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शनिवार, 4 मई 2013

नूर मुहम्मद `नूर'

१.

खेत के बाहर हैं फ़स्लें और पानी खेत में
इतना बरसाया खुदा ने मेहरबानी खेत में


खेत ही था गाँव उनका खेत ही था देश भी
डूब सपनों की गई यूँ राजधानी खेत में


बह गईं सब रोटियाँ-लंगोटियाँ भी बाढ़ में
बच गया आँखों में कुछ, कुछ और पानी खेत में


खनखना उठ्ठेगी फिर सोने के कंगन-सी फ़सल
जब पिघल जाएगी सोने- सी जवानी खेत में।


स्वप्न-ग्रासी योजनाएँ, बघ-नखी दुर्नीति की
ढूँढने पर ‘नूर’ मिलती है कहानी खेत में


२.
इधर पेच है तो मियाँ ,ख़म उधर भी
वही ग़म इधर भी वही ग़म उधर भी


है दोनों तरफ दर्दो-ग़म भूख ग़ुरबत
दवा बम इधर भी दवा बम उधर भी


उजाला यहाँ से वहाँ तक परेशाँ
वही तम इधर भी वही तम उधर भी


किसी से भी कोई न छोटा बड़ा है
वही हम इधर भी वही हम उधर भी


ज़रा-सी मुहब्बत ज़रा-सी शराफ़त
वही कम इधर भी वही कम उधर भी


उखड़ता हुआ ‘नूर’ इंसानियत का
वही दम इधर भी वही दम उधर भी


३.
हमको हर दिन उबाल कर मालिक
हर घड़ी मत हलाल कर मालिक


तेरे नौकर हैं, ठीक है, फिर भी
थोड़ा ढँग से सवाल कर मालिक


कल जो आँधी है, कल जो दहशत है
कल का कुछ तो ख़याल कर मालिक


आज जो कह दिया, कहा लेकिन
कल से कहियो सँभाल कर मालिक


मोच आ जाये ना बुलंदी में
राह चल देखभाल कर मालिक


इन अँधेरों को नूर होना है
तेरी हस्ती उछाल कर मालिक


४.
हक़ तुझे बेशक है, शक से देख, पर यारी भी देख
ऐब हम में देख पर बंधु! वफ़ादारी भी देख


हम ही हम अक्सर हुए हैं खेत, अपने मुल्क में
फिर भी हम ज़िंदा, यहीं हैं, ये तरफ़दारी भी देख


सरफ़रोशी की, लुटाया जिस्मो-जाँ, इल्मो-फ़ुनून
और बदले में ख़रीदा क्या, ख़रीदारी भी देख


लड़ रहे हैं और हम लड़ते रहेंगे तीरगी!
‘नूर’ के हिस्से का ये चकमक जिगरदारी भी देख


५.
इस सदी-सी बेहया कोई सदी पहले न थी
इस क़दर बेआब आँखों की नदी पहले न थी


क्या कहा जाए उजालों के सियह किरदार पर
तीरगीबर्दार ऐसी, रौशनी पहले न थी


पाँव रक्खें तो कहाँ रक्खें बताएँगे हुज़ूर
आपकी धरती तो इतनी दलदली पहले न थी


अब तो यमुना के किनारे भी बहुत वीरान हैं
कृष्ण तेरी बाँसुरी यूँ बेसुरी पहले न थी


क्या कहें इसको तक़ाज़ा वक़्त का या और कुछ
दोस्तों के साथ ऐसी दुश्मनी पहले न थी


मस्लेहत तो है यक़ीनन जानते हैं आप भी
वरना जैसी आजकल है शायरी पहले न थी


६.
सुबह का चावल नहीं है, रात का आटा नहीं
किसने ऐसा वक़्त मेरे गाँव में काटा नहीं


शोर है कमियों ही कमियों का हर इक लम्हा यहाँ
मेरे घर में आजकल कोई भी सन्नाटा नहीं


क्या हुआ पैसे नहीं मिलते, मगर मिलता है सुख
लिखने-पढ़ने में बहुत ज्यादा मगर घाटा नहीं


