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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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बुधवार, 1 मई 2013

मजाज लखनवी

जन्म १९ अक्टूबर 1911 को रूदौली गाँव (बाराबंकी) उत्तरप्रदेश,
१.
तस्कीन-ए-दिल-ए-महज़ू न हुई वो सई-ए-क़रम फ़रमा भी गये
उस सई-ए-क़रम का क्या कहिये बहला भी गये तड़पा भी गये

एक अर्ज़-ए-वफ़ा भी कर न सके कुछ कह न सके कुछ सुन न सके
यहाँ हम ने ज़बाँ ही खोले थी वहाँ आँख झुकी शरमा भी गये

आशुफ़्तगी-ए-वहशत की क़सम हैरत की क़सम हसरत की क़सम
अब आप कहे कुछ्ह या न कहे हम राज़-ए-तबस्सुम पा भी गये

रूदाद-ए-ग़म-ए-उल्फ़त उन से हम क्या कहते क्योंकर कहते
एक हर्फ़ न निकला होठों से और आँख में आँसू आ भी गये

अर्बाब-ए-जुनूँ पे फ़ुर्कत में अब क्या कहिये क्या क्या गुज़रा
आये थे सवाद-ए-उल्फ़त में कुछ् खो भी गये कुछ् पा भी गये

२.
बरबाद तमन्ना पे अताब और ज़्यादा
हाँ मेरी मोहब्बत का जवाब और ज़्यादा

रोये न अभी अहल-ए-नज़र हाल पे मेरे
होना है अभी मुझ को ख़राब और ज़्यादा

आवारा-व-मजनूँ ही पे मौकूफ़ नहीं कुछ
मिलने हैं अभी मुझ को ख़िताब और ज़्यादा

उठेंगे अभी और भी तूफ़ाँ मेरे दिल से
देखूँगा अभी इश्क़ के ख़्वाब और ज़्यादा

टपकेगा लहू और मेरे दीदा-ए-तर से
धड़केगा दिल-ए-ख़ानाख़राब और ज़्यादा

ऐ मुत्रिब-ए-बेबाक कोई और भी नग़्मा
ऐ साक़ी-ए-फ़य्याज़ शराब और ज़्यादा

३.
ख़ूब पहचान लो असरार हूँ मैं
जिन्स-ए-उल्फ़त का तलबगार हूँ मैं

इश्क़ ही इश्क़ है दुनिया मेरी
फ़ितना-ए-अक़्ल से बेज़ार हूँ मैं

छेड़ती है जिसे मिज़राब-ए-अलम
साज़-ए-फ़ितरत का वही तार हूँ मैं

ऐब जो हाफ़िज़-ओ-ख़य्याम में था
हाँ कुछ इस का भी गुनहगार हूँ मैं

ज़िन्दगी क्या है गुनाह-ए-आदम
ज़िन्दगी है तो गुनहगार हूँ मैं

मेरी बातों में मसीहाई है
लोग कहते हैं कि बीमार हूँ मैं

एक लपकता हुआ शोला हूँ मैं
एक चलती हुई तलवार हूँ मैं

४.
सीने में उनके जल्वे छुपाये हुये तो हैं
हम अपने दिल को तूर बनाये हुये तो हैं


तासीर-ए-जज़्ब-ए-शौक़ दिखाये हुये तो हैं
हम तेरा हर हिजाब उठाये हुये तो हैं


हाँ वो क्या हुआ वो हौसला-ए-दीद अहल-ए-दिल
देखो न वो नक़ाब उठाये हुये तो हैं


तेरे गुनाहआर गुनाहगार ही सही
तेरे करम की आस लगाये हुये तो हैं

अल्लाह रे क़ामयाबी-ए-आवारगान-ए-इश्क़
ख़ुद गुम हुये तो क्या उसे पाये हुये तो हैं

ये तुझ को इख़्तियार है तासीर दे न दे
दस्त-ए-दुआ हम आज उठाये हुये तो हैं


मिटते हुओं को देख के क्यों रो न दें 'मजाज़'
आख़िर किसी के हम भी मिटाये हुये तो हैं

