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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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सोमवार, 17 जून 2013

काशी जी के दोहे




अल्लाह सबका एक है, राम सभी का राजिक।
यह दुनिया एक दरिया है, ज्ञान नाव गुरू नाविक।

परमारथ में प्रभु बसे, स्वारथ में शैतान ।
रब का कहना मानीये, बनिये नेक इंसान।

एक सहारा राम का, और न दूजा कोय।
राम हों या अल्ला-ताला, पूजा उसी की होय।

एक कैपसूल में दवा, एक कैपसूल में नूर।
समझ गया सो नियरे, ना समझा सो दूर।

तन के भीतर बादल गरजे, नाड़ी में अग्नि धारा।
मैं तो जग में रहा नहीं, पर देखे दुनिया सारा।

जाके हिये हरि बसे, क्यों जाये हरिद्वार।
सर्व व्यापी हरि आपनो, अपना यहीं हरिद्वार।

काला-काला मन है जिनका, तन है तिनका रेशम का।
कठफोड़वा ने गेह बनाया, देख दशा भाई शीशम का।

आज चिता पे तुझे सुलाऊँ, कल है मेरी बारी।
पिया मिलन को आतुर कन्या, कब तक रहे कुँवारी।

जग छुटे कोई गम नहीं, जगदीश छूट न पाये।
जाको छूट गयो जगदीश, वा नर ठौर न पाये।

कौए की कर्कश बोली, कैसे होय मिठास।
निसदिन भक्षण जो करे, जिन्दा-मुरदा मास।

जोंक भली है जोरू से, सटे तो फेंको नोच।
जोरू सटे तो हटे नहीं, हटे तो जग में खोज।

संसद मध्य श्वान सम, लड़े देश का नेता।
जनता का सेवक देखीए, बन रहा आज अभिनेता।