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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

मुज़फ़्फ़र वारसी


१.

ज़ख़्म-ए-तन्हाई में ख़ुश्बू-ए-हिना किसकी थी
साया दीवार पे मेरा था सदा किसकी थी

उस्की रफ़्तार से लिपटी रही मेरी आँखें
उस ने मुड़ कर भी न देखा कि वफ़ा किसकी थी

वक़्त की तरह दबे पाँव ये कौन आया है
मैंने अँधेरा जिसे समझा वो क़बा किसकी थी

आँसुओं से ही सही भर गया दामन मेरा
हाथ तो मैं ने उठाये थे दुआ किसकी थी

मेरी आहों की ज़बां कोई समझता कैसे
ज़िन्दगी इतनी दुखी मेरे सिवा किसकी थी

आग से दोस्ती उस की थी जला घर मेरा
दी गई किस को सज़ा और ख़ता किसकी थी

मैं ने बीनाइयाँ बो कर भी अंधेरे काटे
किके बस में थी ज़मीं अब्र-ओ-हवा किस की थी

छोड़ दी किस लिये तू ने "मुज़फ़्फ़र" दुनिया
जुस्तजू सी तुझे हर वक़्त बता किसकी थी

२.


शोला हूँ धधकने की गुज़ारिश नहीं करता
सच मुंह से निकल जाता है कोशिश नहीं करता

गिरती हुइ दीवार का हमदर्द हूँ लेकिन
चड़ते हुए सूरज की परस्तिश नहीं करता

माथे के पसीने की महक आये तो देखें
वो ख़ून मेरे जिस्म में गर्दिश नहीं करता

हम्दर्दी-ए-अहबाब से डरता हूँ 'मुज़फ़्फ़र'
मैं ज़ख़्म तो रखता हूँ नुमाइश नहीं करता

३.


मेरी ज़िन्दगी किसी और की, मेरे नाम का कोई और है
मेरा अक्स है सर-ए-आईना, पसे आईना कोई और है

मेरी धड़कनों में है चाप सी, ये जुदाई भी है मिलाप सी
मुझे क्या पता, मेरे दिल बता, मेरे साथ क्या कोई और है
न गए दिनों को ख़बर मेरी, न शरीक-ए-हाल नज़र तेरी
तेरे देस में, मेरे भेस में, कोई और था कोई और है

वो मेरी तरफ़ निगराँ रहे, मेरा ध्यान जाने कहाँ रहे
मेरी आँख में कई सूरतें, मुझे चाहता कोई और है


४.

अब के बरसात की रुत और भी भड़कीली है
जिस्म से आग निकलती है, क़बा गीली है

सोचता हूँ के अब अंजाम-ए-सफ़र क्या होगा
लोग भी काँच के हैं, राह भी पथरीली है

शिद्दत-ए-कर्ब में तो हँसना कर्ब है मेरा
हाथ ही सख़्त हैं ज़ंजीर कहाँ ढीली है

गर्द आँखों में सही दाग़ तो चेहरे पे नहीं
लफ़्ज़ धुँधले हैं मगर फ़िक्र तो चमकीली है

घोल देता है सम'अत में वो मीठा लहजा
किसको मालूम के ये क़िंद भी ज़हरीली है

पहले रग-रग से मेरी ख़ून निचोड़ा उसने
अब ये कहता है के रंगत ही मेरी पीली है

मुझको बे-रंग ही न करदे कहीं रंग इतने
सब्ज़ मौसम है, हवा सुर्ख़, फ़िज़ा नीली है

मेरी परवाज़ किसी को नहीं भाती तो न भाये
क्या करूँ ज़ेहन "मुज़फ़्फ़र" मेरा जिबरीली है

५.

