" हिन्दी काव्य संकलन में आपका स्वागत है "


"इसे समृद्ध करने में अपना सहयोग दें"

सन्देश

मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें,
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
हिन्दी काव्य संकलन में उपल्ब्ध सभी रचनायें उन सभी रचनाकारों/ कवियों के नाम से ही प्रकाशित की गयी है। मेरा यह प्रयास सभी रचनाकारों को अधिक प्रसिद्धि प्रदान करना है न की अपनी। इन महान साहित्यकारों की कृतियाँ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना ही इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य है। यदि किसी रचनाकार अथवा वैध स्वामित्व वाले व्यक्ति को "हिन्दी काव्य संकलन" के किसी रचना से कोई आपत्ति हो या कोई सलाह हो तो वह हमें मेल कर सकते हैं। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जायेगी। यदि आप अपने किसी भी रचना को इस पृष्ठ पर प्रकाशित कराना चाहते हों तो आपका स्वागत है। आप अपनी रचनाओं को मेरे दिए हुए पते पर अपने संक्षिप्त परिचय के साथ भेज सकते है या लिंक्स दे सकते हैं। इस ब्लॉग के निरंतर समृद्ध करने और त्रुटिरहित बनाने में सहयोग की अपेक्षा है। आशा है मेरा यह प्रयास पाठकों के लिए लाभकारी होगा.(rajendra651@gmail.com),00971506823693 (UAE)

समर्थक

शनिवार, 24 अगस्त 2013

मोहम्मद इरशाद


परिचय: 
जन्म: 21 जून 1971,बीकानेर, राजस्थान
प्रकाशनः दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक युगपक्ष, लोकमत, कादम्बिनी, विकल्प, संविद् समेत अनेक स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में १९९० से अनवरत गजल, गीत, कविता, व्यंग्य एवं नाटकों का प्रकाशन।ग़ज़ल-संग्रह-"ज़िन्दगी ख़ामोश कहाँ"


