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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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मंगलवार, 14 मई 2013

कबीर दास के दोहे



कबीर (लगभग १३९९ - १४९५) अपने समय के उच्च कोटि के संत और क्रांतिकारी सुधारक थे।कुछ प्रमुख कृतियाँ बीजक, कबीर ग्रंथावली और कबीर रचनावली।





दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय ।

जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ 1 ॥




तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय ।

कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय ॥ 2 ॥




माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।

कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥ 3 ॥




गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।

बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय ॥ 4 ॥




बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार ।

मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥ 5 ॥




कबिरा माला मनहि की, और संसारी भीख ।

माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख ॥ 6 ॥




सुख में सुमिरन ना किया, दु:ख में किया याद ।

कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥ 7 ॥




साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय ।

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥ 8 ॥




लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।

पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥ 9 ॥




जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान ।

मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥ 10 ॥




जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।

जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥ 11 ॥




धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ 12 ॥




कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और ।

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥ 13 ॥




पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।

एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥ 14 ॥




कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।

जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥ 15 ॥




शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।

तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥ 16 ॥




माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।

आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥ 17 ॥




माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥ 18 ॥




रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।

हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥ 19 ॥




नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग ।

और रसायन छांड़ि के, नाम रसायन लाग ॥ 20 ॥




जो तोकु कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल ।

तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल ॥ 21 ॥




दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार ।

तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥ 22 ॥



आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।

एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥ 23 ॥




काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।

पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥ 24 ॥




माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।

माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख ॥ 25 ॥




जहाँ आपा तहाँ आपदां, जहाँ संशय तहाँ रोग ।

कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग ॥ 26 ॥




माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय ।

भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय ॥ 27 ॥




आया था किस काम को, तु सोया चादर तान ।

सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान ॥ 28 ॥




क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह ।

साँस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह ॥ 29 ॥




गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच ।

हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ॥ 30 ॥




दुर्बल को न सताइए, जाकि मोटी हाय ।

बिना जीव की हाय से, लोहा भस्म हो जाय ॥ 31 ॥




दान दिए धन ना घते, नदी ने घटे नीर ।

अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥ 32 ॥




दस द्वारे का पिंजरा, तामें पंछी का कौन ।

रहे को अचरज है, गए अचम्भा कौन ॥ 33 ॥




ऐसी वाणी बोलेए, मन का आपा खोय ।

औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥ 34 ॥




हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट ।

बांधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट ॥ 35 ॥




कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार ।

साधु वचन जल रूप, बरसे अमृत धार ॥ 36 ॥




जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय ।

यह आपा तो ड़ाल दे, दया करे सब कोय ॥ 37 ॥




मैं रोऊँ जब जगत को, मोको रोवे न होय ।

मोको रोबे सोचना, जो शब्द बोय की होय ॥ 38 ॥




सोवा साधु जगाइए, करे नाम का जाप ।

यह तीनों सोते भले, साकित सिंह और साँप ॥ 39 ॥




अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक साथ ।

मानुष से पशुआ करे दाय, गाँठ से खात ॥ 40 ॥




बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ ।

नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥ 41 ॥




अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट ।

चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट ॥ 42 ॥




कबीरा जपना काठ की, क्या दिख्लावे मोय ।

ह्रदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय ॥ 43 ॥




पतिवृता मैली, काली कुचल कुरूप ।

पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥ 44 ॥




बैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।

एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥ 45 ॥




हर चाले तो मानव, बेहद चले सो साध ।

हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध ॥ 46 ॥




राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस ।

रहे कबीर पाखण्ड सब, झूठे सदा निराश ॥ 47 ॥




जाके जिव्या बन्धन नहीं, ह्र्दय में नहीं साँच ।

वाके संग न लागिये, खाले वटिया काँच ॥ 48 ॥




तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार ।

सत्गुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार ॥ 49 ॥




सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन ।

प्राण तजे बिन बिछड़े, सन्त कबीर कह दीन ॥ 50 ॥




समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय ।

मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥ 51 ॥




हंसा मोती विण्न्या, कुञ्च्न थार भराय ।

जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय ॥ 52 ॥




कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय ।

एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय ॥ 53 ॥




वस्तु है ग्राहक नहीं, वस्तु सागर अनमोल ।

बिना करम का मानव, फिरैं डांवाडोल ॥ 54 ॥




कली खोटा जग आंधरा, शब्द न माने कोय ।

चाहे कहँ सत आइना, जो जग बैरी होय ॥ 55 ॥




कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय ।

भक्ति करे कोइ सूरमा, जाति वरन कुल खोय ॥ 56 ॥




जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय ।

सूरत डोर लागी रहे, तार टूट नाहिं जाय ॥ 57 ॥




साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय ।

सार-सार को गहि रहे, थोथ देइ उड़ाय ॥ 58 ॥




लागी लगन छूटे नाहिं, जीभ चोंच जरि जाय ।

मीठा कहा अंगार में, जाहि चकोर चबाय ॥ 59 ॥




भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय ।

कह कबीर कुछ भेद नाहिं, कहां रंक कहां राय ॥ 60 ॥




घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार ।

बाल सनेही सांइयाँ, आवा अन्त का यार ॥ 61 ॥




अन्तर्यामी एक तुम, आत्मा के आधार ।

जो तुम छोड़ो हाथ तो, कौन उतारे पार ॥ 62 ॥




मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार ।

तुम दाता दु:ख भंजना, मेंरी करो सम्हार ॥ 63 ॥




प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।

राजा-परजा जेहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥ 64 ॥




प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय ।

लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ॥ 65 ॥




सुमिरन में मन लाइए, जैसे नाद कुरंग ।

कहैं कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजे तेहि संग ॥ 66 ॥




सुमरित सुरत जगाय कर, मुख के कछु न बोल ।

बाहर का पट बन्द कर, अन्दर का पट खोल ॥ 67 ॥




छीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार ।

हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार ॥ 68 ॥




ज्यों तिल मांही तेल है, ज्यों चकमक में आग ।

तेरा सांई तुझमें, बस जाग सके तो जाग ॥ 69 ॥




जा करण जग ढ़ूँढ़िया, सो तो घट ही मांहि ।

परदा दिया भरम का, ताते सूझे नाहिं ॥ 70 ॥




जबही नाम हिरदे घरा, भया पाप का नाश ।

मानो चिंगरी आग की, परी पुरानी घास ॥ 71 ॥




नहीं शीतल है चन्द्रमा, हिंम नहीं शीतल होय ।

कबीरा शीतल सन्त जन, नाम सनेही सोय ॥ 72 ॥




आहार करे मन भावता, इंदी किए स्वाद ।

नाक तलक पूरन भरे, तो का कहिए प्रसाद ॥ 73 ॥




जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति न होय ।

नाता तोड़े हरि भजे, भगत कहावें सोय ॥ 74 ॥




जल ज्यों प्यारा माहरी, लोभी प्यारा दाम ।

माता प्यारा बारका, भगति प्यारा नाम ॥ 75 ॥




दिल का मरहम ना मिला, जो मिला सो गर्जी ।

कह कबीर आसमान फटा, क्योंकर सीवे दर्जी ॥ 76 ॥




बानी से पह्चानिये, साम चोर की घात ।

अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह कई बात ॥ 77 ॥




जब लगि भगति सकाम है, तब लग निष्फल सेव ।

कह कबीर वह क्यों मिले, निष्कामी तज देव ॥ 78 ॥




फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त ।

जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त ॥ 79 ॥




दाया भाव ह्र्दय नहीं, ज्ञान थके बेहद ।

ते नर नरक ही जायेंगे, सुनि-सुनि साखी शब्द ॥ 80 ॥




दाया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय ।

सांई के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय ॥ 81 ॥




जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय ।

प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाय ॥ 82 ॥




छिन ही चढ़े छिन ही उतरे, सो तो प्रेम न होय ।

अघट प्रेम पिंजरे बसे, प्रेम कहावे सोय ॥ 83 ॥




जहाँ काम तहाँ नाम नहिं, जहाँ नाम नहिं वहाँ काम ।

दोनों कबहूँ नहिं मिले, रवि रजनी इक धाम ॥ 84 ॥




कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय ।

टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय ॥ 85 ॥




ऊँचे पानी न टिके, नीचे ही ठहराय ।

नीचा हो सो भरिए पिए, ऊँचा प्यासा जाय ॥ 86 ॥




सबते लघुताई भली, लघुता ते सब होय ।

जौसे दूज का चन्द्रमा, शीश नवे सब कोय ॥ 87 ॥




संत ही में सत बांटई, रोटी में ते टूक ।

कहे कबीर ता दास को, कबहूँ न आवे चूक ॥ 88 ॥




मार्ग चलते जो गिरा, ताकों नाहि दोष ।

यह कबिरा बैठा रहे, तो सिर करड़े दोष ॥ 89 ॥




जब ही नाम ह्रदय धरयो, भयो पाप का नाश ।

मानो चिनगी अग्नि की, परि पुरानी घास ॥ 90 ॥




काया काठी काल घुन, जतन-जतन सो खाय ।

काया वैध ईश बस, मर्म न काहू पाय ॥ 91 ॥




सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह ।

शब्द बिना साधु नही, द्रव्य बिना नहीं शाह ॥ 92 ॥




बाहर क्या दिखलाए, अनन्तर जपिए राम ।

कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम ॥ 93 ॥




फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम ।

कहे कबीर सेवक नहीं, चहै चौगुना दाम ॥ 94 ॥




तेरा साँई तुझमें, ज्यों पहुपन में बास ।

कस्तूरी का हिरन ज्यों, फिर-फिर ढ़ूँढ़त घास ॥ 95 ॥




कथा-कीर्तन कुल विशे, भवसागर की नाव ।

कहत कबीरा या जगत में नाहि और उपाव ॥ 96 ॥




कबिरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा ।

कै सेवा कर साधु की, कै गोविंद गुन गा ॥ 97 ॥




तन बोहत मन काग है, लक्ष योजन उड़ जाय ।

कबहु के धर्म अगम दयी, कबहुं गगन समाय ॥ 98 ॥




जहँ गाहक ता हूँ नहीं, जहाँ मैं गाहक नाँय ।

मूरख यह भरमत फिरे, पकड़ शब्द की छाँय ॥ 99 ॥




कहता तो बहुत मिला, गहता मिला न कोय ।

सो कहता वह जान दे, जो नहिं गहता होय ॥ 100 ॥


तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर ।

तब लग जीव जग कर्मवश, ज्यों लग ज्ञान न पूर ॥ 101 ॥




आस पराई राख्त, खाया घर का खेत ।

औरन को प्त बोधता, मुख में पड़ रेत ॥ 102 ॥




सोना, सज्जन, साधु जन, टूट जुड़ै सौ बार ।

दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, ऐके धका दरार ॥ 103 ॥




सब धरती कारज करूँ, लेखनी सब बनराय ।

सात समुद्र की मसि करूँ गुरुगुन लिखा न जाय ॥ 104 ॥




बलिहारी वा दूध की, जामे निकसे घीव ।

घी साखी कबीर की, चार वेद का जीव ॥ 105 ॥




आग जो लागी समुद्र में, धुआँ न प्रकट होय ।

सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय ॥ 106 ॥




साधु गाँठि न बाँधई, उदर समाता लेय ।

आगे-पीछे हरि खड़े जब भोगे तब देय ॥ 107 ॥




घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार ।

बाल सने ही सांइया, आवा अन्त का यार ॥ 108 ॥




कबिरा खालिक जागिया, और ना जागे कोय ।

जाके विषय विष भरा, दास बन्दगी होय ॥ 109 ॥




ऊँचे कुल में जामिया, करनी ऊँच न होय ।

सौरन कलश सुरा, भरी, साधु निन्दा सोय ॥ 110 ॥




सुमरण की सुब्यों करो ज्यों गागर पनिहार ।

होले-होले सुरत में, कहैं कबीर विचार ॥ 111 ॥




सब आए इस एक में, डाल-पात फल-फूल ।

कबिरा पीछा क्या रहा, गह पकड़ी जब मूल ॥ 112 ॥




जो जन भीगे रामरस, विगत कबहूँ ना रूख ।

अनुभव भाव न दरसते, ना दु:ख ना सुख ॥ 113 ॥




सिंह अकेला बन रहे, पलक-पलक कर दौर ।

जैसा बन है आपना, तैसा बन है और ॥ 114 ॥




यह माया है चूहड़ी, और चूहड़ा कीजो ।

बाप-पूत उरभाय के, संग ना काहो केहो ॥ 115 ॥




जहर की जर्मी में है रोपा, अभी खींचे सौ बार ।

कबिरा खलक न तजे, जामे कौन विचार ॥ 116 ॥




जग मे बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय ।

यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय ॥ 117 ॥




जो जाने जीव न आपना, करहीं जीव का सार ।

जीवा ऐसा पाहौना, मिले ना दूजी बार ॥ 118 ॥




कबीर जात पुकारया, चढ़ चन्दन की डार ।

बाट लगाए ना लगे फिर क्या लेत हमार ॥ 119 ॥




लोग भरोसे कौन के, बैठे रहें उरगाय ।

जीय रही लूटत जम फिरे, मैँढ़ा लुटे कसाय ॥ 120 ॥




एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहूँ तो गार ।

है जैसा तैसा हो रहे, रहें कबीर विचार ॥ 121 ॥




जो तु चाहे मुक्त को, छोड़े दे सब आस ।

मुक्त ही जैसा हो रहे, बस कुछ तेरे पास ॥ 122 ॥




साँई आगे साँच है, साँई साँच सुहाय ।

चाहे बोले केस रख, चाहे घौंट भुण्डाय ॥ 123 ॥




अपने-अपने साख की, सबही लीनी मान ।

हरि की बातें दुरन्तरा, पूरी ना कहूँ जान ॥ 124 ॥




खेत ना छोड़े सूरमा, जूझे दो दल मोह ।

आशा जीवन मरण की, मन में राखें नोह ॥ 125 ॥




लीक पुरानी को तजें, कायर कुटिल कपूत ।

लीख पुरानी पर रहें, शातिर सिंह सपूत ॥ 126 ॥




सन्त पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह ।

लखा जो चहे अलख को, उन्हीं में लख लेह ॥ 127 ॥




भूखा-भूखा क्या करे, क्या सुनावे लोग ।

भांडा घड़ निज मुख दिया, सोई पूर्ण जोग ॥ 128 ॥




गर्भ योगेश्वर गुरु बिना, लागा हर का सेव ।

कहे कबीर बैकुण्ठ से, फेर दिया शुक्देव ॥ 129 ॥




प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय ।

चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाय ॥ 130 ॥




कांचे भाडें से रहे, ज्यों कुम्हार का देह ।

भीतर से रक्षा करे, बाहर चोई देह ॥ 131 ॥




साँई ते सब होते है, बन्दे से कुछ नाहिं ।

राई से पर्वत करे, पर्वत राई माहिं ॥ 132 ॥




केतन दिन ऐसे गए, अन रुचे का नेह ।

अवसर बोवे उपजे नहीं, जो नहीं बरसे मेह ॥ 133 ॥




एक ते अनन्त अन्त एक हो जाय ।

एक से परचे भया, एक मोह समाय ॥ 134 ॥




साधु सती और सूरमा, इनकी बात अगाध ।

आशा छोड़े देह की, तन की अनथक साध ॥ 135 ॥




हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप ।

निशिवासर सुख निधि, लहा अन्न प्रगटा आप ॥ 136 ॥




आशा का ईंधन करो, मनशा करो बभूत ।

जोगी फेरी यों फिरो, तब वन आवे सूत ॥ 137 ॥




आग जो लगी समुद्र में, धुआँ ना प्रकट होय ।

सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय ॥ 138 ॥




अटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट ।

चुम्बक बिना निकले नहीं, कोटि पठन को फूट ॥ 139 ॥




अपने-अपने साख की, सब ही लीनी भान ।

हरि की बात दुरन्तरा, पूरी ना कहूँ जान ॥ 140 ॥




आस पराई राखता, खाया घर का खेत ।

और्न को पथ बोधता, मुख में डारे रेत ॥ 141 ॥




आवत गारी एक है, उलटन होय अनेक ।

कह कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक ॥ 142 ॥




आहार करे मनभावता, इंद्री की स्वाद ।

नाक तलक पूरन भरे, तो कहिए कौन प्रसाद ॥ 143 ॥




आए हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।

एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बाँधि जंजीर ॥ 144 ॥




आया था किस काम को, तू सोया चादर तान ।

सूरत सँभाल ए काफिला, अपना आप पह्चान ॥ 145 ॥




उज्जवल पहरे कापड़ा, पान-सुपरी खाय ।

एक हरि के नाम बिन, बाँधा यमपुर जाय ॥ 146 ॥




उतते कोई न आवई, पासू पूछूँ धाय ।

इतने ही सब जात है, भार लदाय लदाय ॥ 147 ॥




अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक होय ।

मानुष से पशुआ भया, दाम गाँठ से खोय ॥ 148 ॥




एक कहूँ तो है नहीं, दूजा कहूँ तो गार ।

है जैसा तैसा रहे, रहे कबीर विचार ॥ 149 ॥




ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए ।

औरन को शीतल करे, आपौ शीतल होय ॥ 150 ॥




कबीरा संग्ङति साधु की, जौ की भूसी खाय ।

खीर खाँड़ भोजन मिले, ताकर संग न जाय ॥ 151 ॥




एक ते जान अनन्त, अन्य एक हो आय ।

एक से परचे भया, एक बाहे समाय ॥ 152 ॥




कबीरा गरब न कीजिए, कबहूँ न हँसिये कोय ।

अजहूँ नाव समुद्र में, ना जाने का होय ॥ 153 ॥




कबीरा कलह अरु कल्पना, सतसंगति से जाय ।

दुख बासे भागा फिरै, सुख में रहै समाय ॥ 154 ॥




कबीरा संगति साधु की, जित प्रीत कीजै जाय ।

दुर्गति दूर वहावति, देवी सुमति बनाय ॥ 155 ॥




कबीरा संगत साधु की, निष्फल कभी न होय ।

होमी चन्दन बासना, नीम न कहसी कोय ॥ 156 ॥




को छूटौ इहिं जाल परि, कत फुरंग अकुलाय ।

ज्यों-ज्यों सुरझि भजौ चहै, त्यों-त्यों उरझत जाय ॥ 157 ॥




कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।

जम जब घर ले जाएँगे, पड़ा रहेगा म्यान ॥ 158 ॥




काह भरोसा देह का, बिनस जात छिन मारहिं ।

साँस-साँस सुमिरन करो, और यतन कछु नाहिं ॥ 159 ॥




काल करे से आज कर, सबहि सात तुव साथ ।

काल काल तू क्या करे काल काल के हाथ ॥ 160 ॥




काया काढ़ा काल घुन, जतन-जतन सो खाय ।

काया बह्रा ईश बस, मर्म न काहूँ पाय ॥ 161 ॥




कहा कियो हम आय कर, कहा करेंगे पाय ।

इनके भये न उतके, चाले मूल गवाय ॥ 162 ॥




कुटिल बचन सबसे बुरा, जासे होत न हार ।

साधु वचन जल रूप है, बरसे अम्रत धार ॥ 163 ॥




कहता तो बहूँना मिले, गहना मिला न कोय ।

सो कहता वह जान दे, जो नहीं गहना कोय ॥ 164 ॥




कबीरा मन पँछी भया, भये ते बाहर जाय ।

जो जैसे संगति करै, सो तैसा फल पाय ॥ 165 ॥




कबीरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर ।

ताहि का बखतर बने, ताहि की शमशेर ॥ 166 ॥




कहे कबीर देय तू, जब तक तेरी देह ।

देह खेह हो जाएगी, कौन कहेगा देह ॥ 167 ॥




करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय ।

बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय ॥ 168 ॥




कस्तूरी कुन्डल बसे, म्रग ढ़ूंढ़े बन माहिं ।

ऐसे घट-घट राम है, दुनिया देखे नाहिं ॥ 169 ॥




कबीरा सोता क्या करे, जागो जपो मुरार ।

एक दिना है सोवना, लांबे पाँव पसार ॥ 170 ॥




कागा काको घन हरे, कोयल काको देय ।

मीठे शब्द सुनाय के, जग अपनो कर लेय ॥ 171 ॥




कबिरा सोई पीर है, जो जा नैं पर पीर ।

जो पर पीर न जानइ, सो काफिर के पीर ॥ 172 ॥




कबिरा मनहि गयन्द है, आकुंश दै-दै राखि ।

विष की बेली परि रहै, अम्रत को फल चाखि ॥ 173 ॥




कबीर यह जग कुछ नहीं, खिन खारा मीठ ।

काल्ह जो बैठा भण्डपै, आज भसाने दीठ ॥ 174 ॥




कबिरा आप ठगाइए, और न ठगिए कोय ।

आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय ॥ 175 ॥




कथा कीर्तन कुल विशे, भव सागर की नाव ।

कहत कबीरा या जगत, नाहीं और उपाय ॥ 176 ॥




कबिरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा ।

कै सेवा कर साधु की, कै गोविंद गुनगा ॥ 177 ॥




कलि खोटा सजग आंधरा, शब्द न माने कोय ।

चाहे कहूँ सत आइना, सो जग बैरी होय ॥ 178 ॥




केतन दिन ऐसे गए, अन रुचे का नेह ।

अवसर बोवे उपजे नहीं, जो नहिं बरसे मेह ॥ 179 ॥




कबीर जात पुकारया, चढ़ चन्दन की डार ।

वाट लगाए ना लगे फिर क्या लेत हमार ॥ 180 ॥




कबीरा खालिक जागिया, और ना जागे कोय ।

जाके विषय विष भरा, दास बन्दगी होय ॥ 181 ॥




गाँठि न थामहिं बाँध ही, नहिं नारी सो नेह ।

कह कबीर वा साधु की, हम चरनन की खेह ॥ 182 ॥




खेत न छोड़े सूरमा, जूझे को दल माँह ।

आशा जीवन मरण की, मन में राखे नाँह ॥ 183 ॥




चन्दन जैसा साधु है, सर्पहि सम संसार ।

वाके अग्ङ लपटा रहे, मन मे नाहिं विकार ॥ 184 ॥




घी के तो दर्शन भले, खाना भला न तेल ।

दाना तो दुश्मन भला, मूरख का क्या मेल ॥ 185 ॥




गारी ही सो ऊपजे, कलह कष्ट और भींच ।

हारि चले सो साधु हैं, लागि चले तो नीच ॥ 186 ॥




चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय ।

दुइ पट भीतर आइके, साबित बचा न कोय ॥ 187 ॥




जा पल दरसन साधु का, ता पल की बलिहारी ।

राम नाम रसना बसे, लीजै जनम सुधारि ॥ 188 ॥




जब लग भक्ति से काम है, तब लग निष्फल सेव ।

कह कबीर वह क्यों मिले, नि:कामा निज देव ॥ 189 ॥




जो तोकूं काँटा बुवै, ताहि बोय तू फूल ।

तोकू फूल के फूल है, बाँकू है तिरशूल ॥ 190 ॥




जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान समान ।

जैसे खाल लुहार की, साँस लेतु बिन प्रान ॥ 191 ॥




ज्यों नैनन में पूतली, त्यों मालिक घर माहिं ।

मूर्ख लोग न जानिए, बहर ढ़ूंढ़त जांहि ॥ 192 ॥




जाके मुख माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप ।

पुछुप बास तें पामरा, ऐसा तत्व अनूप ॥ 193 ॥




जहाँ आप तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग ।

कह कबीर यह क्यों मिटैं, चारों बाधक रोग ॥ 194 ॥




जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान ।

मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥ 195 ॥




जल की जमी में है रोपा, अभी सींचें सौ बार ।

कबिरा खलक न तजे, जामे कौन वोचार ॥ 196 ॥




जहाँ ग्राहक तँह मैं नहीं, जँह मैं गाहक नाय ।

बिको न यक भरमत फिरे, पकड़ी शब्द की छाँय ॥ 197 ॥




झूठे सुख को सुख कहै, मानता है मन मोद ।

जगत चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद ॥ 198 ॥




जो तु चाहे मुक्ति को, छोड़ दे सबकी आस ।

मुक्त ही जैसा हो रहे, सब कुछ तेरे पास ॥ 199 ॥




जो जाने जीव आपना, करहीं जीव का सार ।

जीवा ऐसा पाहौना, मिले न दीजी बार ॥ 200 ॥


ते दिन गये अकारथी, संगत भई न संत ।

प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत ॥ 201 ॥




तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर न होय ।

माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय ॥ 202 ॥




तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय ।

सहजै सब विधि पाइये, जो मन जोगी होय ॥ 203 ॥




तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे नसूर ।

तब लग जीव जग कर्मवश, जब लग ज्ञान ना पूर ॥ 204 ॥




दुर्लभ मानुष जनम है, देह न बारम्बार ।

तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥ 205 ॥




दस द्वारे का पींजरा, तामें पंछी मौन ।

रहे को अचरज भयौ, गये अचम्भा कौन ॥ 206 ॥




धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।

माली सीचें सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ 207 ॥




न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय ।

मीन सदा जल में रहै, धोये बास न जाय ॥ 208 ॥




पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।

एक पहर भी नाम बीन, मुक्ति कैसे होय ॥ 209 ॥




पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय ।

ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंड़ित होय ॥ 210 ॥




पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात ।

देखत ही छिप जाएगा, ज्यों सारा परभात ॥ 211 ॥




पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजौं पहार ।

याते ये चक्की भली, पीस खाय संसार ॥ 212 ॥




पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय ।

अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय ॥ 213 ॥




प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय ।

चाहे घर में बास कर, चाहे बन मे जाय ॥ 214 ॥




बन्धे को बँनधा मिले, छूटे कौन उपाय ।

कर संगति निरबन्ध की, पल में लेय छुड़ाय ॥ 215 ॥




बूँद पड़ी जो समुद्र में, ताहि जाने सब कोय ।

समुद्र समाना बूँद में, बूझै बिरला कोय ॥ 216 ॥




बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जपिए राम ।

कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम ॥ 217 ॥




बानी से पहचानिए, साम चोर की घात ।

अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह की बात ॥ 218 ॥




बड़ा हुआ सो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।

पँछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ॥ 219 ॥




मूँड़ मुड़ाये हरि मिले, सब कोई लेय मुड़ाय ।

बार-बार के मुड़ते, भेड़ न बैकुण्ठ जाय ॥ 220 ॥




माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश ।

जा ठग ने ठगनी ठगो, ता ठग को आदेश ॥ 221 ॥




भज दीना कहूँ और ही, तन साधुन के संग ।

कहैं कबीर कारी गजी, कैसे लागे रंग ॥ 222 ॥




माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय ।

भागत के पीछे लगे, सन्मुख भागे सोय ॥ 223 ॥




मथुरा भावै द्वारिका, भावे जो जगन्नाथ ।

साधु संग हरि भजन बिनु, कछु न आवे हाथ ॥ 224 ॥




माली आवत देख के, कलियान करी पुकार ।

फूल-फूल चुन लिए, काल हमारी बार ॥ 225 ॥




मैं रोऊँ सब जगत् को, मोको रोवे न कोय ।

मोको रोवे सोचना, जो शब्द बोय की होय ॥ 226 ॥




ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं ।

सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठें घर माहिं ॥ 227 ॥




या दुनियाँ में आ कर, छाँड़ि देय तू ऐंठ ।

लेना हो सो लेइले, उठी जात है पैंठ ॥ 228 ॥




राम नाम चीन्हा नहीं, कीना पिंजर बास ।

नैन न आवे नीदरौं, अलग न आवे भास ॥ 229 ॥




रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।

हीरा जन्म अनमोल था, कौंड़ी बदले जाए ॥ 230 ॥




राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय ।

जो सुख साधु सगं में, सो बैकुंठ न होय ॥ 231 ॥




संगति सों सुख्या ऊपजे, कुसंगति सो दुख होय ।

कह कबीर तहँ जाइये, साधु संग जहँ होय ॥ 232 ॥




साहिब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय ।

ज्यों मेहँदी के पात में, लाली रखी न जाय ॥ 233 ॥




साँझ पड़े दिन बीतबै, चकवी दीन्ही रोय ।

चल चकवा वा देश को, जहाँ रैन नहिं होय ॥ 234 ॥




संह ही मे सत बाँटे, रोटी में ते टूक ।

कहे कबीर ता दास को, कबहुँ न आवे चूक ॥ 235 ॥




साईं आगे साँच है, साईं साँच सुहाय ।

चाहे बोले केस रख, चाहे घौंट मुण्डाय ॥ 236 ॥




लकड़ी कहै लुहार की, तू मति जारे मोहिं ।

एक दिन ऐसा होयगा, मैं जारौंगी तोहि ॥ 237 ॥




हरिया जाने रुखड़ा, जो पानी का गेह ।

सूखा काठ न जान ही, केतुउ बूड़ा मेह ॥ 238 ॥




ज्ञान रतन का जतनकर माटी का संसार ।

आय कबीर फिर गया, फीका है संसार ॥ 239 ॥




ॠद्धि सिद्धि माँगो नहीं, माँगो तुम पै येह ।

निसि दिन दरशन शाधु को, प्रभु कबीर कहुँ देह ॥ 240 ॥




क्षमा बड़े न को उचित है, छोटे को उत्पात ।

कहा विष्णु का घटि गया, जो भुगु मारीलात ॥ 241 ॥




राम-नाम कै पटं तरै, देबे कौं कुछ नाहिं ।

क्या ले गुर संतोषिए, हौंस रही मन माहिं ॥ 242 ॥




बलिहारी गुर आपणौ, घौंहाड़ी कै बार ।

जिनि भानिष तैं देवता, करत न लागी बार ॥ 243 ॥




ना गुरु मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव ।

दुन्यू बूड़े धार में, चढ़ि पाथर की नाव ॥ 244 ॥




सतगुर हम सूं रीझि करि, एक कह्मा कर संग ।

बरस्या बादल प्रेम का, भींजि गया अब अंग ॥ 245 ॥




कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीष ।

स्वाँग जती का पहरि करि, धरि-धरि माँगे भीष ॥ 246 ॥




यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।

सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान ॥ 247 ॥




तू तू करता तू भया, मुझ में रही न हूँ ।

वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तू ॥ 248 ॥



राम पियारा छांड़ि करि, करै आन का जाप ।

बेस्या केरा पूतं ज्यूं, कहै कौन सू बाप ॥ 249 ॥



कबीरा प्रेम न चषिया, चषि न लिया साव ।

सूने घर का पांहुणां, ज्यूं आया त्यूं जाव ॥ 250 ॥



कबीरा राम रिझाइ लै, मुखि अमृत गुण गाइ ।

फूटा नग ज्यूं जोड़ि मन, संधे संधि मिलाइ ॥ 251 ॥



लंबा मारग, दूरिधर, विकट पंथ, बहुमार ।

कहौ संतो, क्यूं पाइये, दुर्लभ हरि-दीदार ॥ 252 ॥




बिरह-भुवगम तन बसै मंत्र न लागै कोइ ।

राम-बियोगी ना जिवै जिवै तो बौरा होइ ॥ 253 ॥




यह तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाउं ।

लेखणि करूं करंक की, लिखी-लिखी राम पठाउं ॥ 254 ॥




अंदेसड़ा न भाजिसी, सदैसो कहियां ।

के हरि आयां भाजिसी, कैहरि ही पास गयां ॥ 255 ॥




इस तन का दीवा करौ, बाती मेल्यूं जीवउं ।

लोही सींचो तेल ज्यूं, कब मुख देख पठिउं ॥ 256 ॥




अंषड़ियां झाईं पड़ी, पंथ निहारि-निहारि ।

जीभड़ियाँ छाला पड़या, राम पुकारि-पुकारि ॥ 257 ॥




सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त ।

और न कोई सुणि सकै, कै साईं के चित्त ॥ 258 ॥




जो रोऊँ तो बल घटै, हँसो तो राम रिसाइ ।

मन ही माहिं बिसूरणा, ज्यूँ घुँण काठहिं खाइ ॥ 259 ॥




कबीर हँसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौ चित्त ।

बिन रोयां क्यूं पाइये, प्रेम पियारा मित्व ॥ 260 ॥




सुखिया सब संसार है, खावै और सोवे ।

दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रौवे ॥ 261 ॥




परबति परबति मैं फिरया, नैन गंवाए रोइ ।

सो बूटी पाऊँ नहीं, जातैं जीवनि होइ ॥ 262 ॥




पूत पियारौ पिता कौं, गौहनि लागो घाइ ।

लोभ-मिठाई हाथ दे, आपण गयो भुलाइ ॥ 263 ॥




हाँसी खैलो हरि मिलै, कौण सहै षरसान ।

काम क्रोध त्रिष्णं तजै, तोहि मिलै भगवान ॥ 264 ॥




जा कारणि में ढ़ूँढ़ती, सनमुख मिलिया आइ ।

धन मैली पिव ऊजला, लागि न सकौं पाइ ॥ 265 ॥




पहुँचेंगे तब कहैगें, उमड़ैंगे उस ठांई ।

आजहूं बेरा समंद मैं, बोलि बिगू पैं काई ॥ 266 ॥




दीठा है तो कस कहूं, कह्मा न को पतियाइ ।

हरि जैसा है तैसा रहो, तू हरिष-हरिष गुण गाइ ॥ 267 ॥




भारी कहौं तो बहुडरौं, हलका कहूं तौ झूठ ।

मैं का जाणी राम कूं नैनूं कबहूं न दीठ ॥ 268 ॥




कबीर एक न जाण्यां, तो बहु जाण्यां क्या होइ ।

एक तै सब होत है, सब तैं एक न होइ ॥ 269 ॥




कबीर रेख स्यंदूर की, काजल दिया न जाइ ।

नैनूं रमैया रमि रह्मा, दूजा कहाँ समाइ ॥ 270 ॥




कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउं ।

गले राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाउं ॥ 271 ॥




कबीर कलिजुग आइ करि, कीये बहुत जो भीत ।

जिन दिल बांध्या एक सूं, ते सुख सोवै निचींत ॥ 272 ॥




जब लग भगहित सकामता, सब लग निर्फल सेव ।

कहै कबीर वै क्यूँ मिलै निह्कामी निज देव ॥ 273 ॥




पतिबरता मैली भली, गले कांच को पोत ।

सब सखियन में यों दिपै, ज्यों रवि ससि को जोत ॥ 274 ॥




कामी अभी न भावई, विष ही कौं ले सोधि ।

कुबुध्दि न जीव की, भावै स्यंभ रहौ प्रमोथि ॥ 275 ॥




भगति बिगाड़ी कामियां, इन्द्री केरै स्वादि ।

हीरा खोया हाथ थैं, जनम गँवाया बादि ॥ 276 ॥




परनारी का राचणौ, जिसकी लहसण की खानि ।

खूणैं बेसिर खाइय, परगट होइ दिवानि ॥ 277 ॥




परनारी राता फिरैं, चोरी बिढ़िता खाहिं ।

दिवस चारि सरसा रहै, अति समूला जाहिं ॥ 288 ॥




ग्यानी मूल गँवाइया, आपण भये करना ।

ताथैं संसारी भला, मन मैं रहै डरना ॥ 289 ॥




कामी लज्जा ना करै, न माहें अहिलाद ।

नींद न माँगै साँथरा, भूख न माँगे स्वाद ॥ 290 ॥




कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि घरी खटाइ ।

राज-दुबारा यौं फिरै, ज्यँ हरिहाई गाइ ॥ 291 ॥




स्वामी हूवा सीतका, पैलाकार पचास ।

राम-नाम काठें रह्मा, करै सिषां की आंस ॥ 292 ॥




इहि उदर के कारणे, जग पाच्यो निस जाम ।

स्वामी-पणौ जो सिरि चढ़यो, सिर यो न एको काम ॥ 293 ॥




ब्राह्म्ण गुरु जगत् का, साधू का गुरु नाहिं ।

उरझि-पुरझि करि भरि रह्मा, चारिउं बेदा मांहि ॥ 294 ॥




कबीर कलि खोटी भई, मुनियर मिलै न कोइ ।

लालच लोभी मसकरा, तिनकूँ आदर होइ ॥ 295 ॥




कलि का स्वमी लोभिया, मनसा घरी बधाई ।

दैंहि पईसा ब्याज़ को, लेखां करता जाई ॥ 296 ॥




कबीर इस संसार कौ, समझाऊँ कै बार ।

पूँछ जो पकड़ै भेड़ की उतर या चाहे पार ॥ 297 ॥




तीरथ करि-करि जग मुवा, डूंधै पाणी न्हाइ ।

रामहि राम जपतंडां, काल घसीटया जाइ ॥ 298 ॥




चतुराई सूवै पढ़ी, सोइ पंजर मांहि ।

फिरि प्रमोधै आन कौं, आपण समझे नाहिं ॥ 299 ॥




कबीर मन फूल्या फिरै, करता हूँ मैं घ्रंम ।

कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम ॥ 300 ॥


सबै रसाइण मैं क्रिया, हरि सा और न कोई ।

तिल इक घर मैं संचरे, तौ सब तन कंचन होई ॥ 301 ॥




हरि-रस पीया जाणिये, जे कबहुँ न जाइ खुमार ।

मैमता घूमत रहै, नाहि तन की सार ॥ 302 ॥




कबीर हरि-रस यौं पिया, बाकी रही न थाकि ।

पाका कलस कुंभार का, बहुरि न चढ़ई चाकि ॥ 303 ॥




कबीर भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आई ।

सिर सौंपे सोई पिवै, नहीं तौ पिया न जाई ॥ 304 ॥




त्रिक्षणा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ ।

जवासा के रुष ज्यूं, घण मेहां कुमिलाइ ॥ 305 ॥




कबीर सो घन संचिये, जो आगे कू होइ ।

सीस चढ़ाये गाठ की जात न देख्या कोइ ॥ 306 ॥




कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खांड़ ।

सतगुरु की कृपा भई, नहीं तौ करती भांड़ ॥ 307 ॥




कबीर माया पापरगी, फंध ले बैठी हाटि ।

सब जग तौ फंधै पड्या, गया कबीर काटि ॥ 308 ॥




कबीर जग की जो कहै, भौ जलि बूड़ै दास ।

पारब्रह्म पति छांड़ि करि, करै मानि की आस ॥ 309 ॥




बुगली नीर बिटालिया, सायर चढ़या कलंक ।

और पखेरू पी गये, हंस न बौवे चंच ॥ 310 ॥




कबीर इस संसार का, झूठा माया मोह ।

जिहि धारि जिता बाधावणा, तिहीं तिता अंदोह ॥ 311 ॥




माया तजी तौ क्या भया, मानि तजि नही जाइ ।

मानि बड़े मुनियर मिले, मानि सबनि को खाइ ॥ 312 ॥




करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि करि तुंड ।

जाने-बूझै कुछ नहीं, यौं ही अंधा रुंड ॥ 313 ॥




कबीर पढ़ियो दूरि करि, पुस्तक देइ बहाइ ।

बावन आषिर सोधि करि, ररै मर्मे चित्त लाइ ॥ 314 ॥




मैं जाण्यूँ पाढ़िबो भलो, पाढ़िबा थे भलो जोग ।

राम-नाम सूं प्रीती करि, भल भल नींयो लोग ॥ 315 ॥




पद गाएं मन हरषियां, साषी कह्मां अनंद ।

सो तत नांव न जाणियां, गल में पड़िया फंद ॥ 316 ॥




जैसी मुख तै नीकसै, तैसी चाले चाल ।

पार ब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल ॥ 317 ॥




काजी-मुल्ला भ्रमियां, चल्या युनीं कै साथ ।

दिल थे दीन बिसारियां, करद लई जब हाथ ॥ 318 ॥




प्रेम-प्रिति का चालना, पहिरि कबीरा नाच ।