क्या भला मुझको परख़ने के नतीजा निकला
ज़ख़्म-ए-दिल आप की नज़रों से भी गहरा निकला

तोड़कर देख लिया आईना-ए-दिल तूने
तेरी सूरत के सिवा और बता क्या निकला

तिश्नगी जम गयी पत्थर की तरह होंटों पर
डूब कर तेरे दरिया में मैं प्यासा निकला

६.

लब-ए-ख़ामोश से इज़हार-ए-तमन्ना चाहे
बात करने को भी तस्वीर का लहजा चाहे

तू चले साथ तो आहट भी न आये अपनी
दरमियाँ हम भी न हो यूँ तुझे तन्हा चाहे

ज़ाहीरी आँखों से क्या देख सकेगा कोई
अपने बातों पे भी हम फ़ाश होना चाहे

जिस्म-पोशी को मिले चादर-ए-अफ़्लाक हमें
सर छुपाने के लिये वुस'अतु-ए-सेहरा चाहे

ख़्वाब में रोये तो एहसास हो सैराबी का
रेत पर सोयें मगर आँख में दरिया चाहे

भेँट चड़ जाऊँ न मैं अपने ही ख़ैर-ओ-शर की
ख़ून-ए-दिल ज़ब्त करे ज़ख़्म तमाशा चाहे

ज़िन्दगी आँख से ओझल हो मगर ख़त्म न हो
एक जहाँ और पस-ए-पर्दा-ए-दुनिया चाहे

आज का दिन तो चलो कट ही गया जैसे भी कटा
अब ख़ुदा-बंद से ख़ैरियत-ए-फ़र्दा चाहे

ऐसे तैराक भी देखे हैं ' मुज़फ़्फ़र ' हमने
ग़र्क़ होने के लिये भी जो सहरा चाहे

७.

माना के मुश्त-ए-ख़ाक से बढ़कर नहीं हूँ मैं
लेकिन हवा के रहम-ओ-करम पर नहीं हूँ मैं

इंसान हूँ धड़कते हुये दिल पे हाथ रख
यूँ डूबकर न देख समुंदर नहीं हूँ मैं

चेहरे पे मल रहा हूँ सियाही नसीब की
आईना हाथ में है सिकंदर नहीं हूँ मैं

ग़ालिब तेरी ज़मीं में लिक्खी तो है ग़ज़ल
तेरे कद-ए-सुख़न के बराबर नहीं हूँ मैं

८.

मेरी तस्वीर में रंग और किसी का तो नहीं
घेर लें मुझको सब आके मैं तमाशा तो नहीं

ज़िन्दगी तुझसे हर इक साँस पे समझौता करूँ
शौक़ जीने का है मुझको मगर इतना तो नहीं

रूह को दर्द मिला दर्द को आँखें न मिली
तुझको महसूस किया है तुझे देखा तो नहीं

सोचते सोचते दिल डूबने लगता है मेरा
ज़हन की तह में ' मुज़फ़्फ़र ' कोई दरिया तो नहीं


९.

जी बहलता ही नहीं साँस की झंकारों से। 
फोड़ लूँ सर न कहीं जिस्म की दीवारों से। 
अपने रिस्ते हुए ज़ख्मों पे छिड़क लेता हूँ, 
राख झड़ती है जो एहसास के अंगारों से। 
गीत गाऊं तो लपक जाते हैं शोले दिल में, 
साज़ छेड़ूँ तो निकलता है धुंआ तारों से। 
यूँ तो करते हैं सभी इश्क की रस्में पूरी, 
दूध की नहर निकाले कोई कुह्सारों से। 
जिंदा लाशें भी दुकानों में सजी हैं शायद, 
बूए-खूं आती है खुलते हुए बाज़ारों से।
क्या मेरे अक्स में छुप जायेंगे उनके चहरे, 
इतना पूछे कोई इन आइना बरदारों से। 
प्यार हर चन्द छलकता है उन आंखों से मगर, 
ज़ख्म भरते हैं मुज़फ़्फ़र कहीं तलवारों से।