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सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

ज़ीरो की ग़ज़लें


ग़ज़ल-०१आ रहे दुनिया में जो, रंगी बहारों की तरह,
जा रहे हैं वो यहां से, बस शरारों की तरह.

शहर में चारागरों की, कमी तो कोई नहीं,
फिर यहां रहते सभी क्योंकर, बिमारों तरह?

चाहते आज़ाद करना, और लोगों को यहां,
ज़िन्दगी उन की गुज़रती, गिरफ़्तारों की तरह.

चमन में रहकर ख़िज़ां की, बात क्यों वो कर रहे?
चाहिये उनको तो रहना नौबहारों की तरह.

जिन्होंने चाहा जहां में, ज़ुल्म को कुछ कम करें,
चल दिये वो भी यहां से, गुनहगारों की तरह.

ग़ज़ल-०२

चमन में अब फूल कम क्यों हो रहे?
बाग़बां सारे यहां क्यों सो रहे?

कैसे आयेगी बहार-ए-गुल यहां?
ख़ार ही जब सब चमन में बो रहे.

सारे आलम को समझ लो एक चमन,
फ़ासले दुनिया के अब कम हो रहे.

जल चुका कितना चमन, अब बस करो,
आशियाने वो बचा लो, जो रहे.

देख बर्बादी चमन की सामने,
बुलबुलों के साथ हम भी रो रहे.

ग़ज़ल-०३

इक दिन हम भी टी. वी. का स्टार बन दिखलायेंगे,
नाचने गाने की अपनी वीडियो बनवायेंगे.

अब तो कम्प्यूटर से मिलते सब सवालों के जवाब,
जायें क्यों हम स्कूल को, तालीम घर पर पायेंगे.

चिट्ठियां लिखने की आदत, अब ख़ताम सी हो गई,
गर मिली फुरसत तो बातें फ़ोन पर बतलायेंगे.

बैंक में हम क्यों करें, एक कैशियर का इन्तज़ार,
जब मशीने-कैश से पैसे, यूं ही मिल जायेंगे.

नामाबर की अब हमें कोई ज़रूरत ही नहीं,
अब तो पैग़ाम-ए-मोहब्बत, फ़ैक्स से भिजवायेंगे.

ग़ज़ल-०४

हर मौसम में, हर मुक़ाम पर, याद तुझे ही करते हैं,
दुनिया वाले ख़ुशी मनायें, हम तो आहें भरते हैं.

बसंत आई, बहार लाई, फूल खिले हैं बगिया में,
अपने अरमां तो जैसे पतझड़ में पत्ते गिरते हैं.

धूप में तपते हैं गर्मी से, झुलस रही सारी काया,
दिल के घावों पर ये पसीने, काम नमक का करते हैं.

वर्षा का मौसम बीता है, छत से पानी बन्द हुआ,
लेकिन अपनी आंख के आंसू, अब भी बहते रहते हैं.

सर्दी आई, सिकुड़ रहे सब, आग से लेते हैं गर्मी,
दिल में हमारे आग लगी है, फिर भी ठण्डे रहते हैं.

ग़ज़ल-०५

इस नगरी में आकर हम तो हंसना गाना भूल गए;
महफ़िल जाना भूल गए हम, जशन मनाना भूल गए.

चारों ओर अंधेरा छाया, ऊपर बादल घिर आये,
तरस रहे हैं सब परवाने, शमा जलाना भूल गए.

बीमारी की हालत लेकिन, गर्मी बढ़ती ही जाती,
घावों पर ख़ुद नमक लग रहा, दवा लगाना भूल गए.

तीन तरफ़ सागर की लहरें, फिर भी घर है बे पानी,
बैठ किनारे ख़ाक़ छानते, चमन उगाना भूल गए.

खेल-कूद और नाच-गान से, फ़ुरसत पाई है हमने,
दर्द की बातें याद रहीं बस, और फ़साना भूल गए.