तन-मन तापर वारहुँ, जो कोइ बौलौ सांच ॥ 319 ॥




सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।

जाके हिरदै में सांच है, ताके हिरदै हरि आप ॥ 320 ॥




खूब खांड है खीचड़ी, माहि ष्डयाँ टुक कून ।

देख पराई चूपड़ी, जी ललचावे कौन ॥ 321 ॥




साईं सेती चोरियाँ, चोरा सेती गुझ ।

जाणैंगा रे जीवएगा, मार पड़ैगी तुझ ॥ 322 ॥




तीरथ तो सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाय ।

कबीर मूल निकंदिया, कौण हलाहल खाय ॥ 323 ॥




जप-तप दीसैं थोथरा, तीरथ व्रत बेसास ।

सूवै सैंबल सेविया, यौ जग चल्या निरास ॥ 324 ॥




जेती देखौ आत्म, तेता सालिगराम ।

राधू प्रतषि देव है, नहीं पाथ सूँ काम ॥ 325 ॥




कबीर दुनिया देहुरै, सीत नवांवरग जाइ ।

हिरदा भीतर हरि बसै, तू ताहि सौ ल्यो लाइ ॥ 326 ॥




मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाणि ।

दसवां द्वारा देहुरा, तामै जोति पिछिरिग ॥ 327 ॥




मेरे संगी दोइ जरग, एक वैष्णौ एक राम ।

वो है दाता मुक्ति का, वो सुमिरावै नाम ॥ 328 ॥




मथुरा जाउ भावे द्वारिका, भावै जाउ जगनाथ ।

साथ-संगति हरि-भागति बिन-कछु न आवै हाथ ॥ 329 ॥




कबीर संगति साधु की, बेगि करीजै जाइ ।

दुर्मति दूरि बंबाइसी, देसी सुमति बताइ ॥ 330 ॥




उज्जवल देखि न धीजिये, वग ज्यूं माडै ध्यान ।

धीर बौठि चपेटसी, यूँ ले बूडै ग्यान ॥ 331 ॥




जेता मीठा बोलरगा, तेता साधन जारिग ।

पहली था दिखाइ करि, उडै देसी आरिग ॥ 332 ॥




जानि बूझि सांचहिं तर्जे, करै झूठ सूँ नेहु ।

ताकि संगति राम जी, सुपिने ही पिनि देहु ॥ 333 ॥




कबीर तास मिलाइ, जास हियाली तू बसै ।

नहिंतर बेगि उठाइ, नित का गंजर को सहै ॥ 334 ॥




कबीरा बन-बन मे फिरा, कारणि आपणै राम ।

राम सरीखे जन मिले, तिन सारे सवेरे काम ॥ 335 ॥




कबीर मन पंषो भया, जहाँ मन वहाँ उड़ि जाय ।

जो जैसी संगति करै, सो तैसे फल खाइ ॥ 336 ॥




कबीरा खाई कोट कि, पानी पिवै न कोई ।

जाइ मिलै जब गंग से, तब गंगोदक होइ ॥ 337 ॥




माषी गुड़ मैं गड़ि रही, पंख रही लपटाई ।

ताली पीटै सिरि घुनै, मीठै बोई माइ ॥ 338 ॥




मूरख संग न कीजिये, लोहा जलि न तिराइ ।

कदली-सीप-भुजगं मुख, एक बूंद तिहँ भाइ ॥ 339 ॥




हरिजन सेती रुसणा, संसारी सूँ हेत ।

ते णर कदे न नीपजौ, ज्यूँ कालर का खेत ॥ 340 ॥

काजल केरी कोठड़ी, तैसी यहु संसार ।

बलिहारी ता दास की, पैसिर निकसण हार ॥ 341 ॥




पाणी हीतै पातला, धुवाँ ही तै झीण ।

पवनां बेगि उतावला, सो दोस्त कबीर कीन्ह ॥ 342 ॥




आसा का ईंधण करूँ, मनसा करूँ बिभूति ।

जोगी फेरी फिल करूँ, यौं बिनना वो सूति ॥ 343 ॥




कबीर मारू मन कूँ, टूक-टूक है जाइ ।

विव की क्यारी बोइ करि, लुणत कहा पछिताइ ॥ 353 ॥




कागद केरी नाव री, पाणी केरी गंग ।

कहै कबीर कैसे तिरूँ, पंच कुसंगी संग ॥ 354 ॥




मैं मन्ता मन मारि रे, घट ही माहैं घेरि ।

जबहीं चालै पीठि दे, अंकुस दै-दै फेरि ॥ 355 ॥




मनह मनोरथ छाँड़िये, तेरा किया न होइ ।

पाणी में घीव नीकसै, तो रूखा खाइ न कोइ ॥ 356 ॥




एक दिन ऐसा होएगा, सब सूँ पड़े बिछोइ ।

राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होइ ॥ 357 ॥




कबीर नौबत आपणी, दिन-दस लेहू बजाइ ।

ए पुर पाटन, ए गली, बहुरि न देखै आइ ॥ 358 ॥




जिनके नौबति बाजती, भैंगल बंधते बारि ।

एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि ॥ 359 ॥




कहा कियौ हम आइ करि, कहा कहैंगे जाइ ।

इत के भये न उत के, चलित भूल गँवाइ ॥ 360 ॥




बिन रखवाले बाहिरा, चिड़िया खाया खेत ।

आधा-परधा ऊबरै, चेति सकै तो चैति ॥ 361 ॥




कबीर कहा गरबियौ, काल कहै कर केस ।

ना जाणै कहाँ मारिसी, कै धरि के परदेस ॥ 362 ॥




नान्हा कातौ चित्त दे, महँगे मोल बिलाइ ।

गाहक राजा राम है, और न नेडा आइ ॥ 363 ॥




उजला कपड़ा पहिरि करि, पान सुपारी खाहिं ।

एकै हरि के नाव बिन, बाँधे जमपुरि जाहिं ॥ 364 ॥




कबीर केवल राम की, तू जिनि छाँड़ै ओट ।

घण-अहरनि बिचि लौह ज्यूँ, घणी सहै सिर चोट ॥ 365 ॥




मैं-मैं बड़ी बलाइ है सकै तो निकसौ भाजि ।

कब लग राखौ हे सखी, रुई लपेटी आगि ॥ 366 ॥




कबीर माला मन की, और संसारी भेष ।

माला पहरयां हरि मिलै, तौ अरहट कै गलि देखि ॥ 367 ॥




माला पहिरै मनभुषी, ताथै कछू न होइ ।

मन माला को फैरता, जग उजियारा सोइ ॥ 368 ॥




कैसो कहा बिगाड़िया, जो मुंडै सौ बार ।

मन को काहे न मूंडिये, जामे विषम-विकार ॥ 369 ॥




माला पहरयां कुछ नहीं, भगति न आई हाथ ।

माथौ मूँछ मुंडाइ करि, चल्या जगत् के साथ ॥ 370 ॥




बैसनो भया तौ क्या भया, बूझा नहीं बबेक ।

छापा तिलक बनाइ करि, दगहया अनेक ॥ 371 ॥




स्वाँग पहरि सो रहा भया, खाया-पीया खूंदि ।

जिहि तेरी साधु नीकले, सो तो मेल्ही मूंदि ॥ 372 ॥




चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात ।

एक निस प्रेही निरधार का गाहक गोपीनाथ ॥ 373 ॥




एष ले बूढ़ी पृथमी, झूठे कुल की लार ।

अलष बिसारयो भेष में, बूड़े काली धार ॥ 374 ॥




कबीर हरि का भावता, झीणां पंजर ।

रैणि न आवै नींदड़ी, अंगि न चढ़ई मांस ॥ 375 ॥




सिंहों के लेहँड नहीं, हंसों की नहीं पाँत ।

लालों की नहि बोरियाँ, साध न चलै जमात ॥ 376 ॥




गाँठी दाम न बांधई, नहिं नारी सों नेह ।

कह कबीर ता साध की, हम चरनन की खेह ॥ 377 ॥




निरबैरी निहकामता, साईं सेती नेह ।

विषिया सूं न्यारा रहै, संतनि का अंग सह ॥ 378 ॥




जिहिं हिरदै हरि आइया, सो क्यूं छाना होइ ।

जतन-जतन करि दाबिये, तऊ उजाला सोइ ॥ 379 ॥




काम मिलावे राम कूं, जे कोई जाणै राखि ।

कबीर बिचारा क्या कहै, जाकि सुख्देव बोले साख ॥ 380 ॥




राम वियोगी तन बिकल, ताहि न चीन्हे कोई ।

तंबोली के पान ज्यूं, दिन-दिन पीला होई ॥ 381 ॥




पावक रूपी राम है, घटि-घटि रह्या समाइ ।

चित चकमक लागै नहीं, ताथै घूवाँ है-है जाइ ॥ 382 ॥




फाटै दीदै में फिरौं, नजिर न आवै कोई ।

जिहि घटि मेरा साँइयाँ, सो क्यूं छाना होई ॥ 383 ॥




हैवर गैवर सघन धन, छत्रपती की नारि ।

तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि ॥ 384 ॥




जिहिं धरि साध न पूजि, हरि की सेवा नाहिं ।

ते घर भड़धट सारषे, भूत बसै तिन माहिं ॥ 385 ॥




कबीर कुल तौ सोभला, जिहि कुल उपजै दास ।

जिहिं कुल दास न उपजै, सो कुल आक-पलास ॥ 386 ॥




क्यूं नृप-नारी नींदिये, क्यूं पनिहारी कौ मान ।

वा माँग सँवारे पील कौ, या नित उठि सुमिरैराम ॥ 387 ॥




काबा फिर कासी भया, राम भया रे रहीम ।

मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम ॥ 388 ॥




दुखिया भूखा दुख कौं, सुखिया सुख कौं झूरि ।

सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि ॥ 389 ॥




कबीर दुबिधा दूरि करि, एक अंग है लागि ।

यहु सीतल बहु तपति है, दोऊ कहिये आगि ॥ 390 ॥




कबीर का तू चिंतवै, का तेरा च्यंत्या होइ ।

अण्च्यंत्या हरिजी करै, जो तोहि च्यंत न होइ ॥ 391 ॥




भूखा भूखा क्या करैं, कहा सुनावै लोग ।

भांडा घड़ि जिनि मुख यिका, सोई पूरण जोग ॥ 392 ॥




रचनाहार कूं चीन्हि लै, खैबे कूं कहा रोइ ।

दिल मंदि मैं पैसि करि, ताणि पछेवड़ा सोइ ॥ 393 ॥




कबीर सब जग हंडिया, मांदल कंधि चढ़ाइ ।

हरि बिन अपना कोउ नहीं, देखे ठोकि बनाइ ॥ 394 ॥




मांगण मरण समान है, बिरता बंचै कोई ।

कहै कबीर रघुनाथ सूं, मति रे मंगावे मोहि ॥ 395 ॥




मानि महतम प्रेम-रस गरवातण गुण नेह ।

ए सबहीं अहला गया, जबही कह्या कुछ देह ॥ 396 ॥




संत न बांधै गाठड़ी, पेट समाता-तेइ ।

साईं सूं सनमुख रहै, जहाँ माँगे तहां देइ ॥ 397 ॥




कबीर संसा कोउ नहीं, हरि सूं लाग्गा हेत ।

काम-क्रोध सूं झूझणा, चौडै मांड्या खेत ॥ 398 ॥




कबीर सोई सूरिमा, मन सूँ मांडै झूझ ।

पंच पयादा पाड़ि ले, दूरि करै सब दूज ॥ 399 ॥




जिस मरनै यैं जग डरै, सो मेरे आनन्द ।

कब मरिहूँ कब देखिहूँ पूरन परमानंद ॥ 400 ॥


अब तौ जूझया ही बरगै, मुडि चल्यां घर दूर ।

सिर साहिबा कौ सौंपता, सोंच न कीजै सूर ॥ 401 ॥




कबीर घोड़ा प्रेम का, चेतनि चाढ़ि असवार ।

ग्यान खड़ग गहि काल सिरि, भली मचाई मार ॥ 402 ॥




कबीर हरि सब कूँ भजै, हरि कूँ भजै न कोइ ।

जब लग आस सरीर की, तब लग दास न होइ ॥ 403 ॥




सिर साटें हरि सेवेये, छांड़ि जीव की बाणि ।

जे सिर दीया हरि मिलै, तब लगि हाणि न जाणि ॥ 404 ॥




जेते तारे रैणि के, तेतै बैरी मुझ ।

धड़ सूली सिर कंगुरै, तऊ न बिसारौ तुझ ॥ 405 ॥




आपा भेटियाँ हरि मिलै, हरि मेट् या सब जाइ ।

अकथ कहाणी प्रेम की, कह्या न कोउ पत्याइ ॥ 406 ॥




जीवन थैं मरिबो भलौ, जो मरि जानैं कोइ ।

मरनैं पहली जे मरै, जो कलि अजरावर होइ ॥ 407 ॥




कबीर मन मृतक भया, दुर्बल भया सरीर ।

तब पैंडे लागा हरि फिरै, कहत कबीर कबीर ॥ 408 ॥




रोड़ा है रहो बाट का, तजि पाषंड अभिमान ।

ऐसा जे जन है रहै, ताहि मिलै भगवान ॥ 409 ॥




कबीर चेरा संत का, दासनि का परदास ।

कबीर ऐसैं होइ रक्षा, ज्यूँ पाऊँ तलि घास ॥ 410 ॥




अबरन कों का बरनिये, भोपै लख्या न जाइ ।

अपना बाना वाहिया, कहि-कहि थाके भाइ ॥ 411 ॥




जिसहि न कोई विसहि तू, जिस तू तिस सब कोई ।

दरिगह तेरी सांइयाँ, जा मरूम कोइ होइ ॥ 412 ॥




साँई मेरा वाणियां, सहति करै व्यौपार ।

बिन डांडी बिन पालड़ै तौले सब संसार ॥ 413 ॥




झल बावै झल दाहिनै, झलहि माहि त्योहार ।

आगै-पीछै झलमाई, राखै सिरजनहार ॥ 414 ॥




एसी बाणी बोलिये, मन का आपा खोइ ।

औरन को सीतल करै, आपौ सीतल होइ ॥ 415 ॥




कबीर हरि कग नाव सूँ प्रीति रहै इकवार ।

तौ मुख तैं मोती झड़ै हीरे अन्त न पार ॥ 416 ॥




बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार ।

दुहुँ चूका रीता पड़ै वाकूँ वार न पार ॥ 417 ॥




कोई एक राखै सावधां, चेतनि पहरै जागि ।

बस्तर बासन सूँ खिसै, चोर न सकई लागि ॥ 418 ॥




बारी-बारी आपणीं, चले पियारे म्यंत ।

तेरी बारी रे जिया, नेड़ी आवै निंत ॥ 419 ॥




पदारथ पेलि करि, कंकर लीया हाथि ।

जोड़ी बिछटी हंस की, पड़या बगां के साथि ॥ 420 ॥




निंदक नियारे राखिये, आंगन कुटि छबाय ।

बिन पाणी बिन सबुना, निरमल करै सुभाय ॥ 421 ॥




गोत्यंद के गुण बहुत हैं, लिखै जु हिरदै मांहि ।

डरता पाणी जा पीऊं, मति वै धोये जाहि ॥ 422 ॥




जो ऊग्या सो आंथवै, फूल्या सो कुमिलाइ ।

जो चिणियां सो ढहि पड़ै, जो आया सो जाइ ॥ 423 ॥




सीतलता तब जाणियें, समिता रहै समाइ ।

पष छाँड़ै निरपष रहै, सबद न देष्या जाइ ॥ 424 ॥




खूंदन तौ धरती सहै, बाढ़ सहै बनराइ ।

कुसबद तौ हरिजन सहै, दूजै सह्या न जाइ ॥ 425 ॥




नीर पियावत क्या फिरै, सायर घर-घर बारि ।

जो त्रिषावन्त होइगा, सो पीवेगा झखमारि ॥ 426 ॥

कबीर सिरजन हार बिन, मेरा हित न कोइ ।

गुण औगुण बिहणै नहीं, स्वारथ बँधी लोइ ॥ 427 ॥




हीरा परा बजार में, रहा छार लपिटाइ ।

ब तक मूरख चलि गये पारखि लिया उठाइ ॥ 428 ॥




सुरति करौ मेरे साइयां, हम हैं भोजन माहिं ।

आपे ही बहि जाहिंगे, जौ नहिं पकरौ बाहिं ॥ 429 ॥




क्या मुख लै बिनती करौं, लाज आवत है मोहि ।

तुम देखत ओगुन करौं, कैसे भावों तोहि ॥ 430 ॥




सब काहू का लीजिये, साचां सबद निहार ।

पच्छपात ना कीजिये कहै कबीर विचार ॥ 431 ॥




॥ गुरु के विषय में दोहे ॥




गुरु सों ज्ञान जु लीजिये सीस दीजिए दान ।

बहुतक भोदूँ बहि गये, राखि जीव अभिमान ॥ 432 ॥




गुरु को कीजै दण्डव कोटि-कोटि परनाम ।

कीट न जाने भृगं को, गुरु करले आप समान ॥ 433 ॥




कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय ।

जनम-जनम का मोरचा, पल में डारे धोय ॥ 434 ॥




गुरु पारस को अन्तरो, जानत है सब सन्त ।

वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महन्त ॥ 435 ॥




गुरु की आज्ञा आवै, गुरु की आज्ञा जाय ।

कहैं कबीर सो सन्त हैं, आवागमन नशाय ॥ 436 ॥







जो गुरु बसै बनारसी, सीष समुन्दर तीर ।

एक पलक बिसरे नहीं, जो गुण होय शरीर ॥ 437 ॥




गुरु समान दाता नहीं, याचक सीष समान ।

तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान ॥ 438 ॥




गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट ।

अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ॥ 439 ॥




गुरु को सिर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं ।

कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक भय नहिं ॥ 440 ॥




लच्छ कोष जो गुरु बसै, दीजै सुरति पठाय ।

