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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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रविवार, 3 फ़रवरी 2013

अनीस अंसारी


१.
ज़र्द बादल मेरी धरती पर उतर जाने को है
सब्ज़ रूत पाले की जद़ में ग़ालिबन आने को है

इब्न-ए-मरियम को सलीबें पर चढ़ाने का जुननू
इब्न-ए-आदम के लहू की धार रूलवाने को है

इश्क़ की गहरी जड़ों को खाद पानी चाहिए
पडे़ यह सब मौसमों में फल फूल लाने को है

उड़ रही हैं वहशी चीख़ें चील कौओं गिद्ध की
पीली आँधी आस्माँ से लाश बरसाने को है

मुत्तहिद हैं सब दरिन्दे नाख़ुनें दातों के साथ
मुन्तशिर हर जानवर पंजों में फँस जाने को है

रँग-कोरों को नज़र आते नहीं सब रँग सात
उनकी ज़िद रँगीं धनक यकरँग रँगवाने को है

मिल के सब सरूज जला लें तो अँधेरा भाग ले
एक इक कर के तो सब पर रात छा जाने को है

बीज जैसे बोये वैसी फ़स्ल काटेगा ‘अनीस’
थूहरों को बोने वाला ज़हर ख़ुद खाने को है


२.
बड़ी लज़्ज़त मिली दरबार से हक़ बात कहने में

हलक़ पर जब छुरी थी खून-ए-दिल के घूंट चखने में

बहुत ख़ुश है वह का़तिल अर्ज़-ए-इब्राहीम के ख़ूँ से
मज़ा भी आल-ए-इब्राहीम को आता है कटने में

क़िले मज़बूत थे और मुस्तइद थी फौज कसरत से
मैं हारा दुश्मनों से मीर जाफ़र के बहकने में

चलो फिर से नई तारीख़ लिक्खें कामरानी की
इमामत फ़र्ज़ है जमहूर की क़िसमत बदलने में

मशअल लेकर जो आगे जायेगा सरदार ठहरेगा
वह अमृत पायेगा ज़ुल्मात का दरिया गुज़रने में

पसीना ख़ून देकर फूल फल हमने उगाये हैं
हमें हिस्सा मिले लज़्ज़त में रंग-ओ-बू महकने में

अनीसइतनी सी ख़्वाहिश है कि जंगल राज के बदले
कोई तफ़रीक़ भेड़ों से न हो पानी में चरने में
३.
ज़र्द बादल मेरी धरती पर उतर जाने को है
सब्ज़ रूत पाले की जद़ में ग़ालिबन आने को है

इब्न-ए-मरियम को सलीबें पर चढ़ाने का जुननू
इब्न-ए-आदम के लहू की धार रूलवाने को है

इश्क़ की गहरी जड़ों को खाद पानी चाहिए
पडे़ यह सब मौसमों में फल फूल लाने को है

उड़ रही हैं वहशी चीख़ें चील कौओं गिद्ध की
पीली आँधी आस्माँ से लाश बरसाने को है

मुत्तहिद हैं सब दरिन्दे नाख़ुनें दातों के साथ
मुन्तशिर हर जानवर पंजों में फँस जाने को है