ग़ज़ल-०६

जिस तरफ भी देखिए, बस है ग़ुबार,
सारी बस्ती पर यहां छाया ग़ुबार.

इससे बचकर जायेगा कोई कहां?
सबकी हस्ती में भरा है जब ग़ुबार.

आसमां पर जो सितारे चमकते,
वो भी तो एक रोशनी का है ग़ुबार.

ज़िन्दगी की इब्तदा कोई भी हो,
ज़िन्दगी की इन्तहा तो है ग़ुबार.

मौत का उसको कोई भी डर नहीं,
जिसको प्यारा हो गया है ये ग़ुबार.

ग़ज़ल-०७

साज़ की आवाज में एक दर्द होता है बयां,
मौत में भी ज़िन्दगी का राज होता है निहां.

चमकते हैं जो सितारे अंधेरे में रात भर,
दिन के नीले आसमां में कहां है उनका मकां?

हम किया करते हैं उनसे बात जो बेकार की,
उसका रंगी ख़्वाब में अन्जाम होता है अयां.

जबां ने जो कहा उसको तो समझते हो मगर,
दिल के अन्दर जो छुपा है, वो बयां होता कहां?

हमने जिसको पा लिया था, खो दिया, क्यों ग़म करें?
ये तमाशा बेसबब, दिन-रात होता है यहां.

ग़ज़ल-०८

अब जहां की कोई महफ़िल, दिल को बहलाती नहीं,
दर्द को कुछ कम करे जो, वो दवा आती नहीं.

खिल रहे हैं फूल, लेकिन, रंग फीके लग रहे,
अब गुलों की प्यारी ख़ुशबू, चमन महकाती नहीं.

कोई जाकर उनसे कह दे, ख़त्म हो ये इम्तिहां,
और सहने को ज़फ़ाएं, संग की छाती नहीं.

अंधेरे से हमें अब तो, हो गया गहरा लगाव,
क्या करें, जब दिये में हो तेल पर बाती नहीं.

ज़िन्दगी, बेकार की बातों का है एक सिलसिला,
क्यों न हों ग़मगीन, जब यह बात ही भाती नहीं.

ग़ज़ल-०९
छटा तेरे काले बालों की, किसी घटा से कम नहीं है,
हंसी तेरे होठों की, एक बिजली की चमक से कम नहीं है.

रहे कहीं भी तू, लेकिन मुझको अहसास सदा इसका,
तेरे दिल में मुझको है जो प्यार, किसी से कम नहीं है.

चाहे पास न आ तू फिर भी सूरत तेरी देखेंगे,
बसी तेरी तस्वीर जो मेरे दिल में है, वो कम नहीं है.

घर में चाहे नहीं बुला, पर अपने दिल में रहने दे,
तेरा दिल भी मेरी ख़ातिर, शीश महल से कम नहीं है.

मेरी हालत देख, सभी कह रहे तुझे बेरहम, मगर,
सितम भी सहकर, मुझको तुझसे, प्यार है ज़्यादा, कम नहीं है.

ग़ज़ल-१०

दर्द दिल में, आंख से आंसू भी हैं बहने लगे,
चंद दिन के इश्क़ में, हम कया नहीं सहने लगे?

भले थे लोगों के पहले, प्यार से मिलते थे सब,
इश्क़ होते ही, ज़माने के सितम ढहने लगे.

देखकर हालत हमारी, लोग लेते चुटकियां,
मजनूं, दीवाना, न जाने और क्या कहने लगे.

जब हुआ अहसास, रुसवाई मिलेगी इश्क़ में,
मुंह छुपाकर, अकेलै कमरे में हम रहने लगे.

अब कभी आयें न फन्दे में किसी के इश्क़ के,
सूफ़ियाने हाल में, हम इसलिये रहने लगे.

