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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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समर्थक

रविवार, 28 जुलाई 2013

डॉ. रघुनाथ मिश्र "सहज"


अधिवक्ता और व्यक्तित्व विकास सलाहकार, एक कवि,लेखक, साहित्यिक आलोचक / टीकाकार,साहित्यिक (हिन्दी) संपादक, प्रकाशक, प्रबंधक,
मोबाइल-09214313946-ईमेल-kshamaraghunath@gmail.com, raghunathmisra@ymail.com
पता-3-K-30, तलवंडी, कोटा-324005 (राजस्थान)
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१. 
मिरा अस्तित्व- मिरी सांस व धड़कन तुम हो.
ये तरक्की -ये खुशी गम -ये उलझन तुम हो.

जब भी भटकूंगा, अंधेरों में, कभी राहों में,
मैं ये समझूंगा, मिरे हित में, वो अड़चन तुम हो .

तुम्हारे प्यार का असर, यकीँ दिलाता है.
मिरी रुनझुन,मिरी झिक-झिक , मिरी तड़पन तुम हो.

धरती पे नृत्य- नित्य, दिख रहे हों जहां साफ,
ये मिरे दिल की परख है, कि वो दर्पन तुम हो.

जीवन है इक किताब, जिसे पढ़ रहे हैं लोग
खुशियों की महक, दर्द का क्रंदन तुम हो.

प्रेम- दया- क्षमा पर , हमलों का है ये दौर,
इन्हीँ जुल्मो सितम के मान का, मर्दन् तुम हो.

जब- जब पडी आवाज, संकटोँ के दौर मेँ,
गर्दन के बदले देश, वो गर्दन तुम हो.


२. 
बिछडे, हुए, ,मिलेँ, तो, गज़ल, होती, है.
खुशियोँ, के गुल खिलेँ, त गज़ल होती है.

वर्शोँ से हैँ, आलस्य के, नशे मेँ हम सभी,
पल, भर अगर हिलेँ तो गज़ल होती है.

होश मेँ आयेँ, अभी ,भी कुछ नहीँ बिगडा,
अब से सही चलेँ, तो गज़ल हो ती है.

जँगल- नदी- पहाड- डगर की रुकावटेँ,
ये हाथ गर मलेँ तो गज़ल होती है.

आसान नहीँ है, ये ज़िन्दगी बडी कठिन
,
हालात मेँ ढलेँ, तो गज़ल होती है.

अंतर है आदमी मेँ -जानवर मेँ इक बडा,
इंसाँ के रूप मेँ न हम, खलेँ तो गज़ल होती है

3.
क्या बनना है अगर आ गया, फिर चिंता की बात नहीँ.
परमारथ का भाव भा गया, फिर चिंता की बात नहीँ.

सोया पडा ज़माना सारा, कौन जगाये- प्रश्न ज्वलंत,
प्रश्न अगर सर्वत्र छा गया, फिर चिंता की बात नहीँ.

बनने की खातिर इक्ज़ुट हैँ, आपस मेँ सब ह्रिदय अगर,
तब बिगाड आंखेँ दिखा गया, फिर चिंता की बात नहीँ.

सुपरिणाम पाने के लायक, कर्म तहे दिल से कर डाला,
प्रतिफल फिर गहरा सता गया, फिर चिंता की बात नहीँ.

गीत खुशी के मचल रहे हैँ, बस अधरोँ तक आने को,
राज़ कोई गर ये बता गया, फिर चिंता की बात नहीँ.

है बस्ती खुश, हर बगिया मेँ,पुश्प-पत्र- फल सभी कुशल हैँ,
अंट-शंट सिरफिरा गा गया, फिर चिंता की बात्त नहीँ.


4.
देखा कुदरत का ऐसा कहर ना कभी.
देखा गुस्से का ऐसा असर ना कभी.

यूँ तो आना व जाना चला ही करे .
देखा होना यूँ अंतिम सफ़र ना कभी .

मार डाले न छोड़े किसी भी तरह.
देखी लहरों में ऐसी लहर ना कभी .

लेखनी लिख ग़ज़ल-गीत ऐसे सदा .
हों मुखर भाव टूटे बहर ना कभी .

कुछ करें अब असरदार यारो उठो .
बद्विचारों का लिले ज़हर ना कभी .

हो 'सहज' ज़िन्दगी जी लें जीभर सभी .
तू बुराई पे हरगिज़ ठहर ना कभी .

5.

सुनता नहीं कोई है बात क्या कीजै .
दुश्मन लगा रहा है घात क्या कीजै .

किसलय के पास आ रहा बसंत यकीनन .
डाली पे पक चुके जो पात क्या कीजै .

चंद मर गए अजीर्ण से है समाचार में .
गावों में भूख पर उत्पात क्या कीजै .

चुनाव आ गए हैं सर पे इस लिए शायद .
उठा लिया है अब आपात क्या कीजै .

कुदरत से थी तनातनी सदियों से चल रही .
यकबयक ये बज्रपात क्या कीजै .

वो था अतीत लौट कर न आयेगा कभी .
आज के हैं हाथ में हालात क्या कीजै .