रँग-कोरों को नज़र आते नहीं सब रँग सात
उनकी ज़िद रँगीं धनक यकरँग रँगवाने को है

मिल के सब सरूज जला लें तो अँधेरा भाग ले
एक इक कर के तो सब पर रात छा जाने को है

बीज जैसे बोये वैसी फ़स्ल काटेगा ‘अनीस
थूहरों को बोने वाला ज़हर ख़ुद खाने को है

४.
दर्द अच्छा था रहा दिल में ही लावा न हुआ
फूट पड़ने पे भरे शहर को ख़तरा न हुआ

उन के चहेरे की शिकन वजह-ए-कय़ामत ठहरी
हम सर-ए-दार चढ़े कोई तमाशा न हुआ

रात भर पीते रहे शोख़ हसीना का बदन
रूह तश्ना थी, ग़म-ए-दिल का मदावा न हुआ

आग सीने में दहकती थी मगर हम बाहर
ढूंढने निकले कहीं शोला-ए-सीना न हुआ

शहर से दश्त भटकते थे कि मिल जाये कहीं
बू ए-आहू कहीं अन्दर थी यह अफशा न हुआ

किस क़दर ख़ून किया उम्र का दीवानगी में
सगं पर नक्शा-ए-जुनॅू फिर भी हुवैदा न हुआ

इक तरफ़ क़ैद रखा रिज्क़़ ने घर में मुझको
और जूनॅू में मैं उधर दश्त में दीवाना हुआ

हो के मोमिन भी रही इतने बुतों से यारी
देखते देखते काबा मेरा बुतख़ाना हुआ

आदमी काम का होकर भी किया पेशा-ए-इश्क़
इश्क़ में मैं कभी ग़ालिब सा निकम्मा न हुआ

अब तलक शान से गुज़री है जुनू में यूं ‘अनीस
ख़ाक हम ने न उड़ाई तो ख़राबा न हुआ

५.
जब तेरी नज़रों से देखा तो बहुत ख़ूब लगी
तेरी किरनों में ये दुनिया तो बहुत ख़ूब लगी

ज़िन्दगी तेरी शिफ़ा है कि अभी जीता हूं
मौत से मुझ को बचाया तो बहुत ख़ूब लगी

मेरी बेकार ज़मीं को भी चमनबन्दी से
तेरी मेहनत ने संवारा तो बहुत ख़ूब लगी

की तेरे अश्क ने सैराब मेरी फ़स्ल-ए-मुराद
फ़स्ल ने गुल जो खिलाया तो बहुत ख़ूब लगी

मेरी सूरत को जो पोशीदा थी चट्टानों में
तेरी छेनी ने तराशा तो बहुत ख़ूब लगी

मेरी दरमादाँ सदा के जो फिरी मिस्ल-ए-फक़़ीर
तेरी मौसीक़ी ने बांधा तो बहुत ख़ूब लगी

रिश्ता-ए-इश्क़ में था शीरीं ज़बानी का मज़ा
तूने लज़्ज़त को बढ़ाया तो बहुत ख़ूब लगी

मेरी क़ीमत मेरी क़िस्मत मेरी शोहरत को ‘अनीस’
उस की शफक़़त ने उभारा तो बहुत ख़बू लगी

६.
आंधी पुराने पेड़ गिरा कर चली गई
पत्ते तयूर सब को उड़ा कर चली गई

साहिल पे रेत बिखरी पड़ी थी मिसाल-ए-ख़ाक
पानी की लहर आई बहा कर चली गई

बिजली सी कौंधती थी जो आँखों में फुलझड़ी
मेरे सियह उफ़ुक़ को सजा कर चली गई

घर पर बरस के अब्र को जाना था एक दिन
गर्मी नमी हवा से उड़ा कर चली गई

होता है अब भी दर्द कहीं दिल के आस पास
नश्तर निगाह ऐसे लगा कर चली गई
आमों को खा के खोदना जड़ का फ़ुज़ूल था
आँधी नशेमनों को गिरा कर चली गई

पर बांधे अपनी शाख़ों पे बैठे रहे परिन्द
हल्की सी इक हवा भी डरा कर चली गई

ऊँची इमारतों के मकीं घर में क़ैद थे
दामन हवा वहाँ से बचा कर चली गई

फ़र्श-ए-ज़मीं से चिमटे थे पौदे हक़ीर से
बारिश सरों पे फूल खिला कर चली गई

काटे न कट रही थी शब-ए-हिज्र जो अनीस
आँखों के बन्द होते सुला कर चली गई

७.
मुझ पे हर ज़ुल्म रवा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ
मुझ को अपने से जुदा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

मैं कि मसलबू हूं दे मुझ को भी ज़ालिम का ख़िताब
सुन्नत-ए-ईसा जिला रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

मेरे घर में है जो ग़ासिब तो निकालूं कि नहीं
मुझ पे इल्ज़ाम-ए-जफ़ा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

