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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शुक्रवार, 17 मई 2013

अर्श मलसियानी


१.
मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है
ख़ामोशी भी है आवाज़ भी है

नशेमन के लिये बेताब ताईर
वहाँ पाबन्दी-ए-परवाज़ भी है

ख़ामोशी पे भरोसा करने वालो
ख़ामोशी ग़म का गम्माज़ भी है

मेरी ख़ामोशि-ए-दिल पर न जाओ
कि इस में रूह की आवाज़ भी है

दिल-ए-बेगाना-ख़ूँ दुनिया में तेरा
कोई हमदम कोई हमराज़ भी है

है मेराज-ए-ख़िरद भी अर्श-ए-अज़ीम
जुनूँ का फ़र्श-ए-पा अंदाज़ भी है


२.

इश्क़े-बुताँ का ले के सहारा कभी-कभी
अपने ख़ुदा को हमने पुकारा कभी-कभी

आसूदा ख़ातिरी ही नहीं मतमए-वफ़ा
ग़म भी किया है हमने गवारा कभी-कभी

इस इन्तहाए-तर्के-मुहब्बत के बावजूद
हमने लिया है नाम तुम्हारा कभी-कभी

बहके तो मैक़दे में नमाज़ों पे आ गए
यूँ आक़बत को हमने सँवारा कभी-कभी

३.
जिस ग़म से दिल को राहत हो, उस ग़म का मुदावा क्या मानी?
जब फ़ितरत तूफ़ानी ठहरी, साहिल की तमन्ना क्या मानी?

इशरत में रंज की आमेज़िश, राहत में अलम की आलाइश
जब दुनिया ऐसी दुनिया है, फिर दुनिया, दुनिया क्या मानी?

ख़ुद शेखो-बरहमन मुजरिम हैं इक जाम से दोनों पी न सके
साक़ी की बुख़्ल-पसन्दी पर साक़ी का शिकवा क्या मानी?

इख़लासो-वफ़ा के सजदों की जिस दर पर दाद नहीं मिलती
ऐ ग़ैरते-दिल ऐ इज़्मे-ख़ुदी उस दर पर सजदा क्या मानी?

ऐ साहबे-नक़्दो-नज़र माना इन्साँ का निज़ाम नहीं अच्छा
उसकी इसलाह के पर्दे में अल्लाह मे झगड़ा क्या मानी?

मयख़ाने में तो ऐ वाइज़ तलक़ीन के कुछ उसलूब बदल
अल्लाह का बन्दा बनने को जन्नत का सहारा क्या मानी?

इज़हारेवफ़ा लाज़िम ही सही ऐ 'अर्श' मगर फ़रियादें क्यों?
वो बात जो सब पर ज़ाहिर है उस बात का चर्चा क्या मानी?

४.
तूफ़ान से उलझ गए लेकर ख़ुदा का नाम
आख़िर नजात पा ही गए नाख़ुदा से हम

पहला सा वह जुनूने-मुहब्बत नहीं रहा
कुछ-कुछ सम्भल गए हैं तुम्हारी दुआ से हम

खूँ-ए-वफ़ा मिली दिले-दर्द-आशना मिला
क्या रह गया है और जो माँगें ख़ुदा से हम

पाए-तलब भी तेज था मंज़िल भी थी क़रीब
लेकिन नजात पा न सके रहनुमाँ से हम