५.
हुस्न को बे-हिजाब होना था
शौक़ को कामयाब होना था

हिज्र में कैफ़-ए-इज़्तराब न पूछ
ख़ून-ए-दिल भी शराब होना था

तेरे जल्वों में घिर गया आख़िर
ज़र्रे को आफ़ताब होना था

कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी
कुछ मुझे भी ख़राब होना था

रात तारों का टूटना भी 'मजाज़'
बाइस-ए-इज़्तराब होना था

६.
सारा आलम गोश बर आवाज़ है
आज किन हाथों में दिल का साज़ है

हाँ ज़रा जुर्रत दिखा ऐ जज़्ब-ए-दिल
हुस्न को पर्दे पे अपने नाज़ है

कमनशीं दिल की हक़ीक़त क्या कहूँ
सोज़ में डुबा हुआ इक साज़ है

आप की मख़्मूर आँखों की क़सम
मेरी मैख़्वारी अभी तक राज़ है

हँस दिये वो मेरे रोने पर मगर
उन के हँस देने में भी एक राज़ है

छुप गये वो साज़-ए-हस्ती छेड़ कर
अब तो बस आवाज़ ही आवाज़ है

हुस्न को नाहक़ पशेमाँ कर दिया
ऐ जुनूँ ये भी कोई अन्दाज़ है

सारी महफ़िल जिस पे झूम उट्ठी 'मजाज़'
वो तो आवाज़-ए-शिकस्त-ए-साज़ है

७.
अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो ?

मैंने माना कि तुम इक पैकरे-रानाई हो
चमने-दहर में रूहे-चमन-आराई हो
तलअते-मेह्र हो,फिरदौस की रानाई हो
बिन्ते-महताब हो गर्दूं से उतर आई हो
मुझसे मिलने में अब अंदेशए-रुसवाई है
मैंने ख़ुद अपने किए की ये सज़ा पाई है

ख़ाक में आह मिलाई है जवानी मैंने
शोला-ज़ारों में जलाई है जवानी मैंने
शहरे-खूबां में गंवाई है जवानी मैंने
ख्वाब-गाहों में जगाई है जवानी मैंने
हुस्न ने जब भी इनायत की नज़र डाली है
मेरे पैमाने-मुहब्बत ने सिपर डाली है

उन दिनों मुझपे क़यामत का जुनूं तारी था
सर पे सरशरीओ-इशरत का जुनूं तारी था
माहपारों से मुहब्बत का जुनूं तारी था
शहरयारों से रक़ाबत का जुनूं तारी था
बिस्तरे-मख्मलो-संजाब थी दुनिया मेरी
एक रंगीनो-हसीं ख्वाब थी दुनिया मेरी

जन्नते-शौक़ थी बेगानए- आफ़ाते-सुमूम
दर्द जब दर्द न हो, काविशे-दरमाँ मालूम
ख़ाक थे दीदए-बेबाक में गर्दूं के नुजूम
बज़्मे-परवीं थी निगाहों में कनीज़ों का हुजूम
लैलिए-नाज़ बरअफ़्गंदा-नक़ाब आती थी
अपनी आंखों में लिए दावते-ख्वाब आती थी

संग को गौहरे-नायाबो-गरां जाना था
दश्ते-पुर-खार को फ़िर्दौसे-जिनां जाना था
रेग को सिलसिलए-आबे-रवां जाना था
आह ये राज़ अभी मैंने कहाँ जाना था
मेरी हर फ़तह में है एक हज़ीमत पिनहाँ
हर मसर्रत में है राज़े-ग़मो-इशरत पिनहाँ

क्या सुनोगी मेरी मजरुह जवानी की पुकार
मेरी फर्यादे-जिगर-दोज़, मेरा नालए-ज़ार
शिद्दते-करब में डूबी हुई मेरी गुफ़्तार
मैं कि ख़ुद अपने मजाके-तरब-आगीं का शिकार
वो गुदाज़े-दिले-मरहूम कहाँ से लाऊं
अब मैं वो जज्बए- मौसूम कहाँ से लाऊं

मेरे साए से डरो तुम मेरी गुरबत से डरो
अपनी जुरअत की क़सम अब मेरी जुरअत से डरो
तुम लताफ़त हो अगर मेरी लताफ़त से डरो
मेरे वादों से डरो मेरी मुहब्बत से डरो
अब मैं अल्ताफो-इनायत का सज़ावार नहीं
मैं वफ़ादार नहीं हाँ मैं वफ़ादार नहीं

अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो ?