1.
या रब मुझको ऐसा जीने का हुनर दे
मुझसे मिले जो इंसाँ तू उसको मेरा कर दे

नफरत बसी हुई है जिन लोगों के दिल में
परवर दिगार उनको मुहब्बत से भर दे

मैं ख़ुद के ऐब देखूँ ओ लोगों की खूबियाँ
अल्लाह जो दे तो मुझे ऐसी नज़र दे

बेखौफ जी रहा हूँ गुनहगार हो गया
दुनिया का नहीं दिल को मेरे अपना ही डर दे

जो लोग भटकते हैं दुनिया में दरबदर
मोती का ना सही उन्हें तिनकों का तो घर दे

हर हाल में करते हैं जो शुक्र अदा तेरा
‘इरशाद’ को भी मौला तू बस ऐसा ही कर दे

2.
रोज़ो शब का मुआमला क्या है
ज़िन्दगी इस के फिर सिवा क्या है

मुझसे नज़रें मिला के बात करो
तुमसे अच्छा कोई हुआ क्या है

हर सज़ा फिर कुबूल है मुझको
पहले बतलाइये ख़ता क्या है

दीनो-दुनिया तो तुझपे वार चुका
मेरे दामन में अब बचा क्या है

दिल को टूटे हुए ज़माना हुआ
टूटा शीशा तू जोड़ता क्या है

दुनिया ‘इरशाद’ इक पहेली है
तू है नादाँ तुझे पता क्या है

3.
दुनिया में यूँ भी हमने गुजारी है ज़िन्दगी
अपनी कहाँ है जैसे उधारी है ज़िन्दगी

आवाज़ मुझको ना दे ऐ गुज़रे वक्त सुन
मुश्किल से हमने अपनी सँवारी है ज़िन्दगी

कोई ख़ुशी भी पहलू में आई नहीं कभी
मेरी नज़र में अब भी कुँवारी है ज़िन्दगी

सोचो तो जी रहे है तुम्हारे ही वास्ते
जब चाहो माँग लेना तुम्हारी है ज़िन्दगी

हर एक तन्हा छोड़ के कहता है अलविदा
कितनी ये बदनसीब बेचारी है ज़िन्दगी

कैसा ये बोझ दिल पे तिरे है ज़रा बता
‘इरशाद’ आज इतनी क्यूँ भारी है ज़िन्दगी

4.
रोतों को तुम हँसाओगे अच्छा ख़याल है
बिछड़ो को तुम मिलाओगे अच्छा ख़याल है

मुद्दत से जो अँधेरों में डूबे हुए हैं घर
उनमें दीये जलाओगे अच्छा ख़याल है

बचपन से जो नाबिने हैं देखा नहीं है कुछ
उनकों जहाँ दिखाओगे अच्छा ख़याल है

बरसों से जिनके जख़्म सब नासूर हो गये
मरहम उन्हें लगाओगे अच्छा ख़याल है

हकदार थे जो लोग वो कब के ही मर गये
हक उनको अब दिलाओगे अच्छा ख़याल है

‘इरशाद’ तुम तो जी चुके भरपूर ज़िन्दगी
जीना हमें सिखाओगे अच्छा ख़याल है

5.
आप भी मेरी तरह हर गम में मुस्कराइये
इस तरह हर हाल में जीने का लुत्फ उठाइये

बस्तियों में घर बनाना तो बहुत आसान है
मेरी तरह खण्डहरों में आशियाँ बनाइये

करते हो इंसानियत की बातें इतनी दोस्तो
बेसहारों को ज़रा गले से तो लगाइये

बेवजह ए दोस्तो तुम शोर करते हो बहुत
वक्त आये तो वतन पे जाँ भी लुटाइये

कहता है कौन पत्थर होते हैं बेजुबान
जाकर के खण्डहरों में आवाज भी लगाइये


6.
तीरगी अब तो हमें रोशनी सी लगती है
ज़िन्दगी आज हमें ज़िन्दगी सी लगती है

नस्ले आदम के लिए जो भी फना होता है
मौत क्यूँ उसकी हमें ख़ुदकुशी सी लगती है

कैसे कह दूँ कि फरिश्ता है वो देखो उसको
उसकी फितरत तो हमें आदमी सी लगती है

बन के साया जो हमेशा ही मेरे साथ रहा
उसकी सूरत क्यूँ मुझे अजनबी सी लगती है

होश में आएँ तो फिर उन से ज़रा बात करें
उनकी हालत तो अभी बेख़ुदी सी लगती है

दो कदम चल तो सही काँटों पे ‘इरशाद’ कभी
ज़िन्दगी कितनी तुझे मख़मली सी लगती है