शब्द तुरी बसवार है, छिन आवै छिन जाय ॥ 441 ॥




गुरु मूरति गति चन्द्रमा, सेवक नैन चकोर ।

आठ पहर निरखता रहे, गुरु मूरति की ओर ॥ 442 ॥




गुरु सों प्रीति निबाहिये, जेहि तत निबटै सन्त ।

प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रेम निकट गुरु कन्त ॥ 443 ॥




गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष ।

गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटे न दोष ॥ 444 ॥




गुरु मूरति आगे खड़ी, दुनिया भेद कछु नाहिं ।

उन्हीं कूँ परनाम करि, सकल तिमिर मिटि जाहिं ॥ 445 ॥




गुरु शरणागति छाड़ि के, करै भरौसा और ।

सुख सम्पति की कह चली, नहीं परक ये ठौर ॥ 446 ॥




सिष खांडा गुरु भसकला, चढ़ै शब्द खरसान ।

शब्द सहै सम्मुख रहै, निपजै शीष सुजान ॥ 447 ॥




ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास ।

गुरु सेवा ते पाइये, सद्गुरु चरण निवास ॥ 448 ॥




अहं अग्नि निशि दिन जरै, गुरु सो चाहे मान ।

ताको जम न्योता दिया, होउ हमार मेहमान ॥ 449 ॥




जैसी प्रीति कुटुम्ब की, तैसी गुरु सों होय ।

कहैं कबीर ता दास का, पला न पकड़ै कोय ॥ 450 ॥




मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पाँव ।

मूल नाम गुरु वचन है, मूल सत्य सतभाव ॥ 451 ॥




पंडित पाढ़ि गुनि पचि मुये, गुरु बिना मिलै न ज्ञान ।

ज्ञान बिना नहिं मुक्ति है, सत्त शब्द परनाम ॥ 452 ॥




सोइ-सोइ नाच नचाइये, जेहि निबहे गुरु प्रेम ।

कहै कबीर गुरु प्रेम बिन, कतहुँ कुशल नहि क्षेम ॥ 453 ॥




कहैं कबीर जजि भरम को, नन्हा है कर पीव ।

तजि अहं गुरु चरण गहु, जमसों बाचै जीव ॥ 454 ॥




कोटिन चन्दा उगही, सूरज कोटि हज़ार ।

तीमिर तौ नाशै नहीं, बिन गुरु घोर अंधार ॥ 455 ॥




तबही गुरु प्रिय बैन कहि, शीष बढ़ी चित प्रीत ।

ते रहियें गुरु सनमुखाँ कबहूँ न दीजै पीठ ॥ 456 ॥




तन मन शीष निछावरै, दीजै सरबस प्रान ।

कहैं कबीर गुरु प्रेम बिन, कितहूँ कुशल नहिं क्षेम ॥ 457 ॥




जो गुरु पूरा होय तो, शीषहि लेय निबाहि ।

शीष भाव सुत्त जानिये, सुत ते श्रेष्ठ शिष आहि ॥ 458 ॥




भौ सागर की त्रास तेक, गुरु की पकड़ो बाँहि ।

गुरु बिन कौन उबारसी, भौ जल धारा माँहि ॥ 459 ॥




करै दूरि अज्ञानता, अंजन ज्ञान सुदेय ।

बलिहारी वे गुरुन की हंस उबारि जुलेय ॥ 460 ॥




सुनिये सन्तों साधु मिलि, कहहिं कबीर बुझाय ।

जेहि विधि गुरु सों प्रीति छै कीजै सोई उपाय ॥ 461 ॥




अबुध सुबुध सुत मातु पितु, सबहि करै प्रतिपाल ।

अपनी और निबाहिये, सिख सुत गहि निज चाल ॥ 462 ॥




लौ लागी विष भागिया, कालख डारी धोय ।

कहैं कबीर गुरु साबुन सों, कोई इक ऊजल होय ॥ 463 ॥




राजा की चोरी करे, रहै रंग की ओट ।

कहैं कबीर क्यों उबरै, काल कठिन की चोट ॥ 464 ॥




साबुन बिचारा क्या करे, गाँठे राखे मोय ।

जल सो अरसां नहिं, क्यों कर ऊजल होय ॥ 465 ॥




॥ सतगुरु के विषय मे दोहे ॥







सत्गुरु तो सतभाव है, जो अस भेद बताय ।

धन्य शीष धन भाग तिहि जो ऐसी सुधि पाय ॥ 466 ॥




सतगुरु शरण न आवहीं, फिर फिर होय अकाज ।

जीव खोय सब जायेंगे काल तिहूँ पुर राज ॥ 467 ॥




सतगुरु सम कोई नहीं सात दीप नौ खण्ड ।

तीन लोक न पाइये, अरु इक्कीस ब्रह्म्ण्ड ॥ 468 ॥




सतगुरु मिला जु जानिये, ज्ञान उजाला होय ।

भ्रम का भांड तोड़ि करि, रहै निराला होय ॥ 469 ॥




सतगुरु मिले जु सब मिले, न तो मिला न कोय ।

माता-पिता सुत बाँधवा ये तो घर घर होय ॥ 470 ॥




जेहि खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव ।

कहै कबीर सुन साधवा, करु सतगुरु की सेव ॥ 471 ॥




मनहिं दिया निज सब दिया, मन से संग शरीर ।

अब देवे को क्या रहा, यों कयि कहहिं कबीर ॥ 472 ॥




सतगुरु को माने नही, अपनी कहै बनाय ।

कहै कबीर क्या कीजिये, और मता मन जाय ॥ 473 ॥




जग में युक्ति अनूप है, साधु संग गुरु ज्ञान ।

तामें निपट अनूप है, सतगुरु लागा कान ॥ 474 ॥




कबीर समूझा कहत है, पानी थाह बताय ।

ताकूँ सतगुरु का करे, जो औघट डूबे जाय ॥ 475 ॥




बिन सतगुरु उपदेश, सुर नर मुनि नहिं निस्तरे ।

ब्रह्मा-विष्णु, महेश और सकल जिव को गिनै ॥ 476 ॥




केते पढ़ि गुनि पचि भुए, योग यज्ञ तप लाय ।

बिन सतगुरु पावै नहीं, कोटिन करे उपाय ॥ 477 ॥




डूबा औघट न तरै, मोहिं अंदेशा होय ।

लोभ नदी की धार में, कहा पड़ो नर सोइ ॥ 478 ॥




सतगुरु खोजो सन्त, जोव काज को चाहहु ।

मेटो भव को अंक, आवा गवन निवारहु ॥ 479 ॥




करहु छोड़ कुल लाज, जो सतगुरु उपदेश है ।

होये सब जिव काज, निश्चय करि परतीत करू ॥ 480 ॥




यह सतगुरु उपदेश है, जो मन माने परतीत ।

करम भरम सब त्यागि के, चलै सो भव जल जीत ॥ 481 ॥




जग सब सागर मोहिं, कहु कैसे बूड़त तेरे ।

गहु सतगुरु की बाहिं जो जल थल रक्षा करै ॥ 482 ॥







॥ गुरु पारख पर दोहे ॥




जानीता बूझा नहीं बूझि किया नहीं गौन ।

अन्धे को अन्धा मिला, राह बतावे कौन ॥ 483 ॥




जाका गुरु है आँधरा, चेला खरा निरन्ध ।

अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फन्द ॥ 484 ॥




गुरु लोभ शिष लालची, दोनों खेले दाँव ।

दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पाथर की नाँव ॥ 485 ॥




आगे अंधा कूप में, दूजे लिया बुलाय ।

दोनों बूडछे बापुरे, निकसे कौन उपाय ॥ 486 ॥




गुरु किया है देह का, सतगुरु चीन्हा नाहिं ।

भवसागर के जाल में, फिर फिर गोता खाहि ॥ 487 ॥




पूरा सतगुरु न मिला, सुनी अधूरी सीख ।

स्वाँग यती का पहिनि के, घर घर माँगी भीख ॥ 488 ॥




कबीर गुरु है घाट का, हाँटू बैठा चेल ।

मूड़ मुड़ाया साँझ कूँ गुरु सबेरे ठेल ॥ 489 ॥




गुरु-गुरु में भेद है, गुरु-गुरु में भाव ।

सोइ गुरु नित बन्दिये, शब्द बतावे दाव ॥ 490 ॥




जो गुरु ते भ्रम न मिटे, भ्रान्ति न जिसका जाय ।

सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय ॥ 491 ॥




झूठे गुरु के पक्ष की, तजत न कीजै वार ।

द्वार न पावै शब्द का, भटके बारम्बार ॥ 492 ॥




सद्गुरु ऐसा कीजिये, लोभ मोह भ्रम नाहिं ।

दरिया सो न्यारा रहे, दीसे दरिया माहि ॥ 493 ॥




कबीर बेड़ा सार का, ऊपर लादा सार ।

पापी का पापी गुरु, यो बूढ़ा संसार ॥ 494 ॥




जो गुरु को तो गम नहीं, पाहन दिया बताय ।

शिष शोधे बिन सेइया, पार न पहुँचा जाए ॥ 495 ॥




सोचे गुरु के पक्ष में, मन को दे ठहराय ।

चंचल से निश्चल भया, नहिं आवै नहीं जाय ॥ 496 ॥




गु अँधियारी जानिये, रु कहिये परकाश ।

मिटि अज्ञाने ज्ञान दे, गुरु नाम है तास ॥ 497 ॥




गुरु नाम है गम्य का, शीष सीख ले सोय ।

बिनु पद बिनु मरजाद नर, गुरु शीष नहिं कोय ॥ 498 ॥




गुरुवा तो घर फिरे, दीक्षा हमारी लेह ।

कै बूड़ौ कै ऊबरो, टका परदानी देह ॥ 499 ॥




गुरुवा तो सस्ता भया, कौड़ी अर्थ पचास ।

अपने तन की सुधि नहीं, शिष्य करन की आस ॥ 500


जाका गुरु है गीरही, गिरही चेला होय ।

कीच-कीच के धोवते, दाग न छूटे कोय ॥ 501 ॥




गुरु मिला तब जानिये, मिटै मोह तन ताप ।

हरष शोष व्यापे नहीं, तब गुरु आपे आप ॥ 502 ॥




यह तन विषय की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।

सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान ॥ 503 ॥




बँधे को बँधा मिला, छूटै कौन उपाय ।

कर सेवा निरबन्ध की पल में लेय छुड़ाय ॥ 504 ॥




गुरु बिचारा क्या करै, शब्द न लागै अंग ।

कहैं कबीर मैक्ली गजी, कैसे लागू रंग ॥ 505 ॥




गुरु बिचारा क्या करे, ह्रदय भया कठोर ।

नौ नेजा पानी चढ़ा पथर न भीजी कोर ॥ 506 ॥




कहता हूँ कहि जात हूँ, देता हूँ हेला ।

गुरु की करनी गुरु जाने चेला की चेला ॥ 507 ॥




॥ गुरु शिष्य के विषय मे दोहे ॥







शिष्य पुजै आपना, गुरु पूजै सब साध ।

कहैं कबीर गुरु शीष को, मत है अगम अगाध ॥ 508 ॥




हिरदे ज्ञान न उपजै, मन परतीत न होय ।

ताके सद्गुरु कहा करें, घनघसि कुल्हरन होय ॥ 509 ॥




ऐसा कोई न मिला, जासू कहूँ निसंक ।

जासो हिरदा की कहूँ, सो फिर मारे डंक ॥ 510 ॥




शिष किरपिन गुरु स्वारथी, किले योग यह आय ।

कीच-कीच के दाग को, कैसे सके छुड़ाय ॥ 511 ॥




स्वामी सेवक होय के, मनही में मिलि जाय ।

चतुराई रीझै नहीं, रहिये मन के माय ॥ 512 ॥




गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि ।

बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि ॥ 513 ॥




सत को खोजत मैं फिरूँ, सतिया न मिलै न कोय ।

जब सत को सतिया मिले, विष तजि अमृत होय ॥ 514 ॥




देश-देशान्तर मैं फिरूँ, मानुष बड़ा सुकाल ।

जा देखै सुख उपजै, वाका पड़ा दुकाल ॥ 515 ॥




॥ भक्ति के विषय में दोहे ॥







कबीर गुरु की भक्ति बिन, राजा ससभ होय ।

माटी लदै कुम्हार की, घास न डारै कोय ॥ 516 ॥




कबीर गुरु की भक्ति बिन, नारी कूकरी होय ।

गली-गली भूँकत फिरै, टूक न डारै कोय ॥ 517 ॥




जो कामिनि परदै रहे, सुनै न गुरुगुण बात ।

सो तो होगी कूकरी, फिरै उघारे गात ॥ 518 ॥




चौंसठ दीवा जोय के, चौदह चन्दा माहिं ।

तेहि घर किसका चाँदना, जिहि घर सतगुरु नाहिं ॥ 519 ॥




हरिया जाने रूखाड़ा, उस पानी का नेह ।

सूखा काठ न जानिहै, कितहूँ बूड़ा गेह ॥ 520 ॥




झिरमिर झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेह ।

माटी गलि पानी भई, पाहन वाही नेह ॥ 521 ॥




कबीर ह्रदय कठोर के, शब्द न लागे सार ।

सुधि-सुधि के हिरदे विधे, उपजै ज्ञान विचार ॥ 522 ॥




कबीर चन्दर के भिरै, नीम भी चन्दन होय ।

बूड़यो बाँस बड़ाइया, यों जनि बूड़ो कोय ॥ 523 ॥




पशुआ सों पालो परो, रहू-रहू हिया न खीज ।

ऊसर बीज न उगसी, बोवै दूना बीज ॥ 524 ॥




कंचन मेरू अरपही, अरपैं कनक भण्डार ।

कहैं कबीर गुरु बेमुखी, कबहूँ न पावै पार ॥ 525 ॥




साकट का मुख बिम्ब है निकसत बचन भुवंग ।

ताकि औषण मौन है, विष नहिं व्यापै अंग ॥ 526 ॥




शुकदेव सरीखा फेरिया, तो को पावे पार ।

बिनु गुरु निगुरा जो रहे, पड़े चौरासी धार ॥ 527 ॥




कबीर लहरि समुन्द्र की, मोती बिखरे आय ।

बगुला परख न जानई, हंस चुनि-चुनि खाय ॥ 528 ॥




साकट कहा न कहि चलै, सुनहा कहा न खाय ।

जो कौवा मठ हगि भरै, तो मठ को कहा नशाय ॥ 529 ॥




साकट मन का जेवरा, भजै सो करराय ।

दो अच्छर गुरु बहिरा, बाधा जमपुर जाय ॥ 530 ॥




कबीर साकट की सभा, तू मति बैठे जाय ।

एक गुवाड़े कदि बड़ै, रोज गदहरा गाय ॥ 531 ॥




संगत सोई बिगुर्चई, जो है साकट साथ ।

कंचन कटोरा छाड़ि के, सनहक लीन्ही हाथ ॥ 532 ॥




साकट संग न बैठिये करन कुबेर समान ।

ताके संग न चलिये, पड़ि हैं नरक निदान ॥ 533 ॥




टेक न कीजै बावरे, टेक माहि है हानि ।

टेक छाड़ि मानिक मिलै, सत गुरु वचन प्रमानि ॥ 534 ॥




साकट सूकर कीकरा, तीनों की गति एक है ।

कोटि जतन परमोघिये, तऊ न छाड़े टेक ॥ 535 ॥




निगुरा ब्राह्म्ण नहिं भला, गुरुमुख भला चमार ।

देवतन से कुत्ता भला, नित उठि भूँके द्वार ॥ 536 ॥




हरिजन आवत देखिके, मोहड़ो सूखि गयो ।

भाव भक्ति समझयो नहीं, मूरख चूकि गयो ॥ 537 ॥




खसम कहावै बैरनव, घर में साकट जोय ।

एक धरा में दो मता, भक्ति कहाँ ते होय ॥ 538 ॥




घर में साकट स्त्री, आप कहावे दास ।

वो तो होगी शूकरी, वो रखवाला पास ॥ 539 ॥




आँखों देखा घी भला, न मुख मेला तेल ।

साघु सो झगड़ा भला, ना साकट सों मेल ॥ 540 ॥




कबीर दर्शन साधु का, बड़े भाग दरशाय ।

जो होवै सूली सजा, काँटे ई टरि जाय ॥ 541 ॥




कबीर सोई दिन भला, जा दिन साधु मिलाय ।

अंक भरे भारि भेटिये, पाप शरीर जाय ॥ 542 ॥




कबीर दर्शन साधु के, करत न कीजै कानि ।

ज्यों उद्य्म से लक्ष्मी, आलस मन से हानि ॥ 543 ॥




कई बार नाहिं कर सके, दोय बखत करिलेय ।

कबीर साधु दरश ते, काल दगा नहिं देय ॥ 544 ॥




दूजे दिन नहिं करि सके, तीजे दिन करू जाय ।

कबीर साधु दरश ते मोक्ष मुक्ति फन पाय ॥ 545 ॥




तीजे चौथे नहिं करे, बार-बार करू जाय ।

यामें विलंब न कीजिये, कहैं कबीर समुझाय ॥ 546 ॥




दोय बखत नहिं करि सके, दिन में करूँ इक बार ।

कबीर साधु दरश ते, उतरैं भव जल पार ॥ 547 ॥




बार-बार नहिं करि सके, पाख-पाख करिलेय ।

कहैं कबीरन सो भक्त जन, जन्म सुफल करि लेय ॥ 548 ॥




पाख-पाख नहिं करि सकै, मास मास करू जाय ।

यामें देर न लाइये, कहैं कबीर समुदाय ॥ 549 ॥




बरस-बरस नाहिं करि सकै ताको लागे दोष ।

कहै कबीर वा जीव सो, कबहु न पावै योष ॥ 550 ॥




छठे मास नहिं करि सके, बरस दिना करि लेय ।

कहैं कबीर सो भक्तजन, जमहिं चुनौती देय ॥ 551 ॥