तेरे मक़तूल पे सरगर्म हैं सारे मुन्सिफ़
मेरी लाशों को उठा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

गर्म आहों पे है इल्ज़ाम कि हूँ शोला नफ़स
मुझ को फूंकों से बुझा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

क्यों सहीफ़ों में लिखा है कि मिलेगा इन्साफ़
लफ़्ज़- ओ-मानी न जुदा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

तेरी ज़म्बील में हर चाल पुरानी है रक़ीब
मुझ को अपनों से लड़ा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

अपने वरसे से तेरा क़ब्ज़ा हटाना है हरीस
नाम दहशत कि बला रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

मैं ने आंखों में जला रखा है आज़ादी का तेल
मत अंधेरों से डरा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

गर मेरा हक़ न मिलेगा तो बिगड़ जायेगी बात
अपने पहलू से लगा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

करबला रख के हथेली पे चला हूं घर से
बैअत-ए-ज़ुल्म हटा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

जब ज़मीनों में जड़े हैं तो किधर जाऊंगा
मेरी शाख़ें न कटा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

अद्ल की मिट्टी में उगते नहीं दहशत के बबूल
अपनी मिट्टी को सफ़ा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

बन्द आखों से सियहरू नज़र आयेगा ‘अनीस’
चश्म-ए-बीना को खुला रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

८.
लुटेरे मौज हाकिम हो गये हैं
समन्दर डर के ख़ादिम हो गये हैं

हिफ़ाज़त किस तरह हो फ़स्ल-ए-जां की
कि बाड़े ख़ुद ही मुजरिम हो गये हैं

बहा है गंदा पानी चोट्यों से
नशेबी नाले मुल्ज़िम हो गये हैं

इसी दुनिया में जन्नत की हवस मे
जनाब-ए-शेख़ मुनइम हो गये है

अजब दस्तूर है हर अस्तां पर
चढ़ावे ज़र के लाज़िम हो गये हैं

तिजारत में लगे हैं सब सिप हगर
मुहाफ़िज़ मीर क़ासिम हो गये हैं

हुज़ूर-ए-शाह जब से नज़्र दी है
बड़े अच्छे मरा सिम हो गये हैं

लहरों के मालिक जान की फ़स्ल अमीर
फ़ौज के आक़ा
मियां करते रहो बस अल्लाह अल्लाह
सनम हर दिल में क़ाइम हो गये हैं

बढ़े जाते हैं माया के पुजारी
मगर मोमिन मुलाइम हो गये हैं

‘अनीस’ अपनी मनाओ खैर अब कुछ
हुनरगर आला नाज़िम हो गये हैं

.
दिल पर यूँ ही चोट लगी तो कुछ दिन ख़ूब मलाल किया
पुख़्ता उम्र को बच्चों जैसे रो रो कर बेहाल किया


हिज्र के छोटे गांव से हमने शहर-ए-वस्ल को हिजरत की
शहर-ए-वस्ल ने नींद उड़ा कर ख़्वाबों को पामाल किया


उथले कुएँ भी कल तक पानी की दौलत से जलथल थे
अब के बादल ऐसे सूखे नद्दी को कंगाल किया


सूरज जब तक ढाल रहा था सोना चाँदी आँखों में
भीड़ में सिक्के ख़ूब उछाले सब को मालामाल किया


लेकिन जब से सूरज डूबा ऐसा घोर अँधेरा है
साये सब मादूम हुये और आंखों को कंगाल किया


सख़्त ज़मीं में फूल उगाते तो कहते कुछ बात हुई
हिज्र में तुमने आँसू बो कर ऐसा कौन कमाल किया


आख़िर में अंसारी साहब अपने रंग में डूब गये
इसको दुआ दी, उसको छेड़ा] शहर अबीर गुलाल किया

