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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शुक्रवार, 17 मई 2013

समीर परिमल

जन्म-तिथि - 01/03/1969,जन्म-स्थान - ग्राम- भरतपुरा, पो.- हथुआ, जिला- गोपालगंज, बिहार,शैक्षणिक योग्यता - स्नातक(विज्ञानं), एल एल बी., PGDBA (HR),वर्तमान पदस्थापन - सहायक शिक्षक, राजकीय कन्या मध्य विद्यालय, राजभवन, पटना (बिहार).
सम्पर्क:मोबाईल  - 9934796866,
samir.parimal@gmail.com



१.
हादसों से जंग लड़ता ये शहर,
ज़िन्दगी की राह तकता ये शहर.

मुफ़लिसी की धूप में जलता हुआ,
ख़ुद पे ही अब तंज़ कसता ये शहर.

चीखती इंसानियत हर पल यहाँ,
सिसकियाँ रातों को भरता ये शहर.

सुर्ख मोती सा चमकता था कभी,
तेरी गलियों से गुजरता ये शहर.

बेबसी है, बेकसी है, बेक़ली है,
फिर भी सीने में धड़कता ये शहर.

आंधियाँ शोलों को कब भड्कायेंगी,
बुझते चूल्हों में सुलगता ये शहर.

डूबती साँसों की है ख्वाहिश यही,
काश फिर सजता-सँवरता ये शहर.

तेरी खुशबू से कभी महका जहां,
आज 'परिमल' को तरसता ये शहर.

२.

तुम्हारे नाम अपनी जिंदगानी इस तरह कर लें,
तेरी बाहों में शब गुजरे, पनाहों में सुबह कर लें.


 नहीं बंधना हमें रस्मों-रिवाजों में, समाजों में,
खुले आकाश के पंछी बसेरा हर जगह कर लें.

इरादा, हौसला, ताक़त, मोहब्बत सब तुम्ही से है,
तू गर इक बार आ जाये तो दुनिया को फ़तेह कर लें.

दरो-दीवार पर फैली उदासी को मिटा दें हम,
हर इक शै में तबस्सुम हो, चलो ऐसी वजह कर लें.

अदावत तो है अपनी नफरतों के रहनुमाओं से,
जो दिल में दे जगह उससे भला न क्यूँ सुलह कर लें?

ख़ुदा की कद्र करता है मगर काफिर भी है "परिमल",
कभी आओ जो महफ़िल में, इबादत पर जिरह कर लें.

३.

वो मुझमें क्यूँ भला अब भी ठिकाना ढूँढने निकला?
समंदर में परिंदा आशियाना ढूँढने निकला.

तेरी मक़बूलियत मोहताज़ थी बस खून की मेरे,
मेरे क़ातिल तुझे सारा ज़माना ढूँढने निकला.

इबादत हो गयी जाया उमर भर की न जाने क्यूँ,
दिले-नादान फिर वो बुत पुराना ढूँढने निकला.

मेरी ग़ज़लों की खुशबू जब भी महकी है सरे-महफ़िल,
कोई है जो शिकायत का बहाना ढूँढने निकला.

कोई पहुंचा दे ये पैग़ाम अब मसनद-नशीनों तक,
कफ़न ले के उन्हें 'परिमल' दीवाना ढूंढने निकला.