" हिन्दी काव्य संकलन में आपका स्वागत है "


"इसे समृद्ध करने में अपना सहयोग दें"

सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
हिन्दी काव्य संकलन में उपल्ब्ध सभी रचनायें उन सभी रचनाकारों/ कवियों के नाम से ही प्रकाशित की गयी है। मेरा यह प्रयास सभी रचनाकारों को अधिक प्रसिद्धि प्रदान करना है न की अपनी। इन महान साहित्यकारों की कृतियाँ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना ही इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य है। यदि किसी रचनाकार अथवा वैध स्वामित्व वाले व्यक्ति को "हिन्दी काव्य संकलन" के किसी रचना से कोई आपत्ति हो या कोई सलाह हो तो वह हमें मेल कर सकते हैं। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जायेगी। यदि आप अपने किसी भी रचना को इस पृष्ठ पर प्रकाशित कराना चाहते हों तो आपका स्वागत है। आप अपनी रचनाओं को मेरे दिए हुए पते पर अपने संक्षिप्त परिचय के साथ भेज सकते है या लिंक्स दे सकते हैं। इस ब्लॉग के निरंतर समृद्ध करने और त्रुटिरहित बनाने में सहयोग की अपेक्षा है। आशा है मेरा यह प्रयास पाठकों के लिए लाभकारी होगा.(rajendra651@gmail.com),00971506823693 (UAE)

समर्थक

रविवार, 19 मई 2013

बनज कुमार ‘बनज’ के दोहे


१.

रहे शारदा शीश पर दे मुझको वरदान।
गीत गजल दोहे लिखूँ मधुर सुनाऊँ गान।

हंस सवारी हाथ में वीणा की झंकार
वर दे माँ मैं कर सकूँ गीतों का शृंगार।

माँ शब्दों में तुम रहो मेरी इतनी चाह
पल-पल दिखलाती रहो मुझे सृजन की राह।

माँ तेरी हो साधना इस जीवन का मोल
तू मुझको देती रहे शब्द सुमन अनमोल।

अधर तुम्हारे हो गये बिना छुए ही लाल।
लिया दिया कुछ भी नहीं कैसे हुआ कमाल।

माँ तेरा मैं लाड़ला नित्य करूँ गुणगान।
नज़र सदा नीची रहे दूर रहे अभिमान।

माँ चरणों के दास को विद्या दे भरपूर
मुझको अपने द्वार से मत करना तू दूर।

सुनना हो केवल सुनूँ वीणा की झंकार।
चुनना हो केवल चुनूँ मैं तो माँ का द्वार।

मौन पराया हो गया शब्द हुए साकार
नित्य सुनाती माँ मुझे वीणा की झंकार।

माँ मुझको कर वापसी भूले बिसरे गीत
बिना शब्द के ज़िन्दगी कैसे हो अभिनीत।