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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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बुधवार, 15 मई 2013

बालस्वरूप राही की गज़लें


जन्म: 16 मई 1936,एफ-3/10 मॉडल टाउन,तिमारपुर- दिल्ली
कुछ प्रमुख कृतियाँ: मेरा रूप तुम्हारा दर्पण, जो नितांत मेरी है (तीनों गीत-संग्रह) । राग-विराग (’चित्रलेखा’ के आधार पर ऑपेरा)। दादी अम्माँ मुझे बताओ, जब हम होंगे बड़े, बंद कटोरी मीठा जल, हम सबसे आगे निकलेंगे, गाल बने गुब्बारे, सूरज का रथ (बाल-गीत-संग्रह)। राही को समझाए कौन (ग़ज़लें)।

१.

अक्ल ये कहती है, सयानों से बनाए रखना
दिल ये कहता है, दीवानों से बनाए रखना

लोग टिकने नहीं देते हैं कभी चोटी पर
जान-पहचान ढलानों से बनाए रखना

जाने किस मोड़ पे मिट जाएँ निशां मंज़िल के
राह के ठौर-ठिकानों से बनाए रखना

हादसे हौसले तोड़ेंगे सही है फिर भी
चंद जीने के बहानों से बनाए रखना

शायरी ख़्वाब दिखाएगी कई बार मगर
दोस्ती ग़म के फ़सानों से बनाए रखना

आशियाँ दिल में रहे आसमान आँखों में
यूँ भी मुमकिन है उड़ानों से बनाए रखना

दिन को दिन, रात को जो रात नहीं कहते हैं
फ़ासले उनके बयानों से बनाए रखना

एक बाज़ार है दुनिया जो अगर ‘राही जी’
तुम भी दो-चार दुकानों से बनाए रखना

२.
अचानक दोस्ती करना, अचानक दुश्मनी करना
ये उसका शौक है यारों सभी से दिल्लगी करना

सभी जज़्बात को दीवानगी की हद समझते हैं
ये ऐसा दौर है इसमें संभल कर शायरी करना

अंधेरे आँधियाँ बनकर चिरागों को बुझाते हैं
बड़ा मुश्किल है दुनिया में ज़रा सी रौशनी करना


खिजाएँ ढूँढती फिरती हैं बाग़ों में बहारों को
न लब पर फूल महकाना, न आँखें शबनमी करना

वफ़ा के नाम पर ‘राही’ चलन है बेवफ़ाई का
न इसके नाम अपनी रूह की कोई खुशी करना


3.
ज्ञान ध्यान कुछ काम न आए
हम तो जीवन-भर अकुलाए ।

पथ निहारते दृग पथराए
हर आहट पर मन भरमाए ।

झूठे जग में सच्चे सुख की
क्या तो कोई आस लगाए ।

देवालय हो या मदिरालय
जहाँ गए जाकर पछताए ।

तड़क-भड़क संतो की ऐसी
दुनियादार देख शरमाए ।

माल लूट का सबने बाँटा
हम ही पड़े रहें अलसाए ।

जो बिक जाता धन्य वही है
जो न बिके मूरख कहलाए ।

टिकट बाँटने के नाटक में
धूर्त महानायक बन छाए ।

शिष्टाचार भ्रष्टता दोनों—
ने अपने सब द्वैत मिटाए ।

जहाँ बिछी शतरंज वही ही
शातिर बैठे जाल बिछाए ।

अब के यूँ खैरात बँटी है
सारा किस्सा दिल बहलाए ।

दुर्जन पार लगाता नैया
सज्जन किसका काम बनाए ।

राही तो सीधे-सादे है
कौन भला क्या उनसे पाए ।

4.
उनके वादे कल के हैं
हम मेहमाँ दो पल के हैं ।

कहने को दो पलके हैं
कितने सागर छलके हैं ।

मदिरालय की मेज़ों पर
सौदे गंगा जल के हैं ।

नई सुबह के क्या कहने
ठेकेदार धुँधलके हैं ।

जो आधे में छूटी हम
मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं ।

बिछे पाँव में क़िस्मत है
टुकड़े तो मखमल के हैं ।

रेत भरी है आँखों में
सपने ताजमहल के हैं ।

क्या दिमाग़ का हाल कहे
सब आसार खलल के हैं ।

सुने आपकी राही कौन
आप भला किस दल के हैं ।

5.
जो बात मेरे कान में ख़्वाबो ने कही है
वो बात हमेशा ही ग़लत हो के रही है ।

जो चाहो लिखो नाम मेरे सब है मुनासिब
उनकी ही अदालत है यहाँ, जिनकी बही है ।

टपका जो लहू पाँव से मेरे तो वो चीख़े
कल जेल से भागा था जो मुजरिम वो वही है ।

वो चाहे मेरी जीभ मेरे हाथ पर रख दे
मैं फिर भी कहूँगा कि सही बात सही है ।

इक दोस्त से मिलने के लिए कब से खड़ा हूँ
कूचा भी वही, घर भी वही, दर भी वही है ।

उम्मीद की जिस छत के तले राही रुका मैं
वो छत ही क़यामत की तरह सिर पे ढही है ।

6.
लगे जब चोट सीने में हृदय का भान होता है
सहे आघात जो हँसकर वही इंसान होता है ।

लगाकर कल्पना के पर उड़ा करते सभी नभ पर
शिला से शीश टकराकर मुझे अभिमान होता है ।

सुबह औ' शाम आ-आ कर लगाता काल जब चक्कर
धरा दो साँस में क्या है तभी यह ज्ञान होता है ।

विदा की बात सुनकर मैं बहक जाऊँ असंभव है
जिसे रहना सदा वह भी कही मेहमान होता है ।

अँधेरा रात-भर जग कर गढ़ा करता नया दिनकर
सदा ही नाश के हाथो नया निर्माण होता है ।