ग़ज़ल-११

दिल में होता दर्द मगर, फिर भी हम तो मुस्काते हैं,
जो भी हो पसन्द तुमको, बस वो ही तो दिखलाते हैं.

घर में तुम्हारे हो अंधियारा, हमको यह मंज़ूर नहीं,
शमा तुम्हारी जली रहे, हम अपनी शमा बुझाते हैं.

जो तुमको आसान नहीं है, आना मिलने को हमसे,
तो फिर हम ही दर पै तुम्हारे, अपना घर बनवाते हैं.

तुम ही जानो क्या होगा अन्जाम, मौहब्बत करने का,
बिछे तुम्हारी राहों में तो, इतने सारे कांटे हैं.

किसने देखा है मस्ती या प्यार का आलम तुम जैसा,
और लोग तो ख़ुशियों का झूटा ही स्वांग रचाते हैं.

ग़ज़ल-१२

हो चुके थे हादसे, यूं तो बहुत दिल में मेरे,
उनके आने का मगर, रंग और था दिल में मेरे.

ज़हन का पहरा था, दरवाज़े भी सारे बन्द थे,
फिर न जाने कैसे दाख़िल हो गये दिल में मेरे.

रहे थोड़ी देर, पर यादें बहुत सी दे गये,
मीठा - मीठा दर्द और हल्की चुभन दिल में मेरे.

मेरी वहशत का तो अन्दाज़ा लगे इस बात से,
वो नहीं हैं, मगर मैं समझूं, वो हैं दिल में मेरे.

अब तो वो रहते नहीं, फिर भी न जाने कहां से,
टोक देते है, कोई आता है जब दिल में मेरे.

ग़ज़ल-१३

हौले - हौले, चुपके - चुपके, आये वो मेरे कमरे में,
हंगामा कर डाला, मेरे दिल में और मेरे कमरे में.

बहुत बार था उन्हें बुलाया, पर न कभी मेरे घर आये,
यक़ीं नहीं होता था जब वो आ ही गये मेरे कमरे में.

मायूसी छाई होती थी, रहता था सुनसान अंधेरा,
उनके आते ही, जगमग उजियाला है मेरे कमरे में.

अपने तन मन तो उन पर, पहले ही मैंने वार दिये थे,
वार दिया उन पर अब मैंने, जो भी था मेरे कमरे में.

चले गये, पर मस्त कर गये, वो मेरे कमरे में आकर,
उनसे मिलकर लगता है, वो रहते हैं मेरे कमरे में.

ग़ज़ल-१४

हुस्न वाले अगर नहीं होते,
ज़ख़्मी दिल और जिगर नहीं होते.

रास्ते में ही शाम हो जाती,
आप गर हमसफ़र नहीं होते.

कौन ख़्वाबों की बात दोहराता,
ख़्वाब रंगीं अगर नहीं होते.

जल्वा-ए-हुस्न से झुलस जाते,
ज़ुल्फ़ के साये गर नहीं होते.

ःआल-ए-दिल कैसे हम सुना पाते,
हमज़बां यां अगर नहीं होते.

ग़ज़ल-१५

जब इम्तिहान-ए-इश्क़ में हम फ़ेल हो गये,
दुनिया के कारोबार सब, बेमेल हो गए.

महफ़िल में आ गया मेरा दिल, बुलाये बग़ैर,
छोटी ख़ता थी, उम्र भर की जेल हो गए.

उनकी कड़ी सज़ाओं का, एक फ़ायदा हुआ,
दुनिया के सारे ज़ुल्म, हमें खेल हो गए.

लिपटे रहे, उस शोख के तन से, मेरे ख़याल,
बगिया में खड़ा तना, उसकी बेल हो गए.

उल्फ़त की राह में तो खाईं, हमने ठोकरें.
पत्थर दिलों से, हर क़दम पर, मेल हो गए.

ग़ज़ल-१६

जब मिली मेरी नज़र तेरी नज़र से,
ख़ौफ़ मुझको लगा औरों की नज़र से.

