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सन्देश

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और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शनिवार, 11 मई 2013

ओंकार सिंह

जन्मतिथि: ०४ जुलाई १९५०,जन्म-स्थान: ग्राम- चंगेरी (मुरादाबाद),कृति: संसार हमारा है (गज़ल संग्रह)
१.

यूं कोई दीप मुहब्बत का जलाया जाए
दोस्तों! जिसका ज़माने में उजाला जाए ।

दिल की कश्ती है घिरी वक़्त के तूफानों में
ग़र्क होने से भला कैसे बचाया जाए ।

खून इंसान का जो चूस के फूली है बहुत
ऐसी जोंकों का निशां जड़ से मिटाया जाए ।

ज़हर नफ़रत का जो इंसां के लहू में घोलें
ऐसे नागों से अब इंसां को बचाया जाए ।

मसअला हल कोई बन्दूक नहीं कर सकती
क्यों न हल बैठ के आपस में निकाला जाए ।

नित नये रंग हों खुशबू हो प्यारी-प्यारी
ऐसे फूलों से ही गुलदस्ता सजाया जाए ।

जिससे लोगों के दिमागों में हो नफ़रत पैदा
ऐसी बातों को न अब शेरों में ढाला जाए ।

प्यार की जोत हर इक दिल में जलाकर 'ओंकार'
जग से नफ़रत के अंधेरों को मिटाया जाए ।

२.

हौसलों से तय करेंगे ज़िन्दगानी का सफ़र
ग़म की राहों में भी होगा शादमानी का सफ़र ।

एक होकर हम लड़ें जो मुश्किलाते-दह् र से
खुशनुमा हो जाएगा फिर ज़िंदगानी का सफ़र ।

हमको हैरत से ज़माना देखता रह जाएगा
रंग लाएगा हमारी जांफ़िशानी का सफ़र ।

हम अगर इक दूसरे का हर क़दम पर साथ दें
रास आ जाए हमें भी ज़िंदगानी का सफ़र ।

हम बढ़ाएंगे क़दम जब दोस्ती की राह में
ख़त्म हो जाएगा ख़ुद ही बदगुमानी का सफ़र ।

यूं दिलों में हम जलाएंगे मुहब्बत के दिए
नूर की राहों में गुज़रेगा जवानी का सफ़र ।

कीजिए 'ओंकार' अच्छे काम दुनिया में सदा
बीत जाए कब न जाने ज़िंदगानी का सफ़र ।

३.

ज़द में उदासियों की वतन देखते चलें
आओ फिर एक बार चमन देखते चलें।

मेले न महफ़िलें हैं, न यारों के क़हक़हे
वीरान क्यों है आज वतन देखते चलें ।

किस वास्ते रुखों पै उदासी है आजकल
किस आग में जले हैं बदन देखते चलें ।

चिड़ियों के चहचहाने से कोयल के गीत से
क्यूं गूंजता है अब भी चमन देखते चलें ।

टी.वी के शौक़ में हैं घिरे लोग आजकल
सजती कहाँ है बज़्मे-सुख़न देखते चलें।

फ़स्लें उगा रहे हैं पसीना बहा के जो
चेह् रों की आज उनके थकन देखते चलें ।

किन महफ़िलों में जशने-चिरागां है दोस्तो
है किन घरों में आज घुटन देखते चलें ।

'ओंकार' सीखना है अगर प्यार का सबक़
सागर से इक नदी का मिलन देखते चलें ।