१०.
हम फ़क़ीराना शान वाले हैं
मालिक-ए-दो-जहान वाले है

कल की कुछ भी ख़बर नहीं क्या हो
हम बड़े इत्मीनान वाले हैं

हम से ज़ाहिर है बात जग भर की
हम कि उर्दू ज़बान वाले हैं

सारी दुनिया का दर्द है अपना
हम बड़े खानदान वाले हैं

अर्श से हमकलाम पांचों वक़्त
हम भी ऊंचे मकान वाले हैं

दाग़ कोई नहीं बजुज़ सजदा
बन्दगी के निशान वाले हैं

जेब ख़ाली है पर भरा है दिल
हम अजब आन-बान वाले हैं

शान से गुज़रे हैं नशेब-ओ-फ़राज़
हम कड़े इम्तिहान वाले हैं

नक़्श अपने बचाये रख या रब
हम भी तेरे निशान वाले हैं

डर है हम को न कल जलाये धूप
गो तेरे सायबान वाले हैं

गूंजती है सदा-ए-हक़ अन्दर
ज़ाहिरन बेज़बान वाले हैं

ज़ायक़ा चाहते हैं शीरीं दहन
ऐसी मीठी ज़बान वाले हैं

फीका पकवान हम नहीं रखते
गरचे ऊंची दुकान वाले हैं

उनको सय्याद छू नहीं सकता
जो परिन्दे उड़ान वाले हैं

ज़ुल्म की रात मुख़्तसर है “अनीस”
दिन ये कुछ इम्तहान वाले हैं

११.
साज़िश-ए-दरबार थी और कुछ न था
नाम पर यलग़ार थी और कुछ न था

चुभ रहा था इक ख़ुदा का नामगो
कुछ बुतों को ख़ार थी और कुछ न था

इक इशारे पर मैं उठता बज़्म से
बेसबब तकरार थी और कुछ न था

कोहकन खोदा किया पत्थर में नहर
काविश-ए-बाकार थी और कुछ न था

खटखटाई जिस तरफ़ ज़न्जी-ए-दर
संग की दीवार थी और कुछ न था

चुप रहे अहल-ए-मरातिब क़त्ल पर
लाश थी, सरकार थी और कुछ न था

सर उठाना सख़्त मुश्किल था “अनीस”
ताज पर तलवार थी और कुछ न था

१२.
यार था दरबार था बज़्म-ए-अता थी मैं न था
लायक़े फ़ैजान क्या ख़ल्क़-ए-ख़ुदा थी मैं न था?

मैंने पूछा क्या हुये वह आपके क़ौल-ओ-क़रार
हंस के बोले वह मेरी तर्ज़-ए-जफ़ा थी मैं न था

आपकी चश्म-ए-करम में देखता था मैं मक़ाम
जिसको आंखों पर बिठाया वह अना थी मैं न था

क्या सिला वाजिब न था मेरी वफ़ा का जीनहार
लायक़-ए-ताजीर ख़ल्क़-ए-बेवफ़ा थी मैं न था?

बहर-ए-गिरिया में नहीं चलते उमीदों के जहाज़
मौज में क़ज़्ज़ाक़-ए-जां उल्टी हवा थी मैं न था 

१३.
मैं बेक़ुसूर था लेकिन क़ुसूरवार रहा
शराबख़ाने में ज़ाहिद गुनाहगार रहा

इक अस्ली सिक्का दुकानों में दरकिनार रहा
ख़राब सिक्कों के हाथों में कारोबार रहा

मैं आईने की तरह साफ़ था तो मुश्किल थी
ख़राब चेहरा मेरे आगे दाग़दार रहा

कहां से बचता मैं ऐसे गिरोह की ज़द से
जो भेड़खाल में आमादा-ए-शिकार रहा

वह मुझको रौदं के कुछ देर ख़ुश रहा लेकिन
मैं उसके पॉव में टटूा सा मिस्ल-ए-ख़ार रहा

