" हिन्दी काव्य संकलन में आपका स्वागत है "


"इसे समृद्ध करने में अपना सहयोग दें"

सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
हिन्दी काव्य संकलन में उपल्ब्ध सभी रचनायें उन सभी रचनाकारों/ कवियों के नाम से ही प्रकाशित की गयी है। मेरा यह प्रयास सभी रचनाकारों को अधिक प्रसिद्धि प्रदान करना है न की अपनी। इन महान साहित्यकारों की कृतियाँ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना ही इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य है। यदि किसी रचनाकार अथवा वैध स्वामित्व वाले व्यक्ति को "हिन्दी काव्य संकलन" के किसी रचना से कोई आपत्ति हो या कोई सलाह हो तो वह हमें मेल कर सकते हैं। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जायेगी। यदि आप अपने किसी भी रचना को इस पृष्ठ पर प्रकाशित कराना चाहते हों तो आपका स्वागत है। आप अपनी रचनाओं को मेरे दिए हुए पते पर अपने संक्षिप्त परिचय के साथ भेज सकते है या लिंक्स दे सकते हैं। इस ब्लॉग के निरंतर समृद्ध करने और त्रुटिरहित बनाने में सहयोग की अपेक्षा है। आशा है मेरा यह प्रयास पाठकों के लिए लाभकारी होगा.(rajendra651@gmail.com),00971506823693 (UAE)

समर्थक

रविवार, 12 मई 2013

सुष्मा भण्डारी के दोहे


महानगर में हो रहीं, हत्याएं हर रोज | 
खोजी दस्ता कर रहा ,दिल –ओं-जाँ से खोज || 

समझो तो में आग हूँ ,समझो तो में नीर | 
होलिका बन में जली, समझो मेरी पीर || 

आदर्शो को घुन लगा ,झुलसे सारे मोल | 
मानवता को मारकर, बजा रहे सब ढोल || 

आयाओं की गोद में ,खेल रहे हैं लाल | 
खुद ही लुट कर के कहें, हम है मालामाल || 

दु:शासन लाखों हुए ,कृष्ण हुआ न एक | 
पांचाली की लाज पर, बुरी नजर की रेख || 

जब से भीतर हो गए ,दुनिया के सब ठाठ | 
तब से बाहर हो गयी, माँ-बाबा की खाट || 

अखबारों की सुर्खिया, पढकर सिहरी खाल | 
कैसा जीवन हो गया, जीना हुआ मुहाल ||