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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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बुधवार, 24 अप्रैल 2013

जाफ़र ताहिर



१.

गमे-दौराँ, गमे-जानाँ, गमे-जाँ है कि नहीं.
दिल-सिताँ सिलसिलए-ग़म-ज़दगां है कि नहीं.
हर नफ़स बज़्मे-गुलिस्ताँ में ग़ज़ल-ख्वाँ था कभी,
हर नफ़स नाला-कशां, नौहा-कुनाँ है कि नहीं.
हर ज़बाँ पर था कभी तज़्करए-दौरे-बहार,
हर ज़बाँ शिक्वागरे-जौरे-खिजाँ हैं कि नहीं.
मय-चकाँ, बादा-फ़िशां, थे लबे-गुलरंग कभी,
लबे-गुलरंग पे ज़ख्मों का गुमाँ है कि नहीं.
दश्ते-वहशत से नहीं कम ये जहाने-गुलो-बू,
सूरते रेगे-रवां, उम्र रवां है कि नहीं.
न तो बुलबुल की नवा है, न सदाए-ताउस,
सहने-गुलज़ार में अब अम्नो-अमां है कि नहीं.
ज़िन्दगी कुछ भी सही, फिर भी बड़ी दौलत है,
मौत सी शै भी यहाँ जिन्से-गराँ है कि नहीं.
ज़ुल्म चुपचाप सहे जाओगे आख़िर कब तक,
ऐ असीराने क़फ़स ! मुंह में ज़बाँ है कि नहीं.