मास-मास नहिं करि सकै, उठे मास अलबत्त ।

यामें ढील न कीजिये, कहै कबीर अविगत्त ॥ 552 ॥




मात-पिता सुत इस्तरी आलस्य बन्धू कानि ।

साधु दरश को जब चलैं, ये अटकावै आनि ॥ 553 ॥




साधु चलत रो दीजिये, कीजै अति सनमान ।

कहैं कबीर कछु भेट धरूँ, अपने बित्त अनुमान ॥ 554 ॥




इन अटकाया न रुके, साधु दरश को जाय ।

कहै कबीर सोई सन्तजन, मोक्ष मुक्ति फल पाय ॥ 555 ॥




खाली साधु न बिदा करूँ, सुन लीजै सब कोय ।

कहै कबीर कछु भेंट धरूँ, जो तेरे घर होय ॥ 556 ॥




सुनिये पार जो पाइया, छाजन भोजन आनि ।

कहै कबीर संतन को, देत न कीजै कानि ॥ 557 ॥




कबीर दरशन साधु के, खाली हाथ न जाय ।

यही सीख बुध लीजिए, कहै कबीर बुझाय ॥ 558 ॥




टूका माही टूक दे, चीर माहि सो चीर ।

साधु देत न सकुचिये, यों कशि कहहिं कबीर ॥ 559 ॥




कबीर लौंग-इलायची, दातुन, माटी पानि ।

कहै कबीर सन्तन को, देत न कीजै कानि ॥ 560 ॥




साधु आवत देखिकर, हँसी हमारी देह ।

माथा का ग्रह उतरा, नैनन बढ़ा सनेह ॥ 561 ॥




साधु शब्द समुद्र है, जामें रत्न भराय ।

मन्द भाग मट्टी भरे, कंकर हाथ लगाय ॥ 562 ॥




साधु आया पाहुना, माँगे चार रतन ।

धूनी पानी साथरा, सरधा सेती अन्न ॥ 563 ॥




साधु आवत देखिके, मन में करै भरोर ।

सो तो होसी चूह्रा, बसै गाँव की ओर ॥ 564 ॥




साधु मिलै यह सब हलै, काल जाल जम चोट ।

शीश नवावत ढ़हि परै, अघ पावन को पोट ॥ 565 ॥




साधु बिरछ सतज्ञान फल, शीतल शब्द विचार ।

जग में होते साधु नहिं, जर भरता संसार ॥ 566 ॥




साधु बड़े परमारथी, शीतल जिनके अंग ।

तपन बुझावै ओर की, देदे अपनो रंग ॥ 567 ॥




आवत साधु न हरखिया, जात न दीया रोय ।

कहै कबीर वा दास की, मुक्ति कहाँ से होय ॥ 568 ॥




छाजन भोजन प्रीति सो, दीजै साधु बुलाय ।

जीवन जस है जगन में, अन्त परम पद पाय ॥ 569 ॥




सरवर तरवर सन्त जन, चौथा बरसे मेह ।

परमारथ के कारने, चारों धारी देह ॥ 570 ॥




बिरछा कबहुँ न फल भखै, नदी न अंचय नीर ।

परमारथ के कारने, साधु धरा शरीर ॥ 571 ॥




सुख देवै दुख को हरे, दूर करे अपराध ।

कहै कबीर वह कब मिले, परम सनेही साध ॥ 572 ॥




साधुन की झुपड़ी भली, न साकट के गाँव ।

चंदन की कुटकी भली, ना बूबल बनराव ॥ 573 ॥




कह अकाश को फेर है, कह धरती को तोल ।

कहा साध की जाति है, कह पारस का मोल ॥ 574 ॥




हयबर गयबर सधन धन, छत्रपति की नारि ।

तासु पटतरा न तुले, हरिजन की परिहारिन ॥ 575 ॥




क्यों नृपनारि निन्दिये, पनिहारी को मान ।

वह माँग सँवारे पीववहित, नित वह सुमिरे राम ॥ 576 ॥




जा सुख को मुनिवर रटैं, सुर नर करैं विलाप ।

जो सुख सहजै पाईया, सन्तों संगति आप ॥ 577 ॥




साधु सिद्ध बहु अन्तरा, साधु मता परचण्ड ।

सिद्ध जु वारे आपको, साधु तारि नौ खण्ड ॥ 578 ॥




कबीर शीतल जल नहीं, हिम न शीतल होय ।

कबीर शीतल सन्त जन, राम सनेही सोय ॥ 579 ॥




आशा वासा सन्त का, ब्रह्मा लखै न वेद ।

षट दर्शन खटपट करै, बिरला पावै भेद ॥ 580 ॥




कोटि-कोटि तीरथ करै, कोटि कोटि करु धाय ।

जब लग साधु न सेवई, तब लग काचा काम ॥ 581 ॥




वेद थके, ब्रह्मा थके, याके सेस महेस ।

गीता हूँ कि गत नहीं, सन्त किया परवेस ॥ 582 ॥




सन्त मिले जानि बीछुरों, बिछुरों यह मम प्रान ।

शब्द सनेही ना मिले, प्राण देह में आन ॥ 583 ॥




साधु ऐसा चाहिए, दुखै दुखावै नाहिं ।

पान फूल छेड़े नहीं, बसै बगीचा माहिं ॥ 584 ॥




साधु कहावन कठिन है, ज्यों खांड़े की धार ।

डगमगाय तो गिर पड़े निहचल उतरे पार ॥ 585 ॥




साधु कहावत कठिन है, लम्बा पेड़ खजूर ।

चढ़े तो चाखै प्रेम रस, गिरै तो चकनाचूर ॥ 586 ॥




साधु चाल जु चालई, साधु की चाल ।

बिन साधन तो सुधि नाहिं साधु कहाँ ते होय ॥ 587 ॥




साधु सोई जानिये, चलै साधु की चाल ।

परमारथ राता रहै, बोलै बचन रसाल ॥ 588 ॥




साधु भौरा जग कली, निशि दिन फिरै उदास ।

टुक-टुक तहाँ विलम्बिया, जहँ शीतल शब्द निवास ॥ 589 ॥




साधू जन सब में रमैं, दुख न काहू देहि ।

अपने मत गाड़ा रहै, साधुन का मत येहि ॥ 590 ॥




साधु सती और सूरमा, राखा रहै न ओट ।

माथा बाँधि पताक सों, नेजा घालैं चोट ॥ 591




साधु-साधु सब एक है, जस अफीम का खेत ।

कोई विवेकी लाल है, और सेत का सेत ॥ 592 ॥




साधु सती औ सिं को, ज्यों लेघन त्यौं शोभ ।

सिंह न मारे मेढ़का, साधु न बाँघै लोभ ॥ 593 ॥




साधु तो हीरा भया, न फूटै धन खाय ।

न वह बिनभ कुम्भ ज्यों ना वह आवै जाय ॥ 594 ॥




साधू-साधू सबहीं बड़े, अपनी-अपनी ठौर ।

शब्द विवेकी पारखी, ते माथे के मौर ॥ 595 ॥




सदा रहे सन्तोष में, धरम आप दृढ़ धार ।

आश एक गुरुदेव की, और चित्त विचार ॥ 596 ॥




दुख-सुख एक समान है, हरष शोक नहिं व्याप ।

उपकारी निहकामता, उपजै छोह न ताप ॥ 597 ॥




सदा कृपालु दु:ख परिहरन, बैर भाव नहिं दोय ।

छिमा ज्ञान सत भाखही, सिंह रहित तु होय ॥ 598 ॥




साधु ऐसा चाहिए, जाके ज्ञान विवेक ।

बाहर मिलते सों मिलें, अन्तर सबसों एक ॥ 599 ॥




सावधान और शीलता, सदा प्रफुल्लित गात ।

निर्विकार गम्भीर मत, धीरज दया बसात ॥ 600 II


निबैंरी निहकामता, स्वामी सेती नेह ।

विषया सो न्यारा रहे, साधुन का मत येह ॥ 601 ॥




मानपमान न चित धरै, औरन को सनमान ।

जो कोर्ठ आशा करै, उपदेशै तेहि ज्ञान ॥ 602 ॥




और देव नहिं चित्त बसै, मन गुरु चरण बसाय ।

स्वल्पाहार भोजन करूँ, तृष्णा दूर पराय ॥ 603 ॥




जौन चाल संसार की जौ साधु को नाहिं ।

डिंभ चाल करनी करे, साधु कहो मत ताहिं ॥ 604 ॥




इन्द्रिय मन निग्रह करन, हिरदा कोमल होय ।

सदा शुद्ध आचरण में, रह विचार में सोय ॥ 605 ॥




शीलवन्त दृढ़ ज्ञान मत, अति उदार चित होय ।

लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय ॥ 606 ॥




कोई आवै भाव ले, कोई अभाव लै आव ।

साधु दोऊ को पोषते, भाव न गिनै अभाव ॥ 607 ॥




सन्त न छाड़ै सन्तता, कोटिक मिलै असंत ।

मलय भुवंगय बेधिया, शीतलता न तजन्त ॥ 608 ॥




कमल पत्र हैं साधु जन, बसैं जगत के माहिं ।

बालक केरि धाय ज्यों, अपना जानत नाहिं ॥ 609 ॥




बहता पानी निरमला, बन्दा गन्दा होय ।

साधू जन रमा भला, दाग न लागै कोय ॥ 610 ॥




बँधा पानी निरमला, जो टूक गहिरा होय ।

साधु जन बैठा भला, जो कुछ साधन होय ॥ 611 ॥




एक छाड़ि पय को गहैं, ज्यों रे गऊ का बच्छ ।

अवगुण छाड़ै गुण गहै, ऐसा साधु लच्छ ॥ 612 ॥




जौन भाव उपर रहै, भितर बसावै सोय ।

भीतर और न बसावई, ऊपर और न होय ॥ 613 ॥




उड़गण और सुधाकरा, बसत नीर के संग ।

यों साधू संसार में, कबीर फड़त न फंद ॥ 614 ॥




तन में शीतल शब्द है, बोले वचन रसाल ।

कहैं कबीर ता साधु को, गंजि सकै न काल ॥ 615 ॥




तूटै बरत आकाश सौं, कौन सकत है झेल ।

साधु सती और सूर का, अनी ऊपर का खेल ॥ 616 ॥




ढोल दमामा गड़झड़ी, सहनाई और तूर ।

तीनों निकसि न बाहुरैं, साधु सती औ सूर ॥ 617 ॥




आज काल के लोग हैं, मिलि कै बिछुरी जाहिं ।

लाहा कारण आपने, सौगन्ध राम कि खाहिं ॥ 618 ॥




जुवा चोरी मुखबिरी, ब्याज बिरानी नारि ।

जो चाहै दीदार को, इतनी वस्तु निवारि ॥ 619 ॥




कबीर मेरा कोइ नहीं, हम काहू के नाहिं ।

पारै पहुँची नाव ज्यों, मिलि कै बिछुरी जाहिं ॥ 620 ॥




सन्त समागम परम सुख, जान अल्प सुख और ।

मान सरोवर हंस है, बगुला ठौरे ठौर ॥ 621 ॥




सन्त मिले सुख ऊपजै दुष्ट मिले दुख होय ।

सेवा कीजै साधु की, जन्म कृतारथ होय ॥ 622 ॥




संगत कीजै साधु की कभी न निष्फल होय ।

लोहा पारस परस ते, सो भी कंचन होय ॥ 623 ॥




मान नहीं अपमान नहीं, ऐसे शीतल सन्त ।

भव सागर से पार हैं, तोरे जम के दन्त ॥ 624 ॥




दया गरीबी बन्दगी, समता शील सुभाव ।

येते लक्षण साधु के, कहैं कबीर सतभाव ॥ 625 ॥




सो दिन गया इकारथे, संगत भई न सन्त ।

ज्ञान बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भटकन्त ॥ 626 ॥




आशा तजि माया तजै, मोह तजै अरू मान ।

हरष शोक निन्दा तजै, कहैं कबीर सन्त जान ॥ 627 ॥




आसन तो इकान्त करैं, कामिनी संगत दूर ।

शीतल सन्त शिरोमनी, उनका ऐसा नूर ॥ 628 ॥




यह कलियुग आयो अबै, साधु न जाने कोय ।

कामी क्रोधी मस्खरा, तिनकी पूजा होय ॥ 629 ॥




कुलवन्ता कोटिक मिले, पण्डित कोटि पचीस ।

सुपच भक्त की पनहि में, तुलै न काहू शीश ॥ 630 ॥




साधु दरशन महाफल, कोटि यज्ञ फल लेह ।

इक मन्दिर को का पड़ी, नगर शुद्ध करिलेह ॥ 631 ॥




साधु दरश को जाइये, जेता धरिये पाँय ।

डग-डग पे असमेध जग, है कबीर समुझाय ॥ 632 ॥




सन्त मता गजराज का, चालै बन्धन छोड़ ।

जग कुत्ता पीछे फिरैं, सुनै न वाको सोर ॥ 633 ॥




आज काल दिन पाँच में, बरस पाँच जुग पंच ।

जब तब साधू तारसी, और सकल पर पंच ॥ 634 ॥




साधु ऐसा चाहिए, जहाँ रहै तहँ गैब ।

बानी के बिस्तार में, ताकूँ कोटिक ऐब ॥ 635 ॥




सन्त होत हैं, हेत के, हेतु तहाँ चलि जाय ।

कहैं कबीर के हेत बिन, गरज कहाँ पतियाय ॥ 636 ॥




हेत बिना आवै नहीं, हेत तहाँ चलि जाय ।

कबीर जल और सन्तजन, नवैं तहाँ ठहराय ॥ 637 ॥




साधु-ऐसा चाहिए, जाका पूरा मंग ।

विपत्ति पड़े छाड़ै नहीं, चढ़े चौगुना रंग ॥ 638 ॥




सन्त सेव गुरु बन्दगी, गुरु सुमिरन वैराग ।

ये ता तबही पाइये, पूरन मस्तक भाग ॥ 639 ॥




॥ भेष के विषय मे दोहे ॥




चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावै हंस ।

ते मुक्ता कैसे चुंगे, पड़े काल के फंस ॥ 640 ॥




बाना पहिरे सिंह का, चलै भेड़ की चाल ।

बोली बोले सियार की, कुत्ता खवै फाल ॥ 641 ॥




साधु भया तो क्या भया, माला पहिरी चार ।

बाहर भेष बनाइया, भीतर भरी भंगार ॥ 642 ॥




तन को जोगी सब करै, मन को करै न कोय ।

सहजै सब सिधि पाइये, जो मन जोगी होय ॥ 643 ॥




जौ मानुष गृह धर्म युत, राखै शील विचार ।

गुरुमुख बानी साधु संग, मन वच, सेवा सार ॥ 644 ॥




शब्द विचारे पथ चलै, ज्ञान गली दे पाँव ।

क्या रमता क्या बैठता, क्या गृह कंदला छाँव ॥ 645 ॥




गिरही सुवै साधु को, भाव भक्ति आनन्द ।

कहैं कबीर बैरागी को, निरबानी निरदुन्द ॥ 646 ॥




पाँच सात सुमता भरी, गुरु सेवा चित लाय ।

तब गुरु आज्ञा लेय के, रहे देशान्तर जाय ॥ 647 ॥




गुरु के सनमुख जो रहै, सहै कसौटी दुख ।

कहैं कबीर तो दुख पर वारों, कोटिक सूख ॥ 648 ॥




मन मैला तन ऊजरा, बगुला कपटी अंग ।

तासों तो कौवा भला, तन मन एकहि रंग ॥ 649 ॥




भेष देख मत भूलिये, बूझि लीजिये ज्ञान ।

बिना कसौटी होत नहीं, कंचन की पहिचान ॥ 650 ॥




कवि तो कोटि-कोटि हैं, सिर के मुड़े कोट ।

मन के कूड़े देखि करि, ता संग लीजै ओट ॥ 651 ॥




बोली ठोली मस्खरी, हँसी खेल हराम ।

मद माया और इस्तरी, नहिं सन्तन के काम ॥ 652 ॥




फाली फूली गाडरी, ओढ़ि सिंह की खाल ।

साँच सिंह जब आ मिले, गाडर कौन हवाल ॥ 653 ॥




बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार ।

दोऊ चूकि खाली पड़े, ताको वार न पार ॥ 654 ॥




धारा तो दोनों भली, बिरही के बैराग ।

गिरही दासातन करे बैरागी अनुराग ॥ 655 ॥




घर में रहै तो भक्ति करूँ, ना तरू करू बैराग ।

बैरागी बन्ध करै, ताका बड़ा अभाग ॥ 656 ॥




॥ भीख के विषय मे दोहे ॥







उदर समाता माँगि ले, ताको नाहिं दोष ।

कहैं कबीर अधिका गहै, ताकि गति न मोष ॥ 657 ॥




अजहूँ तेरा सब मिटैं, जो मानै गुरु सीख ।

जब लग तू घर में रहै, मति कहुँ माँगे भीख ॥ 658 ॥




माँगन गै सो भर रहै, भरे जु माँगन जाहिं ।

तिनते पहिले वे मरे, होत करत है नाहिं ॥ 659 ॥




माँगन-मरण समान है, तोहि दई मैं सीख ।

कहैं कबीर समझाय के, मति कोई माँगे भीख ॥ 660 ॥




उदर समाता अन्न ले, तनहिं समाता चीर ।

अधिकहिं संग्रह ना करै, तिसका नाम फकीर ॥ 661 ॥




आब गया आदर गया, नैनन गया सनेह ।

यह तीनों तब ही गये, जबहिं कहा कुछ देह ॥ 662 ॥




सहत मिलै सो दूध है, माँगि मिलै सा पानि ।

कहैं कबीर वह रक्त है, जामें एंचातानि ॥ 663 ॥




अनमाँगा उत्तम कहा, मध्यम माँगि जो लेय ।

कहैं कबीर निकृष्टि सो, पर धर धरना देय ॥ 664 ॥




अनमाँगा तो अति भला, माँगि लिया नहिं दोष ।

उदर समाता माँगि ले, निश्च्य पावै योष ॥ 665 ॥




॥ संगति पर दोहे ॥







कबीरा संगत साधु की, नित प्रति कीर्ज जाय ।

दुरमति दूर बहावसी, देशी सुमति बताय ॥ 666 ॥




एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध ।

कबीर संगत साधु की, करै कोटि अपराध ॥ 667 ॥




कबिरा संगति साधु की, जो करि जाने कोय ।