याद आता है तेरा गुज़रा ज़माना,
देखना वो शर्म से नीची नज़र से.

लगे है डर मुझे तुझको देखने से,
हो न जाये कुछ कहीं मेरी नज़र से.

सैर गुलशन की करो, पर याद रखना,
वहां बचते रहना मौसम की नज़र से.

खूबसूरत लगोगे तुम और ज़्यादा,
देख लो गर आईना, मेरी नज़र से.

ग़ज़ल-१७

जो गुज़रती आंख के आगे, उसे सब देखते हैं,
गुज़रती जो दिल के अन्दर, उसे शायर देखते हैं.

हमैं लगता है कि उनका हुस्न कुछ ढलने लगा है,
आइने में अब वो अपने को, बहुत कम देखते हैं.

रूप की अंगड़ाइयां, जैसे नदी में बाढ़ आना,
हो रहे मजबूर साहिल, ख़ुद को भीगा देखते हैं.

चमन में तो फूल सारे दीखते हैं ख़ूबसूरत,
हो मगर जिस फूल पर भौंरा, उसे हम देखते हैं.

जब कहा मैंने कि अच्छा, रात में देखेंगे तुमको,
वो ये बोले, रात में तो सिर्फ़ उल्लू देखते हैं.

ग़ज़ल-१८

जो तुम्हारे दिल में है, कर के वही दिखलायेंगे,
अपने दिल की बात भी अब साफ़ ही बतलायेंगे.

करते रहते हैं इरादे, कर नहीं पाये हैं कुछ,
वक़्त अब है आ गया, कुछ कर के भी दिखलायेंगे.

माना घायल किये हैं, तुमने बहुत से दिल यहां,
सबसे ज़्यादा दर्द जिसमें, अपना दिल दिखलायेंगे.

करते रहना तुम ज़फ़ायें, ताल्लुक़ जिससे रहे,
गर बहाना चाहिए, करके ख़ता दिखलायेंगे,

अब तो जीने की तमन्ना, आप के ही वास्ते,
जो ना हो जीना गवारा, मर के हम दिखलायेंगे.

ग़ज़ल-१९

कब तलक काग़ज़ पलटते जाइये,
फ़ाइलों में दिल कहां से लाइये?

इश्क़ के दफ़्तर में आकर देखिये,
हुस्न की फ़ाइल में सब कुछ पाइये.

बैठना ही पड़े गर कुछ देर तक,
ग़ैर को मत पास में बिठलाइये.

जो दिखाना है, बहुत मश्ग़ूल हो,
फ़ाइलों को साथ में ले आइये.

नर्म बिस्तर कर रहा है इन्तज़ार,
सख़्त कुर्सी छोड़, घर आ जाइये.

ग़ज़ल-2०


कश्मकश ये आंख की दिल से हमेशा ही रही,
आग जब दिल में लगी तब आंख से नदिया बही.

दिल ने सोचा एक पर ही, करे अपने को फ़िदा,
आंख की आज़ाद फ़ितरत, कई पर मरती रही.

आंख मेरी सो गई जब, कर के उनका इन्तज़ार,
धड़कनों के साथ, दिल की चाह तब बढ़ती रही.

इश्क़ की बाज़ी में हारा, दिल हमारा चुप रहा,
आंख लेकिन चुप न बैठी, ज़ोर से लड़ती रही.

दर्द सहकर, दिल ने चाहा, ग़म भुलाना चाहिये,
आंख मेरी, पर न भूली, रो के ग़म करती रही.

ग़ज़ल-२१
कौन सी रात है जो तेरे साथ गुज़रेगी,
इसी ख़याल में ये सारी रात गुज़रेगी.

जलाता है, तेरे कूचे में किसी का आना,
मरेंगे, जब रक़ीब की बारात गुज़रेगी.

