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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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रविवार, 21 अप्रैल 2013

दाग़ देहलवी

दाग़ देहलवी (वास्तविक नाम:नवाब मिर्ज़ा ख़ाँ, अंग्रेज़ी: Daagh Dehlvi, जन्म- 25 मई, 1831, दिल्ली; मृत्यु- 1905, हैदराबाद) को उर्दू जगत में एक शायर के रूप में बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त है। उनके जीवन का अधिकांश समय दिल्ली में व्यतीत हुआ था, यही कारण है कि उनकी शायरियों में दिल्ली की तहजीब नज़र आती है। दाग़ देहलवी की शायरी इश्क़ और मोहब्बत की सच्ची तस्वीर पेश करती है।
१.

आफ़त की शोखियाँ हैं तुम्हारी निगाह में
महशर के फ़ितने खेलते हैं जल्वागाह में

वो दुश्मनी से देखते हैं, देखते तो हैं
मैं शाद हूँ, कि हूँ तो किसी की नीगाह में

आती है बात बात मुझे याद, बार बार
कहता हूँ दौड़ दौड़ के कासिद से राह में

इस तौबा पर है नाज़ मुझे ज़ाहिद इस क़दर
जो टूट कर शरीक हूँ हाले-तबाह में

मुश्ताक़ इस अदा के बहोत दर्दमंद थे
ऐ ‘दाग़’ तुम तो बैठ गए एक आह में

२.

बुताने-महवशां उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं
कि जिसकी जान जाती है उसी के दिल में रहते हैं

हज़ारों हसरतें वो हैं कि रोके से नहीं रुकतीं
बहोत अरमान ऐसे हैं कि दिल के दिल में रहते हैं

खुदा रक्खे मुहब्बत के लिए आबाद दोनों घर
मैं उनके दिल में रहता हूँ, वो मेरे दिल में रहते हैं

ज़मीं पर पाँव नखवत से नहीं रखते परी-पैकर
ये गोया इस मकाँ की दूसरी मंज़िल में रहते हैं

कोई नामो-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना
तख़ल्लुस 'दाग़' है और आशिकों के दिल में रहते हैं.

३.

काबे की है हवस कभी कूए-बुताँ की है
मुझको ख़बर नहीं मेरी मिटटी कहाँ की है

कुछ ताज़गी हो लज़्ज़ते-आज़ार के लिए
हर दम मुझे तलाश नये आसमां की है

हसरत बरस रही है यूँ मेरे मज़ार से
कहते हैं सब ये क़ब्र किसी नौजवाँ की है

क़ासिद की गुफ्तुगू से तसल्ली हो किस तरह
छुपती नहीं वो बात, जो तेरी ज़बां की है

सुनकर मेरा फ़सानए-ग़म उसने ये कहा
हो जाए झूठ सच, यही खूबी ज़बां की है

क्योंकर न आए खुल्द से आदम ज़मीन पर
मौज़ूँ वहीं वो ख़ूब है जो शय जहाँ की है

उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं 'दाग़'
हिन्दोस्ताँ में धूम हमारी ज़बां की है

४.

खातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
झूठी क़सम से आपका ईमान तो गया

दिल लेके मुफ़्त, कहते हैं कुछ काम का नहीं
उलटी शिकायतें रहीं, एहसान तो गया

अफ़्शाए-राज़े-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं
लेकिन उसे जता तो दिया, जान तो गया

देखा है बुतकदे में जो ऐ शैख़ कुछ न कुछ
ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया

डरता हूँ देख कर दिले-बे-आरज़ू को मैं
सुनसान घर ये क्यों न हो मेहमान तो गया

गो नामाबर से खुश न हुआ पर हज़ार शुक्र
मुझको वो मेरे नाम से पहचान तो गया

होशो-हवासो-ताबो-तवाँ 'दाग़' जा चुके
अब हम भी जाने वाले हैं, सामन तो गया

५.

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा

अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा
सब ने जाना, जो पता एक ने जाना तेरा

तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परीशान रहा करती है
किसके उजड़े हुए दिल में है ठिकाना तेरा

ये समझ कर तुझे ऐ मौत लगा रक्खा है
काम आता है बुरे वक्त में आना तेरा

दाग़ को यूँ वो मिटाते हैं ये फरमाते हैं
तू बदल डाल, हुआ नाम पुराना तेरा

६.

अजब अपना हाल होता ,जो विसाल-ए-यार होता
कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता

न मज़ा है दुश्मनी में, न है लुत्फ़ दोस्ती में
कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता…

ये मज़ा था दिल्लगी का, कि बराबर आग लगती
न तुम्हें क़रार होता न हमें क़रार होता

तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
अगर अपनी जिन्दगी का हमें ऐतबार होता……


७.
अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का
याद आता है हमें हाय! ज़माना दिल का

