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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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बुधवार, 1 मई 2013

अज़ीज़ लखनवी

जन्म: 1882,लखनऊ, उत्तर प्रदेश,निधन: 1935
१.
ये मशवरे बहम उठे हैं चारा-जु करते
अब इस मरीज़ को अच्छा था क़िबलरु करते


कफ़न को बाँधे हुए सर से आए हैं वरना
हम और आप से इस तरह गुफ़्तगू करते


जवाब हज़रत-ए-नासेह को हम भी कुछ देते
जो गुफ़्तगू के तरीक़े से गुफ़्तगू करते


पहुँच के हश्र के मैदान में हौल क्यों है ‘अज़ीज़’
अभी तो पहली ही मंज़िल है जूस्तजू करते


२.
जलवा दिखलाए जो वो खुद अपनी खुद-आराई का
नूर जल जाये अभी चश्म-ए-तमाशाई का


रंग हर फूल में है हुस्न-ए-खुद आराई का
चमन-ए-दहर है महज़र तेरी यकताई का


अपने मरकज़ की तरफ माएल-ए-परवाज़ था हुस्न
भूलता ही नहीं आलम तेरी अंगडाई का


देख कर नज़्म-ए-दो-आलम हमें कहना ही पड़ा
यह सलीका है किसे अंजुमन आराई का


गुल जो गुलज़ार में हैं गोश-बर-आवाज़ “अजीज़”
मुझसे बुलबुल ने लिया तर्ज़ यह शैवाई का


३.