अजीब बात हुई मेरा क़त्ल होने पर
मेरा वकील अदालत में शर्मसार रहा

हमारी क़ब्र के कतबे पे यह लिखा जाये
यह शख्स सादा दिली का सदा शिकार रहा

‘अनीस’ बंद न कर देना जंग घबरा कर
उसी की जीत है जो हौसला सवार रहा

१४.
होतामेरेघर भी बड़ासामानवग़ैरह
चस्के में नपड़ताअगर ईमानवग़ैरह

मयख़ाने में साक़ी का करम आम है सब पर
लब-बन्द हैंबसचन्द मुसलमानवग़ैरह

थाने में रक़ीबों की रपट लिखते हैं फ़ौरन
आशिक़कियाजाता है परेशानवग़ैरह

दरयाफ्तनईदुनिया सितारे में हुईहै
शायदकिवहाँरहते हैं इन्सान वग़ैरह

क़ामत से बड़ी मूर्ति फ़नकार ने ढाली
बौने की ज़रा ऊंची हुई शानान वग़ैरह

ऐ अर्शनशीं ख़ाकमकीं रूह को देखा?
मिल जाती हैं मिट्टी में यह सब शान वग़ैरह

फ़ुरसत हो अमीरों से तो मलका मुझे देखे
लगती है फ़क़ीरों से कुछ अन्जान वग़ैरह

१५.
नूर पकड़ो ख़ुदा मम्बा-ए-नूर है
अपने मरकज़ को शायद यह जाने लगे

इस सितारे से कर आस्माँ का सफ़र
अर्श पर गर्द-ए-पा उड़ के जाने लगे

इश्क़-ए-सरमद का ऐसे वज़ीफ़ा पढ़ो
वस्ल-ए-लम्हा में गोया ज़माने लगे

थे हमारी कहानी के मुश्ताक़ तुम
दोस्तों हम तुम्हारी सुनाने लगे

ऐसा इक घर बनाने में मसरूफ़ हूँ
जिस में सारी ख़ुदाई समाने लगे

संग मुझ पर ते रे अक्स पर वा र है
ताकि किरचों में तू टुट जाने लगे

चोट जब भी लगी तुम को रोया था मैं
तुम मेरी चोट पर मुस्कुराने लगे

मिल के ‘अंसारी’ साहब, से अच्छा लगा
ग़म अलग रख के हंसने हंसाने लगे

१६.
आजकल जब कि मेरे पास है फ़ुरसत जानां
दूर मसरूफ़ हो, कैसे हो मुहब्बत जानां

रात तो नींद के पहलू में गुज़र जाती है
दिन में तन्हाई के संग रहती है साहेबत जानां

आज कुछ बात है जो दर्द सिवा होता है
दस्त-ए-नौमीदी ने क्यों की है जराहत जानां

कासा-ए-चश्म पे शायद कोई रूक्क़ा आये
दर-ए-सरकार कभी बटती है नेअमत जानां

बेगुनाही की सज़ा है तो गुनह बेहतर था
लज़्ज़त-ए-दहर से कुछ मिलती हलावत जानां

हैं शहीदों पे अज़ादारी की रस्में मतरूक
अब यज़ीदों पे नहीं होती मलामत जानां

१७.
मेरे नालों से ज़ालिम ख़ुद को इतना तंग कर बैठा
मेरी नमनाक आंखों से वह अंधी जंग कर बैठा

अपाहिज कर दिया पहले मुझे धोके से ज़ालिम ने
मेरी चीख़ों से घबराया तो उज्र-ए-लंग कर बैठा

बड़े जाबिर हैं मुझ को मार कर रोने नहीं देते
मैं उन की महफ़िलों के रंग में क्यों भंग कर बैठा

बड़ी मुश्किल से ईंटें जोड़ कर हम घर बना पाये
ग़लत तामीर कह कर शहरगर बेढंग कर बैठा
तुम्हारे राग में शामिल हैं सब्र-ओ-शुक्र के दो सुर
मियां ! उस्ताद है जो उन को हम-आहंग कर बैठा

मेरे जूतों से कुछ गर्द-ए-सफ़र बेतौर आ लिपटी
ज़रा सा झाड़ कर मैं फिर उन्हें ख़ुशरंग कर बैठा