सकल बिरछ चन्दन भये, बांस न चन्दन होय ॥ 668 ॥




मन दिया कहुँ और ही, तन साधुन के संग ।

कहैं कबीर कोरी गजी, कैसे लागै रंग ॥ 669 ॥




साधुन के सतसंग से, थर-थर काँपे देह ।

कबहुँ भाव कुभाव ते, जनि मिटि जाय सनेह ॥ 670 ॥




साखी शब्द बहुतै सुना, मिटा न मन का दाग ।

संगति सो सुधरा नहीं, ताका बड़ा अभाग ॥ 671 ॥




साध संग अन्तर पड़े, यह मति कबहु न होय ।

कहैं कबीर तिहु लोक में, सुखी न देखा कोय ॥ 672 ॥




गिरिये परबत सिखर ते, परिये धरिन मंझार ।

मूरख मित्र न कीजिये, बूड़ो काली धार ॥ 673 ॥




संत कबीर गुरु के देश में, बसि जावै जो कोय ।

कागा ते हंसा बनै, जाति बरन कुछ खोय ॥ 674 ॥




भुवंगम बास न बेधई, चन्दन दोष न लाय ।

सब अंग तो विष सों भरा, अमृत कहाँ समाय ॥ 675 ॥




तोहि पीर जो प्रेम की, पाका सेती खेल ।

काची सरसों पेरिकै, खरी भया न तेल ॥ 676 ॥




काचा सेती मति मिलै, पाका सेती बान ।

काचा सेती मिलत ही, है तन धन की हान ॥ 677 ॥




कोयला भी हो ऊजला, जरि बरि है जो सेव ।

मूरख होय न ऊजला, ज्यों कालर का खेत ॥ 678 ॥




मूरख को समुझावते, ज्ञान गाँठि का जाय ।

कोयला होय न ऊजला, सौ मन साबुन लाय ॥ 679 ॥




ज्ञानी को ज्ञानी मिलै, रस की लूटम लूट ।

ज्ञानी को आनी मिलै, हौवै माथा कूट ॥ 680॥




साखी शब्द बहुतक सुना, मिटा न मन क मोह ।

पारस तक पहुँचा नहीं, रहा लोह का लोह ॥ 681 ॥




ब्राह्मण केरी बेटिया, मांस शराब न खाय ।

संगति भई कलाल की, मद बिना रहा न जाए ॥ 682 ॥




जीवन जीवन रात मद, अविचल रहै न कोय ।

जु दिन जाय सत्संग में, जीवन का फल सोय ॥ 683 ॥




दाग जु लागा नील का, सौ मन साबुन धोय ।

कोटि जतन परमोधिये, कागा हंस न होय ॥ 684 ॥




जो छोड़े तो आँधरा, खाये तो मरि जाय ।

ऐसे संग छछून्दरी, दोऊ भाँति पछिताय ॥ 685 ॥




प्रीति कर सुख लेने को, सो सुख गया हिराय ।

जैसे पाइ छछून्दरी, पकड़ि साँप पछिताय ॥ 686 ॥




कबीर विषधर बहु मिले, मणिधर मिला न कोय ।

विषधर को मणिधर मिले, विष तजि अमृत होय ॥ 687 ॥




सज्जन सों सज्जन मिले, होवे दो दो बात ।

गहदा सो गहदा मिले, खावे दो दो लात ॥ 688 ॥




तरुवर जड़ से काटिया, जबै सम्हारो जहाज ।

तारै पर बोरे नहीं, बाँह गहे की लाज ॥ 689 ॥




मैं सोचों हित जानिके, कठिन भयो है काठ ।

ओछी संगत नीच की सरि पर पाड़ी बाट ॥ 690 ॥




लकड़ी जल डूबै नहीं, कहो कहाँ की प्रीति ।

अपनी सीची जानि के, यही बड़ने की रीति ॥ 691 ॥




साधू संगत परिहरै, करै विषय का संग ।

कूप खनी जल बावरे, त्याग दिया जल गंग ॥ 692 ॥




संगति ऐसी कीजिये, सरसा नर सो संग ।

लर-लर लोई हेत है, तऊ न छौड़ रंग ॥ 693 ॥




तेल तिली सौ ऊपजै, सदा तेल को तेल ।

संगति को बेरो भयो, ताते नाम फुलेल ॥ 694 ॥




साधु संग गुरु भक्ति अरू, बढ़त बढ़त बढ़ि जाय ।

ओछी संगत खर शब्द रू, घटत-घटत घटि जाय ॥ 695 ॥




संगत कीजै साधु की, होवे दिन-दिन हेत ।

साकुट काली कामली, धोते होय न सेत ॥ 696 ॥




चर्चा करूँ तब चौहटे, ज्ञान करो तब दोय ।

ध्यान धरो तब एकिला, और न दूजा कोय ॥ 697 ॥




सन्त सुरसरी गंगा जल, आनि पखारा अंग ।

मैले से निरमल भये, साधू जन को संग ॥ 698 ॥




॥ सेवक पर दोहे ॥




सतगुरु शब्द उलंघ के, जो सेवक कहूँ जाय ।

जहाँ जाय तहँ काल है, कहैं कबीर समझाय ॥ 699 ॥




तू तू करूं तो निकट है, दुर-दुर करू हो जाय ।

जों गुरु राखै त्यों रहै, जो देवै सो खाय ॥ 700 ॥


सेवक सेवा में रहै, सेवक कहिये सोय ।

कहैं कबीर सेवा बिना, सेवक कभी न होय ॥ 701 ॥




अनराते सुख सोवना, राते नींद न आय ।

यों जल छूटी माछरी, तलफत रैन बिहाय ॥ 702 ॥




यह मन ताको दीजिये, साँचा सेवक होय ।

सिर ऊपर आरा सहै, तऊ न दूजा होय ॥ 703 ॥




गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल ।

लोक वेद दोनों गये, आये सिर पर काल ॥ 704 ॥




आशा करै बैकुण्ठ की, दुरमति तीनों काल ।

शुक्र कही बलि ना करीं, ताते गयो पताल ॥ 705 ॥




द्वार थनी के पड़ि रहे, धका धनी का खाय ।

कबहुक धनी निवाजि है, जो दर छाड़ि न जाय ॥ 706 ॥




उलटे सुलटे बचन के शीष न मानै दुख ।

कहैं कबीर संसार में, सो कहिये गुरुमुख ॥ 707 ॥




कहैं कबीर गुरु प्रेम बस, क्या नियरै क्या दूर ।

जाका चित जासों बसै सौ तेहि सदा हजूर ॥ 708 ॥




गुरु आज्ञा लै आवही, गुरु आज्ञा लै जाय ।

कहैं कबीर सो सन्त प्रिय, बहु विधि अमृत पाय ॥ 709 ॥




गुरुमुख गुरु चितवत रहे, जैसे मणिहि भुजंग ।

कहैं कबीर बिसरे नहीं, यह गुरु मुख के अंग ॥ 710 ॥




यह सब तच्छन चितधरे, अप लच्छन सब त्याग ।

सावधान सम ध्यान है, गुरु चरनन में लाग ॥ 711 ॥




ज्ञानी अभिमानी नहीं, सब काहू सो हेत ।

सत्यवार परमारथी, आदर भाव सहेत ॥ 712 ॥




दया और धरम का ध्वजा, धीरजवान प्रमान ।

सन्तोषी सुख दायका, सेवक परम सुजान ॥ 713 ॥




शीतवन्त सुन ज्ञान मत, अति उदार चित होय ।

लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय ॥ 714 ॥




॥ दासता पर दोहे ॥







कबीर गुरु कै भावते, दूरहि ते दीसन्त ।

तन छीना मन अनमना, जग से रूठि फिरन्त ॥ 715 ॥




कबीर गुरु सबको चहै, गुरु को चहै न कोय ।

जब लग आश शरीर की, तब लग दास न होय ॥ 716 ॥




सुख दुख सिर ऊपर सहै, कबहु न छोड़े संग ।

रंग न लागै का, व्यापै सतगुरु रंग ॥ 717 ॥




गुरु समरथ सिर पर खड़े, कहा कभी तोहि दास ।

रिद्धि-सिद्धि सेवा करै, मुक्ति न छोड़े पास ॥ 718 ॥




लगा रहै सत ज्ञान सो, सबही बन्धन तोड़ ।

कहैं कबीर वा दास सो, काल रहै हथजोड़ ॥ 719 ॥




काहू को न संतापिये, जो सिर हन्ता होय ।

फिर फिर वाकूं बन्दिये, दास लच्छन है सोय ॥ 720 ॥




दास कहावन कठिन है, मैं दासन का दास ।

अब तो ऐसा होय रहूँ पाँव तले की घास ॥ 721 ॥




दासातन हिरदै बसै, साधुन सो अधीन ।

कहैं कबीर सो दास है, प्रेम भक्ति लवलीन ॥ 722 ॥




दासातन हिरदै नहीं, नाम धरावै दास ।

पानी के पीये बिना, कैसे मिटै पियास ॥ 723 ॥




॥ भक्ति पर दोहे ॥







भक्ति कठिन अति दुर्लभ, भेष सुगम नित सोय ।

भक्ति जु न्यारी भेष से, यह जनै सब कोय ॥ 724 ॥




भक्ति बीज पलटै नहीं जो जुग जाय अनन्त ।

ऊँच-नीच धर अवतरै, होय सन्त का अन्त ॥ 725 ॥




भक्ति भाव भादौं नदी, सबै चली घहराय ।

सरिता सोई सराहिये, जेठ मास ठहराय ॥ 726 ॥




भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की, चढ़े भक्त हरषाय ।

और न कोई चढ़ि सकै, निज मन समझो आय ॥ 727 ॥




भक्ति दुहेली गुरुन की, नहिं कायर का काम ।

सीस उतारे हाथ सों, ताहि मिलै निज धाम ॥ 728 ॥




भक्ति पदारथ तब मिलै, जब गुरु होय सहाय ।

प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय ॥ 729 ॥




भक्ति भेष बहु अन्तरा, जैसे धरनि अकाश ।

भक्त लीन गुरु चरण में, भेष जगत की आश ॥ 730 ॥




कबीर गुरु की भक्ति करूँ, तज निषय रस चौंज ।

बार-बार नहिं पाइये, मानुष जन्म की मौज ॥ 731 ॥




भक्ति दुवारा साँकरा, राई दशवें भाय ।

मन को मैगल होय रहा, कैसे आवै जाय ॥ 732 ॥




भक्ति बिना नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय ।

शब्द सनेही होय रहे, घर को पहुँचे सोय ॥ 733 ॥




भक्ति नसेनी मुक्ति की, संत चढ़े सब धाय ।

जिन-जिन आलस किया, जनम जनम पछिताय ॥ 734 ॥




गुरु भक्ति अति कठिन है, ज्यों खाड़े की धार ।

बिना साँच पहुँचे नहीं, महा कठिन व्यवहार ॥ 735 ॥




भाव बिना नहिं भक्ति जग, भक्ति बिना नहीं भाव ।

भक्ति भाव इक रूप है, दोऊ एक सुभाव ॥ 736 ॥




कबीर गुरु की भक्ति का, मन में बहुत हुलास ।

मन मनसा माजै नहीं, होन चहत है दास ॥ 737 ॥




कबीर गुरु की भक्ति बिन, धिक जीवन संसार ।

धुवाँ का सा धौरहरा, बिनसत लगै न बार ॥ 738 ॥




जाति बरन कुल खोय के, भक्ति करै चितलाय ।

कहैं कबीर सतगुरु मिलै, आवागमन नशाय ॥ 739 ॥




देखा देखी भक्ति का, कबहुँ न चढ़ सी रंग ।

बिपति पड़े यों छाड़सी, केचुलि तजत भुजंग ॥ 740 ॥




आरत है गुरु भक्ति करूँ, सब कारज सिध होय ।

करम जाल भौजाल में, भक्त फँसे नहिं कोय ॥ 741 ॥




जब लग भक्ति सकाम है, तब लग निष्फल सेव ।

कहैं कबीर वह क्यों मिलै, निहकामी निजदेव ॥ 742 ॥




पेटे में भक्ति करै, ताका नाम सपूत ।

मायाधारी मसखरैं, लेते गये अऊत ॥ 743 ॥




निर्पक्षा की भक्ति है, निर्मोही को ज्ञान ।

निरद्वंद्वी की भक्ति है, निर्लोभी निर्बान ॥ 744 ॥




तिमिर गया रवि देखते, मुमति गयी गुरु ज्ञान ।

सुमति गयी अति लोभ ते, भक्ति गयी अभिमान ॥ 745 ॥




खेत बिगारेउ खरतुआ, सभा बिगारी कूर ।

भक्ति बिगारी लालची, ज्यों केसर में घूर ॥ 746 ॥




ज्ञान सपूरण न भिदा, हिरदा नाहिं जुड़ाय ।

देखा देखी भक्ति का, रंग नहीं ठहराय ॥ 747 ॥




भक्ति पन्थ बहुत कठिन है, रती न चालै खोट ।

निराधार का खोल है, अधर धार की चोट ॥ 748 ॥




भक्तन की यह रीति है, बंधे करे जो भाव ।

परमारथ के कारने यह तन रहो कि जाव ॥ 749 ॥




भक्ति महल बहु ऊँच है, दूरहि ते दरशाय ।

जो कोई जन भक्ति करे, शोभा बरनि न जाय ॥ 750 ॥




और कर्म सब कर्म है, भक्ति कर्म निहकर्म ।

कहैं कबीर पुकारि के, भक्ति करो तजि भर्म ॥ 751 ॥




विषय त्याग बैराग है, समता कहिये ज्ञान ।

सुखदाई सब जीव सों, यही भक्ति परमान ॥ 752 ॥




भक्ति निसेनी मुक्ति की, संत चढ़े सब आय ।

नीचे बाधिनि लुकि रही, कुचल पड़े कू खाय ॥ 753 ॥




भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जाने मेव ।

पूरण भक्ति जब मिलै, कृपा करे गुरुदेव ॥ 754 ॥




॥ चेतावनी ॥







कबीर गर्ब न कीजिये, चाम लपेटी हाड़ ।

हयबर ऊपर छत्रवट, तो भी देवैं गाड़ ॥ 755 ॥




कबीर गर्ब न कीजिये, ऊँचा देखि अवास ।

काल परौं भुंइ लेटना, ऊपर जमसी घास ॥ 756 ॥




कबीर गर्ब न कीजिये, इस जीवन की आस ।

टेसू फूला दिवस दस, खंखर भया पलास ॥ 757 ॥




कबीर गर्ब न कीजिये, काल गहे कर केस ।

ना जानो कित मारि हैं, कसा घर क्या परदेस ॥ 758 ॥




कबीर मन्दिर लाख का, जाड़िया हीरा लाल ।

दिवस चारि का पेखना, विनशि जायगा काल ॥ 759 ॥




कबीर धूल सकेलि के, पुड़ी जो बाँधी येह ।

दिवस चार का पेखना, अन्त खेह की खेह ॥ 760 ॥




कबीर थोड़ा जीवना, माढ़ै बहुत मढ़ान ।

सबही ऊभ पन्थ सिर, राव रंक सुल्तान ॥ 761 ॥




कबीर नौबत आपनी, दिन दस लेहु बजाय ।

यह पुर पटृन यह गली, बहुरि न देखहु आय ॥ 762 ॥




कबीर गर्ब न कीजिये, जाम लपेटी हाड़ ।

इस दिन तेरा छत्र सिर, देगा काल उखाड़ ॥ 763 ॥




कबीर यह तन जात है, सकै तो ठोर लगाव ।

कै सेवा करूँ साधु की, कै गुरु के गुन गाव ॥ 764 ॥




कबीर जो दिन आज है, सो दिन नहीं काल ।

चेति सकै तो चेत ले, मीच परी है ख्याल ॥ 765 ॥




कबीर खेत किसान का, मिरगन खाया झारि ।

खेत बिचारा क्या करे, धनी करे नहिं बारि ॥ 766 ॥




कबीर यह संसार है, जैसा सेमल फूल ।

दिन दस के व्यवहार में, झूठे रंग न भूल ॥ 767 ॥




कबीर सपनें रैन के, ऊधरी आये नैन ।

जीव परा बहू लूट में, जागूँ लेन न देन ॥ 768 ॥




कबीर जन्त्र न बाजई, टूटि गये सब तार ।

जन्त्र बिचारा क्याय करे, गया बजावन हार ॥ 769 ॥




कबीर रसरी पाँव में, कहँ सोवै सुख-चैन ।

साँस नगारा कुँच का, बाजत है दिन-रैन ॥ 770 ॥




कबीर नाव तो झाँझरी, भरी बिराने भाए ।

केवट सो परचै नहीं, क्यों कर उतरे पाए ॥ 771 ॥




कबीर पाँच पखेरूआ, राखा पोष लगाय ।

एक जु आया पारधी, लइ गया सबै उड़ाय ॥ 772 ॥




कबीर बेड़ा जरजरा, कूड़ा खेनहार ।

हरूये-हरूये तरि गये, बूड़े जिन सिर भार ॥ 773 ॥




एक दिन ऐसा होयगा, सबसों परै बिछोह ।

राजा राना राव एक, सावधान क्यों नहिं होय ॥ 774 ॥




ढोल दमामा दुरबरी, सहनाई संग भेरि ।

औसर चले बजाय के, है कोई रखै फेरि ॥ 775 ॥




मरेंगे मरि जायँगे, कोई न लेगा नाम ।

ऊजड़ जाय बसायेंगे, छेड़ि बसन्ता गाम ॥ 776 ॥




कबीर पानी हौज की, देखत गया बिलाय ।

ऐसे ही जीव जायगा, काल जु पहुँचा आय ॥ 777 ॥




कबीर गाफिल क्या करे, आया काल नजदीक ।

कान पकरि के ले चला, ज्यों अजियाहि खटीक ॥ 778 ॥




कै खाना कै सोवना, और न कोई चीत ।

सतगुरु शब्द बिसारिया, आदि अन्त का मीत ॥ 779 ॥




हाड़ जरै जस लाकड़ी, केस जरै ज्यों घास ।

सब जग जरता देखि करि, भये कबीर उदास ॥ 780 ॥




आज काल के बीच में, जंगल होगा वास ।

ऊपर ऊपर हल फिरै, ढोर चरेंगे घास ॥ 781 ॥




ऊजड़ खेड़े टेकरी, धड़ि धड़ि गये कुम्हार ।

रावन जैसा चलि गया, लंका का सरदार ॥ 782 ॥




पाव पलक की सुधि नहीं, करै काल का साज ।