तुम भी मुँह चूम लो बेसाख़ता प्यार आ जाए
मैं सुनाऊँ जो कभी दिल से फ़साना दिल का

पूरी मेंहदी भी लगानी नहीं आती अब तक
क्योंकर आया तुझे ग़ैरों से लगाना दिल का

इन हसीनों का लड़कपन ही रहे या अल्लाह
होश आता है तो आता है सताना दिल का

मेरी आग़ोश से क्या ही वो तड़प कर निकले
उनका जाना था इलाही के ये जाना दिल का

दे ख़ुदा और जगह सीना-ओ-पहलू के सिवा
के बुरे वक़्त में होजाए ठिकाना दिल का

उंगलियाँ तार-ए-गरीबाँ में उलझ जाती हैं
सख़्त दुश्वार है हाथों से दबाना दिल का

बेदिली का जो कहा हाल तो फ़रमाते हैं
कर लिया तूने कहीं और ठिकाना दिल का

छोड़ कर उसको तेरी बज़्म से क्योंकर जाऊँ
एक जनाज़े का उठाना है उठाना दिल का

निगहा-ए-यार ने की ख़ाना ख़राबी ऎसी
न ठिकाना है जिगर का न ठिकाना दिल का

बाद मुद्दत के ये ऎ दाग़ समझ में आया
वही दाना है कहा जिसने न माना दिल का


८.
हुस्न-ए-अदा भी खूबी-ए-सीरत में चाहिए,
यह बढ़ती दौलत, ऐसी ही दौलत में चाहिए।

आ जाए राह-ए-रास्त पर काफ़िर तेरा मिज़ाज,
इक बंदा-ए-ख़ुदा तेरी ख़िदमत में चाहिए ।

देखे कुछ उनके चाल-चलन और रंग-ढंग,
दिल देना इन हसीनों को मुत में चाहिए ।

यह इश्क़ का है कोई दारूल-अमां नहीं,
हर रोज़ वारदात मुहब्बत में चाहिए ।

माशूक़ के कहे का बुरा मानते हो ‘दाग़‘,
बर्दाश्त आदमी की तबीअत में चाहिए ।

शब्दार्थ :
हुस्न-ए-अदा: बात करने का सलीक़ा,
सीरत: चरित्र,
राह-ए-रास्त: सीधा रास्ता,
दारूल-अमां: शांति स्थल ।


९.

हसरतें ले गए इस बज़्म से चलने वाले
 हाथ मलते ही उठे इत्र के मलने वाले

वो गए गोर-ए-गरीबाँ*पे तो आई ये सदा— आशिक़ की क़ब्र
 थम ज़रा ओ रविश-ए-नाज़ से चलने वाले

देखिए क्या हवा लाए मेरे नामे का जवाब
 पास उनके हैं बहुत ज़हर उगलने वाले

इन जफ़ाओं पे वफ़ा करिए न करिए लेकिन
 दिल बदलता नहीं ओ आँख बदलने वाले

शर्म आलूदा*निगाहें तो करेंगी बिस्मिल——शर्म से भरी
 अब कोई आन में ये तीर हैं चलने वाले

दिल ने हसरत से कहा तीर जो उसका निकला
 देख इस तरहा निकलते हैं निकलने वाले

दिल-ए-बेताब वो आते हैं ख़बर आई है
 सब्र कर सब्र ज़रा मेरे मचलने वाले

इमतेहान तेग़-ए-जफ़ा*का जो उन्हें हो मंज़ूर—–अत्याचार की
 बच- चा कर अभी टल जाते हैं टलने वाले

गरमि-ए-सोहबत-ए-अग़यार*के शिकवे पे कहा—- दुश्मन के अधिक पास रहने पर
 आप ऎ दाग़ हमेशा के हैं जलने वाले

१०.
हर बार मांगती है नया चश्म-ए-यार दिल
इक दिल के किस तरह से बनाऊं हज़ार दिल

पूछा जो उस ने तालिब-ए-रोज़-जज़ा है कौन
निकला मेरी ज़बान से बे-इख्तियार दिल

करते हो अहद-ए-वस्ल तो इतना रहे ख़याल
पैमान से ज्यदा है नापायदार दिल

उस ने कहा है सब्र पड़ेगा रक़ीब का
ले और बेकरार हुआ ऐ बेकरार दिल


११.
हम तुझसे किस हवस की फलक जुस्तुजू करें
दिल ही नहीं रहा है जो कुछ आरजू करें

तर-दामनी* पे शेख हमारी ना जाईयो
दामन निचोड़ दें तो फ़रिश्ते वजू* करें

सर ता क़दम ज़ुबां हैं जूं शम’अ गो की हम
पर यह कहाँ मजाल जो कुछ गुफ्तगू करें

है अपनी यह सलाह की सब ज़ाहिदान-ए-शहर
ए दर्द आ की बै’अत-ए-दस्त-ओ-सुबू करें

मिट जाएँ एक आन् में कसरत नुमाईयां
हम आईने के सामने आके जब हू करें


१२.
सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-लुत्फ़ कभी न करना
तुम्हें क़सम है हमारे सर की हमारे हक़ में कमी न करना

कहाँ का आना कहाँ का जाना वो जानते ही नहीं ये रस्में
वहां है वादे की भी ये सूरत कभी तो करना कभी न करना

हमारी मय्यत पे तुम जो आना तो चार आँसू बहा के जाना
ज़रा रहे पास-ए-आबरू भी कहीं हमारी हँसी न करना

वो इक हमारा तरीक़-ए-उल्फ़त कि दुश्मनों से भी मिल के चलना
ये एक शेवा तेरा सितमगर कि दोस्त से दोस्ती न करना


१३.
शौक़ है उसको ख़ुदनुमाई का
अब ख़ुदा हाफ़िज़, इस ख़ुदाई का

वस्ल पैग़ाम है जुदाई का
मौत अंजाम आशनाई का

दे दिया रंज इक ख़ुदाई का
सत्यानाश हो जुदाई का

किसी बन्दे को दर्दे-इश्क़ न दे
वास्ता अपनी क़िब्रियाई का

सुलह के बाद वो मज़ा न रहा
रोज़ सामान था लड़ाई का

अपने होते अदू पे आने दें
क्यों इल्ज़ाम बेवफ़ाई का

अश्क़ आँखों में दाग़ है दिल में
ये नतीजा है आशनाई का

हँसी आती है अपने रोने पे
और रोना है जग हँसाई का

उड़ गये होश दाम में फँस कर
क़ैद क्या नाम है रिहाई का


१४.
ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा

अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा
सब ने जाना जो पता एक ने जाना तेरा

तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परेशान रहा करती है
किस के उजड़े हुए दिल में है ठिकाना तेरा

आरज़ू ही न रही सुबहे-वतन[1] की मुझको
शामे-गुरबत[2] है अजब वक़्त सुहाना तेरा

ये समझकर तुझे ऐ मौत लगा रक्खा है
काम आता है बुरे वक़्त में आना तेरा

ऐ दिले शेफ़्ता में आग लगाने वाले
रंग लाया है ये लाखे का जमाना तेरा

तू ख़ुदा तो नहीं ऐ नासहे नादाँ मेरा
क्या ख़ता की जो कहा मैंने न माना तेरा

रंज क्या वस्ले अदू का जो तअल्लुक़ ही नहीं
मुझको वल्लाह हँसाता है रुलाना तेरा

क़ाबा-ओ-दैर[3] में या चश्मो-दिले-आशिक़[4] में
इन्हीं दो-चार घरों में है ठिकाना तेरा

तर्के आदत से मुझे नींद नहीं आने की
कहीं नीचा न हो ऐ गौर[5] सिरहाना तेरा

मैं जो कहता हूँ उठाए हैं बहुत रंजेफ़िराक़
वो ये कहते हैं बड़ा दिल है तवाना तेरा

बज़्मे दुश्मन से तुझे कौन उठा सकता है
इक क़यामत का उठाना है उठाना तेरा

अपनी आँखों में अभी कून्द गई बिजली- सी
हम न समझे के ये आना है या जाना तेरा

यूँ वो क्या आएगा फ़र्ते नज़ाकत से यहाँ
सख्त दुश्वार है धोके में भी आना तेरा

दाग़ को यूँ वो मिटाते हैं, ये फ़रमाते हैं
तू बदल डाल, हुआ नाम पुराना तेरा

शब्दार्थ:
  1. ↑ स्वदेश की सुबह
  2. ↑ परदेस की शाम
  3. ↑ मंदिर-मस्जिद
  4. ↑ आशिक़ केदिल की आँख
  5. ↑ क़ब्र
१६.
लुत्फ़ इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है
रंज भी इतने उठाए हैं कि जी जानता है

जो ज़माने के सितम हैं वो ज़माना जाने
तूने दिल इतने दुखाए हैं कि जी जानता है

तुम नहीं जानते अब तक ये तुम्हारे अंदाज़
वो मेरे दिल में समाए हैं कि जी जानता है

इन्हीं क़दमों ने तुम्हारे इन्हीं क़दमों की क़सम
ख़ाक में इतने मिलाए हैं कि जी जानता है

दोस्ती में तेरी दरपर्दा हमारे दुश्मन
इस क़दर अपने पराए हैं कि जी जानता है


१७.
रू-ए- अनवर[1] नहीं देखा जाता
देखें क्योंकर नहीं देखा जाता

रश्के-दुश्मन[2] भी गवारा[3] लेकिन
तुझको मुज़्तर[4] नहीं देखा जाता

दिल में क्या ख़ाक उसे देख सके
जिसको बाहर नहीं देखा जाता

तौबा के बाद भी ख़ाली-ख़ाली
कोई साग़र[5] नहीं देखा जाता

क्या शबे-वादा हुआ हूँ बेख़ुद[6]
जानिबे-दर[7] नही देखा जाता

मुख़्तसर[8] ये है अब कि ‘दाग़’ का हाल
बन्दापरवर नहीं देखा जाता

शब्दार्थ:
  1. ↑ दमकता हुआ चेहरा
  2. ↑ शत्रु की ईर्ष्या
  3. ↑ स्वीकार
  4. ↑ परेशान
  5. ↑ जाम
  6. ↑ बेसुध
  7. ↑ दरवाज़े की ओर
  8. ↑ संक्षेप में
१८.
रस्म-ए-उल्फ़त सिखा गया कोई
दिल की दुनिया पे छा गया कोई

ता कयामत किसी तरह न बुझे
आग ऐसी लगा गया कोई

दिल की दुनिया उजाड़ सी क्यूं है
क्या यहां से चला गया कोई

वक्त-ए-रुखसत गले लगा कर ‘दाग़’
हंसते हंसते रुला गया कोई


१९.
रंज की जब गुफ्तगू होने लगी
आप से तुम तुम से तू होने लगी

चाहिए पैग़ामबर दोने तरफ़
लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू होने लगी

मेरी रुस्वाई की नौबत आ गई
उनकी शोहरत की क़ू-ब-कू़ होने लगी

नाजि़र बढ़ गई है इस क़दर
आरजू की आरजू होने लगी

अब तो मिल कर देखिए क्या रंग हो
फिर हमारी जुस्तजू होने लगी

‘दाग़’ इतराए हुए फिरते हैं आप
शायद उनकी आबरू होने लगी


२०.
ये जो है हुक़्म मेरे पास न आए कोई
इसलिए रूठ रहे हैं कि मनाए कोई

ये न पूछो कि ग़मे-हिज्र में कैसी गुज़री
दिल दिखाने का हो तो दिखाए कोई

हो चुका ऐश का जलसा तो मुझे ख़त पहुँचा
आपकी तरह से मेहमान बुलाए कोई

तर्के-बेदाद की तुम दाद न पाओ मुझसे
करके एहसान ,न एहसान जताए कोई

क्यों वो मय-दाख़िले-दावत ही नहीं ऐ वाइज़
मेहरबानी से बुलाकर जो पिलाए कोई

सर्द -मेहरी से ज़माने के हुआ है दिल सर्द
रखकर इस चीज़ को क्या आग लगाए कोई

आपने दाग़ को मुँह भी न लगाया, अफ़सोस
उसको रखता था कलेजे से लगाए कोई


२१.
मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया
वो मेरा भूलने वाला जो मुझे याद आया