7.
थोड़ी सी बेवफाई करली है ज़िन्दगी से
क्यूँ देखते हैं मुझको सब लोग बेरूख़ी से

सूरज का है ये दावा कि रोशन जहाँ मुझसे
मैं तिरगी निकाल के लाया हूँ रोशनी से

चलने से पहले सोच लो इस राहे ज़िन्दगी में
है हादसे ही हादसे मिलना है तीरगी से

चेहरे वही तमाम मेरे सामने हैं आज
ख़्वाबो में जो देखा करता था अजनबी से

क्या छोड़के जायेंगें बच्चों के लिए हम
अब वक्त कर रहा है ये सवाल हम सभी से

‘इरशाद’ तुम भी इनकी बातों में आ गये
शैतान सी फ़ितरत हैं दिखते आदमी

8.
सच बोलो मुलाकात हुई क्या
ख़ुद से ख़ुद की बात हुई क्या

उसने जब मेरा नाम सुना तो
आँखों से बरसात हुई क्या

जब देखो तक रूठे रहते
ये भी कोई बात हुई क्या

सब-कुछ सुना-सुनाया सा है
ये बोलो कोई नात हुई क्या

कुदरत के दस्तूर को छोड़ो
दिल के अन्दर रात हुई क्या

तुम बोलो ‘इरशाद’ कहीं पे
इंसानों की ज़ात हुई क्या

9.
तोड़ा है दिल किसने तुम्हारा बता देते
फिर देखते हम उसको कैसी सज़ा देते

हमको खबर न थी के वो राह-ए-वफा पे हैं
इल्ज़ाम हम भी उसपे कोई लगा देते

वो लोग तो नाबिने थे मंज़िल से बेख़बर
तुमको ख़बर थी राह की उनको दिखा देते

उसका अभी बुलावा आता नहीं अगर
जीते हैं किस तरह से ये तुमको बता देते

बच्चों की थी लड़ाई कहते हम किस को क्या
छोटी सी बात थी उसे कैसे बढ़ा देते

‘इरशाद’ उनके हक में गर देते बयान तुम
बो बेज़बान थे मगर दिल से दुआ देते

10.
तन्हा शुरू किया था जो सफर कैसा है
दिल में तेरे छुपा हुआ वो डर कैसा है

घर छोड़ के तो आ गये जंगल में अब बता
बरसों बिताये जिसमें वो घर कैसा है

साये पे जो तुम्हारे रखता था हर कदम
मंजिल के तलबगार हमसफर कैसा है

छाँव में जिसकी बैठके बचपन गुजारा था
कुछ याद है ऐ दोस्त वो शजर कैसा है

अल सुबह एक तारा मुझसे ये कहता है
अच्छा हूँ मैं इधर बता तू उधर कैसा है

‘इरशाद’ हर एक शख़्स को अपना बनाता है
ना जाने उसके पास ये हुनर कैसा है


11.
मेरे लिए तू ख़ुद को यूँ ख़ुद से ज़ुदा न कर
अच्छा तो यही है कि तू मुझसे मिला न कर

अपनों के दिये जख़्म हैं दौलत मेरे लिए
रहने दे इनको ताज़ा कोई दवा न कर

मुश्किल से ये बुझ पायें हैं शोले मेरे दिल के
जल जायेगा तू देखले इनको हवा न कर

जितना भी हो सके तू कर लोगों की भलाई
अपनी तरफ से तू किसी का भी बुरा न कर

हर वक्त रहना चाहता हूँ तेरे सामने अदना
अपने ख़्याल में तू मुझको बड़ा न कर

‘इरशाद’ लड़ना है तुझे ख़ुद अपने ऐब से
अपनों से बात-बात पे हरगिज़ लड़ा न कर


12.
रखते है इत्तिफाक जब उनके बयाँ से हम
अब क्या कहें बताइये अपनी जबाँ से हम

जिसमें कि बेवफाई का हरगिज़ न ज़िक्र हो
उनकों सुनाये दास्ताँ ऐसी कहाँ से हम

चलते हैं इसमें ज़मीन पे नीची किये नज़र
किरदार में बलन्द हैं इस आसमाँ से हम

वो लोग क्या गये कि दुनिया उमड़ गई
जाएँगे ऐसे देखना कभी इस जहाँ से हम

तुम दो कद़म चले कि बस लड़खड़ा गये
गुज़रे हैं सौ-सौ बार ऐसे इम्तिहाँ से हम

‘इरशाद’ सौ न जीने की दे दुआ
पल की ख़बर नहीं जियें इतना कहाँ से हम

13.