काल अचानक मारसी, ज्यों तीतर को बाज ॥ 783 ॥




आछे दिन पाछे गये, गुरु सों किया न हैत ।

अब पछितावा क्या करे, चिड़िया चुग गई खेत ॥ 784 ॥




आज कहै मैं कल भजूँ, काल फिर काल ।

आज काल के करत ही, औसर जासी चाल ॥ 785 ॥




कहा चुनावै मेड़िया, चूना माटी लाय ।

मीच सुनेगी पापिनी, दौरि के लेगी आय ॥ 786 ॥




सातों शब्द जु बाजते, घर-घर होते राग ।

ते मन्दिर खाले पड़े, बैठने लागे काग ॥ 787 ॥




ऊँचा महल चुनाइया, सुबरदन कली ढुलाय ।

वे मन्दिर खाले पड़े, रहै मसाना जाय ॥ 788 ॥




ऊँचा मन्दिर मेड़िया, चला कली ढुलाय ।

एकहिं गुरु के नाम बिन, जदि तदि परलय जाय ॥ 789 ॥




ऊँचा दीसे धौहरा, भागे चीती पोल ।

एक गुरु के नाम बिन, जम मरेंगे रोज ॥ 790 ॥




पाव पलक तो दूर है, मो पै कहा न जाय ।

ना जानो क्या होयगा, पाव के चौथे भाय ॥ 791 ॥




मौत बिसारी बाहिरा, अचरज कीया कौन ।

मन माटी में मिल गया, ज्यों आटा में लौन ॥ 792 ॥




घर रखवाला बाहिरा, चिड़िया खाई खेत ।

आधा परवा ऊबरे, चेति सके तो चेत ॥ 793 ॥




हाड़ जले लकड़ी जले, जले जलवान हार ।

अजहुँ झोला बहुत है, घर आवै तब जान ॥ 794 ॥




पकी हुई खेती देखि के, गरब किया किसान ।

अजहुँ झोला बहुत है, घर आवै तब जान ॥ 795 ॥




पाँच तत्व का पूतरा, मानुष धरिया नाम ।

दिना चार के कारने, फिर-फिर रोके ठाम ॥ 796 ॥




कहा चुनावै मेड़िया, लम्बी भीत उसारि ।

घर तो साढ़े तीन हाथ, घना तो पौने चारि ॥ 797 ॥




यह तन काँचा कुंभ है, लिया फिरै थे साथ ।

टपका लागा फुटि गया, कछु न आया हाथ ॥ 798 ॥




कहा किया हम आपके, कहा करेंगे जाय ।

इत के भये न ऊत के, चाले मूल गँवाय ॥ 799 ॥




जनमै मरन विचार के, कूरे काम निवारि ।

जिन पंथा तोहि चालना, सोई पंथ सँवारि ॥ 800॥


कुल खोये कुल ऊबरै, कुल राखे कुल जाय ।

राम निकुल कुल भेटिया, सब कुल गया बिलाय ॥ 801 ॥




दुनिया के धोखे मुआ, चला कुटुम की कानि ।

तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा मसानि ॥ 802 ॥




दुनिया सेती दोसती, मुआ, होत भजन में भंग ।

एका एकी राम सों, कै साधुन के संग ॥ 803 ॥




यह तन काँचा कुंभ है, यहीं लिया रहिवास ।

कबीरा नैन निहारिया, नाहिं जीवन की आस ॥ 804 ॥




यह तन काँचा कुंभ है, चोट चहूँ दिस खाय ।

एकहिं गुरु के नाम बिन, जदि तदि परलय जाय ॥ 805 ॥




जंगल ढेरी राख की, उपरि उपरि हरियाय ।

ते भी होते मानवी, करते रंग रलियाय ॥ 806 ॥




मलमल खासा पहिनते, खाते नागर पान ।

टेढ़ा होकर चलते, करते बहुत गुमान ॥ 807 ॥




महलन माही पौढ़ते, परिमल अंग लगाय ।

ते सपने दीसे नहीं, देखत गये बिलाय ॥ 808 ॥




ऊजल पीहने कापड़ा, पान-सुपारी खाय ।

कबीर गुरू की भक्ति बिन, बाँधा जमपुर जाय ॥ 809 ॥




कुल करनी के कारने, ढिग ही रहिगो राम ।

कुल काकी लाजि है, जब जमकी धूमधाम ॥ 810 ॥




कुल करनी के कारने, हंसा गया बिगोय ।

तब कुल काको लाजि है, चाकिर पाँव का होय ॥ 811 ॥




मैं मेरी तू जानि करै, मेरी मूल बिनास ।

मेरी पग का पैखड़ा, मेरी गल की फाँस ॥ 812 ॥




ज्यों कोरी रेजा बुनै, नीरा आवै छौर ।

ऐसा लेखा मीच का, दौरि सकै तो दौर ॥ 813 ॥




इत पर धर उत है धरा, बनिजन आये हाथ ।

करम करीना बेचि के, उठि करि चालो काट ॥ 814 ॥




जिसको रहना उतघरा, सो क्यों जोड़े मित्र ।

जैसे पर घर पाहुना, रहै उठाये चित्त ॥ 815 ॥




मेरा संगी कोई नहीं, सबै स्वारथी लोय ।

मन परतीत न ऊपजै, जिय विस्वाय न होय ॥ 816 ॥




मैं भौंरो तोहि बरजिया, बन बन बास न लेय ।

अटकेगा कहुँ बेलि में, तड़फि- तड़फि जिय देय ॥ 817 ॥




दीन गँवायो दूनि संग, दुनी न चली साथ ।

पाँच कुल्हाड़ी मारिया, मूरख अपने हाथ ॥ 818 ॥




तू मति जानै बावरे, मेरा है यह कोय ।

प्रान पिण्ड सो बँधि रहा, सो नहिं अपना होय ॥ 819 ॥




या मन गहि जो थिर रहै, गहरी धूनी गाड़ि ।

चलती बिरयाँ उठि चला, हस्ती घोड़ा छाड़ि ॥ 820 ॥




तन सराय मन पाहरू, मनसा उतरी आय ।

कोई काहू का है नहीं, देखा ठोंकि बजाय ॥ 821 ॥




डर करनी डर परम गुरु, डर पारस डर सार ।

डरत रहै सो ऊबरे, गाफिल खाई मार ॥ 822 ॥




भय से भक्ति करै सबै, भय से पूजा होय ।

भय पारस है जीव को, निरभय होय न कोय ॥ 823 ॥




भय बिन भाव न ऊपजै, भय बिन होय न प्रीति ।

जब हिरदै से भय गया, मिटी सकल रस रीति ॥ 824 ॥




काल चक्र चक्की चलै, बहुत दिवस औ रात ।

सुगन अगुन दोउ पाटला, तामें जीव पिसात ॥ 825 ॥




बारी-बारी आपने, चले पियारे मीत ।

तेरी बारी जीयरा, नियरे आवै नीत ॥ 826 ॥




एक दिन ऐसा होयगा, कोय काहु का नाहिं ।

घर की नारी को कहै, तन की नारी जाहिं ॥ 827 ॥




बैल गढ़न्ता नर, चूका सींग रू पूँछ ।

एकहिं गुरुँ के ज्ञान बिनु, धिक दाढ़ी धिक मूँछ ॥ 828 ॥




यह बिरियाँ तो फिर नहीं, मनमें देख विचार ।

आया लाभहिं कारनै, जनम जुवा मति हार ॥ 829 ॥




खलक मिला खाली हुआ, बहुत किया बकवाद ।

बाँझ हिलावै पालना, तामें कौन सवाद ॥ 830 ॥




चले गये सो ना मिले, किसको पूछूँ जात ।

मात-पिता-सुत बान्धवा, झूठा सब संघात ॥ 831 ॥




विषय वासना उरझिकर जनम गँवाय जाद ।

अब पछितावा क्या करे, निज करनी कर याद ॥ 832 ॥




हे मतिहीनी माछीरी! राखि न सकी शरीर ।

सो सरवर सेवा नहीं , जाल काल नहिं कीर ॥ 833 ॥




मछरी यह छोड़ी नहीं, धीमर तेरो काल ।

जिहि जिहि डाबर धर करो, तहँ तहँ मेले जाल ॥ 834 ॥




परदा रहती पदुमिनी, करती कुल की कान ।

घड़ी जु पहुँची काल की, छोड़ भई मैदान ॥ 835 ॥




जागो लोगों मत सुवो, ना करूँ नींद से प्यार ।

जैसा सपना रैन का, ऐसा यह संसार ॥ 836 ॥




क्या करिये क्या जोड़िये, तोड़े जीवन काज ।

छाड़ि छाड़ि सब जात है, देह गेह धन राज ॥ 837 ॥




जिन घर नौबत बाजती, होत छतीसों राग ।

सो घर भी खाली पड़े, बैठने लागे काग ॥ 838 ॥




कबीर काया पाहुनी, हंस बटाऊ माहिं ।

ना जानूं कब जायगा, मोहि भरोसा नाहिं ॥ 839 ॥




जो तू परा है फंद में निकसेगा कब अंध ।

माया मद तोकूँ चढ़ा, मत भूले मतिमंद ॥ 840 ॥




अहिरन की चोरी करै, करै सुई का दान ।

ऊँचा चढ़ि कर देखता, केतिक दुरि विमान ॥ 841 ॥




नर नारायन रूप है, तू मति समझे देह ।

जो समझै तो समझ ले, खलक पलक में खोह ॥ 842 ॥




मन मुवा माया मुई, संशय मुवा शरीर ।

अविनाशी जो न मरे, तो क्यों मरे कबीर ॥ 843 ॥




मरूँ- मरूँ सब कोइ कहै, मेरी मरै बलाय ।

मरना था तो मरि चुका, अब को मरने जाय ॥ 844 ॥




एक बून्द के कारने, रोता सब संसार ।

अनेक बून्द खाली गये, तिनका नहीं विचार ॥ 845 ॥




समुझाये समुझे नहीं, धरे बहुत अभिमान ।

गुरु का शब्द उछेद है, कहत सकल हम जान ॥ 846 ॥




राज पाट धन पायके, क्यों करता अभिमान ।

पड़ोसी की जो दशा, भई सो अपनी जान ॥ 847 ॥




मूरख शब्द न मानई, धर्म न सुनै विचार ।

सत्य शब्द नहिं खोजई, जावै जम के द्वार ॥ 848 ॥




चेत सवेरे बाचरे, फिर पाछे पछिताय ।

तोको जाना दूर है, कहैं कबीर बुझाय ॥ 849 ॥




क्यों खोवे नरतन वृथा, परि विषयन के साथ ।

पाँच कुल्हाड़ी मारही, मूरख अपने हाथ ॥ 850 ॥




आँखि न देखे बावरा, शब्द सुनै नहिं कान ।

सिर के केस उज्ज्वल भये, अबहु निपट अजान ॥ 851 ॥




ज्ञानी होय सो मानही, बूझै शब्द हमार ।

कहैं कबीर सो बाँचि है, और सकल जमधार ॥ 852 ॥







॥ काल के विषय मे दोहे ॥







जोबन मिकदारी तजी, चली निशान बजाय ।

सिर पर सेत सिरायचा दिया बुढ़ापै आय ॥ 853 ॥




कबीर टुक-टुक चोंगता, पल-पल गयी बिहाय ।

जिव जंजाले पड़ि रहा, दियरा दममा आय ॥ 854 ॥




झूठे सुख को सुख कहै, मानत है मन मोद ।

जगत् चबैना काल का, कछु मूठी कछु गोद ॥ 855 ॥




काल जीव को ग्रासई, बहुत कह्यो समुझाय ।

कहैं कबीर में क्या करूँ, कोई नहीं पतियाय ॥ 856 ॥




निश्चय काल गरासही, बहुत कहा समुझाय ।

कहैं कबीर मैं का कहूँ, देखत न पतियाय ॥ 857 ॥




जो उगै तो आथवै, फूलै सो कुम्हिलाय ।

जो चुने सो ढ़हि पड़ै, जनमें सो मरि जाय ॥ 858 ॥




कुशल-कुशल जो पूछता, जग में रहा न कोय ।

जरा मुई न भय मुवा, कुशल कहाँ ते होय ॥ 859 ॥




जरा श्वान जोबन ससा, काल अहेरी नित्त ।

दो बैरी बिच झोंपड़ा कुशल कहाँ सो मित्र ॥ 860 ॥




बिरिया बीती बल घटा, केश पलटि भये और ।

बिगरा काज सँभारि ले, करि छूटने की ठौर ॥ 861 ॥




यह जीव आया दूर ते, जाना है बहु दूर ।

बिच के बासे बसि गया, काल रहा सिर पूर ॥ 862 ॥




कबीर गाफिल क्यों फिरै क्या सोता घनघोर ।

तेरे सिराने जम खड़ा, ज्यूँ अँधियारे चोर ॥ 863 ॥




कबीर पगरा दूर है, बीच पड़ी है रात ।

न जानों क्या होयेगा, ऊगन्ता परभात ॥ 864 ॥




कबीर मन्दिर आपने, नित उठि करता आल ।

मरहट देखी डरपता, चौडढ़े दीया डाल ॥ 865 ॥




धरती करते एक पग, समुंद्र करते फाल ।

हाथों परबत लौलते, ते भी खाये काल ॥ 866 ॥




आस पास जोधा खड़े, सबै बजावै गाल ।

मंझ महल से ले चला, ऐसा परबल काल ॥ 867 ॥




चहुँ दिसि पाका कोट था, मन्दिर नगर मझार ।

खिरकी खिरकी पाहरू, गज बन्दा दरबार ॥




चहुँ दिसि ठाढ़े सूरमा, हाथ लिये हाथियार ।

सबही यह तन देखता, काल ले गया मात ॥ 868 ॥




हम जाने थे खायेंगे, बहुत जिमि बहु माल ।

ज्यों का त्यों ही रहि गया, पकरि ले गया काल ॥ 869 ॥




काची काया मन अथिर, थिर थिर कर्म करन्त ।

ज्यों-ज्यों नर निधड़क फिरै, त्यों-त्यों काल हसन्त ॥ 870 ॥




हाथी परबत फाड़ते, समुन्दर छूट भराय ।

ते मुनिवर धरती गले, का कोई गरब कराय ॥ 871 ॥




संसै काल शरीर में, विषम काल है दूर ।

जाको कोई जाने नहीं, जारि करै सब धूर ॥ 872 ॥




बालपना भोले गया, और जुवा महमंत ।

वृद्धपने आलस गयो, चला जरन्ते अन्त ॥ 873 ॥




बेटा जाये क्या हुआ, कहा बजावै थाल ।

आवन-जावन होय रहा, ज्यों कीड़ी का नाल ॥ 874 ॥







ताजी छूटा शहर ते, कसबे पड़ी पुकार ।

दरवाजा जड़ा ही रहा, निकस गया असवार ॥ 875 ॥




खुलि खेलो संसार में, बाँधि न सक्कै कोय ।

घाट जगाती क्या करै, सिर पर पोट न होय ॥ 876 ॥




घाट जगाती धर्मराय, गुरुमुख ले पहिचान ।

छाप बिना गुरु नाम के, साकट रहा निदान ॥ 877 ॥




संसै काल शरीर में, जारि करै सब धूरि ।

काल से बांचे दास जन जिन पै द्दाल हुजूर ॥ 878 ॥




ऐसे साँच न मानई, तिलकी देखो जाय ।

जारि बारि कोयला करे, जमते देखा सोय ॥ 879 ॥




जारि बारि मिस्सी करे, मिस्सी करि है छार ।

कहैं कबीर कोइला करै, फिर दै दै औतार ॥ 880 ॥




काल पाय जब ऊपजो, काल पाय सब जाय ।

काल पाय सबि बिनिश है, काल काल कहँ खाय ॥ 881 ॥




पात झरन्ता देखि के, हँसती कूपलियाँ ।

हम चाले तु मचालिहौं, धीरी बापलियाँ ॥ 882 ॥




फागुन आवत देखि के, मन झूरे बनराय ।

जिन डाली हम केलि, सो ही ब्योरे जाय ॥ 883 ॥




मूस्या डरपैं काल सों, कठिन काल को जोर ।

स्वर्ग भूमि पाताल में जहाँ जावँ तहँ गोर ॥ 884 ॥




सब जग डरपै काल सों, ब्रह्मा, विष्णु महेश ।

सुर नर मुनि औ लोक सब, सात रसातल सेस ॥ 885॥




कबीरा पगरा दूरि है, आय पहुँची साँझ ।

जन-जन को मन राखता, वेश्या रहि गयी बाँझ ॥ 886 ॥




जाय झरोखे सोवता, फूलन सेज बिछाय ।

सो अब कहँ दीसै नहीं, छिन में गयो बोलाय ॥ 887 ॥




काल फिरे सिर ऊपरै, हाथों धरी कमान ।

कहैं कबीर गहु ज्ञान को, छोड़ सकल अभिमान ॥ 888 ॥




काल काल सब कोई कहै, काल न चीन्है कोय ।

जेती मन की कल्पना, काल कहवै सोय ॥ 889 ॥

॥ उपदेश ॥




काल काम तत्काल है, बुरा न कीजै कोय ।

भले भलई पे लहै, बुरे बुराई होय ॥ 890 ॥




काल काम तत्काल है, बुरा न कीजै कोय ।

अनबोवे लुनता नहीं, बोवे लुनता होय ॥ 891 ॥




लेना है सो जल्द ले, कही सुनी मान ।

कहीं सुनी जुग जुग चली, आवागमन बँधान ॥ 892 ॥




खाय-पकाय लुटाय के, करि ले अपना काम ।

चलती बिरिया रे नरा, संग न चले छदाम ॥ 893 ॥




खाय-पकाय लुटाय के, यह मनुवा मिजमान ।

लेना होय सो लेई ले, यही गोय मैदान ॥ 894 ॥




गाँठि होय सो हाथ कर, हाथ होय सी देह ।

आगे हाट न बानिया, लेना होय सो लेह ॥ 895 ॥




देह खेह खोय जायगी, कौन कहेगा देह ।

निश्चय कर उपकार ही, जीवन का फल येह ॥ 896 ॥




कहै कबीर देय तू, सब लग तेरी देह ।

देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह ॥ 897 ॥




देह धरे का गुन यही, देह देह कछु देह ।

बहुरि न देही पाइये, अकी देह सुदेह ॥ 898 ॥




सह ही में सत बाटई, रोटी में ते टूक ।

कहैं कबीर ता दास को, कबहुँ न आवे चूक ॥ 899 ॥




कहते तो कहि जान दे, गुरु की सीख तु लेय ।

साकट जन औ श्वान को, फेरि जवाब न देय ॥ 900 ॥