यक़ीन-ए-फ़तह रक्खें ख़ैर-ओ-शर की जँग में ग़ाजी
शहीदाना ‘अनीस’ अपने अदू से जंग कर बैठा

१८.
ख़ून सस्ता है मगर यूं न पिया जाये मुझे
ज़हर जब फैले तो फ़ासिद न कहा जाये मुझे

पेश है चाय जो चाहे पिये गर-ए-दिल-ए-सब्ज़
जो नहीं चाहता वह ज़हर पिला जाये मुझे

कार में इतनी जगह थी मैं समा सकता था
क्यों यह साहब को लगा छोड़ दिया जाये मुझे

फ़ील-ए-बदमस्त की मानिन्द गुज़रने वाले!
कहीं चियूंटी तेरी मय्यत न दिखा जाये मुझे

तख्त के गिर्द मैं करता रहा जिस तरह तवाफ़
उन मनासिक पे ही हाजी न कहा जाये मुझे

सब चराग़ों की हिफ़ाज़त के लिए जलता हूं
नहीं मन्ज़र अँधेरों में रखा जाये मुझे

यूँ ही हिजयान में बकता हूं मैं इन्सा! इन्साफ!
कुछ कहा जाये न मुझ से न सुना जाये मुझे

१९.
चोट लगी तो अपने अन्दर चुपके चुपके रो लेते हो
अच्छी बात है आसानी से ज़ख्मों को तुम धो लेते हो

दिन भर कोशश करते हो सब को ग़म का दरमाँ मिल जाये
नींद की गोली खाकर शब भर बेफ़िक्री में सो लेते हो

अपनों से मोहतात रहो, सब नाहक़ मुश्रिक समझेंगे
ज्यों ही अच्छी मूरत देखी पीछे पीछे हो लेते हो

ख़ुश-एख्लाक़ी ठीक है लेकिन सेहत पे ध्यान ज़रूरी है
बैठे बैठे सब के दुख में अपनी जान भिगो लेते हो

क्यों ठोकर खाते फिरते हो अनदेखे से रस्तों पर
ज़ख्मों के भरने से पहले पत्थर और चुभो लेते हो

अंसारी जी’ आस न रक्खो कोई तुम्हें पढ़ पायेगा
क्या यह कम है पलकों में तुम हर्फ़-ए-अश्क पिरो लेते हो

२०.
है मेरा नाम मुहम्मद सो मुझे आ के पकड़
ऐ अबू जहल! भले नाम को साजिश में रगड़

यह ज़मीं मेरी है, हिजरत मै करू किसके लिए?
ख़ुद ही गरदिश में है ऐ चर्ख़ तू इतना न अकड़

अपनी मसनद के बराबर तू मुझे बैठने दे
दोनों इक शाह के शहज़ादे हैं आपस में न लड़

जब ज़रूरत हो मेरा हदिया-ए-सर तश्त में है
मेरी दस्तार मगर गिर न पड़े ऐसे पकड़

एक फ़नकार की मिट्टी की हैं मूरत शक्लें
काबा-ओ-काशी हैं आईने, ख़ुदा से न झगड़

जब कि मुल्ज़िम को सफ़ाई की इजा्ज़त न मिले
कैसे इन्साफ़ हो, फिर कैसे रूकेगी गड़बड़

जो ज़मीनों पे हैं सरहद वह नही जहर-अगं ज़े
दिल में जो ज़ेर-ए-ज़मीं है वह धतूरे की है जड़

यह ज़मीं ख़ूब है इस को न बिगाड़े कोई
एक मुद्दत में 'अनीस' आई है कुछ बीजों में जड़