हमने तो सब के वास्ते दिल से ही दुआ की
अब देखते हैं आगे क्या म़र्जी है ख़ुदा की

हमसे वफा की आपने उम्मीद क्यूँ न की
जो बेवफा था उससे ही उम्मीदे-वफा की

अपनों मे भी वो रहता है जैसे है अज़नबी
उसको नहीं ज़रूरत अब कोई सज़ा की

ख़ूने ज़िगर मिला के जलाते अगर चराग़
उसको बुझादे क्या थी औकात हवा की

हर शख़्स की क्यूँ उँगली उठी है तेरी तरफ
मुझको बता क्या तूने कोई ऐसी ख़ता की

जिस हाल में वा रखेगा उस हाल में हूँ ख़ुश
मुझको नहीं तलब किसी भी मालोमात की

सोचो तो गुनहगार है हर आदमी मगर
करता कुबुल कौन है कि मैंने ख़ता की

‘इरशाद’ तुम से मिलके ही अच्छा मैं हो गया
मुझको नहीं ज़रूरत अब कोई दवा की

14.
हमने तो सब के वास्ते दिल से ही दुआ की
अब देखते हैं आगे क्या म़र्जी है ख़ुदा की

हमसे वफा की आपने उम्मीद क्यूँ न की
जो बेवफा था उससे ही उम्मीदे-वफा की

अपनों मे भी वो रहता है जैसे है अज़नबी
उसको नहीं ज़रूरत अब कोई सज़ा की

ख़ूने ज़िगर मिला के जलाते अगर चराग़
उसको बुझादे क्या थी औकात हवा की

हर शख़्स की क्यूँ उँगली उठी है तेरी तरफ
मुझको बता क्या तूने कोई ऐसी ख़ता की

जिस हाल में वा रखेगा उस हाल में हूँ ख़ुश
मुझको नहीं तलब किसी भी मालोमात की

सोचो तो गुनहगार है हर आदमी मगर
करता कुबुल कौन है कि मैंने ख़ता की

‘इरशाद’ तुम से मिलके ही अच्छा मैं हो गया
मुझको नहीं ज़रूरत अब कोई दवा की

15.
अब जा के ज़िन्दगी को समझने लगा हूँ मैं
जब पेचोख़म में इसके उलझने लगा हूँ मैं

पहले ख़ुशी ही रास थी अब हूँ ग़मों में ख़ुश
उनका ख़याल है कि बदलने लगा हूँ मैं

एहसास मेरा आज भी ज़िन्दा है देखिये
तुम धूप में जले तो पिघलने लगा हूँ मैं

तेरी वजह से दुनिया मे मेरा भी है वजूद
किरदार से ही अपने निखरने लगा हूँ मैं

दुनिया के साथ चलके भटकता था रात-दिन
राहे-वफा पे चलके सँभलने लगा हूँ मैं

‘इरशाद’ मुझको आके ज़रा फिर से समेट ले
यूँ तिनका-तिनका देख बिखरने लगा हूँ मैं

16.
वक्त के दरिया मे बहता जा रहा है आदमी
जाने क्या क्या साथ लेता जा रहा है आदमी

आसमाँ पर हैं सितारे उस कदर हैं ख़्वाहिशें
हर कदम पर हाथ मलता जा रहा है आदमी

सौ बरस की उम्र तक जीने की ख़्वाहिश दिल में है
लम्हा-लम्हा क्यूँ मगर मरता जा रहा है आदमी

मंज़िलो की चाहतों में गुम हुआ क्यूँ इस तरह
सिर्फ ख़्वाबों में ही चलता जा रहा है आदमी

