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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

आशुफ़्ता चंगेजी


१.
तमाम शह्र से नज़रें चुराए फिरता है
वो अपने शानों पे इक घर उठाये फिरता है

हज़ार बार ये सोचा कि लौट जायेंगे
न जाने क्यों हमें दरिया बहाए फिरता है

हुदूद से जो तजावुज़ की बात करता था
वो अपने सीने में पौदे लगाए फिरता है

थे आज तक इसी धोके में सबसे वक़िफ़ हैं
जिसे भी देखो कोई शै छिपाए फिरता है

अब एतमाद कहाँ तक बहाल रक्खेंगे
कोई तो है जो हमें यूँ नचाये फिरता है.

२.
सभी को अपना समझता हूँ क्या हुआ है मुझे
बिछड़ के तुझ से अजब रोग लग गया है मुझे

जो मुड के देखा तो हो जायेगा बदन पत्थर
कहानियों में सुना था, सो भोगना है मुझे

अभी तलक तो कोई वापसी की राह न थी
कल एक राहगुज़र का पता लगा है मुझे

मैं सर्द जंग की आदत न डाल पाऊंगा
कोई महाज़ पे वापस बुला रहा है मुझे

यहाँ तो साँस भी लेने में खासी मुश्किल है
पड़ाव अबके कहाँ हो ये सोचना है मुझे

सड़क पे चलते हुए आँखें बंद रखता हूँ
तेरे जमाल का ऐसा मज़ा पड़ा है मुझे

मैं तुझको भूल न पाया यही ग़नीमत है
यहाँ तो इसका भी इमकान लग रहा है मुझे

.
अजब रंग आँखों में आने लगे
हमें रास्ते फिर बुलाने लगे

इक अफ़वाह गर्दिश में है इन दिनों
के दरिया किनारों को खाने लगे

ये क्या यक-ब-यक हो गया क़िस्सा-गो
हमें आप-बीती सुनाने लगे

शगुन देखें अब के निकलता है क्या
वो फिर ख़्वाब में बड़बड़ाने लगे

हर इक शख़्स रोने लगा फूट के
के 'अशुफ़्ता' जी भी ठिकाने लगे.


४. 
पता कहीं से तेरा अब के फिर लगा लाए
सुहाने ख़्वाब नया मशग़ला उठा लाए

लगी थी आग तो ये भी तो उस की ज़द में थे
अजीब लोग हैं दामन मगर बचा लाए

चलो तो राह में कितने ही दरिया आते हैं
मगर ये क्या के उन्हें अपने घर बहा लाए

तुझे भुलाने की कोशिश में फिर रहे थे के हम
कुछ और साथ में परछाइयाँ लगा लाए

सुना है चेहरों पे बिख़री पड़ी हैं तहरीरें
उड़ा के कितने वरक़ देखें अब हवा लाए

न इब्तिदा की ख़बर और न इंतिहा मालूम
इधर उधर से सुना और बस उड़ा लाए

५. 
गुज़र गए हैं जो मौसम कभी न आएँगे
तमाम दरिया किसी रोज़ डूब जाएँगे

सफ़र तो पहले भी कितने किये मगर इस बार
ये लग रहा है के तुझ को भी भूल जाएँगे

अलाव ठंडे हैं लोगों ने जागना छोड़ा
कहानी साथ है लेकिन किसे सुनाएँगे

सुना है आगे कहीं सम्तें बाँटी जाती हैं
तुम अपनी राह चुनो साथ चल न पाएँगे

दुआएँ लोरियाँ माओं के पास छोड़ आए
बस एक नींद बची है ख़रीद लाएँगे

ज़रूर तुझ सा भी होगा कोई ज़माने में
कहाँ तलक तेरी यादों से जी लगाएँगे

६. 
घरोंदे ख़्वाबों के सूरज के साथ रख लेते
परों में धूप के इक काली रात रख लेते

हमें ख़बर थी ज़बाँ खोलते ही क्या होगा
कहाँ कहाँ मगर आँखों पे हाथ रख लेते

तमाम जंगों का अंजाम मेरे नाम हुआ
तुम अपने हिस्से में कोई तो मात रख लेते

कहा था तुम से के ये रास्ता भी ठीक नहीं
कभी तो क़ाफ़िले वालों की बात रख लेते

ये क्या किया के सभी कुछ गँवा के बैठ गए
भरम तो बंदा-ए-मौला-सिफ़ात रख लेते

मैं बे-वफ़ा हूँ चलो ये भी मान लेता हूँ
भले बुरे ही सही तजरबात रख ले
ते