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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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सोमवार, 13 मई 2013

सुरेश चन्द्र 'शौक़'

5 अप्रैल, 1938 को ज्वालामुखी (हिमाचल प्रदेश) में जन्म,ग़ज़ल संग्रह "आँच"

संपर्क- satpalg.bhatia@gmail.com

१.
इतने भी तन्हा थे दिल के कब दरवाज़े
इक दस्तक को तरस रहे हैं अब दरवाज़े

कोई जा कर किससे अपना दु:ख—सुख बाँटे
कौन खुले रखता है दिल के अब दरवाज़े

अहले—सियासत ने कैसा तामीर किया घर
कोना—कोना बेहंगम, बेढब दरवाज़े

एक ज़माना यह भी था देहात में सुख का
लोग खुले रखते थे घर के सब दरवाज़े

एक ज़माना यह भी है ग़ैरों के डर का
दस्तक पर भी खुलते नहीं हैं अब दरवाज़े

ख़लवत में भी दिल की बात न दिल से कहना
दीवारें रखती हैं कान और लब दरवाज़े

फ़रियादी अब लाख हिलाएँ ज़ंजीरों को
आज के शाहों के कब खुलते हैं दरवाज़े

शहरों में घर बंगले बेशक आली—शाँ हैं
लेकिन रूखे फीके बे—हिस सब दरवाज़े

कोई भी एहसास का झोंका लौट न जाए
'शौक़', खुले रखता हूँ दिल के सब दरवाज़े.

२.

बग़ैर पूछे जो अपनी सफ़ाई देता है
नहीं भी हो तो भी मुजरिम दिखाई देता है

जो इक़्तिदार की कुर्सी पे जलवा फ़रमा हैं
न जाने क्यों उन्हें ऊँचा सुनाई देता है

तिरे ज़मीर का आइना गर सलामत है
तो देख उसमें तुझे क्या दिखाई देता है

मिरा नसीब कि ग़म तो अता हुआ, वरना
किसी को तिरा दस्ते-हिनाई देता है

वो तकता रहता है हर वक़्त आसमाँ की तरफ़
खला में जाने उसे क्या दिखाई देता है

करोड़ों लोग हैं दुनिया में यूँ तो कहने को
कहीं –कहीं कोई कोई इन्साँ दिखाई देता है

बहुत ज़ियादा जहाँ रौशनी ख़िरद की हो
निगाहे-दिल को वहाँ कम सुझाई देता है

तज़ाद ज़ाहिरो—बातिन में उसके कुछ भी नहीं
है 'शौक़' वैसा ही जैसा दिखाई देता है.


३.

ग़म के सांचे में ढली हो जैसे
ज़ीस्त काँटों में पली हो जैसे


दर-ब-दर ढूँढ़ता फिरता हूँ तुझे
हर गली तेरी गली हो जैसे


हम तन गोश है सारी महफ़िल
आपकी बात चली हो जैसे


यूँ तेरी याद है दिल में रौशन
इक अमर जोत जली हो जैसे


तेरी सूरत से झलकता है ख़ुलूस
तेरी सीरत भी भली हो जैसे


आह! यह तुझसे बिछड़ने की घड़ी
नब्ज़—दिल डूब चली हो जैसे

‘शौक़’! महरूमी-ए-दिल क्या कहिए
हर ख़ुशी हम से टली हो जैसे