नस्ले आदम को कोई दुश्मन नहीं है दूसरा
ख़ुद से ही दुनिया में लड़ता जा रहा है आदमी

देख कर हैरत तुम्हें होती नहीं ‘इरशाद’ क्यूँ
रंग हर लम्हा बदलता जा रहा है आदमी

17.
मुझको जीने का इक वो हुनर दे गया
मेरी बातों में कैसा असर दे गया

अब तो हर शह ज़माने की अच्छी लगे
जाने कैसी मुझे ये नज़र दे गया

चाहे मिट्टी का कच्चा घरौंदा सही
मैं तो बेघर था मुझको वो घर दे गया

उस से मंज़िल का अपनी पता पूछा था
ख़त्म होता नहीं जो सफर दे गया

मुझसे परवाज़ का हौंसला छीन कर
किस लिए मुझे बालो-पर दे गया

उस पे आख़िर मैं कैसे यकीं न करूँ
वो अना के लिये अपना सर दे गया

मुझसे सब-कुछ मेरा छीन कर ले गया
और बदले में दुनिया का डर दे गया

देखो आते हैं ‘इरशाद’ इधर से भी
हमको झोंका हवा का ख़बर दे गया

18.
ऐ ज़िन्दगी हम तुमसे मुलाकात करेंगे
जो बात दिल में है वो ही हम बात करेंगे

तुम सोच के ये रखना दोगी जवाब क्या
जब हम सवालात की बरसात करेंगे

सुन कर रो पड़ोगे तुम ख़ून के आँसू
जब पेश अपने दिन के जज्ब़ात करेंगे

अल्लाह करे आदमी इंसान बन जाये
हम दिल से अपने ये दुआ दिन-रात करेंगे

‘इरशाद’ मेरे दिल की हसरत यही है बस
मरने से पहले तुमसे मुलाकात करेंगे

19.
मंज़िले दर मंज़िले हैं फासले दर फासले
रास्ते दर रास्ते हैं हादसे दर हादसे

सोचता हूँ होगा क्या मासूम से वो लोग हैं
राहबर भटका रहे हैं आज जिनके काफिले

चलते-चलते रूक गया हूँ मैं भी इस उम्मीद पे
लोग जो बिछड़े हुए हैं मुझसे शायद आ मिले

ज़िन्दगी की राह में कुछ लोग ऐसे भी मिले
लफ्ज शोलों से थे उनके गोया वो थे दिलजले

लड़खड़ाती नस्लें अपनी जा रही है किस तरफ
देख कर उठते हैं मेरे दिन में कितने वलवले

रंग होता और ही ‘इरशाद’ के अशआर में
मिल गए होते अगर उस्ताद उसको आप

20.
मैं उनके एतबार के काबिल नहीं रहा
गोया के अच्छे लोगों में शामिल नहीं रहा

सुन के मैं तड़प उठता हूँ फूलों की दास्ताँ
कहते हैं लोग मुझको मैं संगदिल नहीं रहा

हकबात मुझमें कहने की हिम्मत तो आ गई
अपनी नज़र में आज मैं बुज़दिल नहीं रहा

उनका मेरे करीब से निकला जो काफिला
गोया के अब मैं उनकी मंज़िल नहीं रहा

‘इरशाद’ से मिलेगी अब दरिया की मौज क्यूँ
उसको पता है तूफाँ है साहिल नहीं रहा

21.
आदमी ख़ुद से मिला हो तो गज़ल होती है
ख़ुद से ही शिकवा-गिला हो तो गज़ल होती है

अपने जज्ब़ात को लफ्जों में पिरोने वालो
डूब कर शेर कहा हो तो गज़ल होती है

गैर से मिलके जहाँ ख़ुद को भूल जाये कोई
कभी ऐसा भी हुआ हो तो गज़ल होती है

दिल के ठहरे हुए ख़ामोश समन्दर में कभी
कोई तुफान उठा हो तो गज़ल होती है

बेसबब याद कोई बैठे-बिठाये आये
लब पे मिलने की दुआ हो तो गज़ल होती है

सिर्फ आती है सदा दूर तलक कोई नहीं
उस तरफ कोई गया हो तो गज़ल होती है

देखो ‘इरशाद’ ज़रा गौर से सुनना उसको
गुनगुनाती सी हवा हो तो गज़ल होती है


22.
दिल से अपने गम ज़माने का लगाए बैठे हैं
इक अलग ही अपनी दुनिया हम सजाए बैठे हैं

वो ही गर घर से ना निकले तो हमारा क्या कुसूर
हम तो उनके वास्ते पलकें बिछाए बैठे हैं