दी मुअज्जिन ने शब-ए-वस्ल अज़ान पिछली रात
हाए कम-बख्त के किस वक्त ख़ुदा याद आया

लीजिए सुनिए अब अफ़साना-ए- फुर्कत मुझ से
आप ने याद दिलाया तो मुझे याद आया

आप की महिफ़ल में सभी कुछ है मगर ‘दाग़’ नहीं
मुझ को वो ख़ाना-ख़राब आज बहोत याद आया


२२.
मुहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता
मेरा मरना भी तो मेरी ख़ुशी से हो नही सकता

न रोना है तरीक़े का न हंसना है सलीके़ का
परेशानी में कोई काम जी से हो नहीं सकता

ख़ुदा जब दोस्त है ऐ ‘दाग़’ क्या दुश्मन से अन्देशा
हमारा कुछ किसी की दुश्मनी से हो नहीं सकता


२३.
बुतान-ए-माहवश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं
के जिस की जान जाती है उसी के दिल में रहते हैं

हज़ारों हसरतें वो हैं कि रोके से नहीं रुकतीं
बहोत अर्मान ऐसे हैं कि दिल के दिल में रहते हैं

ख़ुदा रक्खे मुहब्बत के लिये आबाद दोनों घर्
मैं उन के दिल में रहता हूँ वो मेरे दिल में रहते हैं

ज़मीं पर पाँव नख्वत से नहीं रखते परी-पैकर
ये गोया इस मकाँ की दूसरी मंज़िल में रहते हैं

कोई नाम-ओ-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना
तख़ल्लुस “दाग़” है और आशिक़ों के दिल में रहते हैं


२४.
फिरे राह से वो यहाँ आते आते
अजल मेरी रही तू कहाँ आते आते

मुझे याद करने से ये मुद्दा था
निकल जाए दम हिचकियां आते आते

कलेजा मेरे मुंह को आएगा इक दिन

यूं ही लब पे आह-ओ-फ़ुगां आते आते

नतीजा न निकला थके सब पयामी

वहाँ जाते जाते यहाँ आते आते

नहीं खेल ऐ ‘दाग़’ यारों से कह दो
कि आती है उर्दू ज़ुबां आते आते

२५.

पुकारती है ख़ामोशी मेरी फ़ुगां की तरह
निगाहें कहती हैं सब राज़-ए-दिल ज़ुबां की तरह

जला के दाग़-ए-मुहब्बत ने दिल को ख़ाक किया
बहार आई मेरे बाग में ख़िज़ां की तरह

तलाश-ए-यार में छोड़ी न सर-ज़मीं कोई
हमारे पांव में चक्कर हैं आसमां की तरह

अदा-ए-मत्लब-ए-दिल हमसे सीख जाए कोई
उन्हें सुना ही दिया हाल दास्तां की तरह


२६.
पर्दे पर्दे में अताब[1] अच्छे नहीं
ऐसे अन्दाज़-ए-हिजाब[2] अच्छे नहीं

मयकदे में हो गए चुपचाप क्यों
आज कुछ मस्त-ए-शराब अच्छे नहीं

ऐ फ़लक! क्या है ज़माने की बिसात
दम-ब-दम के इन्क़लाब अच्छे नहीं

तू भी उसकी ज़ुल्फे-पेचाँ [3] हो गया
ऐ दिल, ऐसे पेचो-ताब [4] अच्छे नहीं

बज्म-ए-वाइज़[5] से कोई कहता गया
ऐसे जलसे बे-शराब अच्छे नहीं

तौबा कर लें हम मय-ओ-माशूक़ से
बे-मज़ा हैं ये सवाब[6] अच्छे नहीं

इक नजूमी[7] ’दाग़’ से कहता था आज
आप के दिन ऐ जनाब अच्छे नहीं

शब्दार्थ:
  1. ↑ अत्याचार्
  2. ↑ शरमाने के ढंग
  3. ↑ उलझे हुए बाल
  4. ↑ चक्कर
  5. ↑ उपदेशकों की सभा
  6. ↑ पुण्य-कार्य
  7. ↑ ज्योतिषी
२७.
न रवा कहिये न सज़ा कहिये
कहिये कहिये मुझे बुरा कहिये

दिल में रखने की बात है ग़म-ए-इश्क़
इस को हर्गिज़ न बर्मला कहिये

वो मुझे क़त्ल कर के कहते हैं
मानता ही न था ये क्या कहिये

आ गई आप को मसिहाई
मरने वालो को मर्हबा कहिये

होश उड़ने लगे रक़ीबों के
“दाग” को और बेवफ़ा कहिये


२८.
न बदले आदमी जन्नत से भी बैतुल-हज़न[1] अपना
कि अपना घर है अपना और है अपना वतन अपना

जो यूँ हो वस्ल तो मिट जाए सब रंजो-महन[2] अपना
ज़बाँ अपनी दहन[3]उनका ज़बाँ उनकी दहन अपना