इश्क़ की प्यास, अश्क़ पीने से नहीं बुझती,
बुझेगी, जब गले से तेरी सांस गुज़रेगी.

बहुत सजदे किये हमने, दुआयें भी की हैं,
तेरी चाहत, मगर अब जां के साथ गुज़रेगी.

गिला क्या कीजिये, चुप रहके, बेवफ़ाई का,
अब तो महफ़िल में, ग़ज़ल बनके, बात गुज़रेगी.

ग़ज़ल-२२

मैं कहीं फ़रिश्ता न बन जाऊं, मुझे डर है बस इस बात का,
फिर ज़मीन पर न उतर पाऊं, यह ख़ौफ़ है दिन-रात का.

मेरा हाथ कोई थाम ले, तो क़दम चलें एक राह पर,
इस दिल को भी तो सुकूं मिले, न हो ख़ून मेरे जज़्बात का.

जो बुला रही मुझे दूर से, वो परी तो लगती अजीब है,
मेरी उस हसीना का होगा क्या, जिसे इन्तज़ार बरात का.

जो न इस जहान में पा सका, उसे पाऊंगा कहीं और क्या?
ये ख़याल है उस ज़हन का, जिसे यक़ीं सूफ़ी की बात का.

मुझे रहने दो अभी इस जगह, कुछ वक़्त और गुज़ार लूं,
जो न मिल सकेगी बहिश्त में, मुझे शौक़ है उस रात का.

ग़ज़ल-२३

मेरा नसीब है वीरानियां फ़ज़ाओं में,
मुझे तो मिल रहीं नाकामियां वफ़ाओं में.

जो तड़पते थे मौहब्बत में कभी मेरे लिए,
चैन मिलता है उन्हें, ज़ुल्म और ज़फ़ाओं में.

दर्द भी हद को पार कर चुका मेरे दिल का,
नहीं इलाज अब इस का कोई दवाओं में.

कल जो लाती थीं मेरे कूंचे में उनकी ख़ुशबू,
आज बस ख़ाक ही उड़ती है उन हवाओं में.

रह गया ख़्वाब ही बनकर, चमन बहारों का,
अब तो टूटा हुआ एक आशियां ख़िज़ाओं में.

ग़ज़ल-२४

तुम मेरे ख़्वाबों की हो सुन्दर परी,
दुनिया चाहे सूखी पर तुम तो हरी.

खोटे निकले सब जहान-ए-इश्क़ में,
बस तुम्हीं हो एक जो बिलकुल खरी.

ऐसी मस्ती है तुम्हारी आंख में,
हो नशीले प्यार की प्याली भरी.

मनचलों पर मरते है अक़्सर हसीं,
तुम हो लेकिन एक सूफ़ी पर मरी.

प्यार ऐसा उसे ही होता नसीब,
जिसने हम जैसी इबादत हो करी.

ग़ज़ल-२५

मेरी वीरानी दुनिया में, फिर से बहार आये क्यों?
एक चलती-फिरती गाड़ी में, रोड़ा कोई अटकाये क्यों?

सूने से आंगन में अपनी चैन की बंसी बजती है,
तोड़ के मेरी बंसी, कोई शहनाइयां बजाये क्यों?

उजियारा लगता है, जैसे आग का हो एक अंगारा,
अंधियारे में मेरे घर में, कोई दिया जलाये क्यों?

प्यार की बातें भूल चुके हैं, बैठे हैं आराम से हम,
प्यार भरी तिरछी नज़रों के, हम पर तीर चलाये क्यों?

घनी निराशाओं से मेरा, दिल है जब आबाद हुआ,
देकर मुझको आशा, मेरे दिल को कोई जलाये क्यों?

ग़ज़ल-२६

मुझको, तेरे ना होने से, बेचैनी सी होती है,
सी-सी करती रात भी मेरे साथ रात भर होती है.

