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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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सोमवार, 13 मई 2013

सुनीता दोहरे के दोहे

देखे इस संसार में भरे पड़े हैवान !
पलक पुतलियाँ थम गयी ढूँढ-ढूँढ इंसान !!

मोह माया के लोभ में भ्रष्ट किया ईमान !
रक्त ही रक्त को बेच रहा बिक गया ईमान !!

वक्त ऐसा आ गया लूट मची चहुँ ओर !
कैसे होगा अंत यहाँ दिखे ना ओर छोर !!

क्यों आये अधरों पर अब कोई मुस्कान !
मात-पिता की उपेक्षा जब करे संतान !!

बना भिखारी राजा कभी रंक बना धनवान !
पलक झपकते तय करे समय बड़ा बलवान !!

इस संसार का मालिक एक है हम उसकी संतान !
जात-पात और धर्म के भ्रम में बने हुये अनजान !!

माटी को रौंद-रौंद कर गढता रूप कुम्हार !
ज्ञानी गुरुजन हल करें उसमें छिपे विकार !!

मुख से बोलो तौलकर बात करो गंभीर !
बुरा किसी को ना लगे ना ह्रदय को पहुंचे पीर !!

आँखें तेरी प्रीत की जैसे श्याम हो राधा बीच !
नयना पुलकित हों सदा रखते इनको भींच !!.

जल में अग्नि सी जले जल गयी सारी पीर !
सोच सखी के दर्द को नैनन बह रहा नीर !!

पलक पुतलियाँ थम गई अश्क हुये गंभीर !
शून्य हो गया धरातल मन हो गया प्राण विहीन !!


असमय मन की वेदना घाव करे गम्भीर !
ह्रदय बीच कुंठा भरी दया हो गई विलीन !!

जीवन की सच्चाई को सिखा रही है पीर !
सिक्कों के दो पहलू को दिखा रही तस्वीर !!

सिसक-सिसक कर जख्मों से टूट गई जंजीर !
गुम् हो गई जब चांदनी तो कैसी हार और जीत !!