न सीधी चाल चलते हैं न सीधी बात करते हैं
दिखाते हैं वो कमज़ोरों को तन कर बाँकपन अपना

अजब तासीर पैदा की है वस्फ़े-नोके-मिज़गाँ[4] ने
कि जो सुनता है उसके दिल में चुभता है सुख़न अपना

पयामे-वस्ल[5],क़ासिद[6] की ज़बानी और फिर उनसे
ये नादानी वो नाफ़हमी[7] ये था दीवानापन अपना

बचा रखना जुनूँ के हाथ से ऐ बेकसो, उसको
जो है अब पैरहन[8] अपना वही होगा क़फ़न अपना

निगाहे-ग़म्ज़ा[9] कोई छोड़ते हैं गुलशने दिल को
कहीं इन लूटने वालों से बचता है चमन अपना

यह मौका मिल गया अच्छा उसे तेशा[10] लगाने का
मुहब्बत में कहीं सर फोड़ता फिर कोहकन अपना

जो तख़्ते-लाला-ओ-गुल के खिले वो देख लेते हैं
तो फ़रमाते हैं वो कि ‘दाग़’ का ये है ये चमन अपना

शब्दार्थ:
  1. ↑ रहने की जगह
  2. ↑ पीड़ा
  3. ↑ मुँह
  4. ↑ विशिष्ट पलकों
  5. ↑ प्रणय-सन्देश
  6. ↑ सन्देशवाहक
  7. ↑ नासमझी
  8. ↑ वस्त्र
  9. ↑ दृष्टिपात
  10. ↑ कुल्हाड़ी
३०.
न जाओ हाल-ए-दिल-ए-ज़ार[1] देखते जाओ
कि जी न चाहे तो नाचार देखते जाओ

बहार-ए-उमर् में बाग़-ए-जहाँ की सैर करो
खिला हुआ है ये गुलज़ार देखते जाओ

उठाओ आँख, न शरमाओ ,ये तो महिफ़ल है
ग़ज़ब से जानिब-ए-अग़यार[2] देखते जाओ

हुआ है क्या अभी हंगामा अभी कुछ होगा
फ़ुगां में हश्र के आसार देखते जाओ

तुम्हारी आँख मेरे दिल से बेसबब-बेवजह
हुई है लड़ने को तय्यार देखते जाओ

न जाओ बंद किए आँख रहरवान-ए-अदम[3]
इधर-उधर भी ख़बरदार देखते जाओ

कोई न कोई हर इक शेर में है बात ज़रूर
जनाबे-दाग़ के अशआर देखते जाओ

शब्दार्थ:
  1. ↑ द्रवित हृदय
  2. ↑ दुश्मनों की ओर
  3. ↑ परलोक सिधारने वाले
३१.
अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का
याद आता है हमें हाय! ज़माना दिल का

तुम भी मुँह चूम लो बेसाख़ता प्यार आ जाए
मैं सुनाऊँ जो कभी दिल से फ़साना दिल का

पूरी मेंहदी भी लगानी नहीं आती अब तक
क्योंकर आया तुझे ग़ैरों से लगाना दिल का

इन हसीनों का लड़कपन ही रहे या अल्लाह
होश आता है तो आता है सताना दिल का

मेरी आग़ोश से क्या ही वो तड़प कर निकले
उनका जाना था इलाही के ये जाना दिल का

दे ख़ुदा और जगह सीना-ओ-पहलू के सिवा
के बुरे वक़्त में होजाए ठिकाना दिल का

उंगलियाँ तार-ए-गरीबाँ में उलझ जाती हैं
सख़्त दुश्वार है हाथों से दबाना दिल का

बेदिली का जो कहा हाल तो फ़रमाते हैं
कर लिया तूने कहीं और ठिकाना दिल का

छोड़ कर उसको तेरी बज़्म से क्योंकर जाऊँ
एक जनाज़े का उठाना है उठाना दिल का

निगहा-ए-यार ने की ख़ाना ख़राबी ऎसी
न ठिकाना है जिगर का न ठिकाना दिल का

बाद मुद्दत के ये ऎ दाग़ समझ में आया
वही दाना है कहा जिसने न माना दिल का


३२.
अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता

न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती में
कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता

ये मज़ा था दिल्लगी का कि बराबर आग लगती
न तुम्हें क़रार होता न हमें क़रार होता

तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
अगर अपनी जिन्दगी का हमें ऐतबार होता


३३.
दिल गया तुम ने लिया हम क्या करें
जानेवाली चीज़ का ग़म क्या करें

पूरे होंगे अपने अरमां किस तरह
शौक़ बेहद वक्त है कम क्या करें

बक्श दें प्यार की गुस्ताख़ियां
दिल ही क़ाबू में नहीं हम क्या करें

तुंद ख़ू है कब सुने वो दिल की बात
ओर भी बरहम को बरहम क्या करें

एक सागर पर है अपनी जिन्दगी
रफ्ता- रफ्ता इस से भी कम क्या करें

कर चुको सब अपनी-अपनी हिकमतें
दम निकलता है ऐ मेरे हमदम क्या करें

दिल ने सीखा शेवा-ए-बेगानगी
ऐसे नामुहिरम को मुहिरम क्या करें

मामला है आज हुस्न-ओ-इश्क़ का
देखिए वो क्या करें हम क्या करें

कह रहे हैं अहल-ए-सिफ़ारिश मुझसे ‘दाग़’
तेरी किस्मत है बुरी हम क्या करें


३४.
दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने
क्यों है ऐसा उदास क्या जाने