दर्दो-गम है भूख है पीड़ा है चोटें और दुख
इस नदी में ज्वार तो आए मगर भाटा नहीं

क़र्ज़ की हम भी इधर खाते हैं पीते हैं ‘असद’
नूर, अंबानी नहीं, बिड़ला नहीं, टाटा नहीं


७.
वे ख़ाम-ख़्वाह हथेली पे जान रखते हैं
अजीब लोग हैं मुँह में ज़ुबान रखते हैं


ख़ुशी तलाश न कर मुफ़लिसों की बस्ती में
ये शय अभी तो यहाँ हुक़्मरान रखते हैं


यहँ की रीत अजब दोस्तो, रिवाज अजब
यहाँ ईमान फक़त बे-ईमान रखते हैं


चबा-चबा के चबेने-सा खा रहे देखो
वो अपनी जेब में हिन्दोस्तान रखते हैं


ग़मों ने दिल को सजाया, दुखों ने प्यार किया
ग़रीब हम हैं मगर क़द्रदान रखते हैं


वे जिनके पाँव के नीचे नहीं ज़मीन कोई
वे मुठ्ठियों में कई आसमान रखते हैं


सजा के जिस्म न बेचें यहाँ, कहाँ बेचें
ग़रीब लोग हैं, घर में दुकान रखते हैं।


८.
भूख जब वे गाँव की पूरे वतन तक ले गए
मामला हम भी ये फिर शेरो-सुखन तक ले गए


हम इधर उसके दुपट्टे को रफ़ू करते रहे
वो, उधर शेरों को उसके तन-बदन तक ले गए


आग भी हैरान थी शायद ये मंज़र देखकर
जब उसे तहज़ीब-दाँ घर की दुल्हन तक ले गए


हम पिलाते रह गए अपना लहू हर लफ़्ज़ को
और वे बे-अदबियाँ सत्ता सदन तक ले गए


छेनियाँ, बसुँला, अँगूठे, उँगलियाँ ,ख़्वाबो-ख़याल
हम ही तहज़ीबों को उनके बाँकपन तक ले गए