८.

इक नन्ही मुन्नी सी पुजारन
पतली बाहें पतली गर्दन
भोर भये मन्दिर आई है
आई नहीं है, माँ लाई है
वक़्त से पहले जाग उठी है
नींद अभी आंखों में भरी है
ठोडी तक लट आई हुई है
यूँ ही सी लहराई हुई है
आंखों में तारों की चमक है
मुखड़े पर चांदी की झलक है
कैसी सुंदर है क्या कहिये
नन्ही सी इक सीता कहिये
धूप चढ़े तारा चमका है
पत्थर पर इक फूल खिला है
चाँद का टुकडा फूल की डाली
कमसिन, सीधी, भोली भाली
दिल में लेकिन ध्यान नहीं है
पूजा का कुछ ज्ञान नहीं है
कैसी भोली और सीधी है
मन्दिर की छत देख रही है
माँ बढ़कर चुटकी लेती है
चुपके चुपके हंस देती है
हँसना रोना उसका मज़हब
उसको पूजा से क्या मतलब
ख़ुद तो आई है मंदर में
मन उसका है गुडिया घर में

९.

अपने दिल को दोनों आलम से उठा सकता हूँ मैं
क्या समझती हो कि तुमको भी भुला सकता हूँ मैं
  
कौन तुमसे छीन सकता है मुझे क्या वहम है
खुद जुलेखा से भी तो दामन बचा सकता हूँ मैं
  
दिल मैं तुम पैदा करो पहले मेरी सी जुर्रतें
और फिर देखो कि तुमको क्या बना सकता हूँ मैं
  
दफ़्न कर सकता हूँ सीने मैं तुम्हारे राज़ को
और तुम चाहो तो अफ़साना बना सकता हूँ मैं

तुम समझती हो कि हैं परदे बहुत से दरमियाँ
मैं यह कहता हूँ कि हर पर्दा उठा सकता हूँ मैं

तुम कि बन सकती हो हर महफ़िल मैं फिरदौस-ए-नज़र
मुझ को यह दावा कि हर महफ़िल पे छा सकता हूँ मैं

१०.
कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं
ये किस के हाथ से दामन छुड़ा रहा हूँ मैं

तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया
बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं

ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ म'अज़-अल्लाह
तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं

इस इक हिजाब पे सौ बे-हिजाबियाँ सदक़े
जहाँ से चाहता हूँ तुमको देखता हूँ मैं

बताने वाले वहीं पर बताते हैं मंज़िल
हज़ार बार जहाँ से गुज़र चुका हूँ मैं

कभी ये ज़ोम कि तू मुझ से छुप नहीं सकता
कभी ये वहम कि ख़ुद भी छुपा हुआ हूँ मैं

मुझे सुने न कोई मस्त-ए-बादा-ए-इशरत
'मज़ाज़' टूटे हुये दिल की इक सदा हूँ मैं

११.
ख़ुद दिल में रह के आँख से पर्दा करे कोई
हाँ, लुत्फ़ जब है पाके भी ढूँढा करे कोई

तुम ने तो हुक्म-ए-तर्क-ए-तमन्ना सुना दिया
किस दिल से आह तर्क-ए-तमन्ना करे कोई

दुनिया लरज़ गई दिल-ए-हिरमाँ नसीब की
इस तरह साज़-ए-ऐश न छेड़ा करे कोई

मुझ को ये आरज़ू वो उठायें नक़ाब ख़ुद
उन को ये इन्तज़ार तक़ाज़ा करे कोई

रन्गीनी-ए-नक़ाब में ग़ुम हो गई नज़र
क्या बे-हिजाबियों का तक़ाज़ा करे कोई

या तो किसी को जुर्रत-ए-दीदार ही न हो
या फिर मेरी निगाह से देखा करे कोई

होती है इस में हुस्न की तौहीन ऐ 'मज़ाज़'
इतना न अहल-ए-इश्क़ को रुसवा करे कोई