" हिन्दी काव्य संकलन में आपका स्वागत है "


"इसे समृद्ध करने में अपना सहयोग दें"

सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
हिन्दी काव्य संकलन में उपल्ब्ध सभी रचनायें उन सभी रचनाकारों/ कवियों के नाम से ही प्रकाशित की गयी है। मेरा यह प्रयास सभी रचनाकारों को अधिक प्रसिद्धि प्रदान करना है न की अपनी। इन महान साहित्यकारों की कृतियाँ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना ही इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य है। यदि किसी रचनाकार अथवा वैध स्वामित्व वाले व्यक्ति को "हिन्दी काव्य संकलन" के किसी रचना से कोई आपत्ति हो या कोई सलाह हो तो वह हमें मेल कर सकते हैं। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जायेगी। यदि आप अपने किसी भी रचना को इस पृष्ठ पर प्रकाशित कराना चाहते हों तो आपका स्वागत है। आप अपनी रचनाओं को मेरे दिए हुए पते पर अपने संक्षिप्त परिचय के साथ भेज सकते है या लिंक्स दे सकते हैं। इस ब्लॉग के निरंतर समृद्ध करने और त्रुटिरहित बनाने में सहयोग की अपेक्षा है। आशा है मेरा यह प्रयास पाठकों के लिए लाभकारी होगा.(rajendra651@gmail.com),00971506823693 (UAE)

समर्थक

सोमवार, 20 मई 2013

आशुतोष द्विवेदी के मुक्तक

जन्म: 02 जून 1982. जन्म स्थान, कानपुर, उत्तर प्रदेश,१९९४ से काव्य-रचना - विभिन्न विधाओं में, जैसे- छंद (घनाक्षरी, सवैया, दोहा, संस्कृत-वर्णवृत्त), गीत, ग़ज़ल, मुक्तक |ब्लॉग dwivediashutosh.blogspot.com
1.
याद से जाते नहीं सपने सुहाने और तुम ।
लौटकर आते नहीं गुज़रे ज़माने और तुम ।
सिर्फ़ दो चीज़ें कि जिनको खोजती है ज़िंदगी -
गीत गाने गुनगुनाने के बहाने और तुम ।

2.
दफ़्तरों में दर्द के शिकवे-गिले होते नहीं ।
मेज़ पर तय आँसुओं के मामले होते नहीं ।
फाइलों में धड़कनों को बंद मत करिए कभी
काग़ज़ों पर ज़िंदगी के फ़ैसले होते नहीं ।

3.
ढल गया दिन और अपना ख्याल तक आया नहीं
रात आई तो किसी कि आरज़ू में कट गई ।
बेरहम दुनिया में जीना था बहुत मुश्किल मगर
ज़िंदगी ख़ामोशियों से गुफ़्तगू में कट गई ।

4.
धडकनें बेचैन साँसों में उदासी है बहुत ।
ऐसा लगता है तुम्हारी रूह प्यासी है बहुत ।
तुम पियो जमकर कहीं कम पड़ नहीं जाए तुम्हें
क्या हमारी बात हमको तो ज़रा-सी है बहुत ।

5.
तेरी महफ़िल में चले आए हैं लाशों कि तरह
और आए हैं तो जी कर ही उठेंगे साक़ी ।
तूने बरसों जिसे आँखों में छिपाए रखा
आज उस जाम को पी कर ही उठेंगे साक़ी ।

6.
ख़्वाब नाज़ुक थे छू लेने से बिखर जाते थे ।
इसलिए हम उन्हें बिन छेड़े गुज़र जाते थे ।
उम्र भर पर्दा हटाया न गया रुख से कभी
पहली कोशिश में ही वो शर्म से मर जाते थे ।

7. 
हमने फिर रेत को मुट्ठी में पकड़ना चाहा
भूल बैठे कि वो हर बार फिसल जाती है ।
हमने सपनों की हक़ीक़त को न समझा अब तक
आँख के खुलते ही ये दुनिया बदल जाती है ।

8.
हर नए मोड़ पे बस एक नया ग़म चाहा ।
गहरे ज़ख्मों के लिए थोड़ा-सा मरहम चाहा ।
हमने जो चाहा उसे पाया हमेशा लेकिन
एक अफ़सोस यही है कि बहुत कम चाहा ।