२१.
कोई आये अभी और आग लगाये मुझको
गीली लकड़ी की तरह फूंके, जलाये मुझको

याद आ जाते हैं सब अपने अधूरे क़िस्से
कोई परियों की कहानी न सुनाये मुझको

एक मुद्दत से नहीं पिघले जमी आंखों में अश्क
कोई चिन्गारी लगादे जो रूलाये मुझ को

कोई कहता था मैं हंसता हूं तो प्यार आता है
बस उसी तरह कोई फिर से हंसाये मुझ को

जागती आँखेंतरसती हैं हसीं ख्वाबों को
कोई सहलाये उन्हें और सुलाये मुझको

२२.
दिल जो टूटा तो नई बात है क्या? कुछ भी नहीं
संग में शीशे की औक़ात है क्या, कुछ भी नहीं

क्यों हसीं आंखों को खुल कर नहीं हंसने देते
उन के रोने में बड़ी बात है क्या, कुछ भी नहीं

इश्क़ आज़ाद है, बहने दो सबा की मानिन्द
गुल खिलाना भी बुरी बात है क्या ? कुछ भी नहीं

क़ैद क्यों अंधे कुंएं में है अभी तक यूसुफ़?
रौशनी ग़र्क़-ए-सवालात है क्या, कुछ भी नहीं

हिज्र के दाग़ तो अश्कों से भी धुल जाते हैं
वस्ल के ग़म की मुकाफ़ात है क्या? कुछ भी नही

दू र सूरज से ज़रा हा के ज़मीं सर्द हुई
और बेमेहरी-ए-हालात है क्या, कुछ भी नहीं

गर्द सूरज पे अगर डालोगे बढ़ जायेगी धुन्द
इस में सूरज की कही मात है क्या? कुछ भी नहीं

नू की बूँद में सतरंगी धनक बहती है
रंग इक हो तो करामात है क्या? कुछ भी नहीं


२३.
दर्द होता है बहुत, इश्क़ न सहना भाई
जीते जी अब न किसी और पे मरना भाई

एक यह दिल है खिंचा जाता है मक़तल की तरफ़
उस पे समझाते हो उस राह न चलना भाई

चांद को देख के बरपा है समन्दर में जुनून
रात कहती है ज रा होश में रहना भाई

मुड़ के देखोगे तो पत्थर में बदल जाओगे
गुज़री राहों की तरफ़ अब न पलटना भाई

कोई खुश्बू हो तो सीने में छुपाये रखना
चाँद के नीचे खुली छत पे न रहना भाई

कैसी दुरगत हुई 'अंसारी जी' बस्ती जाकर
इस से बेहतर था वह सहरा में भटकना भाई

२४.
चोट लगी तो अपने अन्दर चुपके चुपके रो लेते हो
अच्छी बात है आसानी से जख्मों को तुम धो लेते हो

दिन भर कोशिश करते हो सबको गम का दरमाँ मिल जाये
नींद की गोली खाकर शब भर बेफ़िक्री में सो लेते हो

अपनों से मोहतात रहो, सब नाहक़ मुश्रिक समझेंगे
ज्यों ही अच्छी मूरत देखी पीछे पीछे हो लेते हो

ख़ुशएख्लाक़ी ठीक है लेकिन सेहत पे ध्यान ज़रूरी है
बैठे बैठे सब के दुख में अपनी जान भिगो लेते हो

क्यों ठोकर खाते फिरते हो अनदेखे से रस्तों पर
जख्मों के भरने से पहले पत्थर और चुभो लेते हो

'अंसारी जी' आस न रक्खो कोई तुम्हें पढ़ पायेगा
क्या यह कम है पलकों में तुम हर्फ़-ए-अश्क पिरो लेते हो

२५.
तुम्हारे ग़म का मौसम है अभी तक
लब-ए-तश्ना पे शबनम है अभी तक

सफ़र में आबले ही आबले थे
मगर पैरों में दम-ख़म है अभी तक

तुम्हारे बंद दर मुझ से ख़फ़ा हैं
मेरे जीने का मातम है अभी तक

तेरी आब-ओ-हवा रास आ गई थी
बिछड़ जाने का कुछ ग़म है अभी तक

गई रुत में हुई थी फ़स्ल अच्छी
इधर पानी गिरा कम है अभी तक

मैं ख़ुद को ढूँढता फिरता हूँ सब में
जुनूँ का इक आलम है अभी तक