कह दिया मैं ने हाल-ए-दिल अपना
इस को तुम जानो या ख़ुदा जाने

जानते जानते ही जानेगा
मुझ में क्या है वो अभी क्या जाने

तुम न पाओगे सादा दिल मुझसा
जो तग़ाफ़ुल को भी हया जाने


३५.
दर्द बन के दिल में आना , कोई तुम से सीख जाए
जान-ए-आशिक़ हो के जाना , कोई तुम से सीख जाए

हमसुख़न पर रूठ जाना , कोई तुम से सीख जाए
रूठ कर फिर मुस्कुराना, कोई तुम से सीख जाए

वस्ल की शब[1] चश्म-ए-ख़्वाब-आलूदा[2] के मलते उठे
सोते फ़ित्ने[3] को जगाना,कोई तुम से सीख जाए

कोई सीखे ख़ाकसारी की रविश[4] तो हम सिखाएँ
ख़ाक में दिल को मिलाना,कोई तुम से सीख जाए

आते-जाते यूँ तो देखे हैं हज़ारों ख़ुश-ख़राम[5]
दिल में आकर दिल से जाना,कोई तुम से सीख जाए

इक निगाह-ए-लुत्फ़ पर लाखों दुआएँ मिल गयीं
उम्र को अपनी बढ़ाना,कोई तुम से सीख जाए

जान से मारा उसे, तन्हा जहाँ पाया जिसे
बेकसी में काम आना ,कोई तुम से सीख जाए

क्या सिखाएगा ज़माने को फ़लत तर्ज़-ए-ज़फ़ा
अब तुम्हारा है ज़माना,कोई तुम से सीख जाए

महव-ए-बेख़ुद[6] हो, नहीं कुछ दुनियादारी की ख़बर
दाग़ ऐसा दिल लगाना,कोई तुम से सीख जाए
शब्दार्थ:
  1. ↑ मिलन की रात
  2. ↑ नींद से बोझिल आँखें
  3. ↑ उपद्रव
  4. ↑ तरीका
  5. ↑ मस्त चाल
  6. ↑ ध्यान मग्न
३६.
तेरी महफ़िल में यह कसरत कभी थी
हमारे रंग की सोहबत कभी थी

इस आज़ादी में वहशत कभी थी
मुझे अपने से भी नफ़रत कभी थी

हमारा दिल, हमारा दिल कभी था
तेरी सूरत, तेरी सूरत कभी थी

हुआ इन्सान की आँखों से साबित
अयाँ कब नूर में जुल्मत कभी थी

दिल-ए-वीराँ में बाक़ी हैं ये आसार
यहाँ ग़म था, यहाँ हसरत कभी थी

तुम इतराए कि बस मरने लगा ‘दाग़’
बनावट थी जो वह हालत कभी थी.


३७.
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब[1]तो आख़िर वो नाम किस का था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था

वफ़ा करेंगे ,निबाहेंगे, बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम[2] कौन हुआ है मुक़ाम किस का था

न पूछ-ताछ थी किसी की वहाँ न आवभगत
तुम्हारी बज़्म में कल एहतमाम[3] किस का था

हमारे ख़त के तो पुर्जे किए पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बा-दिल वो पयाम किस का था

इन्हीं सिफ़ात[4] से होता है आदमी मशहूर
जो लुत्फ़ आप ही करते तो नाम किस का था

तमाम बज़्म जिसे सुन के रह गई मुश्ताक़[5]
कहो, वो तज़्किरा-ए-नातमाम [6]किसका था

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें
ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था

अगर्चे देखने वाले तेरे हज़ारों थे
तबाह हाल बहुत ज़ेरे-बाम[7] किसका था

हर इक से कहते हैं क्या ‘दाग़’ बेवफ़ा निकला
ये पूछे इन से कोई वो ग़ुलाम किस का था

शब्दार्थ:
  1. ↑ दुश्मन
  2. ↑ निवासी
  3. ↑ प्रबन्ध
  4. ↑ गुणों
  5. ↑ उत्सुक
  6. ↑ अधूरा ज़िक्र
  7. ↑ साये के नीचे

३८.
डरते हैं चश्म-ओ-ज़ुल्फ़, निगाह-ओ-अदा से हम
हर दम पनाह माँगते हैं हर बला से हम

माशूक़ जाए हूर मिले, मय बजाए आब
महशर में दो सवाल करेंगे ख़ुदा से हम

गो हाल-ए-दिल छुपाते हैं पर इस को क्या करें
आते हैं ख़ुद ख़ुद नज़र इक मुबतला से हम