रोज़ सवेरे सुननी चाही, बगिया में आवाज़ तेरी,
तेरी नहीं, मगर कोयल की कूक कान में होती है.

नदी किनारे सोच रहा, तू बैठ नाव पर आ जाए,
इसी लिए लहरों पर मेरी आंख गड़ी ही होती है.

आयेंगे दिन फिर बहार के, फिर से हरियाली होगी,
सोच यही, धरती भी फटकर, दिन गर्मी के सहती है.

एक दिन मेल हमारा होगा, फिर पूरे होंगे सपने,
इस आशा से, मेरे मन को, थोड़ी तसल्ली होती है.

ग़ज़ल-२७

न कमी थी कोई जहान में, कमज़ोर मेरा नसीब था,
सब दौलतें थीं सामने, पर मैं तो एक ग़रीब था.

जो मिला, उसी से ग़म मिला, कोई ग़मगुसार मिला नहीं,
मेरे दर्द को न समझ सका, मेरा दोस्त गरचे तबीब था.

मैं खुला किसी से जब कभी, मेरा ज़हन भी तब खुल गया,
रहे दिल के अरमां बन्द ही, मेरा ज़हन दिल का रक़ीब था.

मुझे अपने पास बुला के फिर, कुछ फ़ासले भी बढ़ा दिये,
रही दूर मंज़िल उफ़्क़ सी, यह सिलसिला ही अजीब था.

शब-ए-वस्ल बेचैनी रही, किया क़ैद ज़ब्त और शर्म ने,
मेरी रात काली रह गई, जब चांद मेरे क़रीब था.

ग़ज़ल-२८

उनकी महफ़िल की तरफ़ जब हम चले,
अपने क़िस्से, हम से भी पहले चले.

हो गये हम भी फ़िदा, उस शोख़ पर,
जिससे हारे, जाने कितने मनचले.

हम तो मरते, जब वो आते सामने,
तीर फिर नज़रों से उनकी क्यों चले?

हुस्न के दरिया में उतरो संभल कर,
भंवर से कुछ दूर ही कश्ती चले.

ज़िन्दगी में इश्क़ एक तूफ़ान है,
इस से बचते रहिये, जब तक बस चले.

ग़ज़ल-२९

याद तुम्हारी, आकर मेरे मन में हलचल कर जाती है,
जैसे पानी में दीपक की ज्योति चमक कर लहराती है.

बगिया में सब फूल खिल रहे, कलियां भी तो निकल रही हैं,
बिना तुम्हारे, मेरे दिल की बगिया उजड़ी रह जाती है.

कोयल वन में कूक-कूक कर, याद किसी की दिला रही है,
तुम बिन, एक हूक सी बनकर, सांस गले में रह जाती है.

जी करता है तुम्हें भुलाने, दिल से तुमको निकाल डालूं,
दिल में जब तक तुम हो, दिल की बेचैनी बढ़ती जाती है.

एक बार बस आकर, अपने हाथों से थामो इस दिल को,
फिर देखो, इस मुर्दा दिल में, कैसे जां वापस आती है.

ग़ज़ल-३०

तुमने मुझसे प्यार किया है, ये बच्चों का खेल नहीं;
औरों जैसा, ऐसा-वैसा, हम दोनों का मेल नहीं.

दिल के अन्दर क़ैद किया, फिर बांहों में है जकड़ लिया;
जैसी मुझको जेल मिली है, वैसी कोई जेल नहीं.

धूप-ताप से मुझे बचाने, दी है तुमने छांव घनी;
प्यार तुम्हारा पेड़ बड़ा है, ये छोटी सी बेल नहीं.

अंधियारे में आकर तुमने, दीप जलाये हैं जगमग;
इन दीपों में तेल प्यार का, ये मामूली तेल नहीं.

दुनिया वाले देख रहे हैं, इम्तहान हम दोनों का;
मुझे यक़ीं है, इम्तहान में, हम हो सकते फ़ेल नहीं.