हम नहीं कहते किसी को हाले दिल अपना मगर
लोग कहते हैं कि हम क्या क्या छुपाए बैठे हैं

मैं ना पूछूँगा सबब उनसे ख़फा होने का अब
ख़ुद ही जब वो गैर को अपना बनाए बैठे हैं

जबके इस अन्जानी दुनिया में कोई उसका नहीं
किसके ख़ातिर फिर वो महफिल को सजाए बैठे हैं

इनका गर ‘इरशाद’ हो तो जान तक दे दें अभी
वो ही अपने होठों पे ताले लगाए बैठे हैं

23.
तन्हा हूँ ज़िन्दगी के सफर में भी दोस्तो
कितने ही ख़्वाब हैं मेरी नजर में भी दोस्तो

आना भी उनका गोया अलामत है मौत की
कुछ हादसे हैं उनकी ख़बर में भी दोस्तो

यूँ ही ख़फा-ख़फा से हुए लोग किस लिए
क्या हादसे हैं मेरे नगर में भी दोस्तो

लिखी हुई है पानी पर तहरीर इसलिए
देखो हैं राज़ इसकी लहर में भी दोस्तों

‘इरशाद’ क्या किसी से भी दुनिया ने की वफा
फिर क्यों है लोग इसके असर में भी दोस्तो

24.
हम से वो पूछते हैं कि क्या है ये ज़िन्दगी
हर शाम है धुआँ-धुआँ हर सुबह रोशनी

अफसोस क्या करें के वो जो दिन गुजर गए
आ मिल गुज़ार ले जो बाकी है ज़िन्दगी

तेरी नज़र पड़ी तो हम क्या से क्या हुए
तू है मेरा ख़ुदा तेरी करते हैं बन्दगी

हमने तो नाम आप से पूछा था आपका
लेते हो नाम गैर का कैसी ये बेख़ुदी

सुबह को जब मिला तो गले मिल के गया था
ऐसे मिला वो शाम को जैसे है अजनबी

‘इरशाद’ ज़िन्दगी को ज़िन्दादिली से जी
मायूस हो के जीना है मानिन्दे ख़ुदकुशी

25.
गैर भी समझो तो हर गम की दवा करते हैं
करे मरने की सही पर वो दुआ करते है

चलो माना कि हमें जीना नहीं आता है
जीने वाले क्यूँ भला हम पे मरा करता है

एक पल में जो बदलते हैं रंगो-बू अपनी
ऐसे लोगों से तो हम यारों बचा करते हैं

राह में जब भी मिले हमसे बेरूख़ी से मिले
जाने फिर क्यूँ वो मेरे घर का पता करते है

अपनी फितरत से जो शैताँ को करदे शर्मिंदा
ऐसे इंसाँ भी क्या दुनिया में हुआ करते हैं

हमने ‘इरशाद’ बुजुर्गों से सुना है अक्सर
जैसी करते है लोग वैसी भरा करते हैं

26.
चढ़ता हुआ दरिया भी उतर जायेगा इक दिन
और तेरा मुकद्दर भी सँवर जायेगा इक दिन

घर जल गया तो तूने ज़बाँ से ना कुछ कहा
ख़ामोश रहना तेरा असर लायेगा इक दिन

अब छोड़ कर जायेगा कहाँ अपना ही साया
तन्हा रहा तो ख़ुदा से भी डर जायेगा इक दिन

तू ना सँवार बार-बार अपने गुरूर को
ये आईना भी टूट बिखर जायेगा इक दिन

तुझ को जब देखने का शऊर आयेगा ‘इरशाद’
हर सिम्त बस ख़ुदा ही नज़र आयेगा इक दिन

27.
आ गया तुमको भी आख़िर फरेब का इल्मो-हुनर
दिन में भी दिखलाते हो तुम जगमगाता सा कमर

जो हकीकत के जहाँ में जी रहे थे अब तलक
ख़्वाब उनको क्यूँ दिखाये क्यूँ जलाये उनके घर