देखें तो पहले कौन मिटे उसकी राह में
बैठे हैं शर्त बाँध के हर नक्श-ए-पा से हम


३९.
ज़बाँ हिलाओ तो हो जाए,फ़ैसला दिल का
अब आ चुका है लबों पर मुआमला दिल का

किसी से क्या हो तपिश में मुक़ाबला दिल का
जिगर को आँख दिखाता है आबला दिल का

कुसूर तेरी निगाह का है क्या खता उसकी
लगावटों ने बढ़ाया है हौसला दिल का

शबाब आते ही ऐ काश मौत भी आती
उभरता है इसी सिन में वलवला दिल का

निगाहे-मस्त को तुम होशियार कर देना
ये कोई खेल नहीं है मुक़ाबिला दिल का

हमारी आँख में भी अश्क़े-गर्म ऐसे हैं
कि जिनके आगे भरे पानी आबला दिल का

अगरचे जान पे बन-बन गई मुहब्बत में
किसी के मुँह पे न रक्खा मुआमला दिल का

करूँ तो दावरे-महशर के सामने फ़रियाद
तुझी को सौंप न दे वो मुआमला दिल का

कुछ और भी तुझे ऐ `दाग़’ बात आती है
वही बुतों की शिकायत वही गिला दिल का


४०.
क्या कहिये किस तरह से जवानी गुज़र गई
बदनाम करने आई थी बदनाम कर गई ।

क्या क्या रही सहर को शब-ए-वस्ल की तलाश
कहता रहा अभी तो यहीं थी किधर गई ।

रहती है कब बहार-ए-जवानी तमाम उम्र
मानिन्दे-बू-ए-गुल इधर आयी उधर गई ।

नैरंग-ए-रोज़गार से बदला न रंग-ए-इश्क़
अपनी हमेशा एक तरह पर गुज़र गई ।


४१.
ग़म से कहीं नजात मिले चैन पाए हम
दिल ख़ूँ में नहाए तो गंगा नहाए हम

जन्नत में जाए हम कि जहन्नुम में जाए हम
मिल जाए तू कहीं न कहीं तुझ को पाए हम

मुमकिन है ये कि वादे पे अपने वो आ भी जाए
मुश्किल ये है कि आप में उस वक्त आए हम

नाराज़ हो ख़ुदा तो करें बन्दगी से ख़ुश
माशूक़ रूठ जाए तो क्यों कर मनाए हम

सर दोस्तों के काट कर रक्खे हैं सामने
ग़ैरों से पूछते हैं कसम किस की खाए हम

सौंपा तुम्हें ख़ुदा को चले हम तो नामुराद
कुछ पढ़ के बख्शना जो कभी याद आए हम

ये जान तुम न लोगे अगर, आप जाएगी
इस बेवफ़ा की ख़ैर कहां तक मनाए हम

हम-साए जागते रहे नालों से रात भर
सोए हुए नसीब को क्यों कर जगाए हम

तू भूलने की चीज़ नहीं ख़ूब याद रख
ऐ ‘दाग़’ किस तरह तुझे दिल से भुलाए हम


४२.
ग़ज़ब किया, तेरे वादे पे ऐतबार किया
तमाम रात क़यामत का इन्तज़ार किया

हंसा हंसा के शब-ए-वस्ल अश्क-बार किया
तसल्लिया मुझे दे-दे के बेकरार किया

हम ऐसे मह्व-ए-नज़ारा न थे जो होश आता
मगर तुम्हारे तग़ाफ़ुल ने होशियार किया

फ़साना-ए-शब-ए-ग़म उन को एक कहानी थी
कुछ ऐतबार किया और कुछ ना-ऐतबार किया

ये किसने जल्वा हमारे सर-ए-मज़ार किया
कि दिल से शोर उठा, हाए! बेक़रार किया

तड़प फिर ऐ दिल-ए-नादां, कि ग़ैर कहते हैं
आख़िर कुछ न बनी, सब्र इख्तियार किया

भुला भुला के जताया है उनको राज़-ए-निहां
छिपा छिपा के मोहब्बत के आशकार किया

तुम्हें तो वादा-ए-दीदार हम से करना था
ये क्या किया कि जहाँ के उम्मीदवार किया

ये दिल को ताब कहाँ है कि हो मालन्देश
उन्हों ने वादा किया हम ने ऐतबार किया

न पूछ दिल की हक़ीकत मगर ये कहते हैं
वो बेक़रार रहे जिसने बेक़रार किया

कुछ आगे दावर-ए-महशर से है उम्मीद मुझे
कुछ आप ने मेरे कहने का ऐतबार किया


४३.
क्यों चुराते हो देखकर आँखें
कर चुकीं मेरे दिल में घर आँखें

ज़ौफ़ से कुछ नज़र नहीं आता
कर रही हैं डगर-डगर आँखें

चश्मे-नरगिस को देख लें फिर हम
तुम दिखा दो जो इक नज़र आँखें

कोई आसान है तेरा दीदार
पहले बनवाए तो बशर आँखें

न गई ताक-झाँक की आदत
लिए फिरती हैं दर-ब-दर आँखें

ख़ाक पर क्यों हो नक्शे-पा तेरा
हम बिछाएँ ज़मीन पर आँखें

नोहागर कौन है मुक़द्दर पर
रोने वालों में हैं मगर आँखें

दाग़ आँखें निकालते हैं वो
उनको दे दो निकाल कर आँखें


४४.
क्या लुत्फ़-ए-सितम यूँ उन्हें हासिल नहीं होता
ग़ुँचे को वो मलते हैं अगर दिल नहीं होता

कुछ ताज़ा मज़ा शौक़ का हासिल नहीं होता
हर रोज़ नई आँख, नया दिल नहीं होता

जिस आइने को देख लिया, क़हर से उसने
उस आइने से कोई मुक़ाबिल नहीम होता

ग़म्ज़ा भी हो शफ़्फ़ाक़, निगाहें भी हों ख़ूँरेज़
तलवार के बाँधे से तो क़ातिल नहीं होता

