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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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गुरुवार, 23 मई 2013

क्षेत्रपाल शर्मा के दोहे


Name KshetrapalSharma, Fathers Name Late Liladhar Sharma. Address:- KshetrapalSharma A-8/29, 3rd floor Sec 15 Rohini ,Delhi 85.  Date of Birth:- 05.09.1950 at Alighrah ( plla,asi), Education:- M.A. English B.A. Honours Hindi with English as main. Joint Director (Retd.)(Official Language) ,E.S.I.C. C.I.G.Marg NewDelhi 110002 Mob no. 9711477046 Email kpsharma05@yahoo.co 


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1

हाथ जेब भीतर रहे, कानों में है तेल
नौ दिन ढाई कोस का वही पुराना खेल .

छिपने की बातें सभी, छपने को तल्लीन
सच मरियल सा हो गया झूट मंच आसीन.

बचपन- पचपन सब हुए रद्दी और कबाड़,
आध – अधूरे लोग हैं करते फ़िरें जुगाड़ .

क्या नेता क्या यूनियन सबके तय हैं दाम,
जीते हैं, पर मर चुके, इतने ओछे काम.

भाषा संकर हो गई ऐसे योग-प्रयोग ,
आसपास दुर्गंध है , फूले फलते रोग.

फिर-फिर कर आती रही एकलव्य की याद ,
उसी अंगूठे के लिए, गुरू की अब फरियाद.

घर -भेदी को ही सदा मिलता आया ताज,
ना था, था ना फ़ंस गया,घर की फूट समाज.

पहर ओढ न चल सके, घर से बेटी आज,
अब भी द्रोणाचार्य-सा, चुप है सभ्य समाज.

बिना किए का भोगते ,जीवन भर यह दंस,
तिमिर सभा में निकष पर, ये सूरज के अंश.

कहीं केवड़ा फूलता कहीं कुरील के वंश,
शर्त यही निर्माण की, पहले हो विध्वंस.
2.
सब कहते हैं हो गया, जानवरों का राज l
मानुष ही भयभीत है, अब मानुष से आज ll

ट्विटर, गुटखा फ़ेसबुक, सब रूमानी ख्याल l
जेवर कट हैं बढ चले, मटरगश्त हैं लाल ll

एसेमेस क्लिपिन्ग और रातचीत के अंश l
बूढे को अब सालता, मोबाइल सा कंस ll

आम आदमी पिस रहा, कानूनों का बोझ l
निर्वचनों , निर्वाचनों में ,रहा पहेली खोज ll

सत्य अहिंसा लग रहा, ये सब बेचें तेल l
बड़का यदि होवन चला, अनिवारज है जेल ll

दागी , बागी हो गए, नौका खेवनहार l
तारेखों में फ़ंस रहे, जनता है लाचार ll

साधु शिरोमणि हो गए, नेता परमानंद l
दाने को मोहताज हैं, बेटा लखमीचंद ll

रिश्ते सब रिसने लगे, नीयत आया खोट l
कोट कचेरी मारे फ़िरें, झगड़े की हैं ओट ll

भले लोग हैं हर समय, लेकिन चुप क्यों आज l
कुछ बदचलनों ने रखा, जब गिरवी सभ्य समाज ll

सरिता सम बहती रहे, अहर्निश रसधार l
वाणी से सब मिलत है, मणी , मुकुट व्यापार ll
3
छीछालेदर हो गई सन्मानों की लाज,
नामा तो अंटी किया , फ़ेंक खोपटा –खाज II

इननें कब किसकी सुनी, जो वे सुन लें आज
चलन यहां बदचलन है , नहीं गिरेगी गाज II

एडी मत्था घिस गया, तब पाया सन्मान 
समय न हत्थे चढ सका, नहीं रहा ये ध्यान II

शब्द चेहरा मोहरा , नीयत लेते भांप 
घडियालों से बच रहे , आस्तीन के सांप II

गिरे आप से आप ही ,लौटाया ये मान 
मान सहित मरना भला, भूल गए ये ग्यान II

ये कहते हम खास हैं ,वे कहते हम खास 
कौन तिलक्धारी बने ,और हो किनका बनवास II 

रफ़्ता रफ़्ता वक्त की , चाल बडी नादान 
जो गिरता है पीठ से ,लेता है पहचान II

तमगे वालों की ठसक , अज़ब गज़ब इतरान
जो थी कौडी दूर की , अब है ठौर ठिकान II
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