एक इंसाँ था ये पहले आज क्यूँ पत्थर हुआ
जाने क्या गुज़री है इस पर क्या पता किसको ख़बर

गर उतरना चाहते हो दिल में मेरे तो सुनो
हाथ तो तुमने मिलाये हैं मिला अब नज़र

किसकों फुरसत है जो सोचे हम कहाँ तक आ गये
भागती इस ज़िन्दगी में सब के सब हैं बेख़बर

मंज़िले ही मंज़िले हैं ज़िन्दगी की राह में
ख़त्म होगा मौत की बाँहों में जाकर ये सफर

दास्ताँ सुन करके मेरी रो पड़े ‘इरशाद’ क्यूँ
गम का रिश्ता है मेरा तुम से ये जिसका है असर

28.
पत्थर हैं लोग सब यहाँ ज़ज्बात कुछ नहीं
किससे करें हम बात यहाँ बात कुछ नहीं

वैसे तो रोज़ मिलते हैं दुनिया की नज़र में
दिल की न बात हो वो मुलाकात कुछ नहीं

औरों की बात अपनी ज़बाँ से जो कहते हैं
ऐसे लाचार लोगों के ख़यालात कुछ नहीं

दुनिया-ए-दिल को अपनी जो आबाद रखते हैं
फिर उनके सामने ये कायनात कुछ नहीं

किस्मत में जिनके लिखी है सियाह रात
उनकी नज़र में फिर ये दिन रात कुछ नहीं

29.
उफ ये घुटन और ये अंधेरा अजीब लगता है
शायद मेरा घर यहीं करीब लगता है

रोज़ बनता हूँ फिर यूँ ही मिट जाता हूँ मैं
अब तो अपना बस यही नसीब लगता है

सबका तू है पर यहाँ तेरा नही कोई
मेरी तरह तू कितना बदनसीब लगता है

तुझको चाहा है मैंने कुछ इस तरह ऐ दोस्त
मेरा साया ही मुझे अब रकीब लगता है

सब-कुछ तेरे पास है और सब पे इख़्तियार
शक्ल से तू फिर भी कितना गरीब लगता है 

30.
हमसे कसम हर बात पे खाई नही जाती
लजों से आग दिल में लगाई नही जाती

पहले तो हर ख़ुशी में हम गाते थे झूम के
अब क्या हुआ वो रस्म निभाई नही जाती

गर ज़िस्म जख़्मी हो तो दिखाई दे वो सबको
हो रूह लहू-लहू तो दिखाई नहीं जाती

सब की ज़बाँ पे है यहाँ अपनी ही दास्ताँ
ये और बात है कि सुनाई नहीं जाती

अपने ही घर में जो हम दोनों को बाँट दे
ऐसी कोई दीवार उठाई नहीं जाती

‘इरशाद’ तेरी कोशिशें कुछ काम आ सके
नफरत की आग हम से बुझाई नहीं जा

31.
पेड़ से होकर जुदा पत्ते ने दी है ये दुआ
जा भला तेरा करेगा ए-हवा मेरा ख़ुदा

किससे अब शिकवा करें हम कौन सुनता है यहाँ
मान ले ऐ दिल तू अब तो जो हुआ अच्छा हुआ

जब पलट के देखता हूँ दूर तक कोई नहीं
रोज़ पीछा करती मेरा जाने है किसकी सदा

बनके नश्तर हर सितारा ज़िस्म में चुभता रहा
पल-दो पल की बात छोड़ो रात भर ऐसा हुआ

तूने ऐ ‘इरशाद’ यूँ ही वक्त जाया कर दिया
ख़्वाब में खो कर के किससे रात भर सोता रहा32.