जबकि हर तोहमत सही , भूखे रहे ए ‘नूर’ हम
फिर भी अपनी प्यास हम गंगो-जमन तक ले गए


९.
बेहयाई, बेवफ़ाई, बेईमानी हर तरफ़
धीरे-धीरे मर रहा आँखों का पानी हर तरफ़


सोचता हूँ नस्ले-नौ कल क्या पढ़ेगी ढूँढकर
पानियों पर लिख रही दुनिया कहानी हर तरफ़


फिर भी कुछ दिखता नहीं जबकि उजाला खूब है
रौशनी-सी, तीरगी की तर्जुमानी हर तरफ़


मुल्क तो दिखता नहीं है मुल्क में यारो कहीं
दिख रही लेकिन है उसकी राजधानी हर तरफ़


किसको-किसको रोइएगा और क्या-क्या ढोइए
एक जैसी लानते और लनतरानी हर तरफ़


१०.
बे-मुल्क हो रहा है जो हिन्दोस्तान में
हर पल समा रहा है मेरे ज़ेहनो-जान में


भाषा तो खैर आपकी दुमदार हो गई
क्या आग भी नहीं है ज़रा- सी ज़ुबान में


यह कौन पूछता है उधर खाँसता हुआ
है और कितनी देर अभी भी बिहान में


कुछ इस तरह से लोग दिले-रहनुमा में हैं
ज्यूँ गंदगी भरी हो किसी नाबदान में


फिरता था जिसके पीछे ज़माना वो आज कल
तन्हा पड़ा हुआ है अँधेरे मकान में


गिरते हो बार-बार अँधेरे में ‘नूर’ तुम
अब भी कहीं कमी है तुम्हारी उड़ान में


११.
पहले घर-घर जाइए, जाकर गुज़ारिश कीजिए
बैठकर एवान में फिर आप साज़िश कीजिए


जीत के पहले वो जोड़े हाथ आए थे, मगर
आपकी बारी है अब जाकर सिफ़ारिश कीजिए


नौकरी की अब नहीं कोई कमी इस मुल्क में
शौक़ से कीजे अपहरण बूट-पॉलिश कीजिए


आज जो जम्हूरियत है मुल्क में यानी कि आप
ज़ोर है बाज़ू में तो फिर आज़माइश कीजिए


और थोड़ा अज़्म थोड़ी सब्र सूरज के लिए
रौशनी होनी है, होगी और ख़्वाहिश कीजिए


१२.
जो बँधी थी गाँठ में वो भी गँवाई हाय हाय
आपकी बंदानवाज़ी रहनुमाई हाय हाय


कब से फैलाए खड़े हैं हाथ, अपने राह में
थामते हैं आप ग़ैरों की कलाई हाय हाय


फिर वही कौरव वही पांडव महाभारत वही
छिड़ रही है फिर उसी जैसी लड़ाई हाय हाय


हम कि दोनों जून की रोटी को भी मँहगे हुए
चाभते हैं आप लंदन की मलाई हाय-हाय


अब कोई क़ातिल , कोई मुजरिम न बख़्शा जाएगा
आपने क्या ख़ूब फ़रमाया, बधाई हाय हाय


क़ाग़ज़ों पे पुल बने सड़कें बनीं फिर क्या हुआ
योजनाओं को लगी आने जम्हाई हाय-हाय


१३.
किन सज़ाओं तक मुझे मेरी ख़ता ले जाएगी
और कितनी दूर तक मुझको वफ़ा ले जाएगी


मुझको अपने रास्ते का इल्म[1] है अच्छी तरह
क्यों कहीं मुझको कोई पागल हवा ले जाएगी


मैं तो अपनी कोशिशों से जाऊँगा जंगल के पार
आपको उस पार क्या कोई दुआ ले जाएगी?


दूर तक सहराओं[2] में पानी की ख़ातिर [3]दोस्तो
मुझको मेरी प्यास की क़ातिल अदा ले जाएगी


ज़िंदगी जब-जब भी आएगी मेरी दहलीज़ पे
माँग कर मुझसे वो थोड़ा हौसला ले जाएगी


‘नूर’ इस अल्हड़ पवन को इस तरह से साध तू
दूर तक दुनिया में वो तेरा कहा ले जाएगी
शब्दार्थ:
  1. ↑ ज्ञान
  2. ↑ रेगिस्तानों
  3. ↑ के लिए
१४.
कितने उजले दिन बचे कितनी हसीं रातें बचीं
जाने कितनी और लफ्ज़ों से मुलाक़ातें बचीं


फ़िक्रो-फ़न शेरो-सुखन से भीग जाना सुबहो-शाम
जानें कितनी और इस मौसम की बरसातें बचीं


कब ज़बाँ ख़ामोश आँखें बंद हो जाएँ कि आ
आ कि मिल-जुल कर तो बतिया लें हैं जो बातें बचीं


बदक़लामी, नफ़रतें औ पैंतरे चालाकियाँ
क्या यही अब लेने देने को हैं सौंग़ातें बचीं


हर कोई यह जानता है क्यों उजाले हैं उदास
इन अँधेरों की अभी भी ‘नूर’ जी , घातें बचीं


१५.
उनका सपना शब्द से पहचान सुन्दर चाहिए
मेरा सपना है कि हिन्दोस्तान सुन्दर चाहिए


ज़िंदगी से छलछलाते शब्द ही मेरे यक़ीन
उनको कविताओं क़ब्रिस्तान सुन्दर चाहिए


फिर कहीं दहशत न होगी फिर न होंगी आफ़तें
आदमी की भीड़ में इंसान सुन्दर चाहिए


क्यों न बन जाएगा सोने का परिंदा मुल्क फिर
सारे फ़िरक़ों में ज़रा ईमान सुन्दर चाहिए


खिलखिलाएँगे नए ताज़ा महकते फूल भी
इस पुराने बाग़ में तूफ़ान सुन्दर चाहिए


चल नहीं सकती अगर दुनिया ख़ुदाओं के बिना
दोस्तो फिर तो नया भगवान सुन्दर चाहिए


ऊब गए हैं लोग पढ़-पढ़ कर असुन्दर संग्रह
‘नूर’ दुनिया को तेरा दीवान सुन्दर चाहिए