इन्कार तो करते हो मगर यह भी समझ लो
बेवजह किसी से कोई साइल नहीं होता

मंज़िल पे जो पहुँचे तो मोले क़ैस को लैला
नाके से जुदा क्या कभी महमिल नहीं होता

मरने ही पे जब आए तो क्या डूब के मरिये
क्या ख़ाक में मिल जाने को साहिल नहीं होता

यह दाद मिली उनसे मुझे काविश-ए-दिल की
जिस काम की आदत हो मुश्किल नहीं होता

ऐ ‘दाग़’ किस आफ़त में हूँ, कुछ बन नहीं आती
वो छीनते हैं मुझसे जुदा दिल नहीं होता


४५.
कहाँ थे रात को हमसे ज़रा निगाह मिले
तलाश में हो कि झूठा कोई गवाह मिले

तेरा गुरूर समाया है इस क़दर दिल में
निगाह भी न मिलाऊं तो बादशाह मिले

मसल-सल ये है कि मिलने से कौन मिलता है
मिलो तो आँख मिले, मिले तो निगाह मिले


४६.
उनके एक जां-निसार हम भी हैं
हैं जहाँ सौ-हज़ार हम भी हैं

तुम भी बेचैन हम भी हैं बेचैन
तुम भी हो बेक़रार हम भी हैं

ऐ फ़लक कह तो क्या इरादा है
ऐश के ख्वास्तगार हम भी है

शहर खाली किए दुकां कैसी
एक ही वादा-ख्वार हम भी हैं

शर्म समझे तेरे तग़ाफ़ुल को
वाह! क्या होशियार हम भी हैं

तुम अगर अपनी ख़ू के हो माशूक़
अपने मतलब के यार हम भी हैं

जिस ने चाहा फंसा लिया हमको
दिल-बरों के शिकार हम भी हैं

कौन सा दिल है जिस में ‘दाग़’ नहीं
इश्क़ की यादगार हम भी हैं

४७.
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
बाइस-ए-तर्क-ए मुलाक़ात बताते भी नहीं

मुंतज़िर हैं दमे रुख़सत के ये मर जाए तो जाएँ
फिर ये एहसान के हम छोड़ के जाते भी नहीं

सर उठाओ तो सही, आँख मिलाओ तो सही
नश्शाए मैं भी नहीं, नींद के माते भी नहीं

क्या कहा फिर तो कहो; हम नहीं सुनते तेरी
नहीं सुनते तो हम ऐसों को सुनाते भी नहीं

ख़ूब परदा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

मुझसे लाग़िर तेरी आँखों में खटकते तो रहे
तुझसे नाज़ुक मेरी आँखों में समाते भी नहीं

देखते ही मुझे महफ़िल में ये इरशाद हुआ
कौन बैठा है इसे लोग उठाते भी नहीं

हो चुका तर्के तअल्लुक़ तो जफ़ाएँ क्यूँ हों
जिनको मतलब नहीं रहता वो सताते भी नहीं

ज़ीस्त से तंग हो ऐ दाग़ तो जीते क्यूँ हो
जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं


४८.
इस अदा से वो वफ़ा करते हैं
कोई जाने कि वफ़ा करते हैं

हमको छोड़ोगे तो पछताओगे
हँसने वालों से हँसा करते हैं

ये बताता नहीं कोई मुझको
दिल जो आ जाए तो क्या करते हैं

हुस्न का हक़ नहीं रहता बाक़ी
हर अदा में वो अदा करते हैं

किस क़दर हैं तेरी आँखे बेबाक
इन से फ़ित्ने भी हया करते हैं

इस लिए दिल को लगा रक्खा है
इस में दिल को लगा रक्खा है

‘दाग़’ तू देख तो क्या होता है
जब्र पर जब्र किया करते हैं


४९.
आरजू है वफ़ा करे कोई
जी न चाहे तो क्या करे कोई

गर मर्ज़ हो दवा करे कोई
मरने वाले का क्या करे कोई

कोसते हैं जले हुए क्या क्या
अपने हक़ में दुआ करे कोई

उन से सब अपनी अपनी कहते हैं
मेरा मतलब अदा करे कोई

तुम सरापा हो सूरत-ए-तस्वीर
तुम से फिर बात क्या करे कोई

जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई


५०.
अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता

न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती में
कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता

ये मज़ा था दिल्लगी का कि बराबर आग लगती
न तुम्हें क़रार होता न हमें क़रार होता

तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
अगर अपनी जिन्दगी का हमें ऐतबार होता


५१.
अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का
याद आता है हमें हाय! ज़माना दिल का

तुम भी मुँह चूम लो बेसाख़ता प्यार आ जाए
मैं सुनाऊँ जो कभी दिल से फ़साना दिल का

पूरी मेंहदी भी लगानी नहीं आती अब तक
क्योंकर आया तुझे ग़ैरों से लगाना दिल का

इन हसीनों का लड़कपन ही रहे या अल्लाह
होश आता है तो आता है सताना दिल का

मेरी आग़ोश से क्या ही वो तड़प कर निकले
उनका जाना था इलाही के ये जाना दिल का

दे ख़ुदा और जगह सीना-ओ-पहलू के सिवा
के बुरे वक़्त में होजाए ठिकाना दिल का

उंगलियाँ तार-ए-गरीबाँ में उलझ जाती हैं
सख़्त दुश्वार है हाथों से दबाना दिल का

बेदिली का जो कहा हाल तो फ़रमाते हैं
कर लिया तूने कहीं और ठिकाना दिल का

छोड़ कर उसको तेरी बज़्म से क्योंकर जाऊँ
एक जनाज़े का उठाना है उठाना दिल का

निगहा-ए-यार ने की ख़ाना ख़राबी ऎसी
न ठिकाना है जिगर का न ठिकाना दिल का

बाद मुद्दत के ये ऎ दाग़ समझ में आया
वही दाना है कहा जिसने न माना दिल का

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