ख़ामोश कहाँ जिन्दगी आवाज देती है
सुन कर तो देख जीने का हर राज़ देती है

जो आसमाँ छूने का रखता है हौंसला
उसको बलन्द ज़िन्दगी परवाज़ देती है

इस ज़िन्दगी के सुर में जो सुर मिला सके
कितना सुरीला ज़िन्दगी उसे साज़ देती है

उसके हुकुम को जो भी बजा लाता है ज़नाब
इंसानियत का आदमी को ताज़ देती है

‘इरशाद’ सब से मिलना अदब और प्यार से
ये दुनिया कितना फिर तुम्हें एज़ाज़ देती है

32.
कुछ हादसे हैं जो कि भुलाये नही जाते
सब याद हैं पर अश्क बहाये नही जाते

माना कि वक्त जख़्मो को भर देगा एक दिन
लेकिन निशाने-जख़्म मिटाये नही जाते

देखें हैं अपनी आँखों से मंज़र वो खौफनाक
ऐसे में ख़्वाब हमसे सजाये नहीं जाते

गर ज़िस्म ज़ख्मी होतो दिखाई दे सभी को
हो रूह पे दाग तो वो दिखाये नही जाते

आँखों में खौफ आज भी बच्चों के वो देखो
ऐसे में ये तो हमसे सुलाये नही जाते

‘इरशाद’ लोग कैसे लड़ाते हैं अपनों को
फितने तो ऐसे हमसे उठाये नही जा

33.
ज़िक्र मेरा जो बुराई में भी करता होगा
गैर तो होगा नहीं वो कोई अपना होगा

चाँद को पाने की ज़िद उसकी बज़ा है लेकिन
वो कोई दाना नहीं होगा तो बच्चा होगा

इक कदम चलके जो रूक जाता है तन्हा अक्सर
अपने साये यकीनन ही वो डरता होगा

रू-ब-रू होने से क्यूँ डरते हो उससे आख़िर
दरमियाँ उसके तेरे आज भी पर्दा होगा

वक्त निकला तो तुम्हें कुछ भी ना होगा हासिल
वक्त रहते तुम सँभल जाओ तो अच्छा होगा

ज़ुस्तजु ले के गई उसको ये जाने किसकी
मारा-मारा वो यूँ ही शहर में फिरता होगा

रहते ‘इरशाद’के महफिल मे वो छाए कैसे
उसने ऐसा तो किसी ख़्वाब में देखा होगा


34.
जीने की मैं बात करूँ तो उसको धोखा लगता है
तू तो मेरा हम साया है तुझको कैसा लगता है

अच्छे-बुरे सारे लोगों को उसने गले लगाया है
सच पूछो तो उसका दिल मुझको दरिया लगता है

अपनी नज़रो में वो ख़ुद को समझे दानिश्वर लेकिन
बातों से तो वो मुझको अब भी बच्चा लगता है

दुनिया में अब प्यार ही होगा नफरत सब मिट जायेगी
तुम बोलो ऐ-दोस्त क्या तुमको ऐसा होता लगता है

उसके दिल की क्या जानूँ मैं उस पे क्या क्या गुजरी है
शक्लों-सूरत से वो मुझको बिलकुल अच्छा लगता है

उस को ऐ-‘इरशाद’ तुम अपना हम साया भी कहते हो
कभी-कभी वो ही इंसाँ क्यूँ तुमको पगला लगता 

35.
मालूम है मुझे की चाँद दागदार है
रूसवा करूँ मैं कैसे बचपन का यार है

वो लोग फिक्रमन्द हैं जिनको मिले हैं गुल
मैं मुतमईन हूँ मेरे हिस्से में ख़ार है

आके खड़ी है ज़िन्दगी अपना बढ़ा तू हाथ
क्या सोचता है तुझको किसका इंतज़ार है

उसने लगाया था कभी मेरे घर के सामने
शक्ले शजर में उसकी ताज़ा यादगार है

दुनिया है उनके साथ तो इसकी ना फिक्र कर
‘इरशाद’ तेरे साथ तो परवर दिगार है