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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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मंगलवार, 7 मई 2013

डा. राजसक्सेना के मुक्तक




मन-मानी करते रहे, करते नहीं मलाल |
अपनी-अपनी सोच है, अपनी-अपनी चाल |
होली में हुड़-दंग को, कुछ ने समझा टीक,
कुछ ने कीचड़ ही मला, कुछ ने मला गुलाल |
-०- 
होली के त्योहार पर, बरसें रंग हजार | 
शत्रु-मित्र हर एक का, पाएं अदभुत प्यार |
पाएं अदभुत प्यार, छ्टा हो रंग – बिरंगी,
रहे आप से दूर, दुष्ट – मन हर हुड़्दंगी |
कहे ‘राजकवि’ रहें, स्वस्थ सुन्दर सौभागी,
होली पर हों क्लेशहीन, होली – अनुरागी |
-०-



होली पर अपना रखें, नियमित हर आचार |
हर हुड़दंगी से रखें, प्रेम – पूर्ण व्यवहार |
प्रेम – पूर्ण व्यवहार, नहीं उलझें – उलझाएं,
नशेबाज से दूर रहें, अति निकट न जाएं |
कहे ‘राजकवि’ होली पर कविगण से बचना,
वरना लेंगे पकड़, सुनाएं घण्टों रचना |
-०- 
मौका पाकर कुछ करें, इतना रखें खयाल |
हावभाव से कुछ प्रकट,हो ना मनका हाल |
हो ना मन का हाल, भनक पत्नी ना पाए,
अगर प्रेमिका आंख बचाकर, रंग लगाए |
कहे ‘राजकवि’ ‘दूरदृष्टि’, अनु-पालन करना,
पत्नी से सौ कदम दूर,’उनका’ तन रंगना |
-०-
रंगे-हाथ पकड़े अगर, पत्नी तुमको मित्र |
चमचों से कहलाइए, खुद को श्रेष्ट चरित्र |
खुद को श्रेष्ट चरित्र, काम में सबको लाएं,
किसी जगह वे फंसें,आप भी उन्हें बचाएं |
कहे ‘राजकवि’सुनो,अगर यह नीति बनेगी,
कुछ वर्षों निर्विघ्न,’प्रेम की कथा’ चलेगी |
-०- 
होली के संग जल गई, दुख देती हर बात |
होली के हुड़दंग में, उभरे नव जज्बात |
उभरे नव जज्बात, प्रेम के अंकुर फूटे,
कुछ दिन में जुड़ जांय,सभी रिश्ते जो टूटे |
कहे’राजकवि’मन में,सबके ज्योति जलेगी,
सम्बन्धों की परिभाषा अब, नई बनेगी |
-०-
होली देती है हमें, एक नया संदेश |
धर्मध्वजा का उन्नयन करता उन्नत देश |
करता उन्नत देश, जागृति तब आएगी,
नई एकता जब,हम सब में बन जाएगी |
कहे’राजकवि’सुनो, तभी प्रभुता पाएंगे,
करके मुट्ठी बंद सभी,मुक्का बन जाएंगे |
-०-
भारतीय राजनीति पर छोटा सा व्यंग-
गए बरस जो कुछ हुआ,सभी जानते हाल |
देश बेच कर खा गए, बाकी रखी न खाल |
बाकी रखी न खाल,समझ किसने क्या खाया,
क्या क्या करते रहे,द्रमुक,ममता और माया |
कहे ‘राजकवि’मित्र पड़े,कुछ लोग मुलायम,
इसी वजह से भ्रष्ट अभी,कुर्सी पर कायम |
-०-
और चलते-चलते एक मुक्तक हिन्दुत्व पर-
हिन्दुत्व इस जगत में, हर पक्ष से भला है |
ना बन्द द्वार कोई, हर द्वार-पट खुला है |
कहने को कोई कुछ भी कहता रहे विषय पर,
हर कोण से जो परखी,जीने की वह कला है |

बस, अंत में एक शेर के साथ विदा-

फासले भी कर दिया करते हैं दूरी कम कभी,
पर कभी नजदीकियों से बढ गए हैं फासले |