |
बांसुरी की सुरीली सुहानी सदा,
याद बन-बन के आती रही रात भर |
याद की चाँद दिल में उतरती रही,
चाँदनी जगमगाती रही रात भर |
कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा,
कोई आवाज़ आती रही रात भर |


१०.

आपकी याद आती रही रात-भरचाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर

गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात-भर

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात-भर

फिर सबा साय-ए-शाख़े-गुल के तले
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात-भर

जो न आया उसे कोई ज़ंजीरे-दर
हर सदा पर बुलाती रही रात-भर

एक उम्मीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात-भर

११.

कब याद मे तेरा साथ नहीं, कब हाथ में तेरा हाथ नहीं
साद शुक्र की अपनी रातो में अब हिज्र की कोई रात नहीं 

मुश्किल है अगर हालत वह, दिल बेच आए, जा दे आए
दिल वालो कुंचा-ए-जाना में, क्या ऐसे भी हालात नहीं 

जिस धज से कोई मकतल में गया, वो शान सलामत रहती है
ये जान तो आणि-जनि है, इस जान की तो कोई बात नहीं 

मैदाने-वफ़ा दरबार नहीं, या नामो-नसब की पूछ कहाँ
आशिक तो किसी का नाम नहीं, कुछ इश्क किसी की जात नहीं 

गर बाज़ी इश्क की बाज़ी है, ओ चाहो लगा दो दर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहने, हारे भी तो बाज़ी मात नहीं 

१२.

मैंने समझा था के तू है तो दरखशां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दह्र का झगडा क्या है

तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सेबात
तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

तू जो मिल जाए तो तक़दीर नुगूँ हो जाए
यूं न था, मैंने फ़क़त चाहा था यूं हो जाए

और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अनगिनत सदियों के तरीक बहीमाना तिलिस्म
रेशमो-अतलसो-कमख्वाब में बुनवाये हुए

जा-बजा बिकते हुए कूचाओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथडे हुए खून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीब बहती हुई गलते हुए नासूरों से

लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की रहत के सिवा
मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग 
१३.
चन्द रोज़ और मेरी जान फ़क़त चन्द ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हूँ मैं

और कुछ देर सितम सह लें, तड़प लें, रो लें
अपने अजदाद की मीरास है माज़ूर हैं हम

जिस्म पर क़ैद है, जज़्बात पे ज़ंजीरें हैं
फ़िक्र महबूस है गुफ्तार पे ताज़ीरें हैं

अपनी हिम्मत है के हम फिर भी जिए जाते हैं
ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिसमें

हर घड़ी दर्द के पेवंद लगे जाते हैं
लेकिन अब ज़ुल्म की मीआद के दिन थोड़े हैं

इक ज़रा सब्र, के फ़र्याद के दिन थोड़े हैं
अर्साए-दह्र की झुलसी हुई वीरानी में

हम को रहना है, पे यूं ही तो नहीं रहना है
अजनबी हाथों का बे नाम गरांबार सितम

आज सहना है, हमेशा तो नहीं सहना है
ये तेरे हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द

अपनी दो-रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार
चांदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द

दिल की बेसूद तड़प, जिस्म की मायूस पुकार
चन्द रोज़ और मेरी जान फ़क़त चन्द ही रोज़
१४.
फिर कोई आया, दिले-ज़ार, नहीं , कोई नहीं
राहरौ होगा, कहीं और चला जायेगा

ढल चुकी रात, बिखरने लगा तारों का गुबार
लड़खडाने लगे ऐवानों में ख्वाबीदा चराग़

सो गई रास्ता तक-तक के हरेक राह गुज़ार
अजनबी ख़ाक ने धुन्दला दिए कदमों के सुराग़

गुल करो शमएं, बढ़ा दो मयोमीना के अयाग़
अपने बे-ख्वाब किवाडों को मुक्फ्फल कर लो
१५.
बोल, के लब आज़ाद हैं तेरे
बोल, ज़बां अब तक तेरी है

तेरा सुत्वां जिस्म है तेरा
बोल, के जाँ अब तक तेरी है

देख, के आहन गर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले, सुर्ख है आहन

खुलने लगे कुफलों के दहाने
फैला हरेक ज़ंजीर का दामन

बोल, ये थोड़ा वक्त बहोत है
जिस्मो-ज़बां की मौत से पहले

बोल, के सच ज़िंदा है अब तक
बोल, जो कुछ कहना है कह ले
१६.
ये दाग़-दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सेहर
वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सेहर तो नहीं

ये वो सेहर तो नहीं जिसकी आरजू लेकर
चले थे यार के मिल जायगी कहीं-न-कहीं

फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल
कहीं तो होगा शबे-सुस्त-मौज का साहिल

कहीं तो जाके रुकेगा सफीनए गमे-दिल
जवां लहू की पुर-असरार शाहराहों से

चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े
दयारे-हुस्न की बेसब्र ख्वाबगाहों से

पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे
बहोत अज़ीज़ थी लेकिन रूखे-सेहर की लगन

बहोत क़रीं था हसीनाने-नूर का दामन
सुबुक-सुबुक थी तमन्ना, दबी-दबी थी थकन

सुना है हो भी चुका है फिराके-ज़ुल्मतो-नूर
सुना है, हो भी चुका है विसाले-मंजिलो-गाम

बदल चुका है बहोत अहले-दर्द का दस्तूर
निशाते-वस्ल हलालो-अज़ाबे-हिज्र-हराम

जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन
किसी पे चारए-हिजरां का कुछ असर ही नहीं

कहाँ से आई निगारे-सबा, किधर को गई
अभी चरागे-सरे-रह को कुछ ख़बर ही नहीं

अभी गरानिए शब में कमी नहीं आई
निजाते-दीदाओ-दिल की घडी नहीं आई

चले चलो के वो मंज़िल अभी नहीं आई